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चीनी गाथा: तेजी, आयात और बदलती तस्वीर

The Sugar Saga: Surge, Imports, and the Changing Landscape


सुरेश मनचन्दा


चीनी बाजार का नया दौर तेजी, आयात और बदलती तस्वीर के बीच भारत की चीनी नीति

देश में जो चीनी जुलाई के अंत तक 39 रुपए/किलो तक बिक रही थी, अगस्त आते आते तेजी के चलते देश के हर न्यूज पेपर और न्यूज़ चनैल में हेडलाइन बन गई। चीनी रातों रात 60 रुपए/किलो के पार चली गई यहां तक कि कुछ शहरों में तो 100 फिसदी का उछाल लेकर 80 रुपए के पार बिकने लगी। और चीनी की कीमतों में आए उछाल ने सरकार के साथ साथ आम जन को भी सकते में ला दिया। जुलाई तक जो सरकार चीनी का निर्यात कोटे के अन्तर्गत कर रही थी। उसी सरकार को 10 लाख टन चीनी आयात करने की नौबत आ गई। यही नहीं उत्तर-प्रदेश राज्य सरकार ने तो चीनी स्टाक करने वालों, ब्लैक मार्केटिंग करने वालों पर ताबड़तोड़ रेड डाली। बहुत से बुद्धिजीवियों ने चीनी की कीमतों में आए उछाल के पीछे ऐथनाल को ही जिम्मेदार ठहरा दिया। क्या चीनी की कीमतों के पीछे ऐथनाल है? क्या गन्ना से रिकवरी कम होने के चलते चीनी उत्पादन में कमी आई और चीनी की कीमतों में उछाल देखने को मिला? क्या एल-नीनो इसकी वजह बना ? क्या चीनी की कीमतें 40 रुपए के नीचे किसानों और चीनी मिलों के लिए उचित नहीं? क्या चीनी का निर्यात करना सरकार की विफलता रहा? क्या चीनी की कीमतों में अभी और उछाल आना है ?

ऐसे बहुत से सवाल है और इस लेख में उन्हीं बिन्दुओं को उजागर करने की कोशिश, सिलसिलेवार आसान शब्दों में है।

अगस्त 2026 में घरेलू चीनी बाजार में कीमतों में असाधारण तेजी देखने को मिली। सरकार के अनुसार मौजूदा सीजन में चीनी उत्पादन का अनुमान शुरुआती 343 लाख टन से घटकर लगभग 306 लाख टन रह गया है। गन्ने में Red Rot और Top Borer जैसी बीमारियों ने उत्पादन को प्रभावित किया है।

इसके साथ ही त्योहारी मांग ने बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है। अगस्त से नवंबर के बीच देश में गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहार आते हैं, जिनमें मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों के कारण चीनी की मांग बढ़ जाती है।

यानी बाजार में कहानी साफ है-Supply पर दबाव और Demand में seasonal jumpiहालांकि कारण जो भी रहे हों किसानों की तरफ से मांग आ रही है कि गन्ना की बेहतर कीमतों के लिए चीनी की बाजार कीमतों में उछाल आना चाहिए। ताकि चीनी मिलें समय पर और सही दाम दे पाएँ और किसानों की आमदनी में भी बढ़ोतरी हो।

लेकिन क्या देश में सचमुच चीनी की कमी है?

यहीं से कहानी थोड़ी पेचीदा हो जाती है।

Indian Sugar & Bio-energy Manufacturers Association यानी ISMA का कहना है कि देश में चीनी की वास्तविक कमी नहीं है। संगठन के मुताबिक मौजूदा तेजी के पीछे उत्पादन में कमी के साथ-साथ bulk consumers की stocking और speculative buying भी महत्वपूर्ण कारण हैं। ISMA का अनुमान है कि घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है।

सरकार का भी कहना है कि अक्टूबर में नए crushing season के शुरू होने तक देश में घरेलू मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त चीनी उपलब्ध है।

इसलिए मौजूदा स्थिति को "Sugar Crisis" कहना शायद जल्दबाजी होगी। इसे फिलहाल tight supply situation और price management challenge कहना अधिक उचित होगा।

सरकार ने क्यों लिया Import का रास्ता?

एक दशक यानि 10 साल बाद सरकार ने चीनी आयात को शुल्क मुक्त करने का फैसला लिया है। इसी बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार, कंज्यूमर एफेयर मंत्रालय को इस बात की बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी कि देश में चीनी का स्टाक कितना है और मांग कितनी ? कंज्यूमर एफेयर मंत्रालय चीनी और अन्य कमोडिटी के स्टीक आंकड़ों की जानकारी रखने में पूरी तरह विफल रहा। देश में किसी भी तरह से चीनी के उत्पादन में कमी नहीं थी, हालांकि मिली जानकारी के मुताबिक गन्ने से रिकवरी भी बेहतरीन रही। और रिकवरी को जिम्मेदार मानना और वो भी उस समय पर जब नया सीजन सिर पर है, ऐसे में चीनी की कीमतों में तेजी आना साफतौर पर बड़ी चीनी मिलों, स्टाकिस्ट के खेल की तरफ इशारा करती हैं।

