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कांग्रेस की गलती सुधारी गई

By विजय दत्त

वाजपेयी जी कठिन हालात में भी अपनी खुशमिजाजी नहीं खोते थे। भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, मैं अभी अभी राजा से मिलकर आया। मैंने उनसे पूछा कि आप इतनी शानोशौकत हमेशा कैसे झेल लेते हैं। उनकी महानता और स्वाभिमान का इसी से पता चलता है कि उन्होंने खुद को कभी भारत रत्न देने की पेशकश नहीं की, जबकि 1998 में भाजपा ने परमाणु परीक्षण के बाद यह प्रस्ताव दिया था। पार्टी को लगा था कि उनकी लोकप्रियता चरम पर है।

मनमोहन सिंह की नेतृत्व वाली यूपीए सरकार 10 सालों तक अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने से बचती रही। उसने लालकृष्ण आडवाणी का अटल जी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान देने की लिखित अपील की भी परवाह नहीं की। मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी के लिए बुजुर्ग अटल जी की सेवाओं के बदले राजनैतिक वजहों से युवा सचिन तेंडुलकर को भारत रत्न से नवाजना ज्यादा जरूरी लगा। इस ओछी राजनीति का कोई जवाब नहीं है।

ब्रजेश मिश्रा को उनकी सेवाओं के लिए पद्मविभूषण से नवाजा गया, लेकिन सोनिया गांधी को अटलजी के पूरे कार्यकाल में हासिल सम्मान के बदले भारत रत्न देना मंजूर नहीं हुआ। क्या वे यह सोचती हैं कि मिश्रा अटलजी की सहमति के बिना बोस्टन में उनके लिए कुछ कर पाते और वॉशिंगटन में मदद कर पाते।

अब वही लोग उनके सम्मान पर खुशी जाहिर कर रहे हैं। इससे वे शर्मिंदा हुए हैं और देश उनके तंगनजरिए को कभी भुला नहीं पाएगा।

नरेंद्र मोदी के ट्विट के मुताबिक अटलजी हर किसी के लिए सम्माननीय हैं... वे महान हस्तियों में महान रहे। कवि, दार्शनिक, भद्रपुरुष और मानवीय हृदय वाले राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी की मिसाल समकालीन नेताओं में नहीं मिलती। उनकी हल्की हंसी ही बड़े बड़ों के गुस्से को शांत कर देती रही है। उनकी कविताएं सदन में विरोधियों के तेवर ठंडा कर देती थी और प्रेस कॉन्फ्रेंसों में पत्रकारों पर जादुई असर पैदा कर देती थी। उनका मुस्कुराता चेहरा और उठे हाथ हर किसी की जेहन में याद है।

राजनैतिक कॅरियर की ऊंच-नीच उन्हें कभी भी भारत को महानता दिलाने की महत्वाकांक्षा से दूर नहीं कर पाया। उन्हें इसमें कामयाबी भी मिली। बेनजीर भुट्टो की एक बात से पता चलता है कि उनके लिए पाकिस्तान में भी कितना सम्मान था और अमेरिकी सरकार में कितनी इज्जत थी।

मैं लंदन से दिल्ली छुट्टी पर आ रहा था और सोचा कि बीवी (बेनजीर को लोग प्यार से इसी नाम से पुकारते थे) से एक इंटरव्यू कर लूं और संपादक को थमा दूं। मैं उनसे उनके बड़े से फ्लैट में मिला। इंटरव्यू आधे घंटे चला। फिर उन्होंने मुझसे लंच कर के जाने को कहा। भोजन के समय जब मैंने दिल्ली जाने की बात कही तो उन्होंने कहा, विजय, कृपया मेरे लिए दो काम कर दोगे? एक, सबसे असान है कि मेरे हल्दीराम की मिठाई का एक पैकेट लेते आना। दूसरे, मेरी ओर से जनाब वाजपेयी से कहना कि वे मेरे बारे में वॉशिंगटन को कुछ कह दें। इससे मुझे काफी मदद मिल जाएगी। वे नहीं जानते कि उनकी बात का अमेरिकी प्रशासन कितना वजन देता है।

