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यमुना नदी का जलविज्ञानीय विश्लेषण

Hydrological Analysis of Yamuna River

सिं धु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र नामक विश्व की तीन प्रमुख नदी प्रणालियों का उद्गम हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं से होता है। इन नदी तंत्रों में भारत की सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं पवित्र नदी गंगा, भारतवर्ष के भौगोलिक क्षेत्र के लगभग एक तिहाई भू-भाग से होकर गुजरती है। इस महान नदी की सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक गाथा इतनी पौराणिक है कि भारतीय पौराणिक कथाओं और इतिहास में नदी के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियों और घटनाओं की भरमार है। इसके मार्ग में कई तीर्थस्थल स्थित हैं। निस्संदेह, गंगा भारत की सर्वाधिक पवित्र नदी है वास्तव में स्थानीय लोग इसे आमतौर पर गंगा माँ (या माँ गंगा) या गंगा जी (या पूजनीय गंगा) कहते हैं। भारत के लोगों का मानना है कि गंगा के पवित्र जल में स्नान करने से व्यक्ति के सभी पिछले पाप धुल जाते हैं। अगर किसी व्यक्ति की मृत्यु के समय उसे गंगा जल की कुछ बूँदें दी जाएँ, तो यह उसकी आत्मा को स्वर्ग पहुँचाने के लिए पर्याप्त है। गंगा और उसकी सहायक नदियों ने उत्तर भारत में एक विशाल समतल और उपजाऊ मैदान का निर्माण किया है। प्रचुर जल संसाधनों, उपजाऊ मिट्टी और उपयुक्त जलवायु की उपलब्धता की बदौलत यह क्षेत्र अत्यधिक विकसित कृषि आधारित सभ्यता और दुनिया के सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में से एक है। भारत में गंगा बेसिन में शुद्ध बोया गया क्षेत्र लगभग 44 मिलियन हेक्टेयर और शुद्ध सिंचित क्षेत्र 23.41 मिलियन हेक्टेयर है। बेसिन के पूर्वी भाग को जल देने वाली सहायक नदियों के प्रवास के परिणामस्वरूप विशिष्ट बैक-स्वैम्प और मेन्डर बोल्ट एकत्रित हो गए हैं। ये तलछटी विशेषताएँ क्षेत्र की जलगतिकीय में एक प्रमुख भूमिका निभाती हैं।

