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जब विपक्ष का नेता विदूषक बन जाए : राहुल गांधी की राजनीति में घटती गंभीरता

When the Leader of the Opposition Becomes a Buffoon: The Declining Seriousness in Rahul Gandhi's Politics


बिंदिया कुमारी


पुराने राजदरबारों में विदूषक हुआ करते थे। उनका काम था राजा और दरबारियों को हँसाना। वे राजा पर चुटकी ले लेते थे, कभी मंत्री की पगड़ी पर तंज कस देते थे और कभी दरबार में बैठे किसी सेनापति की गंभीर मुद्रा को मजाक का विषय बना देते थे। दरबार ठहाका लगाता, विदूषक अपनी टोपी उतारकर झुकता और फिर अगला मजाक शुरू कर देता। उस दौर में विदूषक की भूमिका मनोरंजन तक सीमित थी। उससे राज्य की नीति बनाने, युद्ध की रणनीति तय करने या पड़ोसी देशों से संबंधों की दिशा निर्धारित करने की अपेक्षा नहीं की जाती थी।

आज के लोकतंत्र में विदूषक का कोई संवैधानिक पद नहीं है। विपक्ष का नेता, खासकर राष्ट्रीय स्तर का नेता, लोकतंत्र में एक गंभीर संस्था होता है। उससे अपेक्षा होती है कि वह सरकार की नीतियों की आलोचना करे, सवाल पूछे, वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करे और जनता के सामने यह बताए कि सत्ता में आने पर वह देश को किस दिशा में ले जाएगा। लेकिन जब राष्ट्रीय राजनीति का कोई बड़ा चेहरा विदेश नीति जैसे गंभीर विषय को आलिंगन, चुटकुले और व्यक्तिगत इशारों तक सीमित कर देता है, तो सवाल सिर्फ एक नेता की भाषा का नहीं रह जाता। सवाल लोकतांत्रिक विमर्श के स्तर का हो जाता है।

कांग्रेस के राष्ट्रीय सम्मेलन का वह दृश्य इसी कारण असहज करने वाला था। राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर बोल रहे थे। सामने संदीप दीक्षित थे। राहुल गांधी ने उन्हें गले लगाया और बात अचानक प्रधानमंत्री मोदी के विदेशी नेताओं से मिलने-जुलने के अंदाज से होती हुई इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी तक पहुँच गई। फिर ऐसा मजाक हुआ कि सभागार ठहाकों से गूँज उठा।

एक क्षण के लिए यह समझना कठिन हो गया कि मंच पर भारत की विदेश नीति पर चर्चा हो रही है या किसी पारिवारिक समारोह में रिश्तेदारों के बीच छेड़छाड़ चल रही है। यही राहुल गांधी की राजनीतिक शैली की सबसे बड़ी समस्या है। वे अक्सर उस विषय की गंभीरता से बच निकलते हैं जिस पर उन्हें वास्तव में बात करनी चाहिए। विदेश नीति पर चर्चा हो रही हो तो प्रश्न होना चाहिए कि भारत ने किस देश के साथ कौन-सा समझौता किया, उससे भारत को क्या रणनीतिक लाभ मिला, कहाँ जोखिम पैदा हुए, किस क्षेत्र में सरकार की नीति विफल हुई, किन कूटनीतिक फैसलों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है और वैश्विक शक्ति-संतुलन में भारत की स्थिति क्या है। लेकिन यदि पूरी विदेश नीति को इस सवाल तक सीमित कर दिया जाए कि प्रधानमंत्री किस विदेशी नेता से कितनी गर्मजोशी से मिले या किसे गले लगाया, तो यह आलोचना नहीं, राजनीतिक विमर्श का सरलीकरण है।

