
नीलाभ कृष्ण
भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। पिछले कई दशकों से यह बहस लगातार चलती रही है कि विदेशी स्रोतों से आने वाला धन केवल सामाजिक सेवा और जनकल्याण के लिए उपयोग होता है या फिर उसके माध्यम से देश की राजनीति, सामाजिक विमर्श और वैचारिक दिशा को भी प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है। यही कारण है कि जब भी केंद्र सरकार ने विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाले कानून Foreign Contribution (Regulation) Act (FCRA) में कोई बड़ा बदलाव किया है, तो देश में तीखी राजनीतिक बहस छिड़ गई है। मोदी सरकार द्वारा हाल ही में अधिसूचित किए गए नए संशोधन भी इसी बहस का नया अध्याय हैं।
सरकार का दावा है कि इन संशोधनों का उद्देश्य किसी संस्था की वैध सामाजिक या धार्मिक गतिविधियों पर रोक लगाना नहीं, बल्कि विदेशी धन के स्रोत, उसके वास्तविक उपयोग और उससे जुड़े व्यक्तियों की जवाबदेही को और अधिक पारदर्शी बनाना है। दूसरी ओर कांग्रेस और कई नागरिक समाज संगठन इन बदलावों को अत्यधिक नियंत्रणकारी बताते हुए आशंका जता रहे हैं कि इससे स्वैच्छिक संस्थाओं के कामकाज पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा। यही विरोधाभास आज FCRA को केवल एक प्रशासनिक कानून नहीं, बल्कि भारत की राजनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा बना चुका है।
हालिया संशोधनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। सबसे अधिक चर्चा उस प्रावधान की हो रही है जिसके तहत विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठन अब "धार्मिक शिक्षा", "धार्मिक परंपराओं का संरक्षण" अथवा "स्थानीय आस्थाओं के संरक्षण" जैसी व्यापक श्रेणियों का उपयोग धर्म परिवर्तन से संबंधित गतिविधियों के लिए नहीं कर सकेंगे। सरकार ने नियमों में स्पष्ट रूप से यह जोड़ दिया है कि इन श्रेणियों का उपयोग proselytisation, अर्थात धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से की जाने वाली गतिविधियों के लिए नहीं किया जा सकता। सरकार का तर्क है कि धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मांतरण से जुड़ी गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए तथा विदेशी धन के माध्यम से होने वाली ऐसी गतिविधियों पर अधिक निगरानी आवश्यक है।
इसी प्रकार सरकार ने विदेशी नागरिकों के किसी संगठन में प्रमुख पदाधिकारी बनने के नियमों को भी और सख्त किया है। अब ऐसे संगठनों के संचालन और निर्णय लेने वाले व्यक्तियों की पृष्ठभूमि पर अधिक बारीकी से नजर रखी जाएगी। इसके अतिरिक्त विदेशी धन के अंतिम स्रोत अर्थात Ultimate Donor की जानकारी देना भी अनिवार्य किया गया है। पहले कई मामलों में धन विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं या मध्यस्थ संगठनों के माध्यम से भारत पहुंचता था, जिससे वास्तविक दानदाता की पहचान करना कठिन हो जाता था। नए नियम इस अस्पष्टता को समाप्त करने का प्रयास करते हैं।
इसके साथ ही सरकार ने फील्ड वेरिफिकेशन, सोशल मीडिया की जांच और निष्क्रिय (Dormant) संगठनों के लाइसेंस रद्द करने जैसे प्रावधान भी जोड़े हैं। अब केवल कागजी दस्तावेज पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि यह भी देखा जाएगा कि जिस उद्देश्य के लिए विदेशी धन लिया गया है, उसका वास्तविक उपयोग उसी दिशा में हो रहा है या नहीं। सरकार का मानना है कि पारदर्शिता केवल बैंक खाते तक सीमित नहीं रह सकती; धन का वास्तविक उपयोग भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