गंगा नदी की प्रमुख सहायक नदियों में यमुना, सोन, घाघरा, रामगंगा, दामोदर, गोमती, महानंदा, टॉस, कोसी, बूढ़ी गंडक, पुनपुन, मयूराक्षी, गंडक, अजय, चन्दन, बागमती आदि प्रमुख हैं जिनमें यमुना नदी गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी तथा भारत की पवित्र नदियों में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, यमुना को सूर्य की पुत्री और यम (मृत्यु के देवता) की बहन बताया  गया है। महाकवि बाण ने अपने महाकाव्य कादंबरी में यमुना नदी को इसके जल का रंग काला होने के कारण इसे कालिंदी के रूप में संबोधित किया है। एक लोकप्रिय मान्यता यह है कि यमुना के पवित्र जल में स्नान करने से जनमानस में मृत्यु का भय नहीं रहता। यमुना नदी का भगवान कृष्ण के जीवन से घनिष्ठ संबंध है। यह कहा जाता है कि जब भगवान कृष्ण के जन्म पर उनके पिता वासुदेव शिशु भगवान कृष्ण के साथ यमुना नदी पार कर नदी के दूसरे किनारे पर सुरक्षित स्थान पर जा रहे थे, तो नदी में बाढ़ आ गई। किवदंती कहती है कि जिस क्षण बढ़ते पानी ने भगवान कृष्ण के चरणों को छुआ, नदी में जल का बहाव कम हो गया। इसके अतिरिक्त अपने बाल्यकाल में ही भगवान कृष्ण ने यमुना नदी में कालिया नाग का मर्दन भी किया था। यमुना नदी का उद्‌गम उत्तराखंड राज्य के उत्तरकाशी जिले में समुद्र तल से लगभग 6,387 मीटर की ऊँचाई पर 38° 59' उत्तरी अक्षांश एवं 78° 27' पूर्वी देशांतर पर निम्न हिमालय की मसूरी पर्वत श्रृंखला में बंदरपूँछ के पास यमुनोत्री हिमनद से होता है। अपने उद्गम स्थल यमुनोत्री से गंगा में संगम स्थल इलाहाबाद तक यमुना की कुल लंबाई 1,376 किमी है और जल निकासी क्षेत्र 366,223 वर्ग किमी है। यमुना स्वयं में एक विशाल नदी है और इसकी अनेक सहायक नदियाँ हैं। यमुना नदी के कुल  जलग्रहण क्षेत्र में यमुना नदी की सहायक नदियों का भाग 70.9% है। इसके अतिरिक्त यमुना का जलग्रहण क्षेत्र गंगा बेसिन के कुल जलग्रहण क्षेत्र का 40.2% और भारत के सम्पूर्ण भू-भाग का 10.7% है। यमुना नदी की प्रमुख सहायक नदियों में टॉस, चंबल, हिंडन, शारदा, बेतवा और केन प्रमुख हैं। अन्य लघु सहायक नदियों में ऋषि गंगा कुंटा, हनुमान गंगा, उमा, गिरि, करन, सागर और रिंद सम्मिलित हैं। इन नदियों में यमुना एवं टोंस नदियाँ हिमालय के हिमनदों से उद्गमित होती हैं। इसके अतिरिक्त यमुना बेसिन की अनेक छोटी नदियाँ जैसे चौटांग, साहिबी, दोहन, कन्तिली, बापाह, वानगंगा आदि यमुना नदी में संगम से पूर्व ही रेतीले इलाकों में सूख जाती हैं।

यमुना नदी के उद्गम स्थल पर उत्तराखंड के चार धामों में से एक यमुनोत्री मंदिर स्थित है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्री यहाँ दर्शन हेतु आते हैं। यह कहा जाता है कि यमुनोत्री मंदिर का निर्माण 19वीं शताब्दी के अंतिम  दशक में हुआ था। यमुनोत्री में गर्म जल का एक कुंड मौजूद है और इस कुंड का जल इतना गर्म है कि लोग चावल और आलू को कपड़े के थैलों में डालकर इस गर्म पानी में डुबोकर पकाते हैं। यमुना नदी तंत्र का जलग्रहण क्षेत्र उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और दिल्ली राज्यों के कुछ भागों से आच्छादित है। विभिन्न राज्यों में स्थित यमुना के जलग्रहण क्षेत्र को सारणी 1 में दर्शाया गया है।

अपने स्रोत से उद्गमित होकर यमुना नदी हिमालय के निचले भाग में लगभग 200 किमी तक घाटियों की एक श्रृंखला से होकर प्रवाहित होती है और फिर सिंधु-गंगीय मैदानी क्षेत्र में तीव्र प्रवणता वाले भू-भाग में उद्गमित होती है। 200 किमी लम्बे नदी प्रवाह के इस भाग में यमुना नदी में अनेक प्रमुख सहायक नदियाँ समाहित होती हैं। इसके पश्चात यह नदी भारत के हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड राज्यों की शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं से होकर प्रवाहित होती है और तत्पश्चात उत्तराखंड के डाक पत्थर नामक स्थान पर यह मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। जहाँ नदी के जल को डाक पत्थर वैराज द्वारा नियंत्रित कर इसका उपयोग विद्युत उत्पादन के लिए किया जाता है। डाक पत्थर के पास यमुना नदी पर यहाँ सतलुज यमुना लिंक (SYL) नहर का निर्माण चल रहा है जो सतलुज को यमुना से जोड़ती है। इस नहर का उद्देश्य सिंधु बेसिन से हरियाणा के हिस्से का 3.5 MAF जल यमुना में स्थानांतरित करना है। डाक पत्थर से, यमुना प्रसिद्ध सिख धार्मिक स्थल पौंटा साहिब से बहते हुए, यह हरियाणा राज्य के यमुना नगर जिले में हथिनीकुंड ताजेवाला बैराज तक पहुँचती है, जहाँ नदी के जल को सिंचाई के लिए पश्चिमी यमुना नहर और पूर्वी यमुना नहर में मार्गाभिगमित किया जाता है। शुष्क ऋतु के दौरान, ताजेवाला वैराज के अनुप्रवाह में नदी में व्यावहारिक रूप से कोई जल प्रवाह नहीं होता है और ताजेवाला और दिल्ली के बीच के कई भागों में नदी सामान्यतः अपने स्रोत से उद्गमित होकर, सूखी रहती है।

