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मोदी डॉक्ट्रिन : जहां सिद्धांत नहीं, राष्ट्रीय हित तय करते हैं रिश्ते

The Modi Doctrine: Where national interests, not principles, determine relationships

अभी हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने ट्रुथ सोशल सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट में लिखा, "अमेरिका असली एनर्जी दबदबे की ओर लौट रहा है! आज मुझे यह बताते हुए गर्व हो रहा है कि अमेरिका फर्स्ट रिफाइनिंग, ब्राउन्सविले, टेक्सास में 50 साल में पहली नई U.S. ऑयल रिफाइनरी खोल रही है।"

उन्होंने आगे कहा, "इस ज़बरदस्त इन्वेस्टमेंट के लिए भारत में हमारे पार्टनर्स और उनकी सबसे बड़ी प्राइवेट एनर्जी कंपनी, रिलायंस को धन्यवाद।"

मित्रों, अमेरिका ने पिछले पचास वर्षों में एक भी नई तेल रिफाइनरी नहीं बनाई। पूरे पचास साल। आख़िरी बार जब किसी रिफाइनरी की नींव पड़ी थी, तब रिचर्ड निक्सन अमेरिका के राष्ट्रपति थे और कच्चे तेल की कीमत महज़ 3 डॉलर प्रति बैरल थी।

अब डोनाल्ड ट्रम्प ने 300 अरब डॉलर की एक विशाल परियोजना का ऐलान किया है—अमेरिकी इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा निवेश। टेक्सास के Port of Brownsville में एक नई रिफाइनरी बनाई जाएगी। 2026 की second quarter में इसकी आधारशिला रखी जाएगी। 20 साल का ऑफटेक समझौता तय है। यह प्लांट अमेरिकी शेल तेल को प्रोसेस करेगा, दक्षिण टेक्सास में हज़ारों नौकरियाँ पैदा करेगा और इसे “दुनिया की सबसे साफ़ रिफाइनरी” बताया जा रहा है।

लेकिन इस कहानी का असली दिलचस्प मोड़ यहाँ है—इस परियोजना का सबसे बड़ा विदेशी निवेशक एक भारतीय कंपनी है। और वो कौन है?

वही Reliance Industries, जिसे सुबह शाम पानी पी पी के कोसते रहते हैं राहुल गांधी।  आज राहुल गांधी पर बात नहीं करेंगे, waste of time हो जाएगा।  रिलायंस इंडस्ट्रीज, अंबानी परिवार की कंपनी, जिसमें प्रमोटरों की हिस्सेदारी 50.39% है। गुजरात में इसका Jamnagar Refinery Complex दुनिया का सबसे बड़ा सिंगल-लोकेशन रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स है। ट्रम्प ने अपने प्लेटफॉर्म Truth Social पर भारत में अपने “पार्टनर्स” का धन्यवाद करते हुए लिखा कि यह “तगड़ा निवेश” अमेरिका की ऊर्जा ताकत को और बढ़ाएगा।

अब ज़रा दो बातें एक साथ सोचिए

एक तरफ़ भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज़ अरबों डॉलर लगाकर अमेरिका में रिफाइनरी बना रही है—ताकि अमेरिकी शेल तेल को प्रोसेस किया जा सके और अमेरिका की ऊर्जा क्षमता और मज़बूत हो।

दूसरी तरफ़ भारत की सरकार—जिसका नेतृत्व नरेंद्र मोदी कर रहे हैं—उसी समय अपनी ज़रूरत का 40 प्रतिशत से ज़्यादा कच्चा तेल रूस से खरीद रही है, वो भी युद्ध के कारण मिलने वाली रियायती कीमतों पर। 7 मार्च को जब अमेरिका की तरफ़ से यह बात आयी  कि भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिन की “इजाज़त” दी जा रही है, तो नई दिल्ली का जवाब साफ़ था—भारत ने कभी किसी देश की अनुमति पर निर्भर रहकर अपनी ऊर्जा नीति नहीं चलाई। इसी के साथ भारत Chabahar Port के रास्ते ईरान से जुड़ी ऊर्जा और व्यापारिक आपूर्ति को भी बनाए हुए है।

