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ओडिशा सरकार ने विधायक व मंत्रियों के वेतन वृद्धि बिल वापस लिए

Odisha government withdraws bills to increase salaries of MLAs and ministers

भुवनेश्वर, 27 मार्च: ओडिशा सरकार ने विधायकों, मंत्रियों तथा अन्य संवैधानिक पदाधिकारियों के वेतन और भत्तों में भारी बढ़ोतरी से जुड़े चार विवादास्पद विधेयकों को व्यापक जन-विरोध के बाद वापस लेने का निर्णय लिया है। संसदीय कार्य मंत्री मुकेश महालिंग द्वारा विधेयकों को वापस लेने की सूचना दिए जाने के बाद विधानसभा सचिव सत्यव्रत राउत ने 26 मार्च को इस संबंध में सदस्यों को आधिकारिक जानकारी दी। वापस लिए गए विधेयकों में ओडिशा विधानसभा सदस्यों, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष तथा राज्य मंत्रियों के वेतन, भत्तों और पेंशन से जुड़े संशोधन विधेयक शामिल हैं। ये सभी विधेयक दिसंबर 2025 में पारित किए गए थे।

वेतन में भारी बढ़ोतरी का प्रस्ताव

इन संशोधनों के तहत विधायकों के मासिक वेतन को लगभग ₹1.11 लाख से बढ़ाकर ₹3.45 लाख करने का प्रस्ताव था, जो 200 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि थी। 

प्रस्तावित वेतन संरचना के अनुसार:
मुख्यमंत्री: ₹3.74 लाख प्रति माह
उपमुख्यमंत्री: ₹3.68 लाख प्रति माह, कैबिनेट मंत्री: ₹3.62 लाख प्रति माह, राज्य मंत्री: ₹3.56 लाख प्रति माह, विधानसभा अध्यक्ष: ₹3.68 लाख प्रति माह, उपाध्यक्ष: ₹3.56 लाख प्रति माह, विपक्ष के नेता व मुख्य सचेतक: ₹3.62 लाख प्रति माह।

विधानसभा में लगभग 211 प्रतिशत वेतन वृद्धि के प्रस्ताव के समय केवल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक लक्ष्मण मुंडा ने इसका विरोध किया था। बाद में बीजद अध्यक्ष एवं विपक्ष के नेता नवीन पटनायक  ने  मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को पत्र लिखकर घोषणा की थी कि वे अपने पद के लिए प्रस्तावित बढ़े हुए वेतन और भत्तों का लाभ नहीं लेंगे। भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने भी इतनी बड़ी वृद्धि को लेकर अपना असंतोष व्यक्त किया था।

सरकार के इस कदम ने राज्य की राजनीति में इस मुद्दे को प्रमुख मुद्दा बना दिया। इस बड़ी वेतन वृद्धि के समय व आवश्यकता को लेकर व्यापक बहस छिड़ गई। जनता में इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। जिसने विपक्षी दलों को इससे किनारा करने पर विवश कर दिया।  

इसके बाद सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष के विधायकों ने भी मुख्यमंत्री से वेतन वृद्धि के फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की। राज्य सरकार ने पहले इस वेतन वृद्धि का बचाव करते हुए कहा था कि पिछले आठ वर्षों से वेतन में कोई संशोधन नहीं हुआ था और महंगाई को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक था। हालांकि, बढ़ते जनदबाव के चलते सरकार को अंततः यह निर्णय वापस लेना पड़ा।

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