भूजल संचय और मौसमी सरिताओं से  प्राप्त जल का योगदान फिर से नदी को पुनर्जीवित करता है। यमुना नदी लगभग 224 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद पल्ला गाँव के पास दिल्ली में प्रवेश करती है। दिल्ली में स्थित वजीराबाद बैराज से यमुना नदी द्वारा दिल्ली शहर को पेयजल उपलब्ध कराया जाता है। सामान्यतः वजीराबाद बैराज के अनुप्रवाह में नदी में जल प्रवाह शुष्क मौसम में लगभग शून्य होता है क्योंकि नदी में उपलब्ध जल दिल्ली की जल मांग को पूर्ण करने के लिए पर्याप्त नहीं होता है। वजीराबाद बैराज से लगभग 22 किमी अनुप्रवाह में, यमुना के जल को ओखला बैराज के माध्यम से सिंचाई के लिए आगरा नहर में मार्गाभिगमित कर दिया जाता है। सामान्यतः शुष्क मौसम के दौरान बैराज के माध्यम से जल का प्रवाह शून्य होता है। ओखला बैराज के अनुप्रवाह में नदी में जो भी जल प्रवाहित होता है, वह पूर्वी दिल्ली, नोएडा और साहिबाबाद से निकलने वाले घरेलू और औद्योगिक अपशिष्ट जल के माध्यम से आता है और शाहदरा नाले के माध्यम से नदी में समाहित हो जाता है।

ताजेवाला में, नदी में वर्ष में अधिकतम एवं न्यूनतम निस्सरण का अनुपात लगभग 40 प्राप्त होता है, जबकि यही अनुपात सिंधु का 33, गंगा का 34 और अमेज़न का 4 है। यह बड़ा अनुपात प्रवाह में व्यापक अस्थायी भिन्नता का संकेत है। गैर-मानसून अवधि के दौरान ताजेवाला में पूर्ण प्रवाह नहर प्रणालियों में परिवर्तित हो जाता है जिससे नदी सूखी रहती है। इसके पश्चात यमुना नदी आगरा, मथुरा शहर से होकर प्रवाहित होती है तथा अंततः इलाहाबाद में गंगा नदी में समाहित हो जाती है।

यमुना नदी को विशिष्ट जलविज्ञानीय और पारिस्थितिकी स्थितियों के कारण इसे पाँच अलग-अलग स्वतंत्र खंडों में विभाजित किया जा सकता है जिन्हें सारणी-2 में प्रस्तुत किया गया है।
 

