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धुएं में छिपा विज्ञान, जब परंपरा को पश्चिम से मिला प्रमाणपत्र

Science hidden in smoke, when tradition gets certification from the West

भारत की परंपराओं को लंबे समय तक अंधविश्वास कहकर खारिज किया गया। घरों में हवन, धूप, गुग्गुल, लोबान या औषधीय जड़ी-बूटियों का धुआँ करना आधुनिकता के पैमाने पर पिछड़ापन बताया गया। लेकिन हाल ही में जर्नल ऑफ एथ्नोफार्माकोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन ने इस सोच को चुनौती दी है। इस शोध में “मेडिसिनल स्मोक” यानी लकड़ी और सुगंधित व औषधीय जड़ी-बूटियों के धुएँ के प्रभाव का परीक्षण किया गया। एक बंद कमरे में एक घंटे तक इस धुएँ का प्रयोग किया गया और परिणाम चौंकाने वाले थे—सिर्फ 60 मिनट में हवा में मौजूद बैक्टीरिया की संख्या में 94 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई। यह केवल गंध को ढकने वाला धुआँ नहीं था, बल्कि वातावरण को रोगाणुओं से मुक्त करने की क्षमता रखता था।
यह निष्कर्ष उन भारतीय परंपराओं की याद दिलाता है जिन्हें सदियों से घरों और मंदिरों में अपनाया जाता रहा है। चाहे वह यज्ञ हो, धूप-दीप हो या विशेष अवसरों पर गुग्गुल और लोबान का धुआँ—इन सबका उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वातावरण की शुद्धि भी रहा है। आयुर्वेद और प्राचीन ग्रंथों में “धूपन” की विधि का उल्लेख मिलता है, जिसका उपयोग रोगाणुओं को नष्ट करने और संक्रमण रोकने के लिए किया जाता था। ग्रामीण भारत में आज भी प्रसव के बाद या किसी बीमारी के फैलाव के समय घरों में औषधीय धुआँ किया जाता है। यह परंपरा अनुभव और पीढ़ियों की समझ पर आधारित थी, जिसे आधुनिक विज्ञान ने लंबे समय तक गंभीरता से नहीं लिया।
विडंबना यह है कि जब यही बातें भारतीय कहते थे, तो उन्हें “अवैज्ञानिक” कहकर उपहास का पात्र बनाया जाता था। Colonial mindset ने हमें अपनी ही विरासत पर संदेह करना सिखाया। Western certifications के बिना किसी ज्ञान को मान्यता नहीं दी जाती थी। आज जब पश्चिमी जर्नल में प्रकाशित शोध वही बात पुष्ट करता है, तो अचानक वही प्रथा “Innovative” और “Sustainable Air Purification” बन जाती है। संभव है कि आने वाले वर्षों में इसी सिद्धांत पर आधारित कोई नया उत्पाद पश्चिमी ब्रांड के नाम से बाजार में उतरे और उसे आधुनिक खोज बताया जाए।


यह प्रश्न केवल विज्ञान का नहीं, मानसिकता का भी है। भारत को लंबे समय तक “थर्ड वर्ल्ड” कहकर उसकी परंपराओं को पिछड़ा बताया गया, जबकि उसी भूमि ने आयुर्वेद, योग, ध्यान और प्राकृतिक चिकित्सा जैसे समग्र स्वास्थ्य मॉडल दुनिया को दिए। कोविड-19 के दौरान भी जब इम्युनिटी बढ़ाने के पारंपरिक उपायों की चर्चा हुई, तब धीरे-धीरे दुनिया ने भारतीय ज्ञान-परंपरा की ओर देखा। आज योग वैश्विक है, आयुर्वेद पर अंतरराष्ट्रीय शोध हो रहे हैं, और अब औषधीय धुएँ पर भी वैज्ञानिक अध्ययन सामने आ रहे हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि हर परंपरा को बिना जांचे-परखे स्वीकार कर लिया जाए। विज्ञान का उद्देश्य ही परीक्षण और सत्यापन है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा को पूर्वाग्रह के कारण खारिज करना भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण नहीं था। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी परंपराओं का अध्ययन आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति से करें, उन्हें प्रमाणित करें और जहां आवश्यक हो, उन्हें समकालीन संदर्भ में परिष्कृत करें। इससे न केवल हमारी सांस्कृतिक आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना होगी, बल्कि विश्व को भी टिकाऊ और प्राकृतिक समाधान मिलेंगे।
आज जब यह अध्ययन सामने आया है, तो इसे केवल पश्चिम की मुहर के रूप में देखने के बजाय आत्ममंथन का अवसर समझना चाहिए। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हमारी सभ्यता में गहरा empirical knowledge निहित है। यदि हम स्वयं उसे समझें, शोध करें और दुनिया के सामने प्रस्तुत करें, तो किसी बाहरी प्रमाणपत्र की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। समय आ गया है कि हम अपनी परंपराओं को हीन भावना से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आत्मविश्वास के साथ देखें। क्योंकि धुएँ में छिपा यह विज्ञान हमें यही सिखाता है—जिसे हमने सदियों से साधा, उसे पहचानने में हमें देर जरूर हुई, पर सत्य अंततः सामने आता ही है।
 

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