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नेपाल आपदा : हिमालयी पारिस्थितिकी और इंसानी भूल का पाठ

Nepal Disaster: Lessons on Himalayan Ecology and Human Error

डॉ दीपक कोहली


नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी आकस्मिक बाढ़ और भयानक भूस्खलन ने एक बार फिर पूरे दक्षिण एशिया को झकझोर कर रख दिया है। मानसून के आगमन के साथ ही हिमालय की गोद में बसी यह शांत और सुंदर भूमि जिस तरह से प्राकृतिक तबाही का केंद्र बनी है, वह केवल एक भौगोलिक दुर्घटना नहीं बल्कि प्रकृति के बढ़ते रोष और इंसानी बेपरवाही का एक भयावह प्रतीक है। उफनती नदियाँ, जलमग्न शहर, ताश के पत्तों की तरह बहते पक्के पुल और मलबे के नीचे दबे गाँव के गाँव, ये केवल नेपाल की आपदा के दृश्य नहीं हैं, बल्कि यह पूरे क्षेत्र के लिए एक ऐसी चेतावनी है जिसे अब और नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित होगा। इस जल-आपदा ने केवल नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों और काठमांडू घाटी में तबाही नहीं मचाई है, बल्कि इसका सीधा और जानलेवा प्रभाव सीमा पार भारत के मैदानी इलाकों, विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार पर भी पड़ा है।

 जब भी नेपाल के पहाड़ों में बादल फटते हैं या मूसलाधार बारिश होती है, तो उसका सीधा असर निचले इलाकों पर पड़ता है जहाँ नदियाँ अपना उग्र रूप दिखाकर लाखों जिंदगियों को अस्त-व्यस्त कर देती हैं।

वैज्ञानिक और भूगर्भीय दृष्टि से देखा जाए तो नेपाल और उसके आसपास का पूरा हिमालयी क्षेत्र पृथ्वी की सबसे युवा वलित पर्वत श्रृंखला का हिस्सा है। इसका निर्माण लगभग पाँच करोड़ वर्ष पूर्व भारतीय टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेट के आपस में टकराने से हुआ था। आज भी भारतीय प्लेट उत्तर की ओर प्रतिवर्ष लगभग पाँच सेंटीमीटर की दर से खिसक रही है, जिसके कारण पूरा हिमालयी क्षेत्र निरंतर आंतरिक भूगर्भीय दबाव और तनाव में रहता है। भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से नेपाल का भौगोलिक ढाँचा मुख्यतः पाँच प्रमुख पैरेलल ज़ोन में विभाजित है, जिसमें तराई का जलोढ़ मैदान, चूरिया या शिवालिक की कमज़ोर अवसादी चट्टानें, लघु हिमालय की ढलानदार और जटिल शैल संरचनाएँ, महान हिमालय के ग्लेशियर और टेथिस हिमालय की शुष्क चट्टानें शामिल हैं। इन पर्वत श्रेणियों को जोड़ने वाली प्रमुख भ्रंश रेखाएँ जैसे मेन फ्रंटल थ्रस्ट, मेन बाउंड्री थ्रस्ट और मेन सेंट्रल थ्रस्ट पूरे नेपाल में सक्रिय हैं। इन भ्रंश रेखाओं की मौजूदगी के कारण यहाँ की मिट्टी, बलुआ पत्थर, शेल और अवसादी चट्टानें स्वाभाविक रूप से बहुत कमज़ोर, अत्यधिक दरारयुक्त और संवेदी हैं।

जब बहुत कम समय में एक सीमित क्षेत्र में अत्यधिक बारिश होती है, जिसे तकनीकी भाषा में अतिवृष्टि या मेसोस्केल कन्वेक्टिव सिस्टम कहा जाता है, तो पहाड़ों का प्राकृतिक संतुलन पूरी तरह बिगड़ जाता है। अत्यधिक पानी मिट्टी की परतों के भीतर गहराई तक रिसकर उसमें जल-दबाव को बढ़ा देता है। यह अतिरिक्त दबाव मिट्टी और चट्टानों की आंतरिक पकड़ को खत्म कर देता है, जिससे पहाड़ों की ढलाने खिसकने लगती हैं। नदियाँ अपने साथ भारी मात्रा में मिट्टी, विशाल पत्थर, बोल्डर और पेड़-पौधों को बहाकर प्रचंड वेग से नीचे की ओर लाती हैं। इसे ही हम फ्लैश फ्लड या आकस्मिक बाढ़ कहते हैं। इस प्रकार की बाढ़ की सबसे खतरनाक बात यह होती है कि इसका जलस्तर इतनी तेज़ी से बढ़ता है कि यह संभलने या चेतावनी देने का अवसर ही नहीं देती। कुछ ही मिनटों में शांत बहने वाली पहाड़ी नदियाँ विकराल रूप धारण कर लेती हैं और अपने मार्ग में आने वाली हर चीज़ को निगल जाती हैं। जलविद्युत परियोजनाएँ हों, राष्ट्रीय राजमार्ग हों या घनी आबादी वाले रिहाइशी इलाके, कोई भी इस प्रचंड वेग के आगे टिक नहीं पाता।