यमुना जल बंटवारा समझौता

यमुनोत्री में इसके उद्गम से लेकर दिल्ली में ओखला बैराज तक नदी के खंड को (ऊपरी यमुना बेसिन) कहा जाता है। इसके जल के बंटवारे के लिए 12 मई 1994 को पांच बेसिन राज्यों (हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली) के बीच एक समझौता ज्ञापन (MOU) पर हस्ताक्षर किए गए थे। इसके परिणामस्वरूप भारत के जल संसाधन मंत्रालय के तहत ऊपरी यमुना नदी बोर्ड का गठन हुआ, जिसके प्राथमिक कार्य हैंः लाभार्थी राज्यों के बीच उपलब्ध प्रवाह का विनियमन और वापसी प्रवाह की निगरानी; सतही और भूजल की गुणवत्ता के संरक्षण और उन्नयन की निगरानी; बेसिन के लिए जल-मौसम संबंधी आंकड़ों को तैयार करना; जलविभाजक प्रबंधन के लिए योजनाओं का अवलोकन करना; और ओखला बैराज सहित सभी परियोजनाओं की प्रगति की निगरानी और समीक्षा करना। अंतर्राज्यीय समझौते में यह भी परिकल्पना की गई है कि पर्यावरणीय उपयोगों के लिए पूरे वर्ष ताजेवाला और ओखला हेडवर्क्स के अनुप्रवाह पर यमुना नदी में न्यूनतम 10 क्यूमेक का प्रवाह बनाए रखा जाएगा। यह भी आंकलन किया गया है कि बाढ़ के कारण 680 एमसीएम की मात्रा उपयोग योग्य नहीं है। लाभार्थी राज्यों के बीच उपलब्ध यमुनोत्री प्रवाह का आवंटन ऊपरी यमुना नदी बोर्ड द्वारा विनियमित किया जाता है। जिस वर्ष सतही जल की उपलब्धता निर्धारित मात्रा से अधिक होगी, अधिशेष उपलब्धता को राज्यों के बीच उनके आबंटन के अनुपात में वितरित किया जाएगा। हालांकि, जिस वर्ष उपलब्धता निर्धारित मात्रा से कम होगी, पहले दिल्ली के पेयजल आबंटन को पूरा किया जाएगा और शेष जल को हरियाणा, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के बीच उनके आबंटन के अनुपात में वितरित किया जाएगा।

यमुना नदी में बाढ़ के पूर्वानुमान के उद्देश्य से पांवटा साहिब में बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली स्थापित की गई है। जहां टोंस, पवार और गिरी सहायक नदियां मिलती है। पांवटा साहिब के बाद ताजेवाला में बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली स्थापित की गई है। ताजेवाला से दिल्ली तक जल पहुंचने में लगभग 60 घंटे लगते हैं। अत: दिल्ली में बाढ़ के पुर्वानुमान   के लिए कम से कम दो दिन पहले चेतावनी जारी की जा सकती है। यमुना नदी के उपयोग योग्य प्रवाह का राज्यवार आवंटन सारणी 3 में दर्शाया गया है।
 

यमुना बेसिन की जलवायु

हिमालय ऊपरी यमुना 11,983 जलग्रहण क्षेत्र के उत्तरी भाग में जलवायु पर विशिष्ट प्रभाव डालता है। इस क्षेत्र में शीत ऋतु में तापमान बहुत कम तथा ग्रीष्म ऋतु में मध्यम होता है। जिससे यहाँ शीत ऋतु बहुत अधिक ठंडी होती हैं। यमुना नदी के इस भू-भाग में माध्य वार्षिक वर्षा 1,500 मिमी से 400 मिमी के मध्य होती है। यमुना नदी का सम्पूर्ण जलग्रहण क्षेत्र दक्षिण-पश्चिम मानसून के प्रभाव में आता है और वर्षा का एक बड़ा भाग जून से सितंबर माह के मध्य प्राप्त होता है। सर्दियों में दिसंबर और फरवरी के मध्य वर्षा बहुत कम होती है। यमुना बेसिन मैदानी क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत मध्यम होता है तथा गर्मियों अपेक्षाकृत मध्यम होता है तथा गर्मियों में तापमान सामान्यतः 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक हो जाता है।

यमुना नदी व इसकी सहायक नदियों में घरेलू उपयोग, सिंचाई, विद्युत उत्पादन आदि उद्देश्यों की पूर्ति हेतु अनेक बाँध व बैराज निर्मित/ निर्माणाधीन प्रस्तावित हैं। निर्मित बांधों व वैराजों में धालीपुर जल विद्युत परियोजना, गिरी परियोजना, छिबरो जल विद्युत परियोजना, खोदरी जल विद्युत परियोजना, खारा जल विद्युत परियोजना, गांधीसागर बाँध, राणा प्रताप सागर बाँध, जवाहर सागर बाँध, चम्बल घाटी परियोजना, बाण सागर टोंस परियोजना, पार्बती बाँध, माताटीला बाँध, रामसागर बाँध, डाकपत्थर वैराज, हथिनी कुंड वैराज (ताजेवाला बैराज से प्रतिस्थापित), वजीराबाद वैराज, इंद्रप्रस्थ वैराज, ओखला वैराज, गोकुल बैराज (मथुरा,वैराज), पल्ला बैराज आदि सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य निर्माणाधीन प्रस्तावित परियोजनाओं में लखवार बाँध, किसाऊ बाँध, रेणुका बाँध, नया वजीराबाद बैराज प्रमुख हैं। उपरोक्त परियोजनाओं में से प्रमुख परियोजनाओं का संक्षिप्त वर्णन निम्न खण्डों में दर्शाया गया है।

