नई दिल्ली: यूपी में चुनावी बिगुल बजने में अभी समय है पर चुनाव की आहट पहले ही आ चुकी है। सभी दलों ने अपने अपने तरकश के तीरों का परिक्षण शुरु कर दिया है। सोशल मीडिया पोस्ट और मीम्स से भर रहे हैं। प्रमुख जगहों पर पोस्टरों के तीखे वार देखने को मिल रहे हैं। देखा जाए तो फरवरी मार्च के समय में यूपी समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हो सकते हैं। इस बीच सूबे में सियासत गर्मा गई है। विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट को लेकर राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। सभी सियासी दल वोटरों को लुभाने में जुटे हैं। इस बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 5 अगस्त को PDA की नई व्याख्या करते हुए इसमें 'P' का मतलब 'पंडित' बताया। इससे पहले 2022 के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव PDA में 'P' का मतलब 'पिछड़ा' बताते थे। ऐसे में 'पिछड़ा' से 'पंडित' तक का यह बदलाव यूपी की चुनावी राजनीति में एक अहम पॉलिटिकल संदेश माना जा रहा है।

अखिलेश यादव का बीजेपी पर निशाना-
यही नहीं अखिलेश यादव ने लखनऊ में आयोजित ब्राह्मण सम्मेलन में बीजेपी पर ब्राह्मण समाज को निशाना बनाने का आरोप लगाया। उन्होंनें कहा, "लोग PDA के बारे में बात करते रहते हैं और इसकी नई-नई डेफिनिशन बनाते रहते हैं। जब से वे PDA से हारे हैं, वे इसे फिर से डिफाइन करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन वे भूल गए हैं कि PDA में 'PD' का मतलब पंडित भी है। वे जितना ज़्यादा दर्द (पीड़ा) देंगे, PDA उतना ही मज़बूत होगा।" उनके इस बयान के बाद शियासी हलचल और तेज हो गई। यही नहीं अखिलेश यादव एक के बाद एख निशाने सीएम योगी और बीजेपी सरकार पर लगाते जा रहे हैं। अखिलेश यादव ने महाकुंभ को लेकर, युवाओं को लेकर और नौकरी देने को लेकर निशाने साधते जा रहे हैं।
खैर यह रही बात अखिलेश यादव की बीजेपी पर निशानेबाजी कि अगर हम इस बात पर गौर करें कि आखिर यूपी में क्यों महत्वपूर्ण है ब्राह्मण वोट तो उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मणों को लंबे समय से प्रभावशाली वोट बैंक माना जाता है। विधानसभा चुनावों में इनकी भूमिका अहम हो जाती है। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक राज्य की 115 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण वोटर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं। यही वजह है कि चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल इस ब्राह्मणों को अपने पाले में लाने की कोशिश करते हैं.. 2007 हो 2012 हो 2017 हो ..,या फिर 2022 ही क्यों नहीं ब्राह्मणों के वोट ने यूपी में चुनावी समीकरण बदला है चाहे वो बहुजन समाजवादी पार्टी हो, सपा हो या फिर सत्ता धारी सीएम योगी और बीजेपी की सरकार। जिस पक्ष में ब्राह्मणों का वोट पड़ा वो बड़े मार्जिन से जीता। यह सिर्फ तर्क नहीं बल्कि आंकड़े भी कहते हैं।
क्या BJP से नाराज हैं ब्राह्मण?
बीते कुछ महिनों में देश में और राज्य में जो कुछ भी देखने को मिला है उससे यह सवाल उठता है कि क्या BJP से नाराज हैं ब्राह्मण या ब्राह्मण समाज तो विपक्षी दलों का दावा है कि यूपी में BJP सरकार के खिलाफ ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में नाराजगी है। विपक्ष की ओर से भी यह आरोप अक्सर लगते रहे हैं कि योगी की अगुवाई वाले सरकार में ठाकुरों को अधिक प्राथमिकता मिल रही है। हालांकि BJP से नाराजगी का मतलब यह नहीं है कि ब्राह्मण वोटर अपने आप समाजवादी पार्टी या किसी अन्य विपक्षी दल के पक्ष में चला जाएगा । फैसला तो वोट पड़ने पर ही और चुनाव नजदिक आने और जनता के राय के बाद ही पता चलेगा। लेकिन समाजवादी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि उसके मुस्लिम तुष्टीकरण के कथित रुख को लेकर ब्राह्मण मतदाताओं के एक हिस्से में अब भी असहजता हो सकती है। इसलिए अखिलेश का ब्राह्मण सम्मेलन करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसे 2027 की बड़ी सोशल इंजीनियरिंग का हिस्सा माना जा रहा है।
यह तो चुनावी बयार को अपने तरफ करने का सभी राजनीतिक दलों का एक तीकड़म कहें या फिर कोशिश वो है जो इस वक्त बड़े पैमाने पर यूपी में देखने को मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर BJP भी ब्राह्मण वोट बैंक को लेकर सतर्क है। बीजेपी ने अपनी टीम को एक्टीव कर दिया है साथ ही सभी को जिम्मेदारी भी दे दी गई है। इससे साफ है कि 2027 से पहले उत्तर प्रदेश में मुकाबला सिर्फ BJP बनाम विपक्ष का नहीं, बल्कि ब्राह्मण वोट को अपने साथ जोड़ने की राजनीतिक होड़ का भी है। अखिलेश यादव ने PDA में 'पंडित' जोड़कर इस होड़ को खुलकर सामने ला दिया है। अब सवाल यही है कि क्या ब्राह्मण वोट का एक हिस्सा BJP से हटकर SP या BSP की ओर जाएगा, या 2017 और 2022 की तरह BJP का दबदबा कायम रहेगा?
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