वहां से लौटते वक्त मैं काफी खुश था। मुझे लगा कि देखो अटलजी ने भारत को किस मुकाम पर पहुंचा दिया है। उनके लिए दूसरे देशों में सम्मान का दूसरा उदाहरण अंग्रेज सरकार द्वारा उनका स्वागत था। एजवेयर रोड पर एसक होटल में भारतीय समुदाय से अटलजी की बातचीत से निकल हम जल्दी बाहर आए कि देखे कि अटलजी का कारवां जा रहा है। लेकिन हमने जो देखा, उससे भौंचक रह गए।

बेमानी विवाद

17-01-2015

मालवीय जी को महामना की उपाधि गांधीजी ने दी थी और वे उन्हें अपना गुरु मानते थे। मालवीयजी जब 1909 में कांग्रेस अध्यक्ष बने तो गांधीजी परिदृश्य पर नहीं थे, इसलिए एक मायने में यह सही भी है। 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में मालवीयजी के भाषण की प्रशंसा हुई थी। मालवीयजी 1900 में वकालत छोडऩे का फैसला किया था, लेकिन चौरी चौरा के अभियुक्तों के लिए वे फिर अदालत में पहुंचे और तीन-चौथाई आरोपियों को छुड़ा लाए। वे 1912 से 1919 तक इंपीरियल काउंसिल के पहले सदस्य थे।

हम भारतीयों को विवाद में बड़ा मजा आता है। किसी छोटे मामले की भी बाल की खाल निकालने में हम माहिर हैं। इसी तरह महामना मदनमोहन मालवीय को मरणोपरांत भारत रत्न देने पर विवाद छिड़ गया है।

जाहिर है, यह राजनैतिक वार-प्रतिवार का तीखा दौर है। सवाल है कि जब वी.पी. सिंह की सरकार डॉ. भीमराव आंबेडकर को मृत्य के 44 साल बाद भारत रत्न दिया या मृत्यु के 34 साल बाद मौलाना अब्दुल कलाम आजाद को या सरदार पटेल को यह उपाधि दी गई, तब तो कोई विवाद नहीं छिड़ा। तो, विचारधारा की भिन्नता कोई वजह है? आज आपत्ति उठाने वाले अनेक नेहरूवादी विचारधारा वाले हैं। उन्होंने तब एक शब्द भी नहीं बोला जब इंदिरा गांधी ने खुद भारत रत्न की उपाधि ली और फिर इमरजेंसी लगा दी। 1966 में जब इस सम्मान का ऐलान हुआ तो छह लोगों को मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे।

अब यह विवाद उठाया जा रहा है कि उनसे बड़े राष्ट्रवादी हैं। क्या वे यह कहना चाहते हैं कि गुलजारीलाल नंदा और एमजीआर से मालवीयजी छोटे राष्ट्रभक्त थे? क्या मालवीयजी महामना कहलाने के काबिल नहीं हैं? एक किसी ने कहा कि वे हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे, लेकिन वे भूल गए कि मालवीयजी बाद में चार बार कांग्रेस के भी अध्यक्ष बने। असलियत यह है कि वे दिन टकराव के नहीं, सहमति के बिंदुओं पर राजनीति करने के थे। दूसरों को आपत्ति है कि अगर मरणोपरांत सम्मान दिए गए तो अनगिनत महापुरुषों को देने की मांग उठ सकती है।

मालवीयजी की ख्याति 1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना के लिए है जो एशिया में सबसे बड़ा आवासीय विश्वविद्यालय है और दुनिया के बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है। वहां कला, विज्ञान, इंजीनियरिंग और तकनीक के 12,000 छात्र पढ़ते हैं। मालवीयजी 1919 से 1938 तक बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे। वे चार बार (1909-1913, 1919, 1932) कांग्रेस के अध्यक्ष रहे। उन्होंने 1934 में कांग्रेस छोड़ दी। वे भारत मे स्काउट की स्थापना करने वालों में रहे हैं। उन्होंने प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक लीडर की इलाहाबाद में 1909 में शुरुआत की। वे हिंदुस्तान टाइम्स के 1924 से 1946 तक चेयरमैन भी रहे। उनके ही प्रयासों से 1936 में उसके हिंदी संस्करण हिंदुस्तान दैनिक की शुरुआत हुई।

