
नीलाभ कृष्ण
भारत आज विश्व का सबसे युवा देश बनने की ओर अग्रसर है। देश की आधे से अधिक आबादी 30 वर्ष से कम आयु की है और हर वर्ष लाखों युवा उच्च शिक्षा पूरी कर रोजगार, उद्यमिता और सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर रहे हैं। यही वह पीढ़ी है जिसे हम जेनरेशन Z के नाम से जानते हैं। यह वह पीढ़ी है जिसने इंटरनेट को आते हुए नहीं देखा, बल्कि इंटरनेट के साथ ही जन्म लिया। इसके लिए स्मार्टफोन कोई तकनीकी उपकरण नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा और वैश्विक संपर्क इसकी रोजमर्रा की दुनिया हैं।
लेकिन यही पीढ़ी भारतीय समाज का सबसे बड़ा विरोधाभास भी प्रस्तुत करती है। जितने अवसर इसके सामने हैं, उतनी ही अनिश्चितताएँ भी हैं। जितनी जानकारी इसके पास है, उतना ही भ्रम भी है। जितनी महत्वाकांक्षा है, उतनी ही मानसिक थकान भी। यही विरोधाभास आज भारत के भविष्य को समझने की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी बन चुका है।
अवसरों का नया भारत
पिछले एक दशक में भारत का डिजिटल परिवर्तन अभूतपूर्व रहा है। सस्ती इंटरनेट सेवाएँ, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, यूपीआई, ऑनलाइन शिक्षा मंच और स्टार्टअप संस्कृति ने छोटे शहरों के युवाओं के लिए भी दुनिया के द्वार खोल दिए हैं। आज पटना, इंदौर, गुवाहाटी या कोटा का छात्र भी उसी ऑनलाइन पाठ्यक्रम से पढ़ सकता है, जिससे न्यूयॉर्क या लंदन का विद्यार्थी पढ़ता है। कोई युवा इंस्टाग्राम के माध्यम से अपना व्यवसाय शुरू कर सकता है, यूट्यूब पर ज्ञान साझा कर सकता है, विदेशों के ग्राहकों के लिए फ्रीलांसिंग कर सकता है और डिजिटल निवेश के माध्यम से अपनी वित्तीय यात्रा भी शुरू कर सकता है।
यह वह भारत है जहाँ भूगोल अब अवसरों की सबसे बड़ी बाधा नहीं रह गया। डिजिटल माध्यमों ने प्रतिभा को राजधानी और महानगरों की सीमाओं से बाहर निकालकर देश के दूर-दराज़ क्षेत्रों तक पहुँचा दिया है।
किन्तु केवल अवसर उपलब्ध हो जाने से सफलता सुनिश्चित नहीं हो जाती। डिजिटल क्रांति ने जहाँ लाखों नए रास्ते खोले हैं, वहीं प्रतिस्पर्धा को भी कई गुना बढ़ा दिया है।
ज्ञान बढ़ा, लेकिन प्रतिस्पर्धा उससे भी अधिक
आज के छात्र के पास जानकारी की कोई कमी नहीं है। एक क्लिक पर हजारों व्याख्यान, ई-पुस्तकें, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित अध्ययन उपकरण और परीक्षा की तैयारी उपलब्ध है। लेकिन विडंबना यह है कि ज्ञान जितना सुलभ हुआ है, उत्कृष्टता की अपेक्षा भी उतनी ही बढ़ गई है।
सिर्फ डिग्री अब रोजगार की गारंटी नहीं रही। कंपनियाँ केवल अंकपत्र नहीं देखतीं; वे समस्या समाधान की क्षमता, संवाद कौशल, तकनीकी दक्षता, टीमवर्क और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति तलाशती हैं। दूसरी ओर, भारत की शिक्षा व्यवस्था अभी भी बड़े पैमाने पर परीक्षा-केंद्रित बनी हुई है, जहाँ स्मरण शक्ति को अक्सर नवाचार से अधिक महत्व मिलता है।
यही कारण है कि एक ओर उद्योगों को योग्य कर्मचारी नहीं मिलते, तो दूसरी ओर लाखों डिग्रीधारी युवा रोजगार की तलाश में भटकते दिखाई देते हैं। यह केवल बेरोजगारी का संकट नहीं, बल्कि कौशल और अवसरों के बीच बढ़ती खाई का संकेत है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता: खतरा भी, संभावना भी
जेनरेशन Z का सबसे बड़ा साथी और सबसे बड़ा भय—दोनों कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) है।
कुछ वर्ष पहले तक मशीनें मुख्यतः शारीरिक श्रम का स्थान ले रही थीं। आज AI लेखन, प्रोग्रामिंग, डिज़ाइन, वित्तीय विश्लेषण, ग्राहक सेवा और शोध जैसे बौद्धिक कार्यों को भी प्रभावित कर रही है। स्वाभाविक है कि नए स्नातकों के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि मशीनें ही अधिकांश कार्य कर लेंगी तो उनके लिए अवसर कहाँ बचेंगे?