हालांकि, इस त्रासदी के लिए केवल वर्षा की मात्रा या प्रकृति के मिजाज को जिम्मेदार ठहराना समस्या की गहराई से मुँह मोड़ना होगा। इसके पीछे अनियोजित विकास, पहाड़ों का अविवेकपूर्ण दोहन और जलवायु परिवर्तन जैसे इंसानी कारण गहराई से जुड़े हुए हैं। पिछले कुछ दशकों में नेपाल के पहाड़ी क्षेत्रों और काठमांडू घाटी में जिस तरह से अनियंत्रित और बेतरतीब निर्माण कार्य हुआ है, उसने प्राकृतिक जल निकासी की व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है। नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों और बाढ़ के मैदानों में बहुमंजिला इमारतों, सड़कों और व्यावसायिक परिसरों का निर्माण कर लिया गया। जब नदियों के पास बहने के लिए स्वाभाविक जगह ही नहीं बची, तो पानी ने आबादी वाले इलाकों का रुख किया। इसके साथ ही, सड़कों के संजाल को फैलाने और रन-ऑफ-द-रिवर जलविद्युत परियोजनाओं को खड़ा करने के नाम पर पहाड़ों की अंधाधुंध कटाई की गई। भारी डायनामाइट विस्फोटों ने संवेदनशील ढलानों की आंतरिक दरारों को और चौड़ा कर दिया है, जिससे वे मामूली बारिश में भी खिसकने लगती हैं। ढलानों से जंगलों की कटाई ने मृदा अपरदन की दर को कई गुना बढ़ा दिया है, जिससे पेड़ों की जड़ें जो मिट्टी को बांधकर रखती थीं, उनके गायब होने से बारिश का पानी सीधे सतह पर प्रचंड वेग से बहने लगता है।

इसके ऊपर वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तन का असर अब अत्यंत प्रत्यक्ष और घातक रूप में सामने आ रहा है। अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में अधिक तेज़ी से गर्म हो रहा है। तापमान में लगातार वृद्धि के कारण मानसून का चक्र पूरी तरह से अनिश्चित हो चुका है। अब बारिश का फैलाव पूरे मौसम में समान रूप से होने के बजाय कुछ ही दिनों या घंटों की अतिवृष्टि में सिमट गया है। जब अत्यधिक मात्रा में पानी एक साथ गिरता है, तो जमीन उसे सोखने में असमर्थ हो जाती है और वह सतह पर प्रचंड बाढ़ का रूप ले लेता है। इसके साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण नई ग्लेशियल झीलों का निर्माण हो रहा है और पुरानी झीलों का आकार खतरनाक रूप से बढ़ रहा है। नेपाल में इम्जा, चो रोल्पा और थुलागी जैसी सैकड़ों ग्लेशियल झीलें हैं जो अत्यंत संवेदनशील स्थिति में हैं। जब इन झीलों के प्राकृतिक मोराइन बाँध भूकंप या अत्यधिक जल-दबाव के कारण टूटते हैं, तो ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड की स्थिति पैदा होती है। इसके तहत लाखों क्यूसेक पानी और मलबा कुछ ही मिनटों में नीचे घाटी की ओर बहता है, जिसकी विनाशकारी क्षमता सामान्य बाढ़ से कई गुना अधिक होती है।

नेपाल और भारत का जल-संबंध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं है, यह एक साझी भौगोलिक, जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक वास्तविकता है। नेपाल की प्रमुख नदियाँ—कोसी, गण्डक, घाघरा और बागमती—अंततः भारत के मैदानी इलाकों में ही प्रवेश करती हैं। गंगीय मैदानी क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा नेपाल से आने वाले जल प्रवाह पर निर्भर है। नेपाल के पहाड़ों में होने वाली हर एक बूँद बारिश भारत के उत्तर प्रदेश के गोरखपुर, देवरिया, लखीमपुर खीरी, बहराइच, श्रावस्ती और बिहार के सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, मधुबनी, चंपारण जैसे जिलों के लिए जल-स्तर के बढ़ने का संकेत होती है। जब नेपाल के पहाड़ों में पानी का दबाव सीमा से बाहर हो जाता है और वहाँ बने भीमनगर या वाल्मीकिनगर बैराजों के फाटक खोले जाते हैं, तो भारत के निचले इलाकों में रातों-रात तबाही फैल जाती है। गाँव के गाँव जलमग्न हो जाते हैं, हजारों हेक्टेयर उपजाऊ फसलें गाद और पानी के नीचे दबकर नष्ट हो जाती हैं और लाखों लोग बेघर होकर सड़कों और बाँधों पर शरण लेने के लिए मजबूर हो जाते हैं। यह कोई नई बात नहीं है; हर साल मानसून के समय यह दुखद चक्र दोहराया जाता है, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक वैज्ञानिक व कूटनीतिक समाधान की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सका है।

