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बिहार में NDA की जीत की "सुनामी” बिहार में का बा.. मालिक नीतीश कुमार के हवा बा!

दो चरण, 243 विधानसभा क्षेत्र और 7.4 करोड़ वोटर्स के साथ ही हजारों उम्मीदवार! इन सबकी किस्मत का फैसला 14 नवंबर 2025 को तय किया गया। 6 नवंबर और 11 नवंबर को राजनीतिक दृष्टिकोण से सबसे अहम माने जाने वाले राज्य बिहार में विधानसभा चुनाव हुए। चुनाव ऐसे हुए कि पिछले कई सालों के रिकॉर्ड्स टूट गए। 2020 की तुलना में 2025 में बिहार में पहले औऱ दूसरे चरणों में वोट प्रतिशत में कुल 10 से 12 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। जिसका जीता-जागता परिणाम 14 नवंबर को देखने को मिला। बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में NDA को 202 सीटों पर प्रचंड जीत मिली। जिसमें बीजेपी के खाते में 89 सीटें आई और वह प्रदेश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी.. तो वहीं JDU के खातें में 85 सीटें आई और वह दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही। यही नहीं NDA की जीत में लोक जनशक्ति पार्टी(राम विलास) का भी अहम योगदान रहा उन्होंने कुल 19 सीटों पर जीत दर्ज की तो वहीं महागठबंधन को हार का सामना करना पड़ा। उनके खाते में मात्र 35 सीटें ही आई। उधर बड़े-बड़े दावे करने वाले प्रशांत किशोर की जनसुराज तो पूरी तरह फ्लॉप साबित हो गई और उसे एक भी सीट नसीब नहीं हुई। कांग्रेस के साथ भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। कांग्रेस मात्र 6 सीट ही जीत पाई। एक बात तो इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव से साबित होती है कि NDA की जीत में सबसे अहम भूमिका महिलाओं की रही, जिन्होंने बढ़-चढ़कर मतदान किया और पुरुष मतदाताओं की अपेक्षा महिला मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा रही। इन महिलाओं को NDA का साइलेंट वोटर कहा गया, जिन्होंने परिणाम को बिना किसी शोर-शराबे के NDA के पाले में कर दिया। हालांकि चुनाव परिणाम के बाद एक बार फिर से विपक्षी दलों का रोना शुरु हो गया है। उन सभी का कहना ही के वोट चोरी हुई है और भी तमाम बातें। खैर यह उनका अपना मसला या कहें कि दुखड़ा रोने का और अपने तमाम बयानों को छुपाने का एक जरिया है। खैर...बिहार चुनाव में महिला वोटरों के बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की वजह से चुनाव का रुख पूरी तरह बदल गया। इस बार के चुनाव में जीत का सबसे बड़ा फैक्टर रहा 71.6% महिलाओं का मतदान करना। जी हां.. महिलाओं के 71.6 फीसदी वोट के तुलना में पुरुषों का मतदान प्रतिशत काफी कम रहा। इस बार केवल 62.8% पुरुषों ने मतदान किया। यानी 8.8% महिला वोटरों ने ज्यादा वोट डाला। यह जाहिर करता है कि नीतीश कुमार की सरकार द्वारा महिलाओं की सुरक्षा के लिए किए गए कार्य साथ ही उन्हें सशक्त बनाने के दिशा में उठाये गए तमाम फैसले काफी कारगर साबित हुए। जिसका जवाब महिला वोटरों ने दोनों चरणों के दौरान हुए चुनाव में दिया। इसके अलावा भी कई ऐसे मुद्दे रहे जिन्होंने महिलाओं के वोट को नीतीश की झोली में लाने का काम किया। जिसमें बिजली-पानी की सुविधा और जागरुकता सबसे अहम रहा।

 बिहार में कुल 7.4 करोड़ वोटरों में महिला वोटरों की संख्या 3.51 करोड़ है। इसमें से बड़ी संख्या पहले से नीतीश कुमार को वोट देती आ रही है। नीतीश की "10 हजारी योजना" से जब एक करोड़ से ज्यादा महिलाओं को पहली किस्त मिली तो महिलाओं का एक और बड़ा हिस्सा नीतीश कुमार के समर्थन में आ गया। यहीं नहीं उन्होंने अपने मताधिकार का जमकर इस्तेमाल भी किया और यह भी जाहिर किया कि अब वे सभी वादे करने वाली नहीं बल्कि काम को जमीनी स्तर पर करने वाली सरकार के साथ हैं।


