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रक्षामंत्री राजनाथ सिंह द्वारा पंडित नेहरू एवं बाबरी मस्जिद के बयान से जुड़े सवालों पर सुधांशु त्रिवेदी का विपक्ष पर करारा हमला, जानिये क्या कहा

Sudhanshu Trivedi launches a scathing attack on the opposition over Defence Minister Rajnath Singh's statement on Pandit Nehru and the Babri Masjid. Find out what he said

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राज्य सभा सांसद डॉ सुधांशु त्रिवेदी ने बुधवार, 3 दिसंबर को केंद्रीय रक्षा मंत्री एवं भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता श्री राजनाथ सिंह द्वरा पंडित नेहरू एवं बाबरी मस्जिद के संदर्भ में दिए गए बयान को  लेकर विपक्ष के सवाल पर करारा हमला बोला और कहा कि - लगता है, कांग्रेस के नेता अपने ही नेताओं के बारे में जानकारी रखने की आदत छोड़ चुके हैं, पढ़ना लिखना भी छोड़ दिया है और नेहरू गांधी के बारे में भी उन्हें सही जानकारी नहीं होती। माननीय श्री राजनाथ सिंह जी द्वारा कही गई बात का स्रोत The Inside Story of Sardar Patel - Diary of Maniben Patel है, जिसका पेज नंबर 24 इस बात की पुष्टि करता है। इसमें पंडित नेहरू और सरदार पटेल के भीच 1936 से 1950 तक के सभी पत्राचार का विवरण दर्ज है। पेज नंबर 24 पर यह लिखा हुआ है कि “Nehru also raised the question of Babri Masjid, but Sardar made it clear that the government could not spend any money for building a mosque. He told Nehru that the question of reconstruction of Somnath temple was a quite different issue, as a trust had been created for the purpose and about 30 lakh rupees had been collected. Patel told Nehru that it was a trust of which Jam Saheb was the chairman and Munshi was just a member and no government money was going to be used for the purpose. This silenced Nehru. 20th September 1950.”

राज्यसभा सांसद ने कहा कि वह इसका सार हिंदी में रख रहे हैं कि नेहरू ने बाबरी मस्जिद का विषय उठाया था, सरदार पटेल ने इसका विरोध किया था और साफ कहा था कि सोमनाथ के पुनर्निर्माण का मामला इससे पूरी तरह अलग है। वह एक प्राइवेट ट्रस्ट है जिसकी अध्यक्षता जाम साहब, जो उस समय जूनागढ़ के राजप्रमुख थे, कर रहे थे और मुंशी जी उसके सदस्य थे। इसमें सरकारी धन का कोई उपयोग नहीं हुआ, 30 लाख रुपये प्राइवेट ट्रस्ट ने दिए थे, और 20 सितंबर 1950 के बाद नेहरू शांत हो गए थे।  मगर कांग्रेस के लोगों के मन में जो खुजली रहती है, उसके लिए भी वह एक तथ्य रखना चाहते हैं कि नेहरू के मन में सिर्फ इतना ही नहीं था। सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के समय नेहरू ने 24 अप्रैल 1951 को जाम साहब को एक पत्र लिखा था। यह Selected Works of Jawaharlal Nehru, सीरीज़ 2, वॉल्यूम 47 में दर्ज है, कोई भी जाकर देख सकता है। वह कह रहे हैं कि “मैं तो बहुत स्पष्ट करना चाहता हूं, आपको उसमें नहीं जाना चाहिए, सोमनाथ मंदिर के निर्माण में कोई भूमिका नहीं निभानी चाहिए, आपको वह अटेंड भी नहीं करना चाहिए।” सोमनाथ मंदिर का तो कार्यक्रम भी अटेंड नहीं करना चाहिए जाम साहब को, जो कि राजा थे, मगर बाबरी मस्जिद बनवानी चाहिए।

डॉ त्रिवेदी ने कहा कि इतना ही नहीं है, मैं नेहरू जी का एक कोट करता हूं जो उन्होंने दिल्ली में 1959 में नेशनल गैलरी में कहा; यह “Speeches at the Inauguration of Seminar and Exhibition on Architecture organised by Lalit Kala Akademi and All India Fine Arts & Crafts, New Delhi, 17 March 1959” में है। एक कार्यक्रम में नेहरू बोलते हैं कि “Some of the temples of South India, however, repel me in spite of their beauty. I just cannot stand them, why I do not know, cannot explain that, but they are oppressive, they suppress my spirit, they do not allow me to rise and keep me down in the dark corridors. I like the sun and air.” In contrast he found Taj Mahal “astonishingly beautiful, astoundingly beautiful”. 17 मार्च 1959 को जवाहरलाल नेहरू ने लिखा कि “वह कह रहे हैं, दक्षिण भारत के मंदिर कितने भी सुंदर हों, उससे मैं डिप्रेस्ड फील करता हूं, मुझे समझ में नहीं आता है कि मुझे डिप्रेशन क्यों लगता है उन कॉरिडोर्स में मूव करते समय।”

राष्ट्रीय प्रवक्ता ने कहा कि इसका अर्थ हुआ कि वहां से लेकर आज तक राम मंदिर के शिलान्यास में न जाना, राम मंदिर की ध्वजा का विरोध करना, बाबरी मस्जिद बनाने का संकल्प लेना, वो एक पुराना गाना था ना कि “ये रईसी है खानदानी”, वो रईसी नहीं, यह कहानी है खानदानी। तो इसलिए मैं यह स्पष्ट रूप से कांग्रेस के नेताओं को, मैंने कोट के साथ बता दिया है। अब कांग्रेस वालों को सोच‑समझकर अपने नेताओं को पढ़कर बताना चाहिए। और यह भी बताना चाहिए कि यह भारत वह था कि सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन के समय तत्कालीन हमारे राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद जी गए थे, उनको जाने से रोकने का प्रयास किया था। पुरुषोत्तम दास टंडन जी राजस्थान के गवर्नर थे, उनको भी रोकने का प्रयास किया था। श्री रामलला विराजमान जब 22‑23 दिसंबर 1949 की रात को प्रकट हुए, तो जो गोविंद वल्लभ पंत को पत्र लिखा है कि “आप सख्ती नहीं कर रहे हैं। मुझे लगता है हम और कुछ नहीं कर रहे।” इतिहास में गड़े मुर्दे उखाड़ने का भाजपा का कोई प्रयास नहीं है, पर कांग्रेस को अपने मुर्दों का डीएनए जरूर चेक कर लेना चाहिए। मैं किसी के प्रति व्यक्तिगत अपमान नहीं करना चाहता हूं और “डीएनए” का अर्थ राजनीतिक डीएनए से है कि आपके मन में जिस प्रकार की तिरस्कार की भावना थी, वह पहले भी थी, आज भी है और कल भी रहेगी। जो पुराना गीत था ना कई साल पहले कि “मुझे तुमसे प्यार था, जिया बेक़रार था, आज भी है, कल भी रहेगा।” मगर कांग्रेस के लिए होना चाहिए कि “कई साल पहले मुझे हिंदुओं से नफ़रत का ज्वार था, जिया बेक़रार था कट्टरपंथी वोटों के लिए बेकरार था, आज भी है और कल भी रहेगा।”

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