
दीपक कुमार रथ
रक्षाबंधन भारत की उस सनातन परंपरा का पर्व है, जिसमें भाई-बहन के रिश्ते में स्नेह, विश्वास और जिम्मेदारी का भाव निहित है। यह ऐसा त्योहार है जो सामाजिक पहचान की तमाम दीवारों से ऊपर उठकर रिश्तों को जोड़ता है। लेकिन जब ऐसे अवसरों पर भी जाति की पहचान और सामाजिक वर्गीकरण का प्रवेश होने लगे, तो मन में कई सवाल उठते हैं। सवाल यह है कि क्या हम सचमुच जातिविहीन समाज की ओर बढ़ रहे हैं या फिर जाति को हमारी सार्वजनिक और राजनीतिक पहचान का स्थायी आधार बना रहे हैं?
असली बहस इनसे और बड़ी है। भारत में “सामान्य”, “एससी”, “एसटी” और “ओबीसी” जैसे वर्ग अब केवल संवैधानिक या प्रशासनिक श्रेणियां नहीं रह गए हैं; वे धीरे-धीरे राजनीतिक पहचान और सामाजिक प्रतिस्पर्धा के स्थायी प्रतीक बनते जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति उस भारत के लिए चिंताजनक है जो जाति की दीवारों से आगे बढ़ने का सपना देखता है।
यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि आरक्षण अपने आप में गलत नहीं है। भारतीय संविधान ने इसे ऐतिहासिक सामाजिक अन्याय और अवसरों से वंचित रहे समुदायों को बराबरी का अवसर देने के लिए एक साधन के रूप में स्वीकार किया। जिन समुदायों ने पीढ़ियों तक भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार झेला, उनसे यह कहना कि अब सब बराबर हैं और वे बिना किसी अतिरिक्त सहायता के प्रतिस्पर्धा करें, वास्तविक समानता नहीं होगी। लेकिन सामाजिक न्याय के नाम पर किसी व्यवस्था को प्रश्नों से परे भी नहीं रखा जा सकता।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में किसे मिल रहा है? क्या वह उस परिवार तक पहुंच रहा है जिसकी पहली पीढ़ी उच्च शिक्षा की दहलीज तक पहुंची है? क्या वह उस बच्चे तक पहुंच रहा है जिसके माता-पिता के पास न संसाधन हैं, न मार्गदर्शन और न ही गुणवत्तापूर्ण शिक्षा? या फिर आरक्षण का लाभ अपेक्षाकृत संपन्न और शिक्षित वर्ग के भीतर ही बार-बार केंद्रित होता जा रहा है?
यहीं क्रीमी लेयर का प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि आरक्षण का उद्देश्य वंचितों को आगे बढ़ाना है, तो उन लोगों और परिवारों की पहचान भी जरूरी है जो सामाजिक और आर्थिक रूप से पर्याप्त प्रगति कर चुके हैं। आरक्षण का लाभ उस व्यक्ति तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुंचना चाहिए जिसे वास्तव में इसकी आवश्यकता है, न कि ऐसी स्थिति पैदा हो जहां एक ही परिवार या अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अवसरों पर कब्जा बनाए रखे और सबसे कमजोर उसी कतार में पीछे खड़ा रह जाए। यह आरक्षण विरोध नहीं है। यह आरक्षण को उसके मूल उद्देश्य के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग है। दूसरी ओर, योग्यता का प्रश्न भी वास्तविक है। भारत के लाखों युवा वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। वे अपनी मेहनत, समय और संसाधन लगाकर उम्मीद करते हैं कि शिक्षा और प्रतिभा उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देगी। उनकी चिंता को सामाजिक न्याय विरोधी कहकर खारिज करना भी उचित नहीं है। लेकिन योग्यता को केवल अंकों से मापना भी पर्याप्त नहीं है। महंगे स्कूल, निजी ट्यूशन और कोचिंग प्राप्त करने वाले विद्यार्थी और सीमित संसाधनों वाले सरकारी विद्यालय के विद्यार्थी एक ही शुरुआती रेखा से दौड़ शुरू नहीं करते। इसलिए वास्तविक समाधान केवल आरक्षण की बहस में नहीं, बल्कि अवसर की समानता सुनिश्चित करने में है।
सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता सुधरे, गरीब और वंचित बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले, डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध हों, छात्रवृत्ति और कौशल प्रशिक्षण का विस्तार हो और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण तैयारी की सुविधा गांव-कस्बों तक पहुंचे—तभी सामाजिक न्याय वास्तव में जमीन पर दिखाई देगा। दुर्भाग्य से जाति भारतीय राजनीति में एक सुविधाजनक वोट-बैंक भी बन चुकी है। राजनीतिक दल अक्सर समाज को विभिन्न जातीय समूहों में बांटकर उनके बीच अवसरों और संसाधनों की प्रतिस्पर्धा को राजनीतिक पूंजी में बदल देते हैं। परिणाम यह होता है कि जिस जाति को समाप्त करने की बात कही जाती है, वही जाति चुनावी राजनीति में और अधिक महत्वपूर्ण होती जाती है। इस विरोधाभास को समाप्त करना होगा। सामाजिक न्याय का लक्ष्य यह नहीं हो सकता कि जाति की पहचान हमेशा के लिए जीवित रखी जाए। लक्ष्य होना चाहिए कि जाति किसी व्यक्ति की शिक्षा, रोजगार, सम्मान और भविष्य का निर्धारक न रहे।
भारत को ऐसी आरक्षण व्यवस्था चाहिए जो वास्तविक वंचितों तक पहुंचे, जिसकी समय-समय पर समीक्षा हो और जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि अपेक्षाकृत संपन्न वर्ग लगातार उसी व्यवस्था का लाभ उठाकर सबसे कमजोर लोगों को पीछे न छोड़ दे। हमें “आरक्षण बनाम योग्यता” की खोखली बहस से आगे बढ़ना होगा। भारत को न्याय भी चाहिए और उत्कृष्टता भी; प्रतिनिधित्व भी चाहिए और क्षमता भी; समान अवसर भी चाहिए और सामाजिक सुरक्षा भी। आरक्षण का सबसे बड़ा उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि वह कितने वर्षों तक चलता रहे। उसकी सफलता इस बात में होगी कि एक दिन ऐसी परिस्थितियां पैदा हों जब कम से कम लोगों को आरक्षण की आवश्यकता पड़े। क्योंकि अंतिम लक्ष्य ऐसा भारत होना चाहिए जहां बच्चे की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसकी प्रतिभा और कर्म से हो। आरक्षण सामाजिक न्याय का सेतु बने—जाति की स्थायी दीवार नहीं।
Leave Your Comment