
डॉ. स्मृति उपाध्याय
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के पांच साल पूरे हो चले हैं परन्तु क्या यह नई शिक्षा नीति मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ती करने एवं संरचनात्मक कमियों का निवारण करने में सक्षम हुई है या नहीं इस तथ्य का मूलयांकन करना अति आवश्यक है।
भारत, जहाँ शिक्षा महज ज्ञान-अर्जन का माध्यम नहीं अपितु सभ्यता, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तन का प्रतीक रही है। यहाँ ज्ञानार्जन न केवल धर्म, नैतिकता और आत्म-विकास बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का भी एक महत्वपूर्ण पहलु था। तक्षशिला और नालंदा जैसे विश्वविख्यात शिक्षण केंद्र की उपस्थिति एवं गणित, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, दर्शन और भाषाविज्ञान जैसे विषयों द्वारा भारत वैश्विक शिक्षा प्रणाली के अग्रज के रूप में ख्यात था। गुरुकुल पद्धति एवं गुरु-शिष्य के आत्मीय सम्बन्ध भारतीय ज्ञान परंपरा के शिलाधार रहे हैं। किन्तु दुर्भाग्यवश समय के साथ भारत की शिक्षा व्यवस्था कई ऐतिहासिक, राजनीतिक और आर्थिक परिमार्जनों से होकर गुजरी जिसके फलस्वरूप यूरोप में जहाँ पुनर्जागरण, वैज्ञानिक क्रांति और औद्योगिक क्रांति ने शिक्षा को आधुनिकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रदान किया, वहीं भारत में औपनिवेशिक शासन ने शिक्षा को तत्कालीन प्रशासनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के उद्देश्य तक ही सीमित रखा। लॉर्ड मैकॉले की शिक्षा नीति ने भारतीय शिक्षा को अंग्रेज़ी भाषा, पश्चिमी ज्ञान और औपनिवेशिक प्रशासनिक जरूरतों के अनुरूप ढाल दिया जिसका एकमात्र और अंतिम उद्देश्य भारतीयों को ब्रिटिश राज में नौकरी करने लायक बनाना था। शिक्षा किसी भी समाज के सर्वांगीण विकास का भी आधार हो सकती है यह सोच औपनिवेशिक भारत में गौण तथ्य था। हालाँकि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारतीय नीति-निर्माताओं ने इस व्यवस्था को राष्ट्रीय आकांक्षाओं के अनुरूप पुनर्गठित करने का प्रयास किया।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय शिक्षा प्रणाली को राष्ट्रीय विकास के उपकरण के रूप में देखा गया। शिक्षा के लोकतंत्रीकरण, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने के लिए अनेक आयोगों और नीतियों का गठन किया गया। इन आयोगों एवं नीतियों ने जैसे- राधाकृष्णन आयोग, कोठारी आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1968 और 1986, शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 ने समय-समय पर व्यापक दृष्टिकोण व्यक्त किये हैं एवं उनके अनुरूप शिक्षा व्यवस्था में प्रभावशील बदलाव भी किये गए। इसी क्रम में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP), 2020 भारतीय शिक्षा प्रणाली में पिछले तीन दशकों का सबसे व्यापक सुधार है। इस नई शिक्षा नीति ने शिक्षा को अधिक समावेशी, बहुविषयक, लचीला और रोजगारोन्मुख बनाने की दिशा में व्यापक बदलाव किये हैं जो कि केवल एक शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था के व्यापक पुनर्विचार का दस्तावेज़ है। नई शिक्षा नीति, 2020 ने पारंपरिक 10+2 संरचना को प्रतिस्थापित करते हुए 5+3+3+4 मॉडल प्रस्तुत किया है, जो बच्चों के संज्ञानात्मक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक विकास के विभिन्न चरणों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इस व्यवस्था में यह स्वीकार किया गया है कि सीखने की क्षमता और व्यक्तित्व विकास की नींव जीवन के शुरुआती वर्षों में रखी जाती है, इसलिए प्रारंभिक शिक्षा में निवेश को मानव पूंजी निर्माण की आधारशिला माना गया है। साथ ही भारतीय शिक्षा प्रणाली लंबे समय से रटंत शिक्षा और परीक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण के लिए आलोचना का विषय रही है। नई शिक्षा नीति ने इस कमी को दूर करते हुए पाठ्यक्रम एवं परीक्षाओं को अधिक लचीला, योग्यता-आधारित और कम तनावपूर्ण बनाने पर बल दिया है। दक्षता-आधारित मूल्यांकन शिक्षा के दर्शन और शिक्षण-पद्धति में व्यापक बदलाव का संकेत देता है।
