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विकसित भारत के लक्ष्य को प्रभावित करेंगे मौजूदा विधानसभा चुनाव

The current assembly elections will affect the goal of a developed India

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के विकास को लेकर 'विकसित भारत'  के नाम से जिस लक्ष्य को तय किया है, वह महत्वाकांक्षी तो है, उतना ही चुनौतीपूर्ण भी है। महत्वाकांक्षी यह है कि दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था को भारतीय आजादी की सौंवी वर्षगांठ तक देश को पूरी तरह विकसित करना और दुनिया की अव्वल अर्थव्यवस्था बनाना है। तब तक देश को हर मोर्चे पर विकसित बनाना है, जिस तरह के विकसित देश फिनलैंड, डेनमार्क, नार्वे, अमेरिका, ब्रिटेन या फ्रांस आदि हैं। जहां हर नागरिक को साफ हवा, आर्थिक सुरक्षा, सहज स्वास्थ्य सुविधाएं और गुणवत्तायुक्त विश्वस्तरीय शिक्षा मुहैया हो। चूंकि भारत में सहकारी संघवाद की व्यवस्था है, जहां केंद्र के साथ ही राज्यों की सरकारों की भूमिकाएं महत्वपूर्ण हैं। इन्हीं वजहों से पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के नतीजों की मीमांसा विकसित भारत के लक्ष्यों के लिहाज से की जा रही है।

विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने की उलटी गिनती जारी है। भारत को हर मोर्चे पर सर्वोत्तम बनाने के लिए 21 साल का वक्त बाकी है। भारत की जैसी राजनीति है, जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था है, उसमें दलों की भूमिका और ताकत ज्यादा है। भारतीय संविधान ने शासन के लिए तीन सूचियों की व्यवस्था की है, संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची। संघ सूची में देश की विदेश नीति, सीमाई मामले, विदेश नीति, अर्थव्यवस्था, संचार और रेल जैसे कुछ एक विषय ही आते हैं, लेकिन खेती-किसानी, भूमि संबंधी मामले और स्वास्थ्य जहां राज्य सूची के मामले हैं, वहीं शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। शासन के विषयों में सबसे महत्वपूर्ण विषय कानून और व्यवस्था है। अगर खेती-किसानी ठीक चल रही हो, शिक्षा व्यवस्था बेहतर हो, स्वास्थ्य तंत्र भी सही काम कर रहा हो, लेकिन राज्य की कानून-व्यवस्था ठीक ना हो तो इन सबका कोई विशेष मायने नहीं रह जाता। इस नाते कानून और व्यवस्था का विषय सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है। लेकिन यह राज्यों का विषय है। इसी वजह से केंद्रीय सत्ता हासिल करने वाला हर दल चाहता है कि राज्य में भी उसी की सरकार हो। ताकि राज्य की कानून-व्यवस्था को अपने मनमुताबिक ढंग से निर्देशित किया जा सके। केंद्र सरकार तमाम तरह की योजनाएं शुरू करती हैं, लेकिन उन्हें लागू करने का अधिकार राज्यों के पास होता है। अगर समविचारी सरकारें केंद्र और राज्य में न हों तो केंद्रीय योजनाओं को लागू करना आसान नहीं होता। स्वास्थ्य रक्षा से जुड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना आयुष्मान भारत को पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, केरल जैसे राज्यों द्वारा ना लागू किये जाने की वजह इन राज्यों में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी से इतर पार्टी की सरकारें होना है।

इन दिनों पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो रहे हैं। पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, पुद्दुचेरी और केरल के लोग कुछ ही दिनों में अपने लिए नई सरकारों का चयन करेंगे। इनमें से असम और पुद्दुचेरी में जहां भाजपा की सरकारें हैं, वहीं पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तमिलनाडु में द्रविड़ मुनेत्र कषगम् की सरकारें हैं। ये दोनों ही दल केंद्रीय सत्ताधारी भाजपा के मुखर विरोधी हैं। विरोधी तो वामपंथी पार्टियां भी हैं, जिनके गठबंधन की सरकार केरल में भी है। चूंकि विकसित भारत का संकल्प भाजपा का है, लिहाजा वह चाहती है कि हर राज्य में उसकी या उसके सहयोगी दलों की सरकारें बनें। असम और पुद्दुचेरी में उसकी वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन तमिलनाडु और केरल में उसका मुकाबला कड़ा माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल की सरजमीं पर भगवा ध्वज फहरा पाना आसान नहीं लग रहा है। चूंकि बीजेपी का मकसद अपने शासन की पकड़ को मजबूत बनाए रखना है, इसलिए भी ये विधानसभा चुनाव अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए हैं। ये चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं हैं, बल्कि राष्ट्र के दीर्घकालिक विकास और सुशासन के रोडमैप को तय करने में बड़ी भूमिका निभाने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हो हो गए हैं। विकसति भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए इन विधानसभा चुनावों को विकसित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखा जा रहा है। इन विधानसभा चुनावों के नतीजों पर केंद्र और राज्य के रिश्तों की बुनियाद के साथ ही राजनीतिक स्थिरता और सुधार भी निर्भर करेंगे। शायद ही किसी को एतराज हो कि केंद्र सरकार के 'विकसित भारत' के विजन को लागू करने के लिए राज्यों का सहयोग अनिवार्य है। इन्हीं वजहों से माना जा रहा है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि आने वाले समय में आर्थिक और ढांचागत सुधारों को राज्यों में कितनी गति मिलती है। इन राज्यों में बनने वाली सरकारें यह तय करेंगी कि राष्ट्रीय स्तर की विकास योजनाओं और सुधारों को जमीनी स्तर पर कितनी प्रभावी ढंग से लागू किया जाता है।

