लेखक- डॉ. हरिकृष्ण बड़ोदिया
नए दिल्ली: अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चला है कि स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती न केवल अहम की लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि विपक्ष की राजनीति के मोहरे बन चुके हैं। वे स्वरूपानंद जी सरस्वती के उत्तराधिकारी हैं और यह एक स्थापित तथ्य है कि स्वरूपानंद सरस्वती जी सनातनी रीति रिवाज और परंपराओं या शास्त्रोक्त ज्ञान के प्रसार से ज्यादा कांग्रेस की विचारधारा के पैरोकार थे। उनके सामने जब कोई भाजपा की तारीफ करता तो वे उखड़ जाते थे। वस्तुतः वे कांग्रेस के इतने बड़े समर्थक थे कि उनके निधन पर कहा गया था कि द्वारिका पीठ शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन से कांग्रेस ने एक मित्र और एक प्रमुख हिंदू संत को खो दिया है जो विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के धुर विरोधी थे। भाजपा और हिंदूवादी संगठनों के नाम पर तो वे बुरी तरह भड़क जाया करते थे। उनके उत्तराधिकारी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती भी उसी विचारधारा अर्थात भाजपा, योगी और मोदी के घोर विरोधी हैं जो समय-समय पर उनके व्यवहार और विचारों से स्पष्ट होता रहता है।
प्रयागराज माघ मेले में मौनी अमावस्या पर स्नान हेतु गए स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद मनोनुकूल वीआईपी ट्रीटमेंट न मिलने और पुलिस प्रशासन के व्यवहार से इसलिए नाराज हुए कि उन्हें अपनी पालकी और लाव लश्कर तथा अनुयायियों के साथ गंगा तट पर स्नान के लिए जाने से विनम्रता पूर्वक पुलिस प्रशासन द्वारा रोका गया। पुलिस प्रशासन ने उनसे पैदल चल कर तट पर स्नान करने का निवेदन किया था लेकिन स्वामी जी इसे अपना अपमान मान बैठे। पुलिस प्रशासन का यह कहना उचित लगता है कि स्वामी जी यदि सारे लाव लश्कर के साथ तट पर जाते तो भीड़ के अनियंत्रित होने की आशंका थी जिससे भगदड़ मच सकती थी और उससे जन हानि होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था। वस्तुतः एक सच्चा संत लोक कल्याण और धर्म के लिए अपना जीवन न्योछावर करता है। एक सच्चे संत से अपेक्षा होती है कि वह परिस्थितियों की गंभीरता को समझ कर तात्कालिक निर्णय ले लेकिन स्वामी जी ने पुलिस के रोकने को अहम ( ईगो )का मुद्दा बना लिया। अगर वे पुलिस प्रशासन का सहयोग कर अपनी पालकी से उतरकर 50 मीटर दूर गंगा तट पर स्नान करते तो उनकी उदारता और सहिष्णुता का जनता के बीच सकारात्मक संदेश जाता किंतु इसके विपरीत न केवल उनके अनुयायियों ने पुलिस प्रशासन के साथ हाथापाई की बल्कि स्वामी जी खुद इस बात के लिए अड़ गए कि वह अपनी पालकी और अनुयायियों के साथ ही तट पर जाएंगे। एक तरफ सुव्यवस्था बनाए रखना पुलिस प्रशासन की जिम्मेदारी थी तो दूसरी तरफ स्वामी जी का अहंकार था जिसे वह आत्मसम्मान बता रहे थे। इस घटना से नाराज होकर वे पिछले 10 दिनों से धरना दिए बैठे हैं और उनकी मांग है कि पुलिस अधिकारी ही नहीं बल्कि मुख्यमंत्री योगी जी उनसे माफी मांगे।
स्वामी जी वर्तमान सत्ता के घोर विरोध में बयानों के लिए जाने जाते हैं। कुछ समय पहले उन्होंने केदारनाथ मंदिर से सोना गायब होने का शगूफा छोड़ दिया था। जैसे-जैसे स्वामी जी हठी होते जा रहे हैं वैसे-वैसे उन पर लगे आरोपों की परतें खुलती जा रही हैं। सबसे पहला आरोप तो यही है कि वे शंकराचार्य पद पर वैध रूप से आसीन नहीं हैं। उन्हें उनके विरोधी नकली या विवादास्पद शंकराचार्य कहते देखे जाते हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद और कई संतों ने उनके शंकराचार्य होने पर दावा किया किया था कि उनकी नियुक्ति नियमानुसार नहीं है। यही नहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी उनकी पदवी पर रोक लगाई थी। जब से स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद धरने पर बैठे हैं तब से विवादों की एक लंबी श्रृंखला चल रही है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विरोध में स्वामी जी बहुत कुछ बोल चुके हैं। उनके वक्तव्य स्पष्ट करते हैं कि वे ईर्ष्या की हद तक योगी आदित्यनाथ के विरोधी हैं। योगी आदित्यनाथ के शासन की तुलना वे मुगलों के दमनकारी शासन से करते हैं। वे मुख्यमंत्री योगी को गुस्सैल निरंकुश आक्रामक और बुलडोजर राजनीति करने वाला बताते हुए आलोचना करते हैं। वे चिढ़ते हुए यह भी कहते हैं कि राज्य में गौ हत्या हो रही है इस पर रोक नहीं लगाना मुख्यमंत्री योगी का दोहरा रवैया है।