नई शिक्षा नीति इस बात पर विशेष बल देती है कि किसी भी शिक्षा व्यवस्था की गुणवत्ता उसके शिक्षकों की गुणवत्ता से निर्धारित होती है। अतः इस नीति के माध्यम से शिक्षक प्रशिक्षण की गुणवत्ता में सुधार पर विशेष बल दिया गया है। नई शिक्षा नीति शिक्षकों को केवल ज्ञान प्रदाता ही नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया के मार्गदर्शक और नवाचार के संवाहक के रूप में देखती है। साथ ही नई शिक्षा नीति उच्च शिक्षा को संकीर्ण विषयगत सीमाओं से मुक्त कर बहुविषयक और उदार शिक्षा की दिशा में ले जाने का प्रयास करती है। इसका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थियों का निर्माण करना है जो तकनीकी विशेषज्ञता के साथ-साथ आलोचनात्मक चिंतन, नैतिक मूल्यों, सामाजिक उत्तरदायित्व और वैश्विक दृष्टिकोण से भी समृद्ध हों। इस नीति का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल रोजगार के लिए तैयार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें जिम्मेदार नागरिक, आजीवन शिक्षार्थी और सामाजिक परिवर्तन के सक्रिय भागीदार के रूप में विकसित करने की व्यापक दृष्टि प्रस्तुत करती है, किन्तु अभी भी भारतीय शिक्षा प्रणाली में आधारभूत चुनौतियाँ मौजूद हैं।
भारत की शिक्षा व्यवस्था आज एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर खड़ी है जहाँ उसे 21वीं सदी की वैश्विक आवश्यकताओं, तकनीकी परिवर्तनों और सामाजिक न्याय की आकांक्षाओं के अनुरूप स्वयं को पुनर्गठित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। जहाँ एक ओर डिजिटल पहचान प्रणालियों, आधार-आधारित शैक्षिक प्रबंधन, बुनियादी साक्षरता एवं संख्यात्मक दक्षता, कौशल-आधारित शिक्षा, अनुसंधान एवं नवाचार के लिए बढ़ते वित्तपोषण तथा उच्च शिक्षा के अंतर्राष्ट्रीयकरण जैसे सुधारों ने शिक्षा क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त किया है। वहीं दूसरी ओर, सीखने की गुणवत्ता में गिरावट, शिक्षक पदों की बड़ी संख्या में रिक्तियाँ, ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के बीच डिजिटल विभाजन, परीक्षा एवं मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता पर उठते प्रश्न तथा सामाजिक एवं आर्थिक रूप से वंचित वर्गों की सीमित भागीदारी जैसी चुनौतियाँ अब भी शिक्षा व्यवस्था के समक्ष गंभीर अवरोध बनी हुई हैं। ऐसे में वर्तमान चुनौतियों और उभरती वैश्विक आवश्यकताओं के संदर्भ में शिक्षा प्रणाली का पुनर्निर्माण केवल संस्थागत विस्तार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह समान अवसर, गुणवत्तापूर्ण अधिगम, अकादमिक स्वायत्तता, अनुसंधान एवं नवाचार, कौशल-आधारित शिक्षण तथा रोजगारपरक परिणामों के मध्य एक संतुलित और न्यायसंगत ढाँचे के निर्माण की मांग करता है।
भारत विश्व की सबसे बड़ी शिक्षा प्रणालियों में से एक है। देश में लाखों विद्यालय, हजारों महाविद्यालय और विश्वविद्यालय करोड़ों विद्यार्थियों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक पहुँच का विस्तार पिछले कुछ दशकों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। नामांकन दरों में वृद्धि, बालिका शिक्षा में सुधार और उच्च शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (GER) की बढ़ोतरी इस प्रगति के महत्वपूर्ण संकेतक हैं। तथापि, मात्रात्मक विस्तार किसी भी देश के शिक्षा व्यवस्था के सुदृढ़ होने के प्रमाण नहीं हो सकते जब तक वहां गुणवत्ता का समावेश न हो। अभी भी विभिन्न राज्यों, सामाजिक समूहों और आय वर्गों के बीच शैक्षिक अवसरों तथा उपलब्धियों में व्यापक असमानताएँ विद्यमान हैं। महानगरों और विकसित क्षेत्रों के शैक्षणिक संस्थानों की तुलना में ग्रामीण एवं पिछड़े क्षेत्रों के विद्यालय अब भी बुनियादी संसाधनों, प्रशिक्षित शिक्षकों और तकनीकी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। यदि शिक्षा व्यवस्था समाज के प्रत्येक वर्ग तक गुणवत्तापूर्ण अवसर पहुँचाने में सक्षम नहीं होती, तो आर्थिक विकास के लाभ भी व्यापक रूप से वितरित नहीं हो पाएँगे।
