हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पंजाब में कृषि की हालत पर अपनी आशंका व्यक्त की। उन्होंने हाल ही में किसानों से कृषि में विविधता लाने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि हमारे नेता भी इस मुश्किल की घड़ी का सामना कर रहे हैं। हम जैव डीजल के निर्माण के लिए कुछ खास तरह के पौधों की कृषि का अध्ययन कर रहे हैं, जिससे सस्ती और अक्षय ईंधन का निर्माण संभव हो सकेगा। ईधन क्या है? ये कैसे हमारे जीवन में आया? अगर पेट्रोलियम महंगी और हानिकारक है तो इसका समाधान क्या है? तेल की वर्तमान स्थिति को देखते हुए हमें इस बता को समझना होगा कि कैसे हमारे किसान सस्ते और अक्षय ईंधन का उत्पादन कर सकते हैं, जो पर्यावरण के लिए सुरक्षित हो, अर्थिक रूप से उत्पादन में आसान और खरीदने में किफायती हो। हां ये संभव है कृषि में परिवर्तन लाकर।
4,000 साल पहले डामर का इस्तेमाल बेबीलोन मे दीवारों के निर्माण के लिए किया गया था, जो कि पेट्रोलियम के अवशेषों से बनाया गया था। बेबीलोन शब्द की उत्पत्ति बाइबल से हुई है। बेबल के टॉवर की ईंटों को मजबूती से जोडऩे के लिए इसी पदार्थ का इस्तेमाल किया गया था। सिंधु घाटी सभ्यता में इसका इस्तेमाल बास्केट्स लाईन का निर्माण करने के लिए किया गया था। 1859 में पहली बार जब तेल ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया गया, उसके लंबे अरसे के बाद इसका नियमित प्रयोग शुरू किया गया। शुरूआत में कृत्रिम प्रकाश प्रदान करने के लिए मिट्टी का तेल बनाने के लिए इसका प्रयोग किया गया था। अगर हम तेल की मांग को स्थिर रखें तो महत्वपूर्ण परिणाम सामने आएंगे, जो अर्थिक रूप से और पर्यावरण की दृष्टि से लाभदायक सिद्ध होंगे। लेकिन अगर मानव जाति अपनी विचार-शक्ति का सही तरह से इस्तेमाल करे तो तेल का कोई दूसरा विकल्प ढूंढा जा सकता है, जो शायद पर्यावरण के लिए काफी अच्छा सिद्ध हो और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने में सहायक हो? हमें अर्जेंटीना पर अपना बहुरूपदर्शक ध्यान केन्द्रित करने की जरूरत है।
अर्जेंटीना एक ऐसा देश है जो प्रकृतिक संसाधनों से संपन्न है। अर्जेंटीना सोयाबीन तेल और सोयाबीन का दुनिया में शीर्ष निर्यातक है। इसके अलावा अर्जेंटीना दुनिया में सूरजमुखी तेल का 13.9 प्रतिशत उत्पादन करता है। इसके साथ ही वह दुनिया में सूरजमुखी तेल का उत्पादन करने के मामले में तीसरे पायदान पर आता है। सोयाबीन और सूरजमुखी से जैव-डीजल के रूप में ईंधन का उत्पादन पर्यावरण के अनुकूल है और इससे प्रदूषण भी कम होता है। भविष्य में ये पेट्रोलियम ईंधन के स्थान पर लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है।