लखवार एवं व्यासी बांध : यमुना नदी पर उत्तराखंड राज्य के देहरादून जिले में 30°31'3" उत्तरी अक्षांश और 77° 56'58" पूर्वी देशांतर पर देहरादून से 72 किलोमीटर दूर लखवार गांव के निकट डाकपत्थर बैराज से लगभग 28 किमी प्रतिप्रवाह में लोहारी ग्राम से 20 किमी दूर लखवार व्यासी बहुउद्देशीय परियोजना प्रस्तावित है जिसके अंतर्गत लखवार बांध. लखवार पॉवर हाउस, व्यासी बांध, हथिआरी पॉवर हाउस तथा कटापत्थर बैराज का निर्माण प्रस्तावित है। लखवार बाँध का जलग्रहण क्षेत्रफल 2080 वर्ग किमी है। इस परियोजना से 300 MW विद्युत उत्पादन प्रस्तावित है।

किशाऊ बांध देहरादून से लगभग 95 किलोमीटर दूर 30°44′59.3" उत्तरी अक्षांश और 77°42′16″ पूर्वी देशांतर पर यमुना नदी की सहायक नदी टोंस नदी पर प्रस्तावित है। परियोजना के पूर्ण होने पर 1.015 MAF सिंचाई जल उपलब्ध होगा, इसमें से केवल 0.515 MAF का उपयोग पूर्वी यमुना नहर द्वारा 97,076 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि की सिंचाई के लिए किया जाएगा और शेष 0.500 MAF जल दिल्ली राज्य को घरेलू उपयोगों के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

डाकपत्थर बैराजः डाकपत्थर बैराज भारत के उत्तराखंड राज्य में यमुना नदी पर दूर 30°30′14" उत्तरी अक्षांश और 77°47'41" पूर्वी देशांतर पर देहरादून जिले के डाकपत्थर नामक स्थान पर स्थित है। यह बैराज रन-ऑफ-द-रिवर योजना के अंतर्गत, डकरानी और धालीपुर पावर प्लांट में जलविद्युत उत्पादन के लिए पूर्वी यमुना नहर के जल को डाइवर्ट करने का कार्य करता है।

धालीपुर जल विद्युत परियोजना : उत्तराखंड के देहरादून जिले में हरबर्टपुर से 5 किमी दूर यमुना नदी पर स्थित है। यह परियोजना डाक पत्थर बैराज द्वारा डकरानी पावर चैनल में डाइवर्ट किए गए यमुना जल का उपयोग करती है। यह परियोजना 1965-70 में चालू की गई थी। इस परियोजना में जल प्रवाह की दर 198.24 घन मीटर/सेकंड है। पावर हाउस की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 39 मेगावाट है।

गिरी परियोजनाः गिरि परियोजना हिमाचल प्रदेश के सिरमौर जिले में पौंटा साहिब से 25 किमी दूर स्थित यमुना नदी की सहायक नदी गिरि पर स्थित एक डायवर्सन परियोजना है। यहाँ स्थित बैराज 163 मीटर लंबा है। 1978 में चालू किए गए गिरि पावर हाउस में 30 मेगावाट की 2 इकाइयाँ स्थापित हैं।