लेकिन इतिहास हमें बताता है कि हर तकनीकी क्रांति ने कुछ रोजगार समाप्त किए हैं तो उससे कहीं अधिक नए अवसर भी पैदा किए हैं। कंप्यूटर आने पर लेखाकार समाप्त नहीं हुए; उनका कार्य करने का तरीका बदल गया। इंटरनेट आने पर पत्रकारिता समाप्त नहीं हुई; उसका स्वरूप बदल गया। उसी प्रकार AI भी मानव की भूमिका को समाप्त नहीं करेगा, बल्कि उसे नए कौशल अपनाने के लिए प्रेरित करेगा।
भविष्य उन युवाओं का होगा जो AI से प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि उसके साथ सहयोग करना सीखेंगे। विश्लेषणात्मक सोच, रचनात्मकता, नेतृत्व, नैतिक निर्णय क्षमता और मानवीय संवेदनाएँ ऐसी शक्तियाँ हैं जिन्हें मशीनें पूरी तरह प्रतिस्थापित नहीं कर सकतीं।
इसलिए जेनरेशन Z के लिए सबसे महत्वपूर्ण योग्यता केवल कोई एक डिग्री नहीं, बल्कि जीवनभर सीखते रहने की क्षमता होगी।
उद्यमिता का बदलता सपना
एक समय था जब सरकारी नौकरी को जीवन की अंतिम उपलब्धि माना जाता था। आज बड़ी संख्या में युवा अपना स्टार्टअप शुरू करना चाहते हैं, कंटेंट क्रिएटर बनना चाहते हैं या स्वतंत्र पेशेवर के रूप में काम करना चाहते हैं।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने उद्यमिता की लागत कम कर दी है। एक छोटा व्यवसाय अब बिना बड़े निवेश के भी राष्ट्रीय या वैश्विक बाजार तक पहुँच सकता है। सरकार की विभिन्न योजनाओं और भारत में विकसित हो रहे स्टार्टअप इकोसिस्टम ने भी इस सोच को बल दिया है।
लेकिन इसके साथ एक नया भ्रम भी पैदा हुआ है। सोशल मीडिया अक्सर केवल सफलता की कहानियाँ दिखाता है। करोड़ों रुपये जुटाने वाले स्टार्टअप, रातोंरात प्रसिद्ध हुए इन्फ्लुएंसर और तेजी से अमीर बनने के उदाहरण युवाओं के सामने प्रस्तुत किए जाते हैं, जबकि असफल प्रयासों की चर्चा शायद ही कभी होती है।
यही कारण है कि उद्यमिता का आकर्षण जितना बढ़ा है, उतना ही आवश्यक हो गया है कि युवा धैर्य, अनुशासन और दीर्घकालिक दृष्टि को भी समझें। स्थायी सफलता केवल वायरल होने से नहीं, बल्कि निरंतर गुणवत्ता, नवाचार और विश्वास अर्जित करने से मिलती है।
यदि आज के भारत में जेनरेशन Z के जीवन को समझना हो, तो उसके सबसे बड़े मंच—सोशल मीडिया—को समझना होगा। इस पीढ़ी के लिए सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है; यह उसकी पहचान, शिक्षा, व्यवसाय, राजनीति और सामाजिक संबंधों का विस्तार बन चुका है। इंस्टाग्राम उसकी रचनात्मकता का मंच है, यूट्यूब उसका विश्वविद्यालय है, लिंक्डइन उसका रोजगार बाजार है और एक्स (पूर्व में ट्विटर) उसकी राजनीतिक बहसों का सार्वजनिक चौक।
डिजिटल प्लेटफॉर्म ने अभिव्यक्ति को लोकतांत्रिक बनाया है। आज किसी छोटे शहर का युवा भी अपने विचार, कला, संगीत, व्यवसाय या सामाजिक पहल को लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। भारतीय भाषाओं में कंटेंट बनाने वाले हजारों युवा यह साबित कर चुके हैं कि डिजिटल सफलता के लिए महानगरों में रहना अब अनिवार्य नहीं है। यह परिवर्तन भारत की सांस्कृतिक विविधता के लिए भी शुभ संकेत है, क्योंकि इंटरनेट ने केवल अंग्रेज़ी भाषी भारत को नहीं, बल्कि हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं को भी नई ऊर्जा दी है।
किन्तु हर क्रांति अपने साथ एक नई चुनौती भी लेकर आती है।

तुलना का अनंत जाल
डिजिटल दुनिया ने हर व्यक्ति को मंच तो दिया है, लेकिन उसी के साथ तुलना की ऐसी संस्कृति भी पैदा कर दी है, जिसका प्रभाव पहले कभी नहीं देखा गया।