तो, ऐसे महामना मालवीय को क्यों नहीं भारत रत्न मिलना चाहिए? एक नेता ने ट्विट किया कि अगर सरकार भारत रत्न देने का ऐतिहासिक रास्ता चुनती है तो उसे भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, लाला लाजपत राय.. वगैरह के नाम पर भी विचार करना चाहिए। एक ने तो रासबिहारी बोस, जनरल मोहन सिंह, एनी बिसेंट, गोपालकृष्ण गोखले तक के नाम सुझा दिए।

इन पर बात हो सकती है, लेकिन इससे मालवीयजी के भारत रत्न पर सवाल नहीं उठता। एक इतिहासकार का यह तर्क भी जायज नहीं है कि तिलक जैसे भी कई महापुरुष हैं। सरकार को अधिकार है कि वह जिसे चाहे इस सम्मान के लिए चुने।

मालवीयजी को महामना की उपाधि गांधीजी ने दी थी और वे उन्हें अपना गुरु मानते थे। मालवीयजी जब 1909 में कांग्रेस अध्यक्ष बने तो गांधीजी परिदृश्य पर नहीं थे, इसलिए एक मायने में यह सही भी है। 1896 में कलकत्ता में कांग्रेस अधिवेशन में मालवीयजी के भाषण की प्रशंसा हुई थी। मालवीयजी 1900 में वकालत छोडऩे का फैसला किया था, लेकिन चौरी चौरा के अभियुक्तों के लिए वे फिर अदालत में पहुंचे और तीन-चौथाई आरोपियों को छुड़ा लाए। वे 1912 से 1919 तक इंपीरियल काउंसिल के पहले सदस्य थे। वे 1926 तक सेंट्रल लेजिस्लेटिव काउंसिल के सदस्य रहे। वे 1930 में गोलमेज सम्मेलन के प्रतिनिधिमंडल में भी थे। लिहाजा, वे भारत रत्न पाने के पूरे हकदार हैं।

मालवीयजी के इस सम्मान को दूसरे राजनैतिक मसलों से मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए।

आगे-आगे मोटरसाइकिल पर चार पुलिसवाले चल रहे थे, उनके पीछे एक काली लिमोसिन में चार काले पोशाक में लोग थे, जो बिलाशक एमआइ-6 के खुफिया वाले होंगे। उसके पीछे अटलजी की कार थी और उसके पीछे एक सुरक्षा गाड़ी चल रही थी। उसके बाद भारतीय राजनयिकों की कार और अंत में स्कॉटलैंड यार्ड की कार तथा एक एंबुलेंस चल रही थी।

लेकिन जैसे ही कारवां आगे बढ़ा, तीन हेलिकॉप्टर आसमान में मंडराने लगे, मानो ऊपर से कारवां का नजारा ले रहे हों। लंदन में तत्कालीन उप उच्चायुक्त हरदीप पुरी यह कहने से अपने को रोक नहीं पाए कि यह देखकर सीना चौड़ा हो जाता है कि हमारे प्रधानमंत्री का कैसा शानदार स्वागत हो रहा है।

मैंने भी अमेरिकी राष्ट्रपति के अलावा ऐसी सुरक्षा की किसी के लिए कल्पना नहीं की थी। किसी भारतीय प्रधानमंत्री का वैसा स्वागत नहीं हुआ था।

अटलजी कठिन हालात में भी अपनी खुशमिजाजी नहीं खोते थे। भारतीय समुदाय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था, मैं अभी अभी राजा से मिलकर आया। मैंने उनसे पूछा कि आप इतनी शानोशौकत हमेशा कैसे झेल लेते हैं। उनकी महानता और स्वाभिमान का इसी से पता चलता है कि उन्होंने खुद को कभी भारत रत्न देने की पेशकश नहीं की, जबकि 1998 में भाजपा ने परमाणु परीक्षण के बाद यह प्रस्ताव दिया था। पार्टी को लगा था कि उनकी लोकप्रियता चरम पर है।