छिबरो जल विद्युत परियोजनाः छिबरो जल विद्युत परियोजना, देहरादून से 67 किलोमीटर दूर, उत्तराखंड के देहरादून जिले में, यमुना की एक सहायक नदी, टोंस पर स्थित है। बांध का जलग्रहण क्षेत्र 4,890 वर्ग किमी है। बांध की ऊंचाई और लंबाई क्रमशः 59.25 मीटर और 155 मीटर है। इस पावर हाउस में 60 मेगावाट की 4 इकाइयां स्थापित हैं।

खोदरी जल विद्युत परियोजनाः छिवरो जल विद्युत परियोजना के अनुप्रवाह में खोदरी पावर हाउस स्थित है, जिसे देहरादून से 52 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के देहरादून जिले में स्थापित किया गया है। यह परियोजना 1984 में शुरू की गई थी। खोदरी पावर हाउस में 30 मेगावाट की 4 इकाइयाँ उपलब्ध हैं।

खारा जल विद्युत परियोजनाः खारा जल विद्युत परियोजना उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में, यमुना नदी की सहायक नदी अहसान पर, सहारनपुर से 50 किलोमीटर दूर स्थित है। 24 मेगावाट की तीन इकाइयों वाले इस पावर हाउस में 1992 में विद्युत उत्पादन प्रारंभ हुआ था, इस पॉवर हाउस की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 62 मेगावाट है।

हथिनी कुंड वैराजः हथिनी कुंड वैराज भारत के हरियाणा राज्य के यमुना नगर जिले में यमुना नदी पर स्थित एक कंक्रीट बैराज है। यह बैराज पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहरों में जल को डाइवर्ट करने के लिए उपयोग किया जाता है। हथिनी कुंड बैराज से छोड़े गए जल को दिल्ली में वजीराबाद बैराज, इंद्रप्रस्थ बैराज, ओखला बैराज द्वारा नियंत्रित करके इसकी दिल्ली के निवासियों के विभिन्न उपयोगों हेतु जलापूर्ति की जाती है।

गांधीसागर बाँधः गांधीसागर चंबल नदी पर निर्मित मुख्य संचयन बांध है, जिसका जलग्रहण क्षेत्र लगभग 23,025 वर्ग किलोमीटर है। यह बांध गांधीसागर, राणा प्रतापसागर और जवाहरसागर बांधों में विद्युत उत्पादन और कोटा बैराज से निकलने वाली नहर प्रणालियों के माध्यम से सिंचाई के लिए बैकअप भंडारण के रूप में कार्य करता है। यह बांध 64.63 मीटर ऊंचा, चिनाई वाला गुरुत्वाकर्षण बांध है जिसकी जल विद्युत उत्पादन क्षमता 115 मेगावाट और सिंचाई क्षमता 7.57 लाख हेक्टेयर है।

राणा प्रताप सागर बाँधः राणा प्रताप सागर राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में कोटा से 54 किलोमीटर दूर चंबल नदी पर बना एक चिनाई वाला गुरुत्वाकर्षण बांध है। बांध का जलग्रहण क्षेत्र 24,576 वर्ग किमी है। बांध की ऊंचाई और लम्बाई क्रमशः 38.3 मीटर और 1,143 मीटर है। जलाशय की उपयोगी संचयन क्षमता 2,899.5 MCM है। विद्युत गृह में विद्युत उत्पादन हेतु 43 मेगावाट की 4 इकाइयाँ उपलब्ध हैं।

जवाहर सागर बांधः  जवाहर सागर बांध राजस्थान के कोटा जिले में कोटा से 36 किलोमीटर दूर राणा प्रताप सागर के अनुप्रवाह में चंबल नदी पर बना एक गुरुत्वाकर्षण कंक्रीट बांध है। बांध का जलग्रहण क्षेत्र 26,880 वर्ग किमी है। बांध की ऊंचाई और लंबाई क्रमशः 37 मीटर और 336 मीटर है। इस जलाशय की उपयोगी संचयन क्षमता 7.40 MCM है। इस बाँध में विद्युत उत्पादन हेतु 33 मेगावाट की 3 इकाइयां स्थापित हैं। यह परियोजना 1972-73 में पूर्ण हुई थी।

