logo

सोशल मीडिया से सिकुड़ती जा रही युवा मानसिकता

Youth mentality is shrinking due to social media



स्मृति उपाध्याय

सहायक प्रोफेसर
डॉ. भीमराव आंबेडकर कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय


वर्तमान समय में सोशल मीडिया का प्रयोग हर उम्र वर्ग के लोग कर  रहे हैं। परंतु आम जन ये स्वयं महसूस कर सकते हैं कि वर्ष 2019 में आए कोविड 19 एवं लॉकडाउन के प्रभाव में सोशल मीडिया की उपयोगिता तेजी से बढ़ी। सोशल मीडिया का लगातार विस्तार संपर्क का अच्छा साधन बन गया है। इसका उपयोग काफी बड़े पैमाने पर अब राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संचार तथा अन्य क्षेत्रों में  जरूरत के हिसाब से किया जा रहा है। आप सोशल मीडिया के सामाजिक नेटवर्किंग वेबसाइट से चिर-परिचित ही होंगे। जिनमें प्रमुख रूप से  यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, ट्विटर यानी कि एक्स, लिंक्ड-इन, माइस्पेस, साउंडक्लाउड, ओमेगल आदि शामिल हैं। वास्तव में सोशल मीडिया मोबाइल और वेब आधारित टेक्नोलॉजी का एक ऐसा सम्मिश्रण है, जिसके माध्यम से व्यक्ति अथवा समूह विभिन्न प्रयोग जनित सामग्री का संप्रेषण अथवा उपयुक्त प्लेटफार्मों पर विचार विमर्श या वार्ता कर सकते हैं।  अत: यदि सोशल मीडिया की परिभाषा  की बात करें तो ये इंटरनेट आधारित विभिन्न अनुप्रयोगों का एक ऐसा समूह है जो कि उपयोगकर्ता संबंधित विभिन्न कार्यों के सम्पादन एवं अनुप्रयोगों को सुनिश्चित करता है। वर्तमान में युवाओं में सोशल मीडिया के प्रति एक अलग तरह का उत्साह या ललक (क्रेज) देखा गया है, जो कि अत्यधिक प्रयोग में लिये जाने के कारण घातक परिणामों में परिवर्तन हो रही है।

सोशल मीडिया का लगातार बढ़ता प्रयोग विशेषकर युवाओं में एक चिंता का विषय है। हालांकि सोशल मीडिया का प्रभाव पूर्णत: नकारात्मक नहीं है। इसके दो पहलुओं में से एक सकारात्मक पक्ष भी होता है। परंतु सोशल मीडिया का अंधाधुंध उपयोग संभवत: भविष्य में कई चुनौतियों  का कारण बनता जा रहा है। हाल के वर्षों में एक ओर जहां बच्चों में साथ ही किशोरों द्वारा मोबाइल स्क्रीन पर बिताए जाने वाले समय में इजाफा देखा गया है, वहीं  सामाजिक और पारिवारिक परिवेश में आपके संचार के कम होने की खबरें भी आई हैं। विभिन्न सोशल मीडिया साइट्स की उपलब्धता ने 'मित्रों' की संख्या में इजाफा किया है पर क्या ये मित्र वास्तव में 'मित्र समान' हैं? ये प्रश्न प्रत्येक युवा के  समक्ष उपस्थित है। भले ही सोशल मीडिया संचार का बेहतरीन साधन बन गया है पर यह आम दिनचर्या की बातों को  सोशल नेटवर्किंग साइट्स की बातें प्रतिस्थापित नहीं कर सकती।

सोशल मीडिया का लगातार प्रयोग युवाओं में एक तरह की लत या लत का कारण बन जाता है। इस लत से उबर पाना एवं स्वयं पर नियंत्रण रख पाना ये आज प्रत्येक युवाओं के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है। वास्तव में आज का युवा अपने रुचि और महत्व के हिसाब से अधिक कार्यक्रम या विषयों को सोशल मीडिया पर ही देखता-सुनता है, लेकिन एक ही तरह की सामग्री को बार बार देखना और सोशल मीडिया से खुद को कड़े प्रयास के बाद भी अलग नहीं कर पाना अक्सर युवा पीढ़ी की सिकुड़ती  मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे में बच्चों के दिमाग का स्वच्छ विकास बाधित होता है। जानकारी बढ़ती है लेकिन साथ ही बच्चों एवं किशोरों का सृजनात्मक विकास की क्षमता का विकास नहीं हो पाता है। परिणामस्वरूप बच्चे या किशोर के अंदर चिड़चिड़ापन और गुस्से का विकास होने लगता है। यह एक न छुटने वाले नशे के समान हो जाता है।