प्रधानमंत्री अक्सर विकसित भारत के लिए 'सबका साथ, सबका विकास' और 'सबका प्रयास' पर जोर देते हैं। दक्षिण और पूर्व के इन पांच राज्यों के चुनाव राष्ट्रीय नीतियों और क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच तालमेल का लिटमस टेस्ट होंगे। अगर सहयोगी दलों की सरकारें बनती हैं या बीजेपी इन राज्यों में आगे रहती हो तो प्रधानमंत्री मोदी का सबका साथ, सबका विकास का संकल्प पूरा करना आसान होगा। लेकिन ऐसा नहीं होता तो तय है कि मोदी का यह संकल्प कम से कम गैर भाजपा दलों के कब्जे वाले राज्यों में पूरा होना कठिन होगा। ऐसे में विकसित भारत के लक्ष्य की राह में कम से कम इन राज्यों में बाधा आएगी और वे राज्य मोदी की संकल्पना के लिहाज से पिछड़ सकते हैं।

केंद्र सरकार ने 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की दिशा में भी कदम बढ़ा लिए हैं, इस विचार का उद्देश्य बार-बार होने वाले चुनावों के खर्च और समय को बचाना और उस रकम को विकास कार्यों पर खर्च करना और तंत्र को विकास की गति को तेज करने के लिए सक्रिय बनाए रखना है। वर्तमान विधानसभा चुनाव इस बहस को और अधिक प्रासंगिक बना रहे हैं। पांचों राज्यों में लगभग 17.4 करोड़ मतदाता हैं। असम जैसे राज्यों में बुनियादी ढांचा, मसलन, सड़क, रेलवे, हवाई अड्डे का विस्तार जहां देश की जीडीपी को प्रभावित करेंगे, वहीं, पश्चिम बंगाल या तमिलनाडु जैसे राज्यों में औद्योगिक निवेश और रोजगार सृजन की भूमिका भी सीधे तौर पर भारत की जीडीपी और विकास दर को प्रभावित करती है। विकसित भारत का लक्ष्य गरीबी मुक्त भारत और 100% बुनियादी सुविधाओं, जैसे आवास, बिजली, पानी आदि की पहुंच भी सुनिश्चित करना है। मौजूदा विधानसभा चुनावों के माध्यम से चुनी गई सरकारें इन सामाजिक कल्याणकारी लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उत्तरदायी होंगी। 

विकसित भारत की सफलता का मुख्य आधार युवा पीढ़ी है। इन राज्यों में शिक्षा, कौशल विकास और स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने वाली नीतियां भविष्य के 'नवाचारी भारत' की नींव रखेंगी। केंद्र ने विकसित भारत के साथ ही सतत विकास लक्ष्य भी तय किया है। इसके तहत  लैंगिक समानता, स्वच्छ ऊर्जा और उद्योग जैसे सतत विकास लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित करना भी है। आर्थिक जानकारों के अनुसार, राज्यों का इन मुद्दों पर प्रदर्शन भारत की वैश्विक रैंकिंग को सुधारने में मदद करता है। यह तय है कि अगर बीजेपी की मंशा के मुताबिक ज्यादातर राज्यों में उसकी या उसके सहयोगी दलों की सरकारें बनीं, जनता ने उन्हें इसलिए चुना तो तय है कि विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए कम मेहनत लगेगी, लेकिन अगर ज्यादातर राज्यों में ऐसा नहीं हुआ तो यह लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं होगा। अगर एक बार फिर ममता को बंगाल का ताज मिला, या फिर द्रविड़ मुनेत्र कषगम् को मौका मिला तो तय है कि इन राज्यों की भारत के विकास दर में भूमिका भले बढ़े, विकसित भारत के मानकों में ये राज्य पिछड़ सकते हैं। केंद्र की योजनाओं को लेकर इन राज्यों में असहयोग जारी रह सकता है। केरल में चाहे वाममोर्चा की सरकार आए या कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा की सरकार, मोदी के मानकों के मुताबिक विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने में इस राज्य का असहयोग बरकरार रहेगा। 

 


उमेश चतुर्वेदी

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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