माताटीला बाँधः माताटीला बांध का निर्माण वर्ष 1956 में यमुना नदी की सहायक नदी बेतवा पर किया गया था। यह बांध 25° 6' 15" उत्तरी अक्षांश और 78° 23' 00" पूर्वी देशांतर पर उत्तर प्रदेश के माताटीला जिले की ललितपुर तहसील में झांसी से लगभग 56 किमी दूर स्थित है। माताटीला बांध 6.6 किमी लंबा एक मिट्टी का बांध है जिसमें ओगी आकार का चिनाई वाला स्पिलवे है। बांध की ऊंचाई 24.40 मीटर है। इसमें 23 ऊर्ध्वाधर लिफ्टिंग गेट और 4 स्लुइस हैं।

बांध की उपयोगी संचयन क्षमता 1,019.40 MCM मृत संचयन क्षमता 113.30 एमसीएम है। पूर्ण जलाशय स्तर (FRL) 308.46 मीटर पर जलाशय की कुल क्षमता 1,132.70 एमसीएम है और इसका जल विस्तार क्षेत्र 142.43 वर्ग मीटर है। यह एक बहुउद्देशीय बांध है जो सिंचाई, जल आपूर्ति और मछली पालन के लिए सुविधाएं प्रदान करता है। 

रामसागर बाँधः रामसागर बांध, राजस्थान के धौलपुर जिले के बाड़ी तहसील में रामसागर नदी (जो चंबल नदी की सहायक नदी है) की एक सहायक नदी वामनी पर स्थित है। रामसागर परियोजना का जलग्रहण क्षेत्र लगभग 176 वर्ग किमी है। वर्ष 1905 के दौरान किए गए जल सर्वेक्षण के अनुसार, परियोजना की सकल और उपयोगी भंडारण क्षमता क्रमशः 30.83 और 29.39 एमसीएम है।

यमुना नहर तंत्र : यमुना नहर ताजेवाला के पास की हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं से उद्गमित होकर मैदानी क्षेत्रों में प्रवेश करती है। ताजेवाला पर स्थित बैराज से यमुना नदी के जल को सिंचाई के लिए पश्चिमी और पूर्वी यमुना नहरों में मार्गाभिगमित किया जाता है। यमुना 280 किलोमीटर अनुप्रवाह में दिल्ली के पास ओखला तक प्रवाहित होती है, जहाँ से इसके जल को आगरा नहर में स्थानांतरित किया जाता है। यमुना नदी की सहायक नदियों पर निर्मित अन्य नहरों में बेतवा नहर, केन नहर एवं धसान नहर प्रमुख हैं।

यमुना नदी की प्रमुख नहरों का संक्षिप्त वर्णन निम्न खण्डों में दिया गया है।

पूर्वी यमुना नहरः यह नहर उत्तर प्रदेश की प्रमुख नहर है जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले की बेहट तहसील के परगना फैजाबाद गांव में स्थित हथिनीकुण्ड बैराज के बायें तट से निकाली गयी है। हथिनीकुण्ड बैराज यमुना नदी पर बना है। यह बैराज चार राज्यों हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, एवं उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित है। इस नहर की अपनी शाखाओं सहित कुल लम्बाई 1,440 किलोमीटर है। इस नहर की क्षमता 84.95 क्यूमेक है। यह नहर सहारनपुर, शामली, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत आदि जिलों की लगभग 16 लाख वर्ग किमी भूमि सिंचित करते हुए अंततः दिल्ली में यमुना नदी में समाहित हो जाती है। इस नहर पर बाबैल बुजुर्ग व बेलका माफी नाम के गांवों में दो लघु बिजलीघर बने हैं।

पश्चिमी यमुना नहरः पश्चिमी यमुना नहर हरियाणा में यमुना नदी पर स्थित ताजेवाला (हथिनीकुण्ड बैराज) के पश्चिमी तट से उद्गमित होने वाली एक प्रमुख नहर है। इस नहर की अपनी शाखाओं सहित कुल लम्बाई 3,226 किलोमीटर है। इसके द्वारा अंबाला, करनाल, सोनीपत, रोहतक, हिसार और सिरसा जिलों तथा दिल्ली और राजस्थान के कुछ भागों की लगभग 5 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई की जाती है।