अब समय आ गया है कि नेपाल की इस त्रासदी को केवल एक पड़ोसी देश की आपदा के रूप में न देखकर एक संयुक्त सामरिक, वैज्ञानिक और मानवीय चुनौती के रूप में देखा जाए। पारंपरिक रूप से हमारा ध्यान केवल आपदा के बाद राहत और बचाव कार्य तक सीमित रहता है। जब पानी उतर जाता है, तो राहत सामग्रियां बाँट दी जाती हैं, मुआवजा घोषित कर दिया जाता है और फिर अगले साल का इंतजार किया जाता है। इस प्रतिक्रियात्मक रवैये को बदलकर आपदा जोखिम न्यूनीकरण की दिशा में काम करना होगा।

सबसे पहली और महत्वपूर्ण आवश्यकता एक प्रभावी, आधुनिक और रियल-टाइम पूर्व-चेतावनी प्रणाली को विकसित करने की है। नेपाल के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में स्थापित मौसम वैज्ञानिक उपकरणों, स्वचालित वेदर स्टेशनों और जल-स्तर मापन केंद्रों का डेटा तुरंत भारत के बाढ़ नियंत्रण कक्षों के साथ साझा किया जाना चाहिए। यदि निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को बाढ़ आने से 6 से 8 घंटे पहले भी सटीक सूचना मिल जाए, तो जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम भारत और नेपाल के बीच जल प्रबंधन को लेकर दशकों पुराने समझौतों और ठप्प पड़ी वार्ताओं को पुनर्जीवित करना है। कोसी और गण्डक परियोजनाओं पर नए सिरे से ध्यान देने की आवश्यकता है। केवल बुनियादी ढाँचा खड़ा करना ही काफी नहीं है, बल्कि उस ढाँचे का नियमित रखरखाव, नदियों से गाद निकालने की निरंतर प्रक्रिया और जल भंडारण क्षमता में वृद्धि के लिए आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल जरूरी है। संयुक्त उच्च बाँध परियोजनाओं पर अटकी बातचीत को कूटनीतिक इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ाना होगा, ताकि मानसून के अतिरिक्त पानी को नियंत्रित तरीके से जमा किया जा सके और उसका उपयोग शुष्क मौसम में सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए किया जा सके।

इसके अतिरिक्त, पूरे हिमालयी क्षेत्र में विकास की अवधारणा को फिर से परिभाषित करने की सख्त जरूरत है। पहाड़ों में बुनियादी ढाँचे का विकास पारिस्थितिकी की कीमत पर नहीं होना चाहिए। ढलानों के स्थिरीकरण के लिए वृक्षारोपण, बायो-इंजीनियरिंग और कड़े निर्माण नियमों को लागू करना अनिवार्य है। सड़कों के निर्माण में भारी विस्फोटकों के बजाय हरित निर्माण तकनीकों का प्रयोग होना चाहिए। नदियों के तटवर्ती क्षेत्रों में अतिक्रमण को सख्ती से रोकते हुए नो-कंस्ट्रक्शन ज़ोन घोषित किया जाना चाहिए। जब तक पहाड़ों की हरियाली और उसकी मिट्टी की पकड़ मजबूत नहीं होगी, तब तक भूस्खलन और मलबे के साथ आने वाली बाढ़ को नहीं रोका जा सकता।

ग्लेशियर झीलों के खतरे से निपटने के लिए आधुनिक उपग्रह निगरानी प्रणालियों का उपयोग करके नियमित मैपिंग की जानी चाहिए और खतरनाक झीलों से साइफनिंग तकनीक द्वारा पानी को नियंत्रित रूप से बाहर निकालकर उनके जलस्तर को सुरक्षित सीमा में रखा जाना चाहिए। इसके साथ ही, सीमावर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण देना और उन्हें पूर्व-चेतावनी नेटवर्क से जोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

नेपाल में आई यह फ्लैश फ्लड वास्तव में प्रकृति का एक स्पष्ट, कड़ा और वैज्ञानिक संदेश है। यह संदेश है कि हम अपनी नदियों के प्राकृतिक प्रवाह को रोककर, अपने पहाड़ों को छिन्न-भिन्न करके और जलवायु संतुलन को बिगाड़ कर सुरक्षित नहीं रह सकते। हिमालय केवल एक सीमा रेखा या खूबसूरत पर्यटन स्थल नहीं है, यह पूरे दक्षिण एशिया का जल बैंक और पर्यावरण का सुरक्षा कवच है। इस कवच की सुरक्षा करना दोनों देशों के साझा अस्तित्व का विषय है। अब कागजी वार्ताओं, खोखले दावों और आपातकालीन राहत शिविरों से आगे बढ़कर एक दूरदर्शी, टिकाऊ और एकीकृत जल-आपदा प्रबंधन रणनीति को धरातल पर उतारना ही एकमात्र विकल्प बचा है, ताकि हर साल बारिश की पहली बूँद के साथ ही जिंदगियों के बह जाने का यह दुखद सिलसिला हमेशा के लिए थम सके। जब तक विज्ञान, नीति-निर्माण और पर्यावरणीय संवेदनशीलता का सही समन्वय नहीं होगा, तब तक हम इस प्राकृतिक और मानवजनित आपदा के भंवर से बाहर नहीं निकल पाएंगे।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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