बड़ा मास्टर स्ट्रोक- 10 हजारी योजना

बिहार की राजनीति हमेशा से ही कोई ना कोई नया कारनामा करती आई है जिसको सभी ने न सिर्फ देखा है बल्कि उसका दीदार भी किया है। चुनाव से कुछ ही महिने पहले नीतीश सरकार का मास्टरस्ट्रोक बना उनका महिलाओं के हित में लिए जाने वाला फैसला "10 हजारी योजना।" नीतीश कुमार का "10 हजारी फैक्टर" महिलाओं के वोटों को NDA की तरफ खींचने में सबसे ज्यादा कामयाब साबित हुआ। दरअसल अगस्त में नीतीश कुमार ने ऐलान किया कि महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को व्यापार करने के लिए 10 हजार रुपए दिए जाएंगे। सितंबर में महिलाओं के खाते में पहली किस्त भी डाल दी गई। कई महिलाओं का कहना भी यह था कि उनके खाते में आए इन पैसा का उपयोग उन्होंने अपने हित मे किया और कई महिलाओं ने उन पैसों से छोटा ही सही लेकिन अपना काम शुरु किया। कुछ ने उन्हीं 10 हजार में 3 अन्य महिलाओं को 2-2 हजार रुपये देकर सिलाई की शिक्षा प्रदान करने का काम किया। तो कुछ ने 10 हजार में ही फूड स्टॉल खोला।

बिहार में महिला रोजगार की स्थिति को देखा जाए तो उस दिशा में भी नीतीश कुमार ने 1.21 करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार की पहली किस्त भेजी, जिससे महिलाओं को ये भरोसा हो गया कि अगर चुनाव के बाद नीतीश कुमार की वापसी होती है तो महिलाओं को सरकार की तरफ से काफी आर्थिक लाभ मिलेगा। ऐसे में महिलाओं ने नीतीश कुमार के समर्थन में NDA को जमकर वोट डाला।

वहीं दूसरी ओर महागठबंधन ने नीतीश कुमार के 10 हजारी फैक्टर को क्रॉसओवर करने की कोशिश भी की...पर उसका कोई परिणाम विधानसभा चुनाव के परिणामों में नहीं देखने को मिला। महागठबंधन की तरफ से भी महिलाओं को 5 नहीं..10 या 20 भी नहीं...बल्कि 30 हजार रुपए देने के साथ ही हर 1 सरकारी नौकरी प्रदान करने का भी वादा किया। लेकिन वो इसलिए बेअसर हो गया क्योंकि नीतीश कुमार ने पहले ही महिलाओं के खाते में पैसा डालकर उनका भरोसा जीत लिया। नतीजन हुआ यह कि महागठबंधन ताकता ही रह गया।

महिलाओं के अलावा बिहार में सड़क, बिजली, सुरक्षा, विकास, शिक्षा के अलावा रोजगार अहम मुद्दा रहा। विपक्ष लगातार इन सभी मुद्दों को उठाता रहा और नीतीश कुमार के साथ NDA की छवि को बिगाड़ने का काम करता रहा। लेकिन कहते हैं ना कि काम देखकर ही किसी सही व्यक्ति का चयन किया जाता है वही हुआ नीतीश कुमार के साथ ही। महागठबंधन के तेजस्वी पत्र के सामने NDA का संकल्प पत्र काफी असरदार रहा। उधर कुल 238 सीटों पर चुनाव लड़ने वाले प्रशांत किशोर की पार्टी का तो सुपड़ा ही साफ हो गया...एक भी सीट नहीं...स्ट्राइक रेट 00...स्कोर 00। यानी मैदान में उतरे तो पर केवल क्षेत्ररक्षण किया। ना मिली गेंदबाजी और ना ही बल्लेबाजी करने का मौका मिला। परिणाम यह हुआ की 90 फीसदी सीटों पर खड़े हुए उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। अगर प्रशांत किशोर के डाउनफॉल की बात करें तो प्रशांत किशोर के शराबबंदी पर विचार कईयों को पसंद नहीं आए। दरअसल पीके ने नीतीश सरकार की शराबबंदी की आलोचना की और ये दावा किया कि अगर जनसुराज की सरकार आती है तो शराबबंदी को खत्म कर दिया जाएगा। यानी बिहार में शराब मिलने लगेगी। वहीं प्रशांत किशोर यानी पीके का बड़ा दावा यह भी था कि अगर जेडीयू को 25 से ज्यादा सीटें मिलती हैं तो वो राजनीति छोड़ देंगे। यह बयान उनके द्वारा बड़े मंच पर दो बार दिया गया। अब तो परिणाम भी आ गए हैं पर प्रशांत किशोर की ओर से राजनीति छोड़ने वाली बात का कोई जवाब नहीं आया है...यानी प्रशांत किशोर भी झूठ की राजनीति करने के लिए बिहार राजनीति में आए थे। झूठ का सहारा लेना और झूठ का प्रचार उनका प्रमुख मुद्दा रहा। खैर यह तो बाद में ही पता चलेगा की उनका और उनकी पार्टी का आखिर क्या होगा और उनका भविष्य क्या होगा।