अर्जेंटीना को जैव-डीजल ईंधन बनाने और बेचने के लिए दुनिया के मुख्य बाजार के रूप में जाना जाता है। बायो-डीजल नवीनीकरण योग्य है, क्योंकि इसके तेल शोधन की प्रक्रिया पौधे से प्राप्त होती है। ये ईंधन बिना किसी रूपांतारण के डीजल इंजन को शक्ति प्रदान कर सकता है। बायो-डीजल ईथेनॉल के साथ एक अद्भुत लाभ देता है। इसे पेट्रोलियम के साथ मिश्रित करके, इसका इस्तेमाल सामान्य तौर पर गैसोलीन इंजन में किया जा सकता है। 1890 के दशक में जब रूडोल्फ डीजल ने बायो डीजल का आविष्कार किया, उस वक्त उन्होंने एक ऐसा ईंजन भी इजाद किया जो मूंगफली के तेल से दौड़ सकता था।
सीएटल में साम्राज्य के नवीनीकरण के लिए अर्जेंटीना में बायो डीजल रिफाइनरी की स्थापनी की गई। सीईओ मार्टिन टोबियास कहते हैं कि प्रति वर्ष र्इंधन के 100 मिलियन गैलन का उत्पादन होगा। उन्हें उम्मीद है कि नई प्रोद्यौगिकी की मदद से संयंत्र के निर्माण की लागत में कमी की जा सकेगी। कंपनी की ग्रामीण क्षेत्रों में सूक्ष्म रिफाइनरियां बनाने की योजना है, ताकि अलग-थलग पड़े किसानों की पहुंच बाहर तक बन सके। इस योजना को सेल लोकल स्कीम करार दिया गया।
एडमुंडो देफ्राई नाम के एक औद्योगिक इंजीनियर ने राजधानी से 145 मील की दूरी पर एक माइक्रो रिफाइनरी का प्रारूप तैयार किया है, जिसे तैयार करने में 1,50,000 डॉलर की लागत आई। रिफाइनरी में एक वर्ष की अवधि के दौरान 1,30,000 गैलन जैव डीजल का निर्माण किया गया। उन्होंने कहा कि इस काम के लिए श्रमिकों की अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। सोयाबीन के पौधों को लोड करने और मशीन को चालू रखने के लिए ही सिर्फ श्रमिकों की जरूरत पड़ती है। उन्होंने बताया कि वह स्थानीय किसानों को प्रति गैलन ईंधन 95 सेंट में बेच देते हैं। उनके ग्राहक सोयाबीन की पैदावार करके सुरक्षित रख लेते हैं, जिसे वो बाद में मशीनरी चलाने के लिए प्रयोग करते हैं। भविष्य में अर्जेंटीना में डीजल ईंधन में बायो-डीजल का 10 प्रतिशत सम्मलित होगा। इसके लिए एक उपयुक्त कानून को मंजूरी भी दे दी गई है। अर्जेंटीना की सरकार ने घोषित किया है कि नवीनीकरण ईंधन युग में कदम रखने का ये अर्जेंटीना का पहला कदम है।
भारत में जट्रोफा कर्कस की खेती की जाती है। इसमें तेल की काफी मात्रा पाई जाती है। ये पौधा भारतीय पौधों की प्रजाति का ही हिस्सा है, जो कि लंबे समय तक चलने वाली ऊर्जा को प्रदान कर सकता है। इसके इसी गुण की वजह से यह सोयाबीन और सूरजमुखी के विकल्प के तौर पर प्रयोग किया जा सकता है। डॉ. अब्दुल कलाम ने कहा था, जट्रोफा सूखी और बंजर भूमि पर आसानी से उगाया जा सकता है। इसकी खेती के मिशन की शुरूआत करके इसके जरिए बायो-डीजल का निर्माण शुरू किया जा सकता है, जिसके माध्यम से भारत में काफी रोजगार उत्पन्न हो सकेगा।
एक प्राचीन चीनी कहावत के मुताबिक, हजारों मील की दूरी तय करने की शुरूआत, पहला कदम उठाने से ही होती है। इस प्रयास में हमारा पहला कदम सोयाबीन, सूरजमुखी और जट्रोफा की कृषि करने से किया जाएगा, ताकि इनसे तेल निकाल कर बायो-डीजल तैयार करने के लिए छोटे रिफाइनरी की स्थापना की जा सके और इस काम के लिए हमारा वक्त शुरू होता है..... अब।
दीपक रिखये
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