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महाशक्तियों को खिलौने की तरह इस्तेमाल कर रहा है भारत

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दुनिया में कहीं भी कोई भी घटना हो, उसका कनेक्शन या तो रूस से होता है या फिर अमेरिका से। यही दोनों महाशक्तियां पूरी दुनिया को चलाती हैं। लेकिन हमारे देश भारत की तो बात ही अलग है। हमारा हिंदुस्तान इन महाशक्तियों से खिलौनों की तरह खेलता है। जिसका चाहा इस्तेमाल किया, जिसे चाहे उठाकर किनारे कर दिया। मजेदार बात यह है कि यह दोनों ही महाशक्तियां इस बात को जानती हैं कि वह भारत के हाथ का खिलौना बनी हुई हैं। लेकिन वो कुछ कर नहीं सकते।  
भारत एक विशाल आबादी वाला बड़ा देश है जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से तरक्की कर रही है। भारत का विशाल बाजार पूरी दुनिया को ललचाता है और यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है। जो अमेरिका और रूस जैसी महाशक्तियों को भारत के इशारे पर नाचने के लिए मजबूर करती है। 
हाल ही में हमारे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह चीन के किंगदाओं में शंघाई सहयोग संगठन यानी एससीओ की बैठक में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे थे। इस दौरान उनकी द्विपक्षीय बैठक रूस के विदेश मंत्री आंद्रेई बेलौसोव के साथ हुई। इस बैठक में यह तय हुआ कि रूस 2026-2027 में S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम की दो यूनिट और देगा। S-400 वही डिफेंस सिस्टम है, जिसने ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद हुए भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान दुश्मन के किसी ड्रोन या मिसाइल को देश की सीमा में घुसने नहीं दिया था। भारत ने रूस से 2018 में एस-400 के पांच स्‍क्‍वाड्रन की 40 हजार करोड़ रुपये की डील की थी। भारत को 3 स्क्वाड्रन मिल भी गए हैं। 
हालांकि अमेरिका ने रूस पर तरह तरह के प्रतिबंध लगा रखे हैं, जिसमें हथियार और तकनीक बेचने की भी मनाही है। लेकिन भारत अमेरिकी प्रतिबंधों को ठेंगे पर रखकर रूस से लगातार हथियार खरीद रहा है। लेकिन मजबूरी में अमेरिका अपने प्रतिबंधों के दायरे से भारत को बाहर रखे हुए है। यानी रुस जैसे प्रतिबंधित देश से हथियार खरीदने के बावजूद अमेरिका भारत का कुछ भी नहीं बिगाड़ पा रहा है। 
लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है। रूस से अच्छे संबंध होने करा यह मतलब नहीं है कि अमेरिका से भारत ने दूरी बना ली है। बल्कि असलियत इसके विरुद्ध है। भारत ने अमेरिका से कच्‍चे तेल का आयात बढ़ा दिया है।  साल 2025 के पहले चार महीनों में भी भारत ने सालाना आधार पर अमेरिका से 270 फीसदी 
ज्‍यादा कच्‍चा तेल खरीदा। जनवरी से अप्रैल 2025 की अवधि में अमेरिका से 6.31 मिलियन टन कच्चा तेल खरीदा।  जबकि पिछले साल इसी अवधि में आयात केवल 1.69 मिलियन टन था।  इस उछाल के साथ ही भारत के कुल तेल आयात में अमेरिका की हिस्‍सेदारी 7 फीसदी हो गई है। जबकि 2024 की समान अवधि में यह केवल 2 फीसदी थी। 
बात सिर्फ तेल तक ही सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिका से भारत के व्यापारिक संबंध लगातार गहरे होते जा रहे हैं। रूस से हथियार और दूसरी चीजें मंगाने का अमेरिका भारत संबंधों पर कोई असर दिखाई नहीं दे रहा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2025 में भारत का कुल आयात 19 फीसदी बढ़ा, लेकिन अमेरिका से आयात में 63 फीसदी का इजाफा हुआ है। 
अप्रैल 2024 में अमेरिका से आयात 3.20 अरब डॉलर था,  जो अप्रैल 2025 में उछलकर 5.24 अरब डॉलर हो गया। केवल यही नहीं भारत और अमेरिका के बीच जुलाई में संभावित व्यापार समझौते की तैयारी हो रही है, जिसमें भारत को अमेरिका से आयात बढ़ाने की दिशा में कई कदम उठाने हैं।  संभावित समझौते के तहत भारत अपने बाजार को अमेरिकी कारों, रक्षा उपकरणों के लिए और अधिक खोल सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी भारत को अमेरिकी एनर्जी का प्रमुख ग्राहक बनाने की बात कह चुके हैं।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात के दौरान ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका, भारत के लिए प्रमुख तेल और गैस आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में काम कर रहा है। बल्कि ट्रंप ने तो भारत को अपना सुपर फाइटर जेट एफ-35 खरीदने का खुला ऑफर भी दे रखा है। 
दरअसल भारत की भौगोलिक स्थिति और बाजार की ताकत ने रुस और अमेरिका जैसे सुपर पावर्स को उसके सामने झुकने के लिए मजबूर कर दिया है।  अमेरिका अच्छी तरह जानता है कि भारत की वजह से रूस पर लगाए हुए उसके प्रतिबंध कारगर साबित नहीं हुआ है। भारत ना केवल रुस से कच्चा तेल खरीद रहा है बल्कि उसको यूरोपीय बाजारों में बेचकर मुनाफा भी कमा रहा है। भारत रूस को दवाइयां, इलेक्ट्रॉनिक सामान, इंजीनियरिंग की वस्तुएं आदि बेच रहा है। साल 2024 में भारत ने रूस को 4.26 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया, जिसमें 3768 वस्तुएं शामिल थीं। 
अमेरिका और रूस दोनों के साथ पीएम मोदी ने जो बैलेंस साध रखा है..उसे देखते हुए लगता है कि भारत के एक हाथ में अमेरिका और दूसरे हाथ में रूस है। जिसे वो जब चाहें, जैसे चाहें इस्तेमाल कर रहा हैं। महाशक्तियों के साथ खिलौनों की तरह खेल रहा है हमारा देश। 

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