इस प्रकार नई शिक्षा नीति के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती वित्तीय संसाधनों की है। शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय अभी भी जीडीपी के 6 प्रतिशत लक्ष्य से कम है। बिना पर्याप्त निवेश के बुनियादी ढाँचे, डिजिटल संसाधनों और शिक्षक प्रशिक्षण में अपेक्षित सुधार संभव नहीं होगा। नई शिक्षा नीति के पांच वर्ष उपरांत भी अभी भारत के कई नामचीन विश्विद्यालयों में आधारभूत डिजटलीकरण के उपकरण उपलब्ध नहीं हो पाए हैं तो ऐसे में में ग्रामीण एवं छोटे शहरों के महाविद्यालयों के शैक्षिक पर्यावरण की स्थिति की गणना करना भी अकल्पनीय है। दूसरी चुनौती डिजिटल विभाजन है, महामारी के दौरान स्पष्ट हुआ कि लाखों विद्यार्थी इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों की अनुपलब्धता के कारण शिक्षा से वंचित रह गए। डिजिटल शिक्षा तभी समावेशी हो सकती है जब तकनीकी संसाधनों तक सार्वभौमिक पहुँच सुनिश्चित की जाए। इंटरनेट की उपलब्धता को चौथी आधरभूत आवश्यकता के रूप में देखते हुए इसे निःशुल्क अथवा कम से कम मूल्य पर मुहैया कराये जाने की व्यवस्था की जानी चाहिए। तीसरी चुनौती सामाजिक असमानताओं की है। जाति, लिंग, भाषा, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति के आधार पर मौजूद शैक्षिक विषमताएँ केवल नीतिगत घोषणाओं से समाप्त नहीं होंगी, इसके लिए लक्षित हस्तक्षेप और सामाजिक न्याय आधारित दृष्टिकोण आवश्यक होगा। चौथी चुनौती शिक्षा के बढ़ते निजीकरण और व्यवसायीकरण की है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल आर्थिक रूप से सक्षम वर्गों तक सीमित रहेगी, तो शिक्षा सामाजिक गतिशीलता का माध्यम बनने के बजाय सामाजिक विभाजन का आधार बन जाएगी । साथ ही विश्वविद्यालयी स्तर पर लागु चौथे वर्ष में न केवल विद्यार्थियों बल्कि शिक्षकों को भी बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। विषय प्रारूप एवं मूल्याङ्कन मानकों जैसे तथ्यों पर विस्तृत विचार अपेक्षित है। नीतियों में नीति निर्माण की दूरदर्शिता के साथ-साथ ही इन नियमों के संचालन के लिए अपेक्षित ढांचागत सुविधाएँ भी मुहैया कराना भी शामिल होना चाहिए कहने का तात्पर्य यह है की जिस तरह बिना प्रायोगिक उपकरणों के वैज्ञानिक विषय की पढ़ाई संभव नहीं है उसी प्रकार बिना डिजिटलीकरण के नई शिक्षा नीति के प्रभावशील परिणाम भी अनुपेक्षित हैं।
भारत के लिए शिक्षा सुधार का अर्थ केवल विद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था का निर्माण करना है जो समानता, गुणवत्ता, नवाचार, रोजगारपरकता और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित कर सके। यदि नई शिक्षा नीति इन उद्देश्यों को व्यवहारिक रूप में साकार कर पाती है, तो शिक्षा भारत के सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन की सबसे प्रभावशाली शक्ति बन सकती है। अन्यथा यह भी उन अनेक नीतिगत दस्तावेज़ों की सूची में शामिल हो जाएगी जिनकी दृष्टि तो व्यापक थी, किंतु उनका प्रभाव सीमित रह गया। वास्तव में किसी भी नीति की वास्तविक सफलता उसके क्रियान्वयन में निहित होती है।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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