दरअसल, मोदी सरकार का यह कदम किसी एक रात में लिया गया निर्णय नहीं है। वर्ष 2014 के बाद से केंद्र सरकार लगातार FCRA व्यवस्था को अधिक कठोर और पारदर्शी बनाने की दिशा में काम करती रही है। हजारों संगठनों के लाइसेंस रद्द किए गए, अनेक संस्थाओं के खातों की जांच हुई और कई अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठनों को भी नियमों के पालन को लेकर सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ा। सरकार का कहना है कि यह कार्रवाई किसी विचारधारा के विरुद्ध नहीं थी, बल्कि केवल कानून के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए की गई।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण की अवधारणा मोदी सरकार की देन नहीं है। भारत में FCRA कानून पहली बार वर्ष 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान लागू किया गया था। उस समय भी सरकार की चिंता यही थी कि विदेशी शक्तियां आर्थिक सहायता के माध्यम से भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन को प्रभावित करने का प्रयास कर सकती हैं। इसलिए राजनीतिक दलों, जनप्रतिनिधियों, पत्रकारों और कुछ अन्य वर्गों के लिए विदेशी चंदा प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगाया गया। बाद में वर्ष 2010 में इस कानून को नए स्वरूप में लागू किया गया, लेकिन इसका मूल उद्देश्य वही रहा—विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करना और उसकी निगरानी सुनिश्चित करना।
समय के साथ भारत में गैर-सरकारी संगठनों की भूमिका भी काफी बढ़ी। शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण विकास, पर्यावरण संरक्षण और आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में हजारों संस्थाओं ने उल्लेखनीय कार्य किया। देश के कई ऐसे हिस्सों में, जहां सरकारी व्यवस्था पूरी तरह प्रभावी नहीं थी, इन संगठनों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन कुछ मामलों में सामाजिक सेवा और वैचारिक या राजनीतिक गतिविधियों के बीच की रेखा धुंधली होती गई। कुछ संगठनों ने विदेशी धन का उपयोग केवल कल्याणकारी गतिविधियों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि नीतिगत मुद्दों, बड़े विकास परियोजनाओं, राजनीतिक आंदोलनों और धार्मिक गतिविधियों को प्रभावित करने के लिए भी किया। इन आरोपों से संबंधित अनेक मामलों में संबंधित संगठनों ने इन दावों का खंडन किया है और कहा है कि उनका कार्य पूरी तरह वैधानिक तथा सार्वजनिक हित में है। यही वह क्षेत्र है जहां सबसे अधिक राजनीतिक विवाद उत्पन्न होता है।

मोदी सरकार का दृष्टिकोण यह है कि इक्कीसवीं सदी में राष्ट्रीय सुरक्षा का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं रह गया है। आज सूचना, डिजिटल नेटवर्क, वित्तीय संसाधन, वैचारिक अभियान और अंतरराष्ट्रीय संस्थागत नेटवर्क भी किसी देश की आंतरिक स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग की निगरानी भी राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक ढांचे का हिस्सा बन चुकी है। सरकार के अनुसार यदि विदेश से धन आ रहा है तो उसके साथ जवाबदेही और पारदर्शिता भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए।
इसी सोच के कारण मोदी सरकार इन संशोधनों को केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में एक आवश्यक सुधार मानती है। सरकार का तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र में विदेशी धन का स्वागत तभी किया जा सकता है, जब उसके पीछे की मंशा, स्रोत और उपयोग पूरी तरह स्पष्ट हों। सरकार का कहना है कि सामाजिक सेवा करने वाले संगठनों को इन नियमों से घबराने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, क्योंकि यदि उनका कार्य कानून के अनुरूप है तो अतिरिक्त पारदर्शिता उनके लिए समस्या नहीं बननी चाहिए।
यहीं से यह मुद्दा केवल कानून का नहीं, बल्कि राजनीति का विषय बन जाता है। सरकार के समर्थक इन संशोधनों को भारत की संप्रभुता और आत्मनिर्भर नीति निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताते हैं, जबकि विपक्ष इसे नागरिक समाज पर बढ़ते सरकारी नियंत्रण के रूप में देखता है। यही वैचारिक टकराव FCRA संशोधनों को देश के सबसे चर्चित राजनीतिक मुद्दों में शामिल कर चुका है।