विदेश नीति कोई शादी का मंच नहीं है, जहाँ मेहमानों की निकटता देखकर रिश्तों का अनुमान लगाया जाए। कूटनीति में हाथ मिलाना भी संकेत होता है, मुस्कान भी संकेत होती है, बैठक का एजेंडा भी संकेत होता है और कभी-कभी मौन भी संकेत होता है। लेकिन विदेश नीति की असली कसौटी इन तस्वीरों से कहीं आगे है। वह व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी सहयोग, निवेश, आपूर्ति-श्रृंखला, बहुपक्षीय संस्थाओं में प्रभाव और राष्ट्रीय हितों की रक्षा से तय होती है।

भारत की विदेश नीति को समझने के लिए आपको यह देखना पड़ेगा कि आज नई दिल्ली की आवाज कितनी सुनी जाती है। आपको यह देखना पड़ेगा कि भारत किस तरह अमेरिका, रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण के साथ एक साथ अपने संबंधों को साध रहा है। आपको यह देखना पड़ेगा कि यूक्रेन संकट के बीच भारत ने अपने हितों की रक्षा कैसे की। आपको यह देखना पड़ेगा कि पश्चिम एशिया में भारत के आर्थिक और रणनीतिक हित किस तरह सुरक्षित हुए। आपको यह देखना पड़ेगा कि आतंकवाद के मुद्दे पर भारत ने वैश्विक मंचों पर किस तरह पाकिस्तान को घेरा। आपको यह देखना पड़ेगा कि क्वाड से लेकर जी-20 तक भारत की भूमिका कैसे विस्तृत हुई। इन सब पर बहस कीजिए। सरकार को कठघरे में खड़ा कीजिए। प्रधानमंत्री की विदेश नीति को असफल साबित कीजिए। जनता को बताइए कि कहाँ गलती हुई। लेकिन तर्क दीजिए। सिर्फ यह कहना कि प्रधानमंत्री ने किसी नेता को गले लगाया, विदेश नीति की समीक्षा नहीं है।

डेढ़ दशक पहले की तस्वीरों को याद कीजिए। भारत दुनिया के बड़े सम्मेलनों में मौजूद रहता था। भारतीय प्रधानमंत्री वैश्विक मंचों पर जाते थे, बैठकें होती थीं, भाषण होते थे। लेकिन आज के भारत और उस दौर के भारत की अंतरराष्ट्रीय दृश्यता में अंतर को नकारना कठिन है। मनमोहन सिंह के दौर की अनेक तस्वीरों में भारत एक महत्वपूर्ण देश अवश्य दिखाई देता था, लेकिन वैश्विक शक्ति-राजनीति के केंद्र में उसकी उपस्थिति आज जैसी मुखर नहीं थी। यह कहना नहीं है कि उस दौर में भारत ने कोई उपलब्धि हासिल नहीं की या भारतीय कूटनीति निष्क्रिय थी। बिल्कुल नहीं। लेकिन यह प्रश्न जरूर पूछा जा सकता है कि क्या भारत की वैश्विक भूमिका आज अधिक सक्रिय, अधिक दृश्यमान और अधिक आत्मविश्वासी नहीं हुई है?