लेकिन सरकार ने स्टाकिस्ट और कारोबारियों के खेले का जवाब देने पर अपनी रणनीति साफ कर दी है अधिक supply बाजार में sentiment सुधरे उपभोक्ताओं को राहत मिले। कीमतों पर दबाव कम हो festive season में अचानक चीनी की कीमतों में आई तेजी और चीनी के ऐथनाल नेटवर्क को साथ जोड़ने से सरकार की ऐथनाल नीति भी खतरे में पड़ती नजर आई और सरकार ने तुरन्त एक्शन लिया। सरकार के एक्शन लेते ही देश में चीनी की एक्स-मिल कीमत 50 रुपए/किलो पर आने के बाद भी चीनी मिलों को खरीददार नहीं मिल रहे और चीनी की कीमतों में गिरावट आने के बाद चीनी के आयात में भी आयातकों की दिलचस्पी कम दिखाई दे रही है।

चैंकाने वाली रिपोर्ट ये भी है कि सरकार ने 10 लाख टन चीनी आयात की अनुमति दी है जिसमें से केवल 5 लाख टन चीनी ही आयात होती दिखाई दे रही है। क्योंकि चीनी में कारोबार करने वाले कारोबारियों का मानना है कि चीनी की कीमतें जल्द फिर से 40 रुपए पर कारोबार करती दिखाई दे सकती हैं और एक्स-मिल भाव 30 रुपए के करीब पहुंच सकता है।

सरकार का दूसरा बड़ा  कदम-Stock Limit

सरकार ने केवल आयात पर भरोसा नहीं किया है। चीनी की जमाखोरी और artificial scarcity को रोकने के लिए stockholding rules को भी कड़ा किया है।

1 अगस्त से चीनी dealers पर 400 टन का stock limit लगाया गया है और 1 सितंबर से bulk consumers को 15 दिनों की खपत से अधिक चीनी रखने की अनुमति नहीं होगी। सरकार ने mills के stocks की physical verification भी शुरू की है।

इसका उद्देश्य है कि बाजार में उपलब्ध चीनी का कृत्रिम अभाव पैदा न हो और speculative stocking पर लगाम लगे।

चीनी मिलों में पड़ा स्टॉक तेजी से बाजार तक पहुंचे और घरेलू बाजार में सप्लाई लगातार बनी रहे।

नई व्यवस्था के तहत चीनी मिलों को अपने आवंटित कोटे का कम से कम 40 फीसदी हिस्सा पहले सप्ताह में बेचना होगा, जबकि बाकी मात्रा अगले हफ्ते में बाजार में भेजनी होगी।

इसके अलावा, मिलों को बिक्री के 7 दिनों के भीतर चीनी की डिस्पैचिंग भी करनी होगी।

इस व्यवस्था से सरकार को बाजार में चीनी की सप्लाई पर पहले की तुलना में ज्यादा करीबी नजर रखने में मदद मिलेगी।

चीनी पर अंतरराष्ट्रीय नजरिया और संकेत

चीनी को लेकर चीनी गाथा सिर्फ भारत में ही नहीं गाई जा रही। बल्कि विदेशी बाजारों में भी गाई जा रही है। दरअसल वैश्विक बाजार में चीनी की सप्लाई ने चिंता बढ़ा दी है।

भारत सरकार के अनुसार 2026-27 में global sugar deficit लगभग 33 बाख टन रहने का अनुमान है। इसका असर international prices पर भी पड़ा है। 30 जून 2026 को international sugar price लगभग $474 प्रति टन थी, जो 20 अगस्त तक बढ़कर करीब $552 प्रति टन हो गई-यानी दो महीने से भी कम समय में 16% से अधिक की तेजी।

इसका मतलब यह है कि यदि भारत को अंतरराष्ट्रीय बाजार से चीनी खरीदनी पड़ती है, तो global prices भी घरेलू बाजार की लागत को प्रभावित कर सकती हैं।

चीनी कीमतों में ऐथनान की भागीदारी

भारतीय चीनी उद्योग अब केवल चीनी बनाने वाली इंडस्ट्री नहीं रह गई। एथनाल ने इस सेक्टर की इक्नोमिक्स को बदल कर रख दिया है। हालांकि इंडस्ट्री का मानना है कि सरकार ऐथनाल पर जो दे रही है उससे ज्यादा मिल को चीनी से मिलता है तो मिल चीनी उत्पादन करना ज्यादा फायदेमंद सोचती है।

हालांकि सरकार ने मौजूदा कीमतों में उछाल को मुख्य रूप से ऐथनाल को कारण नहीं माना है।

अक्टूबर में बदल सकती है तस्वीर

मौजूदा संकट का सबसे महत्वपूर्ण turning point अक्टूबर हो सकता है।

सरकार ने sugar mills को 15 अक्टूबर 2026 से पेराई शुरू करने की सलाह दी है। सरकार का अनुमान है कि अक्टूबर में सामान्य 3-4 लाख टन के मुकाबले उत्पादन 10 लाख टन से अधिक हो सकता है।

यदि नया पेराई सीजन समय पर शुरू होता है और गन्ने की उपलब्धता उम्मीद के मुताबिक रहती है, तो बाजार में सप्लाई तेजी से सुधर सकती है।

आने वाले समय में चीनी की कीमतें इन बातों से होंगी तय

चीनी बाजार को समझने के लिए आने वाले समय में छह संकेत सबसे महत्वपूर्ण होंगे:

पहला-    अक्टूबर में पेराई कितनी जल्दी शुरू होती है।

दूसरा-    महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में गन्ने की वास्तविक स्थिति क्या रहती है।

तीसरा-  चीनी आयात कितना होता है ?

चौथा-    त्यौहारी मांग कितनी मजबूत रहती है।

पांचवां - वैश्विक चीनी की कीमतें और ब्राजिल में उत्पादन और सप्लाई

छठा-      सरकार की नीतियां।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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