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इतिहास और वर्तमान के चौराहे पर विवादित मंदिर के क्षेत्र का सच

The truth about the disputed temple site at the crossroads of history and the present.

 

 श्वेता त्रिपाठी


 

 

भारत एक विविधतापूर्ण देश है जहाँ विभिन्न धर्मों, मतों और सांस्कृतिक मान्यताओं का अनुपालन करने वाले लोग सौहार्दपूर्ण तरीके से निवास करते हैं। कित्नु कुछ ऐतिहासिक निर्णय जो विदेशी आक्रांतों ने भारत के मंदिरों के सन्दर्भ में लिए वह आज भी विवाद का कारण बने हुए हैं। इस परिप्रेक्ष्य में भारत में मंदिरों और विवादों का इतिहास काफी जटिल रहा है। 

भारतीय मध्य-कालीन इतिहास के अध्ययनों से यह इंगित होता है कि विदेशी आक्रांताओं द्वारा धार्मिक स्थलों को तोड़ने और बाद में उन स्थलों पर मस्जिदों और मकबरों के निर्माण जैसे  कई दावे शामिल किये गए हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश उच्च न्यायलय के एक महत्वपूर्ण निर्णय ने इस विषय पर प्रकाश डाला है जिसमें माननीय उच्च न्यायलय ने धार के कमल मौला मस्जिद को भोजशाला मंदिर की संज्ञा दी है। कई राष्ट्रवादी और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए यह 'ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने' और सांस्कृतिक गौरव को वापस लाने का मुद्दा है। उनके अनुसार यह ऐतिहासिक निर्णयगुलामी के प्रतीकों को हटाकर राष्ट्रीय अवचेतना जागरणका पर्याय बनेगा, क्योंकि भारत में अभी भी कई ऐसे धार्मिक विवादित स्थल हैं, जिनके परिणाम अपेक्षित हैं।

आइये इस तथ्य पर विस्तार से चर्चा करते हैं-

भोजशाला मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में मालवा के महान राजा भोज ने अपनी राजधानी में किया था। ज्ञान और कला की देवी वाग्देवी (सरस्वती) की अद्भुत प्रतिमा स्थापित होने के कारण इसे "भोजशाला" नाम दिया गया। उन्होंने इस परिसर को 'संस्कृत शिक्षा'  के प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित किया था, जो देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर था। यहां संस्कृत के श्लोक और व्याकरण से संबंधित शिलालेख दीवारों पर उत्कीर्ण किये गए थे अतः देखा जाए तो इस इमारत में नक्काशीदार बलुआ पत्थर के खंभे और मंडप है, जो इसकी प्राचीन वास्तुकला को दर्शाते हैं। कुछ समय में ही भोजशाला एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र के रूप में उभरा जहां संस्कृत, व्याकरण, दर्शन अन्य महत्वपूर्ण विषयों के अध्ययन के लिए एक विशाल पाठशाला बनाया गया था।

धार के इस भोजशाला मंदिर में पुरातात्विक स्थलों, विशेष रूप से शिलालेखों, की तरफ ध्यान ब्रिटिश राज से जुडे विद्वानों द्वारा आकर्षित किया गया था। 1822 में जॉन मैल्कम ने अपने लेखों में धार का उल्लेख किया है। 19वीं सदी के अंत से वर्तमान तक भोजशाला के शिलालेखों पर विद्वतापूर्ण अध्ययन जारी रहा। 1903 में भोजशाला मंदिर की पृष्टभूमि में एक अध्याय शुरू हुआ, जब धार रियासत में शिक्षा अधीक्षक के.के. लेले ने कमाल मौला मस्जिद के दीवारों और फर्श पर कई संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों के होने की सूचना दी। शिलालेखों का अध्ययन विभिन्न विद्वानों द्वारा वर्तमान तक जारी है। इसी कड़ी में विभिन्न अध्ययनों द्वारा ज्ञात स्थल पर उत्कीर्ण शिलाओं की विविधता और आकार में सादृश्यता पायी गयी है, इन अभिलेखों में दो सर्पबन्ध लेख हैं, जिनमें संस्कृत भाषा के व्याकरणिक नियम दर्शाए गए हैं ।यह इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि सामग्री एक जगह से नहीं बल्कि विस्तृत क्षेत्र में कई विभिन्न इमारतों से इकट्ठी की गई थी। 20वीं शताब्दी में उत्खनन के दौरान इस स्थल से देवी सरस्वती की एक नक्काशीदार मूर्ति खोजी गई जो की स्वयं में एक प्रमाण है तथा इतिहासकारों के अनुसार यह मूर्ति वर्तमान समय में लंदन ब्रिटिश संग्रहालय में रखी हुई है।

विदित है की भोजशाला मंदिर पर मुस्लिम शासकों में विशेषकर 'खिलजी वंश' का प्रभाव अधिक पड़ा, खिलजी शासकों द्वारा मंदिर परिसर को क्षतिग्रस्त किया गया और बाद में इस परिसर के कुछ हिस्सों को दरगाह (सूफी संत कमल उद्दीन /कमाल मौला) और बाद में इसे "कमाल मौला मस्जिद" के रूप में भी जाना जाने लगा। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने मंदिर की दीवार और फर्श पर उत्कीर्ण संस्कृति और प्राकृतिक भाषा के शिलालेखों को नष्ट कर दिया या वही उल्टा करके दीवारों में लगा दिया था।