वरिष्ठ पत्रकार अशोक टंडन का कहना है कि करगिल युद्ध के बाद भाजपा नेताओं का मानना था कि वाजपेयी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए, लेकिन वाजपेयीजी ने इनकार कर दिया। अब इसकी तुलना जरा जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से कीजिए, जिन्होंने अपनी सरकार में ही भारत रत्न की उपाधि ले ली।

प्रधानमंत्री के तौर पर भी उन्होंने साबित किया कि उनके पास अर्थव्यवस्था को सुधारने और पाकिस्तान से शांति स्थापित करने की योजनाएं हैं। 2002 और 2005 में उनकी सरकार ने आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया और देश में जीडीपी वृद्धि दर को 6-7 प्रतिशत के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया। विदेशी निवेश बढ़ाकर और सार्वजनिक तथा औद्योगिक उत्पादन के आधुनिकीकरण के जरिए रोजगार सृजन किया और आइटी उद्योग तथा शहरीकरण के जरिए अंतर्राष्ट्रीय छवि को ऊंचा किया। अच्छी फसल और औद्योगिक विस्तार ने भी देश की मदद की।

सरकार ने टैक्स सुधार भी किए, सुधारों की गति बढ़ाई और कारोबार के अनुकूल माहौल बनाया। भाजपा की राजनैतिक ऊर्जा भी बढ़ते शहरी मध्यवर्ग की ओर लगी। हालांकि उन्हें संघ परिवार के संगठनों से भी लोहा लेना पड़ा। भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ ने तो उनके खिलाफ मोर्चा ही खोल दिया था।

1998 और 1999 में वाजपेयी ने पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया की शुरुआत की। फरवरी 1999 में ऐतिहासिक दिल्ली-लाहौर बस के उद्घाटन के मौके पर उन्होंने कश्मीर विवाद और पाकिस्तान के साथ सुलह की बातें शुरू कीं। लाहौर घोषणा पत्र में व्यापार बढ़ाने, आपसी दोस्ती और दक्षिण एशिया क्षेत्र को परमाणु मुक्त करने का जिक्र हुआ। इससे 1998 में पमाणु परीक्षण से बना तनाव दूर हुआ।

अगस्त 2003 में उन्होंने संसद में पाकिस्तान के साथ शांति की आखिरी बातचीत की घोषणा की। सही मायनों में कूटनीतिक प्रक्रिया की शुरुआत तो नहीं हो सकी, लेकिन इससे उच्चस्तरीय दौरे शुरू हुए और सैनिक तनाव घटा। पाकिस्तान के राष्ट्रपति, राजनैतिक नेताओं और अमेरिका, यूरोप के नेताओं ने भी इस पहल की सराहना की। जुलाई 2003 में वाजपेयी चीन गए और वहां के नेताओं से मिले। उन्होंने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना। इसका असर यह हुआ कि चीन ने भी सिक्किम को भारत का हिस्सा मंजूर कर लिया। उसके भारत-चीन रिश्ते में एक नई शुरुआत हुई।

वाजपेयी ने पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ को दिल्ली और आगरा आने का न्यौता देकर फिर पाकिस्तान से रिश्ते सुधारने की पहल की, जो करगिल युद्ध के बाद बिगड़ गए थे। लेकिन मुशर्रफ के कश्मीर पर अडिय़ल रवैए के कारण वह पहल बेकार गई।

भाजपा के उदार चेहरे के रूप में अटलजी व्यक्ति और राजनेता के तौर ऐसे उभरे कि वे 24 दलों के गठजोड़ की सरकार पांच साल तक चला गए। ऐसी शख्सियत को भारत रत्न देने से इनकार करना ओछी राजनीति की इंतहा है।

आज उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है, लेकिन 25 दिसंबर को उनके जन्मदिन पर भारत रत्न दिए जाने पर समूचे देश ने खुशी मनाई। आखिर में अगर वे नेता नहीं होते तो कवि होते। उन्होंने मानो खुद से पूछा है, राह कौन-सी जाऊं मैं और फिर देश सेवा की राह ही चुनी।

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