नई दिल्ली: कांग्रेस पार्टी भस्मासुर हो चुकी है, जिसके भी साथ खड़ी होकर उसके सिर पर हाथ रखती है वही भस्म होने लगता है। यही कारण है कि देश भर के राजनीतिक दलों में कांग्रेस का हाथ छोड़ने के लिए मारामारी मचती हुई दिख रही है। ताजा मामला है झारखंड का, जहां कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चला रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा के हेमंत सोरेन अब उससे पीछा छुड़ाने के लिए आतुर हो चुके हैं।
झारखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव होने के आसार दिखाई दे रहे हैं। झारखंड के मुख्यंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन दिल्ली आकर भाजपा के एक बड़े नेता के साथ मिल चुके हैं। जिसके बाद यह संभावना जताई जा रही है कि जेएमएम और भाजपा झारखंड में मिलकर सरकार बना सकते हैं। सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि बात इतनी आगे तक हो चुकी है कि भाजपा की तरफ से झारखंड के उप मुख्यमंत्री के तौर पर वरिष्ठ नेता बाबू लाल मरांडी या चंपई सोरेन का नाम तक आगे कर दिया गया है।
ऐसे में यह जरुरी हो जाता है कि आपको झारखंड विधानसभा की वर्तमान स्थिति से अवगत करा दिया जाए। झारखंड में विधानसभा की 81 सीटें हैं।यानी कि इस आदिवासी बहुल राज्य में सरकार बनाने के लिए 42 विधायकों की जरुरत होती है। यहां पिछले साल यानी 2024 के जून में चुनाव हुए थे। जिसमें हेमंत सोरेन की जेएमएम 34 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी के रुप में उभरी थी। इस चुनाव में उसने कांग्रेस, CPI (ML) और राष्ट्रीय जनता दल से गठबंधन किया था। जिन्हें 16, 2 और 4 सीटों पर जीत मिली थी। यानी झारखंड विधानसभा में जेएमएम, कांग्रेस, CPI (ML) और आरजेडी के गठबंधन के पास 56 सीटें मौजूद हैं...जो कि सरकार बनाने के जरुरी आंकड़े से 12 सीटें ज्यादा हैं। ऐसे में अगर जेएमएम ने कांग्रेस से रिश्ते तोड़कर भाजपा के साथ पींगे बढ़ाने का फैसला कर लिया है, तो राजनीतिक समीकरण दूसरे तरह के हो जाएंगे।
2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने JDU-AJSU और LJPरामविलास के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। जिसमें से भाजपा को 21 जबकि उसके सहयोगियों को एक-एक सीट मिली थी। यानी भाजपा गठबंधन के पास झारखंड में कुल 24 सीटें मौजूद हैं। इस तरह से देखा जाए तो यदि झारखंड में भाजपा और जेएमएम मिलकर सरकार बनाते हैं तो उनके पास 81 सदस्यों वाली विधानसभा में 58 सीटें होंगी। यह आंकड़ा अगले साढ़े तीन साल तक सरकार चलाने के लिए पर्याप्त है।
अब जेएमएम जिस तरह से कांग्रेस का दामन छोड़ने के लिए व्यग्र दिखाई दे रही है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह कांग्रेस पार्टी की दिशाहीनता है, जो कि उसके सहयोगियों को मुश्किल में डाल देती है। पिछले कुछ समय में हमने देखा है कि कैसे कांग्रेस के साथ गठबंधन करने वाले आरजेडी, टीआरएस, शिवसेना उद्धव और एनसीपी जैसी पार्टियों को जनता ने नकार दिया। यही कारण है..कि हेमंत सोरेन को भी यह डर सताने लगा है कि कहीं कांग्रेस का हाथ थामने की वजह से झारखंड की जनता उनका हाथ ना छोड़ दे।
हेमंत सोरेन की नाराजगी की दूसरी वजह यह है कि पिछले दिनों बिहार में जो विधानसभा चुनाव हुए थे, उसमें उन्होंने भी कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन से कुछ सीटों की मांग की थी। लेकिन उनकी मांग नहीं मानी गई। जबकि एक साल पहले यानी 2024 में झारखंड में जब चुनाव हुए थे, तब उन्होंने कांग्रेस और आरजेडी दोनों को ही सीटें दी थीं। बिहार में मनचाही सीटें ना मिलने की वजह से भी हेमंत सोरेन खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे थे। भाजपा को जेएमएम की इस नाराजगी का अंदाजा था। यही कारण है कि झारखंड के पहले मु्ख्यमंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता बाबू लाल मरांडी भी बोल चुके हैं कि बिहार चुनाव के बाद इंडी अलायंस झारखंड में भी सत्ता से चला जाएगा।
लेकिन झारखंड में हेमंत सोरेन के मन बदलने की सबसे बड़ी वजह है एसआईआर यानी गहन मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया। जिसकी वजह से देश भर के घुसपैठियों और फर्जी वोटरों में खलबली हुई है। दुनिया जानती है कि कांग्रेस की राजनीति का आधार यही घुसपैठिये रहे हैं, जो एसआईआर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मतदान के लायक नहीं रह जाएंगे। हेमंत सोरेन इस समीकरण को अच्छी तरह समझते है, इसीलिए उन्होंने पहले ही कांग्रेस से पीछा छुड़ाने की तैयारी शुरु कर दी है। जेएमएम और भाजपा के बीच बढ़ती हुई नजदीकियों के आसार नजर भी आने लगे थे- जैसे कि इसी साल 4 अगस्त को जब दिशोम गुरु के नाम से मशहूर जेएमएम के संस्थापक शिबू सोरेन का देहांत हुआ था, तब पीएम मोदी के निर्देश पर केन्द्रीय जनजातीय कल्याण मंत्री जोएल ओराम उनके अंतिम संस्कार में शामिल होने गए थे।
इसके अलावा 15 नबंवर को बिरसा मुंडा की जयंती पर जनजातीय गौरव दिवस का आयोजन किया गया था। जिस अवसर पर झारखंड के खूंटी जिले में विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में केन्द्रीय मंत्री जोएल ओराम, मु्ख्यमंत्री हेमंत सोरेन और राज्यपाल संतोष गंगवार बेहद अच्छे माहौल एक साथ स्टेज दिखाई दिए थे।
यानी कि भाजपा और जेएमएम के बीच खिचड़ी काफी समय से पक रही थी, लेकिन उसके परोसने का समय अब आया है। आसार दिखने लगे हैं कि देश का एक और राज्य कांग्रेस के हाथ से निकलने वाला है और राहुल गांधी के पास मजबूरी में हाथ मलने के सिवा कोई और चारा दिखाई नहीं दे रहा है।
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