आज भारत का प्रधानमंत्री अमेरिका जाता है तो उसकी यात्रा वैश्विक समाचार बनती है। पश्चिम एशिया में जाता है तो वहां की राजनीति और रणनीतिक समीकरणों में भारत की भूमिका पर चर्चा होती है। यूरोप जाता है तो भारत-यूरोप संबंधों की नई संभावनाओं पर बहस होती है। अफ्रीका और वैश्विक दक्षिण के देशों के साथ संवाद होता है तो भारत स्वयं को केवल सहायता पाने वाले विकासशील देश के रूप में नहीं, बल्कि साझेदारी और नेतृत्व की भूमिका में प्रस्तुत करता है। और यह सब किसी एक आलिंगन की कहानी नहीं है। यह बदलते भारत की कहानी है। कोई विपक्षी नेता चाहे तो इस बदलाव का श्रेय नरेंद्र मोदी को न दे। राजनीति में ऐसा करना स्वाभाविक है। विपक्ष का काम ही सरकार की उपलब्धियों पर सवाल उठाना है। वह कह सकता है कि वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती दृश्यता कई दशकों की कूटनीतिक मेहनत का परिणाम है। वह कह सकता है कि मोदी सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की नीतियों को आगे बढ़ाया। वह कह सकता है कि भारत की आर्थिक शक्ति, बाजार का आकार और रणनीतिक स्थिति स्वयं भारत का प्रभाव बढ़ा रहे हैं। इनमें से हर तर्क पर बहस हो सकती है। लेकिन बहस होनी चाहिए। यदि राहुल गांधी को लगता है कि मोदी सरकार की विदेश नीति असफल है, तो उन्हें देश के सामने उसका चार्जशीट रखना चाहिए। उन्हें बताना चाहिए कि कौन-सा समझौता भारत के हितों के विरुद्ध है। किस देश के साथ भारत के संबंध खराब हुए। कहाँ भारत को आर्थिक नुकसान हुआ। कौन-सी रणनीतिक भूल हुई। किस अंतरराष्ट्रीय संकट में भारत की स्थिति कमजोर हुई। किस क्षेत्र में सरकार ने अवसर गंवाया। यही विपक्ष की जिम्मेदारी है। लेकिन जब विदेश नीति का विश्लेषण इस स्तर तक उतर जाए कि प्रधानमंत्री के आलिंगन को ही उसका प्रतीक बना दिया जाए, तो समस्या प्रधानमंत्री की विदेश नीति से ज्यादा आलोचक की दृष्टि में दिखाई देती है।

किसी प्रधानमंत्री के किसी विदेशी नेता से गले मिलने को पकड़कर पूरी विदेश नीति समझा देना वैसा ही है जैसे कोई पूरी फिल्म देखकर सिर्फ एक आलिंगन पर उसकी समीक्षा लिख दे। और इससे भी अधिक चिंताजनक तब हो जाता है जब इस राजनीतिक मजाक को समझाने के लिए एक महिला विदेशी नेता का नाम ऐसे संदर्भ में लिया जाए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय संबंधों की गरिमा से अधिक सड़क किनारे होने वाली फब्तियों का अंदाज दिखाई दे।

जॉर्जिया मेलोनी इटली की प्रधानमंत्री हैं। वह भारत की प्रधानमंत्री नहीं हैं। वह भारतीय घरेलू राजनीति की खिलाड़ी नहीं हैं। वह भाजपा की नेता नहीं हैं। वह राहुल गांधी की राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी भी नहीं हैं। भारत और इटली के बीच संबंधों की अपनी ऐतिहासिक, आर्थिक और रणनीतिक पृष्ठभूमि है। ऐसे में किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का नाम राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर इस तरह इस्तेमाल किया जाना कि सभागार में ठहाके लगें, कम से कम राजनीतिक शिष्टाचार के सवाल तो पैदा करता ही है।

महिलाओं पर टिप्पणी करना राजनीति में कोई नई चीज नहीं है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में कई दलों के नेताओं ने अलग-अलग समय पर ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया है। लेकिन यही तो सवाल है—क्या राष्ट्रीय राजनीति का स्तर इतना नीचे जाना चाहिए कि महिला नेताओं के नाम पर भीड़ से हँसी बटोरना राजनीतिक भाषण की उपलब्धि समझी जाए?