बिहार में NDA की जीत का बड़ा कारण रहा कि पार्टी ने जीविका दीदी, आध्यात्मिक बैठक, शिव-चर्चा जैसे कार्यक्रम करवाये और वे सभी सफल भी रहे। बिहार की महिला वोटरों को लुभाने में बीजेपी ने अपनी महिला टीम को जोर-शोर से काम करने के निर्देश दिए। बिहार में जीविका दीदियों की संख्या एक करोड़ से ज्यादा है। बिहार में बीजेपी की महिला टीमें इन दीदियों से मिलीं और उन्हें NDA सरकार के फायदे बताए। इसके अलावा महिलाओं के बीच पहुंच बनाने के लिए पूरे बिहार में आध्यात्मिक बैठक, शिव-चर्चा जैसे कार्यक्रम चलाए गए, जिससे ज्यादा से ज्यादा महिलाओं तक पहुंच को सुनिश्चित किया गया और आखिर में ये महिला वोटर, NDA के लिए संजीवनी बूटी की तरह काम आईं। बिहार सरकार की तरफ से महिलाओं के हित में तमाम काम किए गए। इसमें आशा वर्करों की सैलरी बढ़ाना और ममता कार्यकर्ताओं के मानदेय में बढ़ोतरी शामिल है। ऐसे में महिलाओं के बीच ये संदेश साफ हो गया कि नीतीश सरकार महिलाओं के हित में सोचती है और इसका NDA को फायदा मिला।



बिहार चुनाव में आंकड़ों का खेला

अगर आंकड़ों की बात करें तो साल 2020 के विधानसभा चुनावों की बात करें तो महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 59.69 था और पुरुषों का वोटिंग प्रतिशत 54.45 था। वहीं साल 2025 के चुनावों में महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत 71.6 पहुंच गया और पुरुषों का वोटिंग प्रतिशत 62.8% रहा। यानी साल 2020 की तुलना में साल 2025 में महिलाओं का वोट 11.91 प्रतिशत ज्यादा रहा, जिसने NDA की जीत का रास्ता खोल दिया। बिहार में साल 2015 के विधानसभा चुनावों में महिलाओं का वोट प्रतिशत 60.48 रहा था और पुरुषों का वोट प्रतिशत 53.32 रहा था। यानी अगर 2015 और 2025 के चुनाव की तुलना करें तो महिलाओं का वोट साल 2025 में 11.12% से ज्यादा बढ़ा है। वहीं साल 2010 में 54.49 फीसदी महिलाओं ने वोट डाला था और 51.12 फीसदी पुरुष ने वोट डाला था। अगर साल 2010 और साल 2025 की तुलना करें तो इस बार 17.11 % ज्यादा महिलाओं ने वोटिंग की है।


कौन बन सकता है बिहार का अगला सीएम?

यह सवाल बड़ा अहम और जरुरी है कि आखिर प्रदेश में NDA सरकार के प्रचंड बहुमत के बाद सीएम का दावेदार आखिर कौन होगा...क्या नीतीश कुमार की वापसी होगी या फिर कोई नया चेहरा बिहार की कमान संभालेगा, जैसा कि अन्य प्रदेशों में NDA की जीत के बाद देखने को मिला है। हालांकि बिहार में हवाओं का रुख पहले की तरह ही देखने को मिल रहा है। यानी कि नीतीश कुमार की वापसी के संकेत देखने को मिल रहे हैं। ­­­­पर इस बात की पुष्टि तभी होगी जब आलाकमान का कोई निर्देश आएगा। 

 

 

 

सात्विक उपाध्याय

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