आज सफलता को अक्सर लाइक्स, फॉलोअर्स, व्यूज़ और वायरल होने से मापा जाने लगा है। किसी की विदेश यात्रा, किसी की नई कार, किसी की करोड़ों की फंडिंग और किसी की आलीशान जीवनशैली हर दिन लाखों युवाओं की स्क्रीन पर दिखाई देती है। लेकिन इन तस्वीरों के पीछे वर्षों का संघर्ष, असफलताएँ और आर्थिक जोखिम शायद ही कभी दिखाई देते हैं।
फलस्वरूप, अनेक युवा अपने वास्तविक जीवन की तुलना दूसरों के संपादित और सजे हुए डिजिटल जीवन से करने लगते हैं। यह तुलना धीरे-धीरे आत्मविश्वास को कम करती है और यह भावना पैदा करती है कि शायद वे अपने साथियों से पीछे रह गए हैं।
यही कारण है कि सूचना के इस युग में भी अकेलापन बढ़ रहा है। मित्रों की सूची लंबी होती जा रही है, लेकिन गहरे संबंध कम होते जा रहे हैं। संवाद बढ़ा है, पर आत्मीयता घटती दिखाई देती है। यह जेनरेशन Z का सबसे गहरा सामाजिक विरोधाभास है—सबसे अधिक जुड़ी हुई पीढ़ी, लेकिन कई बार सबसे अधिक अकेली भी।
मानसिक स्वास्थ्य: कमजोरी नहीं, नई वास्तविकता
पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य पर चर्चा भारतीय समाज में पहले की तुलना में कहीं अधिक खुलकर होने लगी है। यह परिवर्तन सकारात्मक है। पहले जिन समस्याओं को व्यक्तिगत कमजोरी मान लिया जाता था, आज उन्हें सामाजिक और मनोवैज्ञानिक चुनौती के रूप में समझा जाने लगा है।
जेनरेशन Z पर कई प्रकार के दबाव एक साथ काम करते हैं—प्रतिस्पर्धी परीक्षाएँ, रोजगार की अनिश्चितता, परिवार की अपेक्षाएँ, आर्थिक दबाव, डिजिटल तुलना और भविष्य की चिंता। ऐसे में तनाव, चिंता और मानसिक थकान केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक चुनौती बन चुकी है।
सौभाग्य से विश्वविद्यालयों, निजी संस्थानों और अनेक कॉरपोरेट संगठनों ने काउंसलिंग और मानसिक स्वास्थ्य सहायता पर ध्यान देना शुरू किया है। फिर भी भारत में प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता अभी भी सीमित है, विशेषकर छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में।
केवल जागरूकता पर्याप्त नहीं होगी। यदि भारत अपनी युवा आबादी को अपनी सबसे बड़ी शक्ति बनाना चाहता है, तो मानसिक स्वास्थ्य को भी सार्वजनिक नीति का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा जितना शिक्षा और रोजगार को माना जाता है।
गिग इकोनॉमी: स्वतंत्रता की नई कीमत
डिजिटल अर्थव्यवस्था ने रोजगार की पारंपरिक परिभाषा भी बदल दी है। आज लाखों युवा किसी एक कंपनी में जीवनभर नौकरी करने की बजाय स्वतंत्र पेशेवर के रूप में काम कर रहे हैं। कोई ग्राफिक डिज़ाइनर है, कोई वीडियो एडिटर, कोई डिजिटल मार्केटर, कोई कंटेंट राइटर या ऑनलाइन शिक्षक। भारत का युवा अब केवल भारतीय कंपनियों के लिए ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के ग्राहकों के लिए काम कर सकता है।
यह परिवर्तन अभूतपूर्व है। इससे आय के नए स्रोत खुले हैं और प्रतिभा को वैश्विक बाज़ार मिला है। लेकिन इसके साथ एक असुरक्षा भी जुड़ी है।
गिग वर्कर के पास प्रायः स्थायी वेतन, पेंशन, स्वास्थ्य बीमा या दीर्घकालिक रोजगार सुरक्षा नहीं होती। काम है तो आय है, नहीं है तो अनिश्चितता। स्वतंत्रता का यह नया मॉडल आकर्षक अवश्य है, लेकिन आर्थिक स्थिरता की दृष्टि से कई प्रश्न भी खड़े करता है।
इसलिए आने वाले वर्षों में भारत के नीति-निर्माताओं के सामने यह चुनौती होगी कि डिजिटल अर्थव्यवस्था की लचीली कार्यशैली को बनाए रखते हुए श्रमिक सुरक्षा के नए मॉडल विकसित किए जाएँ।
राजनीति का बदलता चेहरा
जेनरेशन Z केवल अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र को भी बदल रही है। करोड़ों प्रथम मतदाता अब समाचार पत्रों या टेलीविजन के बजाय मोबाइल स्क्रीन से राजनीति को समझते हैं। वे भाषणों के लंबे प्रसारण की बजाय छोटे वीडियो, पॉwडकास्ट और डिजिटल चर्चाओं से अपनी राय बनाते हैं।
