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कुढ़नी की हार से कुढ़ गए हैं नीतीश कुमार

पटना: बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार बेहद परेशान हैं। जल्दी ही वह कोई बड़ा फैसला ले सकते हैं। बिहार में कुढ़नी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए, जिसमें सत्तारुढ़ जनता दल यूनाइटेड को करारी हाल मिली। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चहेते प्रत्याशी मनोज कुशवाहा चारो खाने चित्त हो गए और भाजपा के केदार गुप्ता बाजी मार ले गए। लेकिन इस हार से नीतीश कुमार बेहद आहत हैं। क्योंकि कुढ़नी उपचुनाव को उन्होंने अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। इस हार के बाद नीतीश कुमार खुद समीक्षा करने के लिए बैठ गए हैं। उन्होंने कुढ़नी से सभी बूथों की लिस्ट मंगवाई है  और वहां के वोटर क्यों बिहार में सत्तारुढ़ जदयू से नाराज हुए, इसकी पड़ताल निजी तौर पर कर रहे हैं। 

कुढ़नी से पहले बिहार के गोपालगंज और मोकामा में भी उप चुनाव हुए थे, जिसमें गोपालगंज में भाजपा और मोकामा में आरजेडी सीट निकाल ले गई थी। कुढ़नी मूल रुप से आरजेडी की सीट थी, जिसके विधायक अनिल सहनी को एलटीसी घोटाले में सजा हो गई थी और इस सीट पर उप चुनाव कराना पड़ा। जेडीयू ने यह सीट आरजेडी से मांग ली थी और उसपर नीतीश कुमार ने अपने पुराने सहयोगी मनोज कुशवाहा को खड़ा किया। लेकिन उन्हें 3645 वोटों से करारी हार मिली।  मनोज कुशवाहा को जिताने के लिए आरजेडी और जेडीयू ने कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी थी। तेजस्वी यादव ने खुद पूरे इलाके में कैंपेन किया, मनोज कुशवाहा के साथ अपने पुराने गिले शिकवों को दूर किया, लालू यादव की बीमारी का इमोशनल कार्ड भी खेला। 
उधर जेडीयू की तरफ से उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह पूरे समय कुढ़नी में ही बैठे रहे। बिहार सरकार के कई मंत्रियों और विधायकों ने मनोज कुशवाहा के पक्ष में कैंपेन किया।  मुख्यमंत्री नीतीश ने कई सभाएं की और वोटरों के सामने कुढ़नी में जीत को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बताकर उन्हें एकजुट करने की कोशिश की। 
लेकिन जब नतीजा आया तो पता चला कि मुख्यमंत्री की प्रतिष्ठा धूल में मिल चुकी थी। नीतीश ने अनुमान लगाया था..कि कुढ़नी में वैश्य समुदाय के वोट और अति पिछड़ा वोट मिलकर उन्हें जीत दिला देंगे। लेकिन  भाजपा ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं। कुढ़नी में भाजपा ने भी वैश्य समुदाय से आने वाले केदार गुप्ता को टिकट दिया और अति पिछड़े वोटों को अपने पाले में खींचने के लिए भाजपा सांसद अजय निषाद की ड्यूटी लगाई, जिन्होंने मल्लाह वोटरों को खिसकने से  बचाया। 
खबर है कि मतदान से एक दिन पहले कुढ़नी के कई इलाकों में देर रात तक बैठकों का दौर चला। इसमें अति पिछड़ा वोटरों ने जेडीयू प्रत्याशी मनोज कुशवाहा का बहिष्कार करने का फैसला किया। उसी समय कुढ़नी में नीतीश कुमार की प्रतिष्ठा नष्ट होने की शुरुआत हो गई थी। 
अंदरखाने यह भी बताया जा रहा है कि आरजेडी भी नहीं चाहती थी कि कुढ़नी से जेडीयू का उम्मीदवार जीते।  इसलिए तेजस्वी यादव ने अपनी पार्टी का कोर वोट जेडीयू को ट्रांसफर करने में दिलचस्पी नहीं दिखाई। यही वजह है कि राष्ट्रीय जनता दल के वोटर अंतिम समय में भाजपा की तरफ झुकने लगे थे, जिसने नीतीश कुमार की हार की इबारत लिख दी। 
लेकिन बात सिर्फ कुढ़नी तक सीमित नहीं है। इस हार के बाद पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में जेडीयू का अधिवेशन हुआ। जिसमें नीतीश कुमार ने जो भाषण दिया, उससे एक नई सियासी बहस छिड़ गई है। नीतीश कुमार ने कहा कि वह 'अपने वरिष्ठ मंत्री बिजेन्द्र यादव और अपनी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह के कहने पर एनडीए से अलग हुए हैं'। नीतीश ने बताया कि इन दोनों नेताओं ने उन्हें जानकारी दी कि भाजपा जेडीयू को डैमेज करने के काम में लगी हुई है। 

नीतीश का यह बयान बेहद अहम है। उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ने की जिम्मेदारी अपने कंधों से उतार कर बिजेन्द्र यादव और ललन सिंह पर डाल दी है और खुद पल्ला झाड़कर अलग हो गए हैं।  एक और अहम संकेत यह हैं, जो यह बताता है कि नीतीश कुमार के मन में क्या चल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने 5 सितंबर को एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। लेकिन इसमें नीतीश कुमार शामिल नहीं हुए। किंतु जब  8 दिसंबर को कुढ़नी उपचुनाव के परिणाम आ गए, तब  11 दिसंबर को पीएम मोदी ने फिर से बैठक बुलाई, जिसमें नीतीश कुमार दौड़े दौड़े पहुंचे। 
इसके अलावा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने के बाद भी नीतीश कुमार के बेहद करीबी मित्र हरिवंश कुमार राज्यसभा के उपसभापति बने हुए हैं। जिसे देखकर लगता है कि  नीतीश कुमार ने भाजपा से समझौते की एक गुंजाइश अभी बाकी छोड़ रखी है। 
 कुढ़नी विधानसभा उप चुनाव के बाद यह स्पष्ट हो चुका है कि जेडीयू का कोर वोट बैंक अति पिछड़ा अब उससे खिसकने लगा है और राष्ट्रीय जनता दल के वोटर कभी भी जेडीयू के साथ खड़े नहीं होंगे। ऐसे में नीतीश कुमार के पास अपने पुराने मित्र के पास जाने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता है। शायद नीतीश कुमार भी इस बात को समझने लगे हैं। यही वजह है कि भाजपा से संबंध विच्छेद का जिम्मेदार उन्होंने ललन और बिजेन्द्र को बताकर बलि का बकरा बनाने की कोशिश की है। 
नीतीश कुमार अतीत में इतनी बार पलटी मार चुके हैं कि वह एक बार फिर से पाला बदलकर भाजपा का दामन थाम लेते हैं तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 

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A

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