पठन-पाठन या शोध संबंधित विकास की बात करें तो पहले इन सामग्रियों को जुटाने  में काफी समय खर्च होता था। पर आज तमाम तरह की जानकारी हमें केवल एक क्लिक (गूगल) पर हमें आसानी के साथ  उपलब्ध हो जाती है। आधुनिकता के इस दौर में आज-कल AI और CHAT GPT का भी प्रयोग सोशल मीडिया के माध्यम से काफी बड़े पैमाने पर की जा रही है। इस प्रकार के सोशल मीडिया  एप्लिकेशन की उपलब्धता ने युवाओं को विषय विशेष के प्रति कैज़ुअल बना दिया है, अर्थात छात्रों में संजीदगी की कमी महसूस की जा सकती है। आज की युवा पीढ़ी कम मेहनत में अधिकतम परिणाम की आकांक्षा करती है। उनका यह सोचना होता है कि सभी चीजों की उपलब्धि आसानी के साथ बिना समय गंवाए हो जाए। ये मानसिकता हमारी युवा पीढ़ी की कार्योत्पादक क्षमता और विकास को प्रभावित कर सकती है एवं सभी प्रकार की जानकारी के लिए इन नेटवर्किंग साइट्स पर निर्भरता भी व्यक्ति विकास में बाधा है।

16-35 वर्ष की जो युवा पीढ़ी अगर पठन-पाठन के कामों में संलग्न है तो उन्हें अपने शिक्षाकों एवं परिजानों से अक्सर मोबाइल एत्यादि के कम अनुप्रयोगों की बातें सुनी ही होंगी। आखिर ऐसा क्यों है इसका एक बड़ा कारण ये है कि इन नेटवर्किंग साइट्स पे कई ऐसी जानकारियां उपलब्ध हैं जो या तो उस विशेष वर्ग के लिये उपयुक्त नहीं हैं अथवा उनका कोई उपयोग नहीं है और जानकारी के अभाव में अक्सर विद्य़ार्थी वर्ग दिग्भ्रमित करने वाले कंटेट या लेखनी का शिकार हो जाते हैं।  जल्दी ही प्रसिद्धि पाने के लिए "ट्रेंड्स" का अनुसरण करना, मित्रों की संख्या बढ़ाना आदि व्यर्थ की चीजों  से घिर कर अवसाद का शिकार हो जाते हैं। साथ ही सोशल मीडिया का अधिक प्रयोग करने से और बढ़ते स्क्रीन टाइम की वजह से आंखों में जलन, सिर दर्द, नींद नहीं आने जैसी दुनिया भर के  दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

वास्तव में मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है एवं युवा पीढ़ी इस समाज की रीढ़ की हड्डी है। हमारी युवा पीढ़ी ही देश की दशा एवं दिशा का निर्धारण करती है। युवा पीढ़ी जिन तरिके के कामों में संलग्न होगी हमारे देश का भविष्य भी उन्हीं तथ्यों पर निर्भर करेगा। अत: युवा पीढ़ी में सोशल नेटवर्किंग साइट्स के उचित अनुप्रयोगों को लेकर जागृति मुहिम चलाना होगा। अक्सर हमनें खबरों में साइबर क्राइम, पब-जी जैसे घातक गेम्स की लत लगने और इन्हीं  कारणों से  आत्महत्या की खबरें सुनी हैं जो किसी भी तरह से सही नहीं हैं। एक समय पर विश्व गुरु रह चुके भारत में जहां आध्यात्मिकता की गंगा बहती थी, वहां का युवा विभिन्न योग क्रियाओं के बल पर मानसिक रूप से स्वस्थ हो सकता था, ऐसे में अगर भारत में यदि युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित एवं मानसिक रूप से संकीर्ण होती जाएगी तो इसके लिए मजबूती के साथ  समाज के प्रत्येक वर्ग को दृढ़ संकल्पित होकर आगे आना होगा तथा इस सोच को खत्म करने के साथ ही सोशल मीडिया के नकारात्मक पक्ष के खिलाफ लोगों को जागरूक करना होगा।

सोशल मीडिया के लगातार गलत प्रयोग तथा नकारात्मक पक्ष के प्रति सरकार को विभिन्न कानून एवं नियमों के माध्यम से प्रभावी अंकुश स्थापित करना चाहिए। जिस तरह से सोशल नेटवर्किंग साइट्स के नकारात्मक पक्ष से युवा पीढ़ी का भविष्य अंधकार में जा रहा है, उसको देखते हुए उनको प्रतिबंधित करना चाहिए। जैसा विश्व के अन्य देश यानी कि चीन, जापान, के साथ ही अन्य की विकसित देश आदि करते हैं। माँ- बाप को भी बच्चों के सोशल मीडिया गतिविधियों की जानकारी रखनी चाहिए। इसके साथ ही 8 से 14 साल के बच्चों को किन सामग्री को देखना चाहिए उसके अनुरूप मोबाइल या पर्सनल कंप्यूटर में सेटिंग कर के रखना चाहिए। कई बार इन साइट्स पर अश्लील, क्रूर एवं वीभत्स सामग्रियां उपलब्ध होती हैं जो कि अप्रयोजनीय होती हैं। अत: इनकी सुनिश्चितता की जांच स्वयं परिजन करें। बच्चों को विभिन्न पौराणिक कथाएं, धर्मग्रंथों, जीवनियों को पुस्तकों के माध्यम से लिखना-पढ़ना सिखाएं िजससे बच्चों में देश और समाज की प्रति उच्च नैतिक मूल्यों का भी समावेश हो।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

Comments (1)

Totally agreed

Leave Your Comment

 

 

Top