किसी महिला नेता का सम्मान इसलिए नहीं किया जाना चाहिए कि वह किसी राजनीतिक विचारधारा की समर्थक है। सम्मान इसलिए होना चाहिए क्योंकि वह एक संप्रभु राष्ट्र की निर्वाचित प्रधानमंत्री है। राजनीतिक विरोध कीजिए, वैचारिक असहमति रखिए, नीतियों पर प्रहार कीजिए, लेकिन किसी विदेशी महिला राष्ट्राध्यक्ष को राष्ट्रीय मंच पर सस्ते हास्य का पात्र बनाना भारत की अपनी राजनीतिक संस्कृति को छोटा करता है। और यहां राहुल गांधी की समस्या केवल भाषा नहीं है। समस्या यह है कि उनके पास देश के सामने प्रस्तुत करने के लिए विदेश नीति की कोई वैकल्पिक गंभीर कथा दिखाई नहीं देती। वे मोदी को चुनौती देना चाहते हैं, लेकिन मोदी की नीतियों का वैकल्पिक मॉडल कहाँ है? वे भारत की वैश्विक भूमिका पर सवाल उठाते हैं, लेकिन कांग्रेस के पास आज की दुनिया में भारत की भूमिका को लेकर स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि क्या है? चीन पर उनका समाधान क्या है? पश्चिम एशिया में भारत के हितों को लेकर उनकी रणनीति क्या है? रूस के साथ संबंधों का उनका मॉडल क्या है? अमेरिका के साथ संबंधों को वे किस दिशा में ले जाना चाहते हैं? रक्षा आत्मनिर्भरता, समुद्री सुरक्षा, इंडो-पैसिफिक और वैश्विक दक्षिण के लिए उनका दृष्टिकोण क्या है? इन सवालों के जवाब चुटकुलों से नहीं मिलेंगे।

भारत जैसी सभ्यता, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीतिक स्थिति वाले देश में विपक्ष का नेता अगर विदेश नीति पर बोले तो देश सुनना चाहता है। लोग जानना चाहते हैं कि दुनिया में भारत को वह कहाँ देखता है। वे जानना चाहते हैं कि सीमा पर चीन हो, पश्चिम में पाकिस्तान हो, समुद्र में हिंद महासागर की प्रतिस्पर्धा हो, पश्चिम एशिया में संघर्ष हो या अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा—भारत की रणनीति क्या होनी चाहिए। लेकिन अगर चर्चा बार-बार व्यक्तियों, तस्वीरों और व्यक्तिगत कटाक्षों पर लौट आती है, तो राजनीति गंभीर विमर्श से मनोरंजन की ओर चली जाती है। यहीं विदूषक वाली उपमा प्रासंगिक हो जाती है।

पुराने दरबार का विदूषक राजा को हँसाता था। वह सत्ता के आसपास रहता था, लेकिन सत्ता चलाता नहीं था। उसका काम गंभीर निर्णयों पर सलाह देना नहीं, वातावरण हल्का करना था। लोकतंत्र में विपक्ष का काम इसके ठीक उलट है। उसे वातावरण हल्का नहीं, सत्ता को जवाबदेह बनाना है। उसे तालियां और ठहाके नहीं, तर्क और तथ्य जुटाने हैं। उसे मंच पर लोकप्रिय होने से अधिक संसद और जनता के प्रति जिम्मेदार होना है।

जब कोई राष्ट्रीय नेता भीड़ की हँसी को राजनीतिक सफलता का पैमाना बनाने लगे, तब समस्या सिर्फ उस नेता की नहीं होती। समस्या उस राजनीतिक संस्कृति की होती है जो तर्क से अधिक तमाशे को पुरस्कृत करने लगती है। राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी चुनौती नरेंद्र मोदी नहीं, बल्कि उनकी अपनी राजनीतिक गंभीरता है।

मोदी पर हमला करना आसान है। वे देश के सबसे चर्चित राजनीतिक नेता हैं। उनकी हर गतिविधि समाचार बनती है। उनके भाषण, यात्राएँ, बैठकें और विदेशी नेताओं से मुलाकातें लगातार सार्वजनिक चर्चा में रहती हैं। लेकिन उन्हें चुनौती देने के लिए सिर्फ मजाक पर्याप्त नहीं है। जनता को विकल्प चाहिए। उसे नीति चाहिए। उसे दृष्टि चाहिए। उसे यह विश्वास चाहिए कि सत्ता बदलने पर देश की दिशा स्पष्ट होगी, सिर्फ चेहरे बदलेंगे नहीं।