इस परिवर्तन ने लोकतंत्र को अधिक सहभागी बनाया है। नागरिक अब सीधे जनप्रतिनिधियों से संवाद कर सकते हैं, नीतियों पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं और सार्वजनिक विमर्श में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।
लेकिन इसी डिजिटल लोकतंत्र के साथ एक नया खतरा भी उभरा है—भ्रामक सूचना का।
डीपफेक वीडियो, आधे-अधूरे तथ्य, संपादित क्लिप और भावनात्मक प्रचार पहले से कहीं अधिक तेजी से फैलते हैं। ऐसे में डिजिटल साक्षरता केवल तकनीकी कौशल नहीं रह गई; यह लोकतांत्रिक जिम्मेदारी भी बन चुकी है। आने वाले समय में यह उतना ही आवश्यक होगा कि युवा सूचना का उपभोग करना ही नहीं, बल्कि उसकी सत्यता की जांच करना भी सीखें।
दिलचस्प बात यह है कि जेनरेशन Z विचारधाराओं की कठोर सीमाओं में बंधी हुई पीढ़ी नहीं है। वह व्यक्तियों की बजाय प्रदर्शन को महत्व देती है। वह नीतियों का मूल्यांकन परिणामों के आधार पर करना चाहती है। यही कारण है कि यह पीढ़ी किसी भी राजनीतिक दल के लिए सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी।
जलवायु परिवर्तन और भविष्य की चिंता
यदि पिछली पीढ़ियाँ पर्यावरण को भविष्य की समस्या मानती थीं, तो जेनरेशन Z उसे वर्तमान की वास्तविकता के रूप में जी रही है। बढ़ती गर्मी, अनियमित मानसून, जल संकट, वायु प्रदूषण और प्राकृतिक आपदाएँ अब केवल समाचार नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी हैं।
युवा पर्यावरण संरक्षण का समर्थन तो करते हैं, लेकिन उनके सामने एक व्यावहारिक कठिनाई भी है। टिकाऊ उत्पाद अक्सर महंगे होते हैं। इलेक्ट्रिक वाहन, हरित ऊर्जा और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली हर किसी की आर्थिक क्षमता में नहीं आती। ऐसे में पर्यावरणीय जिम्मेदारी केवल व्यक्तिगत विकल्प का विषय नहीं रह जाती; इसके लिए सरकार, उद्योग और समाज—तीनों को मिलकर समाधान विकसित करने होंगे।
इन सबके बीच एक बात स्पष्ट है—जेनरेशन Z चुनौतियों से भागने वाली पीढ़ी नहीं है। उसने महामारी, तकनीकी बदलाव, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता और तेजी से बदलती दुनिया के बीच अपनी पहचान बनाई है। शायद इसी कारण परिवर्तन अब उसके लिए अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य जीवन का हिस्सा बन चुका है।
आज की जेनरेशन Z को लेकर सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि वह अपनी संस्कृति और परंपराओं से दूर होती जा रही है। लेकिन यदि भारतीय समाज को निकट से देखा जाए तो वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल और रोचक है। यह पीढ़ी वैश्विक भी है और स्थानीय भी। वह कोरियाई संगीत सुनती है, अमेरिकी पॉडकास्ट देखती है, यूरोपीय फुटबॉल का अनुसरण करती है, लेकिन दीपावली, छठ, पोंगल, ओणम, दुर्गापूजा और गणेशोत्सव भी उसी उत्साह से मनाती है। वह अंग्रेज़ी में पेशेवर संवाद कर सकती है, लेकिन सोशल मीडिया पर अपनी मातृभाषा में अभिव्यक्ति देने में भी संकोच नहीं करती।
दरअसल, वैश्वीकरण ने भारतीय युवाओं की पहचान को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उसे बहुआयामी बना दिया है। आज हजारों कंटेंट क्रिएटर हिंदी, तमिल, बंगाली, मराठी, भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं में लाखों लोगों तक पहुँच रहे हैं। छोटे शहरों और कस्बों से निकलने वाले युवा डिजिटल दुनिया में अपनी भाषा और संस्कृति के साथ सफल हो रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत का डिजिटल भविष्य किसी एकरूप वैश्विक संस्कृति का नहीं, बल्कि तकनीक और भारतीय सांस्कृतिक विविधता के सह-अस्तित्व का भविष्य है।
