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आकाश की संप्रभुता और कूटनीतिक विवेक

Sovereignty of the sky and scientific prudence

भारत के पास निर्णायक बढ़त

दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में कई बार शक्ति का संतुलन ज़मीन या समुद्र पर नहीं, बल्कि आकाश में तय होता है। भारत के पास आज वही “एयरस्पेस लीवरेज” है, जो बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच सीधी हवाई कनेक्टिविटी के प्रश्न को पूरी तरह नई दिशा देता है। ढाका–कराची सीधी उड़ानें तभी संभव हैं जब भारतीय वायुक्षेत्र के ऊपर से ओवरफ्लाइट की अनुमति मिले। इस अनुमति के अभाव में एक तीन घंटे और 2,300 किलोमीटर की यात्रा 5,800 किलोमीटर और लगभग आठ घंटे के आर्थिक रूप से अव्यावहारिक चक्कर में बदल जाती है। यह केवल तकनीकी तथ्य नहीं, बल्कि रणनीतिक वास्तविकता है।
हवाई मार्गों की अर्थव्यवस्था बेहद संवेदनशील होती है। ईंधन लागत, क्रू टाइम, विमान उपयोगिता और टिकट मूल्य—सब कुछ दूरी और समय से जुड़ा है। भारत के ऊपर से उड़ान न मिलने की स्थिति में ढाका–कराची मार्ग दोनों देशों की एयरलाइंस के लिए घाटे का सौदा बन जाता है। यही कारण है कि यह मुद्दा महज़ एविएशन नहीं, कूटनीति का भी है। विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि विषय मौजूदा समझौतों के तहत देखा जाएगा, यानी अंतिम निर्णय राजनीतिक नेतृत्व के विवेक पर निर्भर है। व्यावहारिक अर्थों में यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ में है।
यहां सवाल यह नहीं कि भारत को अपनी संप्रभुता का उपयोग करना चाहिए या नहीं—वह तो निर्विवाद है। असली प्रश्न यह है कि इस लीवरेज का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया जाए। पिछले वर्षों में भारत ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को बढ़ावा दिया है, बशर्ते पड़ोसी देशों का व्यवहार पारस्परिक सम्मान और सुरक्षा हितों के अनुरूप रहा हो। पाकिस्तान के संदर्भ में यह शर्त और भी कठोर हो जाती है, क्योंकि सीमा पार आतंकवाद, कश्मीर पर दुष्प्रचार और भारत-विरोधी नैरेटिव का रिकॉर्ड जगज़ाहिर है। ऐसे में “सामान्यीकरण” की किसी भी मांग को ठोस व्यवहारिक बदलावों से जोड़ा जाना स्वाभाविक है।


बांग्लादेश के साथ भारत के रिश्ते व्यापक और बहुस्तरीय हैं—व्यापार, ऊर्जा, ट्रांजिट और सुरक्षा सहयोग तक फैले हुए। ढाका की अपनी क्षेत्रीय आकांक्षाएं हैं, लेकिन उन्हें पूरा करने के लिए भारत के वैध हितों और चिंताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एयरस्पेस अनुमति कोई दान नहीं, बल्कि संप्रभु निर्णय है, जो द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय आचरण पर आधारित होता है। यदि भारत यह अनुमति देता है, तो वह केवल आर्थिक व्यवहार्यता नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और भरोसे के संकेत भी देखेगा।
यह भी याद रखना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय कानून देशों को अपने वायुक्षेत्र पर पूर्ण अधिकार देता है। ओवरफ्लाइट अधिकार स्वचालित नहीं होते; वे समझौतों, विश्वास और सुरक्षा आश्वासनों से आते हैं। ऐसे में भारत का संयम और स्पष्टता दोनों आवश्यक हैं। संयम इसलिए कि निर्णय को प्रतिशोध की तरह न देखा जाए, और स्पष्टता इसलिए कि शर्तें असंदिग्ध हों—आतंक के प्रति शून्य सहिष्णुता, भारत-विरोधी गतिविधियों से परहेज और क्षेत्रीय जिम्मेदारी का पालन।
अंततः, यह मामला इस बात की कसौटी है कि भारत अपनी बढ़ती सामरिक हैसियत का उपयोग कैसे करता है। आकाश में मिली यह बढ़त भारत को दबाव की भाषा नहीं, बल्कि शर्तों की स्पष्ट राजनीति बोलने का अवसर देती है। यदि अनुमति मिलती है, तो वह भरोसे का पुरस्कार होगी; यदि नहीं मिलती, तो यह संकेत होगा कि भारत अब केवल शब्दों पर नहीं, कर्मों पर विश्वास करता है। दक्षिण एशिया की उड़ानें तभी सहज होंगी, जब ज़मीन पर नीति और नीयत दोनों स्पष्ट हों।

उदय इंडिया ब्यूरो

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