आज भारत का नागरिक पहले से अधिक वैश्विक है। वह सोशल मीडिया पर दुनिया देखता है। वह अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को समझता है। वह जानता है कि प्रधानमंत्री का किसी नेता से मिलना सिर्फ तस्वीर नहीं होता। वह यह भी देखता है कि भारत को निवेश मिल रहा है या नहीं, भारतीय कंपनियाँ विदेश जा रही हैं या नहीं, रक्षा साझेदारियाँ बन रही हैं या नहीं, भारतीय पासपोर्ट और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा के लिए सरकार क्या कर रही है, विदेशों में संकट के समय भारत अपने नागरिकों को कैसे निकालता है और वैश्विक मंचों पर भारत की बात कितनी मजबूती से रखी जा रही है।

इसलिए जनता को सिर्फ ठहाके नहीं चाहिए।

उसे उत्तर चाहिए।

राहुल गांधी यदि विदेश नीति पर गंभीर बहस करना चाहते हैं तो देश उनका स्वागत करेगा। वे मोदी सरकार की विदेश नीति की आलोचना करें। वे आंकड़े लेकर आएँ। वे दस्तावेज सामने रखें। वे अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों की राय रखें। वे संसद में सवाल पूछें। वे बताएँ कि भारत को चीन के संदर्भ में क्या करना चाहिए, पाकिस्तान के संदर्भ में क्या करना चाहिए, अमेरिका के साथ रिश्ते कैसे संतुलित करने चाहिए, रूस के साथ किस तरह संबंध रखने चाहिए और यूरोप तथा वैश्विक दक्षिण में भारत की भूमिका क्या होनी चाहिए।

लेकिन अगर विदेश नीति पर बहस अंततः इस बात तक पहुँचती है कि प्रधानमंत्री ने किसे गले लगाया, और फिर उस पर ऐसा मजाक किया जाता है जो एक महिला विदेशी नेता को राष्ट्रीय मंच पर हँसी का पात्र बना दे, तो यह आलोचना नहीं, राजनीतिक विमर्श का पतन है।

लोकतंत्र में विपक्ष को सरकार की आलोचना करने का पूरा अधिकार है। बल्कि मजबूत लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष आवश्यक है। लेकिन मजबूत विपक्ष वह नहीं होता जो सबसे जोर से हँसाए। मजबूत विपक्ष वह होता है जो सत्ता को सबसे कठिन सवाल पूछे।

राहुल गांधी चाहें तो नरेंद्र मोदी की विदेश नीति को चुनौती दे सकते हैं। लेकिन उसके लिए उन्हें मोदी के आलिंगन नहीं, मोदी की नीतियों का विश्लेषण करना होगा। उन्हें तस्वीरों के पीछे छिपे समझौतों को पढ़ना होगा। उन्हें यात्राओं के पीछे की रणनीति समझनी होगी। उन्हें भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव को केवल प्रचार कहकर खारिज करने के बजाय यह साबित करना होगा कि यह प्रभाव वास्तविक नहीं है।

अन्यथा जनता के सामने सवाल रहेगा—क्या विपक्ष के पास सचमुच कोई वैकल्पिक विदेश नीति है, या उसके पास केवल प्रधानमंत्री की तस्वीरों पर टिप्पणी करने की कला बची है?