आगरा नहरः हरियाणा के जनपद फरीदाबाद एवं गुड़गाँव, उ.प्र. के मथुरा एवं आगरा जनपदों तथा राजस्थान के भरतपुर जिले में सिंचाई प्रदान करने हेतु यमुना नदी पर ओखला (दिल्ली) के पास एक वियर का निर्माण कर इसके दाहिने तट से आगरा नहर प्रणाली का निर्माण वर्ष 1874 में किया गया था। आगरा नहर से अधिकतम निस्सरण 30.8 घन मीटर प्रति सेकेंड प्राप्त होता है। गंगा-यमुना जल विभाजक के कुछ भागों को सिंचित करने के पश्चात यह नहर अंततः आगरा में पुनः यमुना नदी में समाहित हो जाती है।

यमुना नदी में जल प्रदूषण : जनसंख्या वृद्धि और तीव्र औद्योगीकरण के कारण, वर्तमान में यमुना नदी विश्व की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक बन गई है। जिसका मुख्य कारण भारत की राजधानी नई दिल्ली में उत्पन्न कचरे का लगभग 58% यमुना नदी में डाला जाना है, जिसके कारण यह नदी विशेष रूप से दिल्ली के अनुप्रवाह क्षेत्र में अत्यधिक प्रदूषित है। वर्ष 2016 के एक अध्ययन से पता चलता है कि दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) से गुज़रने के दौरान यमुना नदी का सबसे अधिक प्रदूषण वज़ीराबाद से होता है, जहाँ से यमुना दिल्ली में प्रवेश करती है। वजीराबाद वैराज से न्यू ओखला वैराज खंड, (दिल्ली में यमुना का 22 किलोमीटर भाग जो यमुना की कुल लंबाई का 2% से भी कम है), में इस भाग से नदी में कुल प्रदूषण का लगभग 80% भाग प्राप्त होता है। दिल्ली में स्थापित 35 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट में से 22 दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण समिति द्वारा निर्धारित अपशिष्ट जल मानकों को पूरा नहीं करते हैं, इस प्रकार अनुपचारित अपशिष्ट जल और अपशिष्ट जल उपचार संयंत्रों से निकलने वाले जल की खराब गुणवत्ता यमुना नदी में प्रदूषण के प्रमुख कारण हैं। वर्ष 2019 के आंकड़ों के अनुसार, नदी में प्रतिदिन 800 मिलियन लीटर अनुपचारित सीवेज और 44 मिलियन लीटर औद्योगिक अपशिष्ट प्राप्त होते हैं, जिनमें से नदी में छोड़े गए सीवेज का केवल 35 प्रतिशत ही उपचारित माना जाता है।

यमुना जल विवाद : जैसा कि उपरोक्त खंडों में वर्णित किया गया है, यमुना के जल का उपयोग पांच राज्यों हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं दिल्ली द्वारा किया जाता है। यद्यपि यमुना जल के बंटवारे के लिए 12 मई 1994 को पांचों राज्यों के बीच जल बंटवारे के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए थे। परन्तु इन राज्यों के मध्य विशेष रूप से दिल्ली के साथ जल विवाद बना रहता है। इसका प्रमुख कारण यमुना नदी पर कोई प्रमुख जल संचयन परियोजना का न होना है, जिसके परिणामस्वरूप जहां एक ओर मानसून ऋतु में यमुना से प्राप्त अतिरिक्त जल के कारण दिल्ली और अनुप्रवाह के क्षेत्रों के जन मानस को भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ता है वहीं दूसरी ओर शुष्क मौसम में इन राज्यों के निवासियों, विशेषतः दिल्लीवासियों को जल की कमी का सामना करना पड़ता है। जिसके कारण इसके उपयोगकर्ता राज्यों के मध्य जल विवाद उत्पन्न होता है। अतः इस समस्या का अपेक्षित समाधान किया जाना आवश्यक है।

 

 

kesar@indiawaterportal.org

(https://hindi.indiawaterportal.org/pollution-and-water-quality)

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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