यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युथानम् धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।
भारतीय सेना सतर्क हैं। प्रधानमंत्री मोदी लगातार बैठकें कर रहे हैं। हालांकि भारत और पाकिस्तान के बीच सीजफायर हो चुका है। लेकिन यह कब भंग हो जाए, कुछ कहा नहीं जा सकता। इन परिस्थितियों में मुझे महाभारत की एक कथा याद आ रही है। यह प्रसंग पांडवों के वनवास के समाप्त होने के बाद का है। जब पांचो पांडव और द्रौपदी अपना 12 वर्ष का वनवास और एक वर्ष का अज्ञातवास समाप्त कर चुके थे, जिसके बाद उन्होंने जब अपना अधिकार वापस मांगा, तो दुर्योधन ने सुई की नोक भर जमीन भी देने से इनकार कर दिया। यह वही दुर्योधन था। जिसने जीवन भर पांडवों पर अत्याचार किए थे। बचपन में उसने भीम को जहर देकर नदी में फेंक दिया था, जहां जहरीले नागों द्वारा डंसे जाने से भीम का जहर उतरा और वह नागलोक में अपने नाना नागराज वासुकि से मिल पाया। इसी दुर्योधन ने लाक्षागृह में पांडवों को जिंदा जला देने की साजिश रची, लेकिन पांडव वहां से भी बच गए।
किंतु दुर्योधन का सबसे जघन्य कृत्य था, भरी राजसभा में द्रौपदी का अपमान करना। जहां पर भीष्म और गुरु द्रोण जैसे वयोवृद्ध बैठे हुए थे, उस सभा में द्रौपदी को बालों से पकड़कर घसीटा गया। उसके वस्त्र हरण की कोशिश की गई। जिसे भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दैवीय शक्तियों के माध्यम से बहुत ही मुश्किल से रोका। लेकिन दुर्योधन को तब भी अक्ल नहीं आई। वह देख चुका था कि स्वयं ईश्वर अपनी समस्त शक्तियों के साथ पांडवों के साथ हैं। लेकिन बुराई की शक्ति से लैस दुर्योधन अपना विनाश नहीं देख रहा था। उसके अत्याचार अपनी सीमाएं लांघ रहे थे। वनवास के दौरान भी दुर्योधन ने जयद्रथ के द्वारा द्रौपदी के अपहरण की कोशिश की। दुर्वासा ऋषि के जरिए पांडवों को श्राप दिलवाने का षड्यंत्र रचा।
पांडव महाशक्तिशाली थे। वरिष्ठ पांडव युधिष्ठिर स्वयं धर्मराज थे। जिनके नेतृत्व में पांडवों ने ताकतवर होते हुए भी दुर्योधन के सभी जुल्मों को हंसते हंसते सह लिया। लेकिन द्रौपदी के मन की व्यथा कौन जाने। उस राजमहिषी को तो दुर्योधन के कारण बार बार अपमान का सामना करना पड़ा। पहले दुश्शासन द्वारा चीरहरण की कोशिश, फिर वन में जयद्रथ द्वारा जबरन उठाकर रथ पर बिठाकर अपहरण करने का प्रयास, फिर अज्ञातवास के दौरान विराटराज के सेनापति कीचक द्वारा द्रौपदी से शारीरिक दुर्व्यवहार। यह ऐसी घटनाएं थीं, जो सिर्फ दुर्योधन के कारण द्रौपदी को सहन करनी पड़ी थी। इसीलिए द्रौपदी अत्यंत क्रोधित रहती थीं। उन्होंने अपने बाल भी बरसों तक नहीं बांधे थे। उनकी प्रतिज्ञा थी कि जब तक दुर्योधन की वह जंघा नहीं तोड़ी जाती, जिसपर उसने द्रौपदी को बिठाने का आदेश दिया था। जब तक उसके बाल पकड़कर घसीटने वाले दुश्शासन की छाती फाड़कर उसका लहू नहीं लाया जाता, तब तक वह बाल नहीं बांधेगी।
उस द्रौपदी को जब पता चला कि उसके पति यानी महाराज युधिष्ठिर युद्ध से ठीक पहले शांति का संदेश लेकर श्रीकृष्ण को हस्तिनापुर भेजने वाले हैं, तो उसके रोम-रोम में क्रोध की ज्वाला दहक उठी।