राष्ट्रीय राजनीति में हास्य का स्थान है। व्यंग्य का भी स्थान है। तीखा राजनीतिक कटाक्ष लोकतंत्र को जीवंत बनाता है। लेकिन हास्य तब तक लोकतांत्रिक हथियार है जब तक वह तर्क को मजबूत करता है। जब वह तर्क की जगह ले ले, तब वह कमजोरी का पर्दा बन जाता है।

राहुल गांधी उस मंच पर ठहाके बटोर सकते हैं। उनके समर्थक हँस सकते हैं। पार्टी कार्यकर्ता तालियाँ बजा सकते हैं। लेकिन मंच से बाहर बैठा भारत सवाल पूछता है—आखिर विदेश नीति पर कहना क्या था? क्योंकि देश अब उस दौर में है जहाँ वह केवल यह नहीं देखता कि प्रधानमंत्री किससे गले मिले। वह यह भी देखता है कि उस मुलाकात से भारत को क्या मिला। और यही फर्क है तस्वीर और विदेश नीति के बीच।

पुराने राजदरबारों का विदूषक अपनी टोपी उतारकर झुकता था और दरबार हँसता था। लोकतंत्र में जनता दरबार नहीं है और नेता विदूषक नहीं हो सकते। यहाँ जनता ही सर्वोच्च है। यहाँ नेता को जनता के सामने जवाब देना पड़ता है। इसलिए सत्ता पाने की चाह में यदि कोई नेता मंच को मजाक का अखाड़ा बना देता है, तो उसे यह याद रखना चाहिए कि दरबार की हँसी क्षणिक होती है, लेकिन जनता की स्मृति लंबी।

राहुल गांधी के सामने विकल्प साफ है। वे चाहें तो प्रधानमंत्री मोदी के आलिंगनों की गिनती करते रहें और हर अंतरराष्ट्रीय संबंध को व्यक्तिगत मजाक में बदलते रहें। या फिर वे उस स्तर पर लौटें जिसकी अपेक्षा देश के राष्ट्रीय विपक्ष से की जाती है—तथ्य, तर्क, नीति और दृष्टि के स्तर पर। क्योंकि देश को विदूषक नहीं चाहिए। देश को विपक्ष चाहिए। ऐसा विपक्ष जो प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर चुटकुले नहीं, सवाल लेकर आए। जो विदेशी नेताओं के नाम पर ठहाके नहीं, अंतरराष्ट्रीय समझौते पढ़े। जो तस्वीरों की राजनीति नहीं, रणनीति की राजनीति करे। जो सत्ता को चुनौती दे, लेकिन लोकतंत्र की गरिमा को भी चुनौती न बनाए।

राहुल गांधी ने उस दिन मंच पर शायद कुछ क्षणों के लिए अपने समर्थकों को हँसा दिया हो। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में असली सवाल यह है कि क्या वे देश को सोचने पर मजबूर कर पाए? अगर जवाब नहीं है, तो समस्या मोदी की विदेश नीति में नहीं है। समस्या उस राजनीति में है जिसने गंभीर सवालों से बचने के लिए हास्य का सहारा ले लिया है। और जब सत्ता की भूख किसी नेता को हर सस्ते मजाक, हर हल्के इशारे और हर छिछले राजनीतिक तमाशे तक पहुँचा दे, तब वह अपने विरोधी को नहीं, स्वयं को छोटा करता है। राहुल विदूषक बने और सामने बैठे लोग हँसे भी। लेकिन सामने कोई राजदरबार नहीं था। वहाँ उनकी अपनी पार्टी के लोग थे। बाहर एक पूरा देश था। और उस देश ने देखा कि विदेश नीति पर बहस करने का दावा करने वाला राष्ट्रीय नेता अंततः किस स्तर का राजनीतिक हास्य प्रस्तुत कर रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि पुराने विदूषक ने अपनी टोपी उतारी थी। आज अगर कोई नेता टोपी के साथ राजनीति की गंभीरता, सार्वजनिक मर्यादा और लोकतांत्रिक विमर्श की गरिमा भी उतार दे, तो दरबार भले हँसे—लेकिन लोकतंत्र के बाहर खड़ा देश जरूर सवाल पूछता है। और उस सवाल का जवाब किसी ठहाके में नहीं मिलेगा।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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