बदलते परिवार और नई सोच
जेनरेशन Z को अक्सर परंपराओं के विरुद्ध खड़ा कर दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे भिन्न है। भारतीय परिवार आज भी अधिकांश युवाओं के जीवन का सबसे बड़ा भावनात्मक आधार हैं। परिवर्तन केवल इतना आया है कि अब निर्णय एकतरफा नहीं होते। करियर, उच्च शिक्षा, विवाह या जीवनशैली जैसे विषयों पर संवाद पहले की तुलना में अधिक खुला हुआ है।
आज का युवा इंजीनियरिंग और चिकित्सा के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, एनीमेशन, गेम डेवलपमेंट, स्पोर्ट्स मैनेजमेंट, डेटा साइंस, कंटेंट क्रिएशन, डिज़ाइन और उद्यमिता जैसे क्षेत्रों में भी अपना भविष्य देखता है। परिवार भी धीरे-धीरे इस बदलाव को स्वीकार कर रहे हैं। सफलता की परिभाषा अब केवल सरकारी नौकरी या पारंपरिक पेशों तक सीमित नहीं रही।
यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक भी है। यह उस भारत का संकेत है जहाँ युवा अपनी रुचि के अनुरूप जीवन चुनना चाहते हैं और परिवार भी उनके साथ चलना सीख रहे हैं।
यदि जेनरेशन Z की सबसे बड़ी उपलब्धियों में किसी एक परिवर्तन को रेखांकित करना हो, तो वह युवा महिलाओं की बढ़ती भागीदारी होगी। शिक्षा, डिजिटल तकनीक, ऑनलाइन उद्यमिता और वित्तीय जागरूकता ने लाखों युवतियों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं।
आज वे केवल नौकरी करने वाली कर्मचारी नहीं हैं; वे स्टार्टअप स्थापित कर रही हैं, वैज्ञानिक अनुसंधान का नेतृत्व कर रही हैं, प्रशासनिक सेवाओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर रही हैं, खेल, मीडिया, कला और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। कार्यस्थल पर समान अवसर, सुरक्षा और वेतन जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं, लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि उनकी आकांक्षाएँ अब अपरिवर्तनीय रूप से बदल चुकी हैं।
भारत की आर्थिक प्रगति का अगला अध्याय महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बिना लिखा ही नहीं जा सकता।
उपभोग नहीं, वित्तीय समझ भी जरूरी
डिजिटल युग ने युवाओं को कमाने के साथ-साथ निवेश करने के अवसर भी दिए हैं। म्यूचुअल फंड, एसआईपी, डिजिटल निवेश मंच और वित्तीय शिक्षा अब पहले की तुलना में अधिक सुलभ हैं। अनेक युवा कम उम्र में ही निवेश की शुरुआत कर रहे हैं और वित्तीय स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बना रहे हैं।
लेकिन यही डिजिटल दुनिया जोखिम भी लेकर आई है। सोशल मीडिया पर त्वरित अमीरी के दावे, क्रिप्टोकरेंसी के अवास्तविक सपने, अत्यधिक जोखिम वाले निवेश और तथाकथित 'फाइनेंस इन्फ्लुएंसर्स' ने अनेक युवाओं को भ्रमित भी किया है।जेनरेशन Z की कहानी इसलिए केवल एक पीढ़ी की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जो डिजिटल क्रांति, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के बीच अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। विरोधाभासों से भरे इस दौर में सबसे बड़ी आवश्यकता निराशा की नहीं, बल्कि दूरदर्शी नीतियों, सक्षम संस्थाओं और ऐसे सामाजिक वातावरण की है जो युवाओं के सपनों को केवल प्रेरित ही न करे, बल्कि उन्हें साकार करने का अवसर भी प्रदान करे। यही अवसर भारत की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पूँजी है, और यही उसके विकसित भविष्य की सबसे मजबूत नींव भी बनेगा।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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