भारत के अहम पड़ोसी देश नेपाल में हाल ही में हुए चुनावों के परिणामों ने वहाँ की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव ला दिया है। व्यापक युवा आंदोलनों और राजनीतिक असंतोष के बाद हुए इन चुनावों में बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने बड़ी सफलता हासिल की है। काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर बालेन शाह का देश का सबसे युवा प्रधानमंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा है। यह भी उल्लेखनीय है कि नेपाल के इतिहास में पहली बार किसी राजनीतिक दल को स्पष्ट बहुमत प्राप्त हुआ है, जिससे देश में स्थिर सरकार और विकास की नई उम्मीदें जगी हैं।
पिछले लगभग दो दशकों से नेपाल राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था। लगातार बदलती सरकारों, गठबंधन की राजनीति और दलों के बीच अनैतिक समझौतों के कारण शासन व्यवस्था कमजोर हो गई थी। परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार बढ़ता गया और जनता का पारंपरिक राजनीतिक दलों से विश्वास उठने लगा। इस बार के चुनाव परिणामों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चाहे देश कोई भी हो, जनता राजनीतिक अस्थिरता, परिवारवाद और सत्ता के लिए बार-बार होने वाले समझौतों को पसंद नहीं करती। जैसे ही उसे अवसर मिलता है, वह पुराने दलों को हटाकर नए विकल्प को चुन लेती है, भले ही वह विकल्प अपेक्षाकृत अनुभवहीन क्यों ना हो।
इन चुनावों में नेपाल की राजनीति के दो प्रमुख नेताओं—केपी शर्मा ओली और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’—की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को भी जनता ने नकार दिया। वामपंथी दलों ने गठबंधन बनाकर अपनी स्थिति बचाने की कोशिश की थी, लेकिन मतदाताओं ने उन्हें भी सख्ती से नकारते हुए सत्ता से बाहर कर दिया। इससे यह संकेत मिलता है कि नेपाल की जनता अब नई राजनीतिक दिशा चाहती है।
नेपाल की संसद, जिसे प्रतिनिधि सभा कहा जाता है, में कुल 275 सदस्य होते हैं। इनमें से 164 सदस्य प्रत्यक्ष मतदान से चुने जाते हैं। इस चुनाव में बालेन शाह के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी ने 120 सीटों पर जीत दर्ज कर सबसे बड़ी पार्टी बनने का गौरव प्राप्त किया। वहीं दशकों तक सत्ता में रही नेपाली कांग्रेस को भारी जनाक्रोश का सामना करना पड़ा और वह केवल 17 सीटों तक सिमट कर रह गई। इसी तरह कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी भी मात्र सात–सात सीटों पर सिमट गईं। इस चुनाव में लगभग 60 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया और ऐतिहासिक सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया।
बालेन शाह का राजनीतिक उदय भी अपने आप में एक रोचक कहानी है। रैपर से काठमांडू के मेयर बने बालेन शाह मधेशी समाज से आते हैं और अब पहली बार देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। लगभग दस वर्ष पहले तक किसी मधेशी नेता का नेपाल का प्रधानमंत्री बनना अकल्पनीय माना जाता था। मधेशी समुदाय मुख्यतः नेपाल के तराई या मधेश क्षेत्र में रहता है, जो भारत की सीमा से सटा हुआ है। इस समुदाय की भाषा, संस्कृति और जीवन शैली भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों से काफी मिलती-जुलती है। मैथिली, भोजपुरी, अवधी और हिंदी जैसी भाषाएँ यहाँ व्यापक रूप से बोली जाती हैं। लंबे समय तक मधेशी समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ा, जिसके कारण कई बार अलग मधेश राज्य की मांग को लेकर आंदोलन भी हुए।

बालेन शाह ने चुनाव प्रचार के दौरान स्वयं को “मधेश का बेटा” बताया और उनकी पार्टी ने “अबकी बार बालेन सरकार” जैसे नारों के साथ अभियान चलाया। मधेश प्रांत के आठ जिलों की कुल 32 सीटों में से अधिकांश पर उनकी पार्टी को बड़ी सफलता मिली, जिसने उनके प्रधानमंत्री बनने का मार्ग लगभग साफ कर दिया। हालाँकि, बालेन शाह के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। युवाओं के व्यापक समर्थन से सत्ता में आने वाले बालेन के सामने सबसे बड़ी समस्या रोजगार, पलायन और भ्रष्टाचार की है। नेपाल में बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में विदेश जाने को मजबूर हैं। स्वाभाविक रूप से जनता अब इन समस्याओं के समाधान की उम्मीद नई सरकार से करेगी।
विदेश नीति के मोर्चे पर भी नई सरकार के सामने संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती होगी। नेपाल को अपने दो बड़े पड़ोसियों—भारत और चीन—के बीच संतुलित संबंध बनाए रखने होंगे। बालेन शाह कई बार भारत को लेकर विवादों में भी रहे हैं। एक बार उन्होंने अपने कार्यालय में “ग्रेटर नेपाल” का नक्शा लगा लिया था, जिसमें भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल का भाग दिखाया गया था। विवाद बढ़ने पर उन्हें वह नक्शा हटाना पड़ा था।
इसके अलावा उन्होंने आदिपुरुष फिल्म को लेकर भी कड़ी आपत्ति जताई थी और यहां तक कहा था कि जब तक उनकी आपत्ति दूर नहीं होगी, तब तक काठमांडू में भारतीय फिल्मों के प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसी तरह उन्होंने भारत, अमेरिका और चीन के खिलाफ एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट भी लिखी थी, जिसे बाद में उन्हें हटाना पड़ा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बालेन शाह के लिए भारत से खुला टकराव करना आसान नहीं होगा। नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने “रोटी-बेटी” के संबंध हैं, जो सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर दोनों देशों को जोड़ते हैं। नेपाल में जिन नेताओं ने भारत के साथ अत्यधिक टकराव की नीति अपनाने की कोशिश की, वे अंततः राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ गए।
इसी बीच आईएसआई जैसी बाहरी एजेंसियों की गतिविधियों पर भी भारत की नजर बनी हुई है, क्योंकि नेपाल की राजनीति को प्रभावित करने के प्रयास समय-समय पर सामने आते रहे हैं।
इन सभी चुनौतियों के बावजूद नेपाल में दशकों बाद स्पष्ट बहुमत की सरकार बनने से एक नई उम्मीद पैदा हुई है। इससे यह संभावना बढ़ गई है कि अब देश में राजनीतिक स्थिरता आएगी और विकास की गति तेज होगी। बालेन शाह के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी नेपाल का पुनर्निर्माण करने और युवाओं के सपनों को साकार करने की है। इसके लिए उन्हें देश के सभी वर्गों को साथ लेकर चलना होगा और पड़ोसी देशों के साथ संतुलित और व्यावहारिक नीति अपनानी होगी। तभी नेपाल की जनता द्वारा जताए गए विश्वास पर वे खरे उतर सकेंगे।
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