दरअसल वनवास के लौटने के बाद दुर्योधन द्वारा राज्य लौटाने मनाही सुनने के बाद पांडव पक्ष ने युद्ध की पूरी तैयारी कर ली थी। लेकिन धर्मराज तो आखिर धर्मराज ही थे। वह दिल से कभी युद्ध नहीं चाहते थे, इसीलिए उन्होंने आखिरी कोशिश के तौर पर शांति का संदेश लेकर श्रीकृष्ण को दूत बनाकर हस्तिनापुर भेजने का फैसला कर लिया था। हालांकि पांडव पक्ष से कोई भी शांति का संदेश भेजने के पक्ष में नहीं था। लेकिन युधिष्ठिर आखिरी कोशिश छोड़ना नहीं चाहते थे। उनके इस आदेश को अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव ने तो सिर झुकाकर स्वीकार कर लिया। लेकिन द्रौपदी विद्रोह कर उठीं। वह जानती थी कि युधिष्ठिर के आदेश में बंधे सभी चारो भाई उसकी बात नहीं सुनेंगे। लेकिन श्रीकृष्ण तो उसके अपने हैं, चिर सखा हैं, उनसे तो अपने दिल की बात कही जा सकती है। इसलिए द्रौपदी तुरंत श्रीकृष्ण के पास पहुंची और अपने साथ हुए सभी जुल्मों को एक बार फिर से श्रीकृष्ण को बताया।
हालांकि अंतर्यामी प्रभु सब कुछ जानते थे, लेकिन भक्त के मुख से उसकी पीड़ा सुनना ईश्वर का कर्तव्य है। इसीलिए उन्होंने द्रौपदी की पूरी बात सुनी। आखिरकार द्रौपदी ने जब भरे गले और डबडबाई आंखों से श्रीकृष्ण से प्रश्न किया कि हे केशव, इस सृष्टि में ऐसा कोई कार्य नहीं है, जो तुम कर नहीं सकते। मुझे तुमपर पूरा भरोसा है, लेकिन इसी भरोसे ने आज मुझे विचलित कर दिया है। तुम तो स्वयं ईश्वर हो जो कि शांति का संदेश लेकर दुर्योधन के पास जा रहे हो। तुम्हारी बात तो इस सृष्टि के गोवर्द्धन जैसे पहाड़, कदंब के वृक्ष जैसे जड़ तत्व मानते हैं। कालिय नाग और वृंदावन की गउओं जैसे पशु योनि भी तुम्हारी बात नहीं टाल सकते। पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि कहीं तुम दुर्योधन को शांति के लिए मना लो और मेरी प्रतिज्ञा अधूरी रह जाए।
तो जानते हैं श्रीकृष्ण ने क्या कहा। भगवान ने अपनी भुवनमोहिनी मुस्कान की झलक द्रौपदी को दिखाई और चंद शब्द कहे- हे द्रौपदी तुम मेरे ईश्वरत्व से ज्यादा भरोसा दुर्योधन की दुष्टता पर करो। भले ही मैं स्वयं शांति का संदेश लेकर जा रहा हूं। लेकिन दुर्योधन की दुष्टता इसे स्वीकार नहीं करेगी और युद्ध होने तथा तुम्हारी प्रतिज्ञा पूरी होने से कोई नहीं रोक सकता है। तब जाकर द्रौपदी के मन का सांत्वना मिली और इतिहास साक्षी है कि जैसा श्रीकृष्ण ने कहा था बिल्कुल वैसा ही हुआ। वर्तमान भारत पाकिस्तान युद्ध के परिप्रेक्ष्य में यह कथा सुनाना का उद्देश्य भी यही है। जो लोग युद्धविराम से नाराज हैं और पाकिस्तान को हमेशा के लिए मिटा देने के लिए उतारु हो रहे हैं। उनके लिए इसी कथा में संदेश छिपा हुआ है। आप पीएम मोदी की भलाई की इच्छा को जरुर देखिए लेकिन पाकिस्तान की दुर्योधन जैसी जिद को भी ध्यान में रखिए, जो कि अपने विनाश के लिए दुर्योधन की तरह खुद ही बेचैन हो रहा है। कथा के पीछे के संदेश को समझिए जय श्री कृष्ण।।।।
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