भारत अपने स्वदेशी हथियारों के जखीरे को और घातक बना रहा है। सुखोई और तेजस जैसे भारतीय वायुसेना के प्रमुख लड़ाकू जहाजों को इतना खतरनाक बनाया जाएगा कि चीन और पाकिस्तान जैसे दुश्मन कभी भी चैन की नींद नहीं सो पाएंगे।
हमारा पूर्ण स्वदेशी फायटर जेट तेजस को सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनी हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड ने बनाया है। अब तेजस फाइटर जेट में ऐसा रडार लगाया जा रहा है, जो दुनिया के किसी भी एडवांस्ड जेट में भी नहीं है। डीआरडीओ की इलेक्ट्रॉनिक्स एंड रडार डेवलपमेंट इस्टेब्लिशमेंट ने ऐसा रडार डेवलप किया है, जिसकी नजर से दुश्मनों का बचकर निकलना नामुमकिन हो जाएगा। इस रडार की मदद से टारगेट का पता लगाकर सटीक प्रहार करना भी आसान होगा। युद्ध काल में यह सिस्टम काफी कारगर और मारक सिद्ध हो सकता है। इसे गैलियम नाइट्राइड (GaN) बेस्ड एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार कहा जाता है।
तेजस फाइटर जेट को GaN आधारित रडार सिस्टम से लैस करने की तैयारी चल रही है। ऐसा होने पर तेजस MK1 रडार से बच निकलने के मामले में फ्रांस के राफेल से भी आगे निकल जाएगा। GaN बेस्ड रडार को खासतौर पर तेजस MKI और इसके उन्नत संस्करण MK1A के लिए डेवलप किया गया है। यह रडार 912 टीआरएम से लैस होगा जो मौजूदा राफेल फाइटर जेट के रडार से ज्यादा उन्नत है
GaN बेस्ड AESA रडार ज्यादा पावर एफिशिएंट होने के साथ ही ज्यादा डिटेक्शन रेंज से भी लैस होगाय़ इस रडार को इलेक्ट्रॉनिकली जाम कर पाना काफी मुश्किल होगा। GaN AESA रडार अपने पूर्ववर्ती से कहीं ज्यादा ताकतवर है। क्योंकि यह रडार एक साथ कई दुश्मनों का पता लगाने और उसे ट्रैक करने में भी सक्षम है। ज्यादा साफ तस्वीर भेजने की वजह से एयर-टू-एयर और एयर-टू-मिशन को अंजाम देने में यह काफी मददगार साबित होगा। तेजस MKI फाइटर जेट साल 2026 तक अत्याधुनिक GaN AESA रडार के साथ उड़ान भरने वाला भारत का पहला एयरक्राफ्ट होगा। इस रडार की एक खासियत यह भी है कि यह जल्दी गर्म नहीं होता है, जिससे इसकी काम करने की क्षमता काफी बढ़ जाताी है।
तेजस के अलावा भारत अपने रूस से मिले सुखोई-30 MKI फायटर जेट को भी और घातक बनाने में जुटा हुआ है। भारतीय वैज्ञानिक सुखोई-30 MKI में विरुपाक्ष (Virupaksha) रडार लगाने का काम शुरू कर चुके हैं। यह बेहद उन्नत देसी रडार सिस्टम है। यह भी गैलियम नाइट्राइट आधारित रडार है जिसके एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे (AESA) सिस्टम काफी दूरी से स्टील्थ फाइटर जेट्स को डिटेक्ट कर लेता है। रडार सिस्टम में इस अपग्रेडेशन से सुखोई-30 MKI अपग्रेड होकर 4.5 पीढ़ी के फाइटर जेट्स बन जाएंगे। क्योंकि अपग्रेडेड 4.5 पीढ़ी के फाइटर जेट्स की सबसे बड़ी ताकत यही होती है कि वे मौजूदा वक्त के अधिकतर रडार सिस्टम की पकड़ में नहीं आते। वीरुपक्ष रडार सिस्टम को DRDO ने विकसित किया है। ये सिस्टम इतना कारगर है कि यह दुश्मन के पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से जाम कर सकता है। यह सिस्टम 1m² रडार क्रास-सेक्शन (RCS) की गति से दुश्मन के विमान को करीब 600 किमी की दूरी से ही डिटेक्ट कर सकता है। जबकि मौजूदा वक्त में दुनिया के सबसे आधुनिक स्टील्थ फाइटर जेट्स में लगा रडार सिस्टम केवल 0.01m² RCS से करीब 200 किमी की दूरी तक के खतरों को ही भांप पाते हैं। विरुपक्ष का निर्माण ही चीन के जे-20 और जे-35 फाइटर जेट्स को डिटेक्ट करने के लिए किया गया है। दुश्मन देश द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे इन दोनों फाइटर जेट्स में लगे रडार सिस्टम की क्षमता केवल 0.01m² RCS यानी 200 किलोमीटर तक की है। यानी दुश्मन कितना भी आधुनिक विमान लेकर हमारे देश पर हमला करे। तेजस और सुखोई-30 MKI उनका पता लगाकर दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने में सक्षम हैं।
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