भोजशाला मंदिर का मुद्दा न्यायलय के समक्ष कैसे पहुंचा:-"इंपीरियल गजेटियर ऑफ़ इंडिया" 1908 में उल्लेख किया गया है कि मौजूदा मस्जिद का निर्माण पुराने हिंदू मंदिरों के अवशेष का उपयोग करके किया गया है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई ) ने 2003 में भोजशाला के ढांचे को अपने नियंत्रण में ले लिया और जांच से यह प्रमाणित किया कि यह 11वीं सदी में राजा भोज द्वारा निर्मित मूल रूप से हिंदू मंदिर शिक्षाकेंद्र है बाद में परिसर में दोनों समुदायों के कानूनी दावे शुरू हुए। 2003 का नियम पारित किया गया जिसमें मंगलवार को हिंदू भोजशाला में पूजा करेंगे और शुक्रवार को मुस्लिम नमाज़ अदा करेंगे।

साल 2022 में " हिंदू फ्रेंड फॉर जस्टिस" ने इंदौर बेंच में एक याचिका दायर की जिसमें उसने  माँग की कि भोजशाला मंदिर का धार्मिक स्वरूप स्पष्ट हो और हिंदुओं को पूर्ण रूप से अधिकार दिया जाए, साथ ही यहां नमाज बंद हो और एसआई द्वारा सर्वेक्षण किया जाए। मार्च 2024 में हाई कोर्ट ने एएसआई को वैज्ञानिक सर्वे करने का आदेश दिया यह सर्वे लगभग 98 दिनों तक चला तथा एएसआई के सर्वेक्षण के आधार पर प्रस्तुत रिपोर्ट में निम्नलिखित तथ्य सामने आये:-

1.            मौजूदा संरचना पहले के मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई थी।

2.            परिसर के भीतर पत्थर की शिलाएं हैं, जिस पर प्राचीन प्राकृत भाषा में रचित कूर्म- अवतार (भगवान विष्णु के कछुए अवतार) को समर्पित दो अलग-अलग कविताएं हैं।

3.            कुछ शिलालेखों में 'ओम नमः शिवाय' जैसे मंत्र लिखे मिले हैं।

4.            सर्वे में 94 मूर्तियां 106 स्तंभ और भित्ति चित्रों से सजे 82 लंबे स्तंभ मिले हैं, साथ ही मूर्तियों के कई टुकड़े भी मिले हैं जो की बेसाल्ट, संगमरमर, बलुआ -पत्थर और चूना पत्थर से बने हैं।

5.            यहां से भगवान गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव और कई देवी- देवताओं की मूर्तियां भी प्राप्त हुई है।

6. कुछ शिलालेखों में परमार वंश के 'राजा नरवर्मन 'का जिक्र मिला है इसके अतिरिक्त शास्त्रीय संस्कृत नाटक जो कि 'राजा अर्जुन वर्मा' के शासनकाल के दौरान 'राज शिक्षण मदन' ने लिखा था वह भी प्राप्त हुआ है।

उपरोक्त विवरणों को संज्ञान में लेते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार की भोजशाला मंदिर को वाग्देवी मंदिर बताया है, और फैसला सुनाते हुए कहा है कि यह परिसर हिंदू मंदिर है और अदालत ने एएसआई सर्वे और उसके द्वारा किए गए वैज्ञानिक अध्ययन पर भरोसा जताते हुए कहा कि पुरातत्व एक विज्ञान है और कोर्ट वैज्ञानिक निष्कर्ष पर भरोसा कर सकती है। भोजशाला मंदिर पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले ने कानूनी और ऐतिहासिक ढांचे में सुधार किया और अन्य विवादित प्राचीन मंदिरों के संरक्षण और विवाद समाधान के लिए एक मिसाल पेश किया।

अतः न्यायालय ने 2003 के उसे आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें इस स्थल पर हिंदू और मुसलमान द्वारा संयुक्त पूजा की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने फैसला दिया कि यह "पूजा स्थल अधिनियम 1991" इस स्थल पर लागू नहीं होगा, यह स्थल "प्राचीन स्मारक और पुरातात्विक स्थल और अवशेष अधिनियम 1958"  के तहत संरक्षित स्मारक है।

सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी है की ऐतिहासिक और पुरातत्व महत्व वाली संरचना का संरक्षण करें।न्यायालय ने मुस्लिम पक्ष को नमाज के लिए धार जिले में अलग जमीन के लिए सरकार से संपर्क करने के लिए छूट दी है।

यद्यपि हाईकोर्ट के इस फैसले से मुस्लिम पक्ष ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है, परंतु देखा जाए तो ऐतिहासिक भोजशाला मंदिर के समान भारत के कई अन्य धार्मिक स्थल जैसे ज्ञानवापी मस्जिद (वाराणसी), शाही ईदगाह मस्जिद मथुरा, उत्तर प्रदेश (जहां कृष्ण जन्म स्थल का मूल मंदिर होने का दावा किया जाता है) इसके अतिरिक्त अजमेर शरीफ दरगाह, राजस्थान  (जिसके नीचे शिव मंदिर होने का दावा किया जाता है), बाबा बुद्नगिरी दरगाह (चिकमगलूर कर्नाटक) ऐसे अनेक स्थल है जहां वर्तमान समय में हिंदू स्थलों और मंदिरों की ऐतिहासिक सत्यता का पता लगाने प्रयास चल रहा है। अतः यह सिर्फ जमीन का मामला नहीं है यह इतिहास, आस्था, पहचान की सबसे बड़ी लड़ाई है। यद्यपि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) जैसे संगठन कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि हर मस्जिद में मंदिर खोजना उचित नहीं है इससे समाज में अनावश्यक तनाव पैदा होता है जिससे हमें बचना चाहिए एवं संपूर्ण भारत वासियों का प्रयास होना चाहिए की भारत की एकता एवं अखंडता को यथावत अक्षुण्ण बनाये रखने का सर्वसम्मत प्रयास करें।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

 

 

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