यानी यह सब एक ही हफ्ते और एक ही देश की कहानी है। एक हाथ से अमेरिका की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मज़बूत करता भारत और दूसरे हाथ से रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदता भारत।

ऊपरी तौर पर यह विरोधाभास लगता है। लेकिन असल में यही आज की भारतीय विदेश नीति की असली तस्वीर है—जिसे कई लोग “मोदी डॉक्ट्रिन” कहने लगे हैं।

इस नीति का मतलब सीधा है—भारत किसी एक खेमे में खड़ा नहीं होता। भारत सौदे करता है। जहाँ जो राष्ट्रीय हित में हो, वहाँ वही कदम उठाता है।

  • सुरक्षा के लिए Quadrilateral Security Dialogue यानि QUAD  में साझेदारी।
  • ऊर्जा के लिए रूसी तेल।
  • ईरान तक पहुँच के लिए चाबहार।
  • अमेरिका में रिफाइनिंग के लिए रिलायंस का निवेश।
  • सैन्य आधुनिकीकरण के लिए इज़राइली तकनीक। और खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों की कमाई से आने वाली विदेशी मुद्रा।

किसी एक शक्ति के साथ औपचारिक गठबंधन नहीं—लेकिन लगभग हर बड़ी शक्ति के साथ कामकाजी रिश्ता। हर संबंध व्यावहारिक। हर फैसला संतुलित। हर विरोधाभास दरअसल किसी न किसी राष्ट्रीय हित की पूर्ति करता हुआ।

ट्रम्प को यह रिफाइनरी इसलिए बनानी पड़ रही है क्योंकि ईरान युद्ध ने अमेरिका की एक बड़ी कमजोरी उजागर कर दी। पचास साल तक नई रिफाइनरी न बनाने का मतलब यह हुआ कि अमेरिका को अपने ही शेल तेल से बनने वाले पेट्रोल, डीज़ल और जेट ईंधन के लिए विदेशी रिफाइनिंग क्षमता पर निर्भर रहना पड़ता है।

और जब अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण Strait of Hormuz जैसे समुद्री रास्ते बंद होते हैं, तो सिर्फ कच्चे तेल की आपूर्ति ही नहीं रुकती—ईंधन और पेट्रोकेमिकल्स की पूरी सप्लाई चेन हिल जाती है। इसलिए घरेलू रिफाइनिंग क्षमता बढ़ाना अमेरिका के लिए अब रणनीतिक ज़रूरत बन चुका है।

उधर अंबानी के लिए भी यह सौदा उतना ही अहम है। रिलायंस का जामनगर प्लांट मुख्यतः खाड़ी देशों के उस कच्चे तेल को प्रोसेस करता है जो  Strait of Hormuz   से होकर आता है। वही रास्ता जो आज युद्ध, sea mines और सुरक्षा जोखिमों से घिरा हुआ है—और जहाँ Islamic Revolutionary Guard Corps की सैन्य मौजूदगी लगातार बढ़ती जा रही है।

अमेरिका में शेल तेल की रिफाइनिंग में निवेश करके रिलायंस दरअसल अपने जोखिम को बाँट रही है। अगर खाड़ी से आने वाला कच्चा तेल किसी संकट में फँसता है, तो उसके पास एक दूसरा विकल्प मौजूद रहेगा। यह कोई दान या दोस्ती नहीं है—यह दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनिंग कंपनियों में से एक द्वारा खरीदा गया रणनीतिक बीमा है।

  • युद्ध ने संकट पैदा किया।
  • संकट ने सौदे को जन्म दिया।

और उस सौदे पर हस्ताक्षर उस देश की कंपनी ने किए, जिसके प्रधानमंत्री को हाल ही में रूस से तेल खरीदने के लिए “इजाज़त” दिए जाने की बात कही गई थी—और जिसने साफ़ शब्दों में दुनिया को बता दिया कि भारत अपनी ऊर्जा नीति किसी की अनुमति से नहीं चलाता। और यही मोदी डॉक्ट्रिन है।  कबीरा खड़ा बाजार में, मांगे सबकी खैर, ना काहू से दोस्ती ना काहू  से बैर। जो है सो राष्ट्रहित है।

 

 

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