यहीं से यह बहस और गहरी हो जाती है कि आखिर विदेशी फंडिंग को केवल आर्थिक सहायता के रूप में देखा जाए या फिर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक प्रभाव के व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझा जाए। मोदी सरकार का उत्तर स्पष्ट है। सरकार का मानना है कि आज की दुनिया में युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं लड़े जाते, बल्कि विचारों, सूचनाओं, डिजिटल माध्यमों, विश्वविद्यालयों, थिंक टैंकों, गैर-सरकारी संगठनों और वित्तीय नेटवर्कों के जरिए भी देशों के भीतर प्रभाव स्थापित करने की कोशिश की जाती है। ऐसे में विदेशी धन केवल आर्थिक संसाधन नहीं रह जाता, बल्कि वह प्रभाव स्थापित करने का माध्यम भी बन सकता है। इसी सोच ने FCRA को मोदी सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना दिया है।
सरकार का तर्क है कि भारत आज विश्व की सबसे तेजी से उभरती हुई आर्थिक और सामरिक शक्तियों में शामिल है। स्वाभाविक रूप से दुनिया के अनेक देशों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं, धार्मिक संगठनों और वैश्विक लॉबिंग समूहों की रुचि भारत की नीतियों और सामाजिक दिशा में बढ़ी है। ऐसी स्थिति में यदि विदेशी स्रोतों से आने वाले धन पर पर्याप्त निगरानी नहीं रखी जाती, तो उसके माध्यम से देश की सार्वजनिक बहस, नीतिगत निर्णयों और सामाजिक वातावरण को प्रभावित करने का जोखिम उत्पन्न हो सकता है। यही कारण है कि सरकार विदेशी फंडिंग को केवल वित्तीय विषय नहीं, बल्कि रणनीतिक विषय के रूप में देखती है।
धर्म परिवर्तन से जुड़े प्रावधानों को लेकर सबसे अधिक विवाद भी इसी कारण पैदा हुआ है। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है, लेकिन विदेशी धन के माध्यम से चलने वाली धर्मांतरण संबंधी गतिविधियों पर निगरानी रखना भी राज्य की जिम्मेदारी है। कई राज्यों में पहले से ही धर्म परिवर्तन संबंधी कानून लागू हैं, जिनका उद्देश्य कथित रूप से बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्मांतरण को रोकना बताया गया है। FCRA के नए नियम इसी व्यापक कानूनी ढांचे के अनुरूप विदेशी धन के उपयोग को अधिक स्पष्ट और पारदर्शी बनाते हैं।
हालांकि इस विषय पर मतभेद भी कम नहीं हैं। अनेक चर्च-संबद्ध संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवीय सेवा के क्षेत्र में कार्य करने वाली अनेक संस्थाएं धार्मिक मूल्यों से प्रेरित होती हैं, इसलिए उन्हें संदेह की दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। सरकार इस आशंका को स्वीकार नहीं करती। उसका कहना है कि नियम किसी धर्म या संस्था के विरुद्ध नहीं हैं; वे केवल यह सुनिश्चित करते हैं कि विदेशी धन का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए हो, जिसके लिए उसे अनुमति दी गई है।
इसी प्रकार Ultimate Donor की जानकारी अनिवार्य किए जाने को भी सरकार एक महत्वपूर्ण सुधार मानती है। पहले कई मामलों में विदेशी धन कई मध्यस्थ संस्थाओं के माध्यम से भारत तक पहुंचता था। इससे यह जानना कठिन हो जाता था कि मूल दानदाता कौन है और उसके उद्देश्य क्या हैं। अब सरकार चाहती है कि पूरी वित्तीय श्रृंखला पारदर्शी हो। उसका तर्क है कि यदि धन का स्रोत वैध है और उसका उपयोग भी वैध उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, तो वास्तविक दानदाता की जानकारी सार्वजनिक करने में किसी संस्था को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
सोशल मीडिया की निगरानी और फील्ड वेरिफिकेशन जैसे प्रावधान भी इसी सोच का हिस्सा हैं। इसमें कोई शक है नहीं की आज किसी संगठन की गतिविधियां केवल कार्यालयों तक सीमित नहीं रहती हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म भी उसके कामकाज और जनसंपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुके हैं। इसलिए नियामक एजेंसियों के लिए यह आवश्यक है कि वे केवल कागजी रिपोर्टों पर निर्भर रहने के बजाय वास्तविक गतिविधियों का भी सत्यापन करें।
वास्तव में FCRA को लेकर विवाद केवल भारत तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अनेक लोकतांत्रिक देशों ने भी विदेशी प्रभाव को लेकर अपने कानूनों को काफी सख्त बनाया है। अमेरिका में Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत विदेशी संस्थाओं या सरकारों के लिए काम करने वाले व्यक्तियों और संगठनों को अपने संबंधों की जानकारी सार्वजनिक करनी होती है। ऑस्ट्रेलिया ने Foreign Influence Transparency Scheme लागू किया ताकि विदेशी शक्तियों द्वारा घरेलू राजनीति और नीति-निर्माण को प्रभावित करने के प्रयासों की पहचान की जा सके। यूरोप के कई देशों ने भी विदेशी लॉबिंग, दुष्प्रचार और बाहरी राजनीतिक हस्तक्षेप को लेकर निगरानी बढ़ाई है।