स्वामी जी हिंदुओं को कायर बताते हुए मुसलमानों की प्रशंसा यह कहते हुए करते हैं कि ज्ञानवापी की तीन ईंटें नीचे गिर गई तो 10 हजार मुसलमान इकट्ठे हो गए। धन्य हैं मुसलमान जो अपने धर्म की रक्षा के लिए निकलते हैं। हिंदू तो कायर हैं जो गौ माता की हत्या पर नहीं निकलते। ऐसा लगता है कि वे चाहते हैं कि हजारों की संख्या में हिंदू उनके समर्थन में आकर खड़े हों तो ही हिंदू बहादुर माना जाएगा। उनसे जब पूछा गया कि आपके मत में राज्य का सीएम कैसा होना चाहिए तो उन्होंने कहा कैसा भी हो लेकिन इन (योगी) जैसा नहीं होना चाहिए। यह सीएम गुस्सैल और खुन्नस में रहता है। बुलडोजर की राजनीति करता है। भाजपा ने ऐसा सीएम बनाकर अपनी लुटिया डुबो ली है। स्वामी जी के बयान से स्पष्ट होता है कि वह इस बात से ज्यादा परेशान हैं कि योगी जो एक संत भी हैं एक ऐसे राजनेता बन गए हैं जिनका यश न केवल उत्तर प्रदेश बल्कि पूरे देश में फैल चुका है। वह कहते हैं कि योगी जिसे लोग साधु संत कहते हैं वह हिंदू कहने के लायक नहीं है। हम उसे हुमायूं का बेटा अकबर कहते हैं, औरंगजेब कहते हैं। तो लगता है कि वे योगी से हद दर्जे तक नफरत करते हैं। वह आगे कहते हैं यह मंदिर तोड़ने का समर्थन करने वाला आदमी है। 150 से ज्यादा मंदिर तोड़ दिए गए। एक शब्द नहीं निकला उनके मुंह से। इसलिए कि उनकी गद्दी ना चली जाए।
स्वामी जी का यह बयान और अखिलेश यादव के बयान एक जैसे हैं जिससे लगता है कि ये विपक्ष के हाथों के मोहरे बन गए हैं। स्वामी जी का धरना 10 दिनों से जारी है बताया जाता है कि उन्होंने इन 10 दिनों में स्नान ही नहीं किया। एक संत कैसे बिना स्नान के रह सकता है आश्चर्य होता है। जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव पास आ रहे हैं वैसे-वैसे बयानों की बाढ़ आती जा रही है। अखिलेश यादव इन दिनों हिंदुओं और सनातन की चिंता करते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब से असदुद्दीन ओवैसी मुसलमानों के सर्वमान्य नेता बनने में अग्रणी दिखाई दे रहे हैं तब से अखिलेश ने अपनी घड़ी का कांटा हिंदू और सनातन की ओर मोड़ लिया है। वे समझ रहे हैं कि पहले बिहार और अभी महाराष्ट्र के स्थानीय शासन के चुनाव में जिस तरह ओवैसी की मुसलमानों में स्वीकार्यता बढ़ रही है उत्तर प्रदेश में भी मुसलमान सपा से किनारा कर सकते हैं यही कारण है कि अखिलेश स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में खुलकर आ गए हैं। इससे उन्हें कितना लाभ या हानि होगी यह तो वक्त बताएगा लेकिन यह तो स्पष्ट है कि स्वामी जी आज एक अति विवादास्पद व्यक्तित्व बन गए हैं। वे संतों की आलोचना करने के साथ ही केंद्र शासन के उन निर्णय पर भी उंगली उठाते हैं जिन्हें देश का एक बड़ा वर्ग पसंद करता है। वह जगतगुरु स्वामी रामभद्राचार्य के बारे में कहते हैं कि धर्म शास्त्रों के अनुसार वे संत हो ही नहीं सकते क्योंकि वे आंखों से देख नहीं सकते। वह कहते हैं धारा 370 को बहाल कर देना चाहिए। वह कहते हैं उद्धव ठाकरे को सीएम बनना चाहिए। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद से व्यक्तिगत तौर पर माफी मांगते हुए उनसे धरना खत्म करने की विनती की तो स्वामी जी ने कहा योगी जी की जगह केशव प्रसाद मौर्य को मुख्यमंत्री होना चाहिए। लगता तो यह है कि स्वामी जी योगी जी जितने यश की आकांक्षा पाल बैठे हैं। कालांतर में वे किसी राजनीतिक दल से चुनाव लड़ने को तैयार हो जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
Leave Your Comment