तो सवाल यह है की जब विकसित लोकतंत्र अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए विदेशी वित्तीय प्रभाव पर कठोर निगरानी रख सकते हैं, तो भारत के ऐसा करने पर प्रश्न क्यों उठाए जाते हैं? भारत को अपनी परिस्थितियों और सुरक्षा आवश्यकताओं के अनुसार कानून बनाने का पूरा अधिकार है। किसी भी विदेशी सरकार, अंतरराष्ट्रीय संस्था या बाहरी दबाव समूह को यह तय करने का अधिकार नहीं हो सकता कि भारत अपने घरेलू कानून किस प्रकार बनाए।
इसी संदर्भ में पिछले दिनों अमेरिकी कांग्रेस के कुछ सदस्यों तथा कुछ अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने समय-समय पर चिंता व्यक्त की कि इन नियमों से भारत में नागरिक समाज के लिए काम करना कठिन हो सकता है। लेकिन यह एक बेकार की कवायद है क्योंकि यह पूरी तरह भारत का आंतरिक विषय है और किसी भी संप्रभु राष्ट्र की तरह भारत को भी अपने कानून बनाने और लागू करने का अधिकार है।
यहीं से यह बहस केवल कानूनी न रहकर पूरी तरह राजनीतिक बन जाती है। विपक्ष विदेशी फंडिंग पर बढ़ती पारदर्शिता का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि दशकों तक भारत में एक ऐसा वैचारिक और संस्थागत इकोसिस्टम विकसित हुआ, जिसमें विदेशी वित्तीय सहायता को लगभग स्वाभाविक मान लिया गया था। अब वही व्यवस्था अधिक जवाबदेह बन रही है, इसलिए राजनीतिक असहजता दिखाई दे रही है।
कांग्रेस इस आरोप को सिरे से खारिज करती है। उसका कहना है कि वह पारदर्शिता का विरोध नहीं कर रही, बल्कि उन प्रावधानों का विरोध कर रही है जो उसकी दृष्टि में सरकार को अत्यधिक विवेकाधिकार प्रदान करते हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का तर्क है कि यदि नियमों का उपयोग निष्पक्षता से न किया गया, तो वे सरकार की आलोचना करने वाले संगठनों पर दबाव बनाने का माध्यम बन सकते हैं।
यहीं पर सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न सामने आता है—यदि FCRA संशोधनों का घोषित उद्देश्य केवल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाना है, तो फिर इस पर इतना तीखा राजनीतिक टकराव क्यों दिखाई देता है? इसका उत्तर केवल कानून की धाराओं में नहीं, बल्कि भारत की बदलती राजनीतिक सोच में छिपा है।
पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने शासन की जिस व्यापक अवधारणा को आगे बढ़ाया है, उसमें राष्ट्रीय संप्रभुता का अर्थ केवल सीमाओं की रक्षा तक सीमित नहीं माना गया। सरकार ने आर्थिक सुरक्षा, डिजिटल संप्रभुता, डेटा सुरक्षा, रक्षा आत्मनिर्भरता, आपूर्ति शृंखलाओं पर नियंत्रण और विदेशी प्रभाव से संस्थागत सुरक्षा को भी राष्ट्रीय हित का अभिन्न हिस्सा बताया। इसी सोच का विस्तार FCRA के नए संशोधनों में भी दिखाई देता है।
सरकार का मानना है कि आज का वैश्विक परिदृश्य पहले से कहीं अधिक जटिल है। अब किसी देश को प्रभावित करने के लिए केवल सैन्य शक्ति या कूटनीति का सहारा नहीं लिया जाता। अंतरराष्ट्रीय फाउंडेशन, वैश्विक लॉबिंग समूह, डिजिटल अभियान, थिंक टैंक, विश्वविद्यालय, गैर-सरकारी संगठन और विभिन्न वैचारिक नेटवर्क भी देशों की नीतियों और सामाजिक विमर्श को प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। इसलिए यदि भारत स्वयं को एक आत्मविश्वासी और निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहता है, तो उसे अपने भीतर संचालित होने वाले विदेशी वित्तीय नेटवर्कों पर भी समान रूप से सतर्क निगरानी रखनी होगी।
यही कारण है कि यह संशोधन को केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि भारत की बदलती राष्ट्रीय सोच का प्रतीक बन गयी है। दशकों तक भारत में ऐसी व्यवस्था बनी रही, जिसमें विदेशी सहायता प्राप्त करने वाले अनेक संगठनों की गतिविधियों की पर्याप्त निगरानी नहीं होती थी। विदेशी धन प्राप्त करना अपने-आप में कोई अपराध नहीं है, लेकिन यदि धन विदेश से आ रहा है तो उसके स्रोत, उद्देश्य और अंतिम उपयोग के बारे में सरकार और जनता—दोनों को पूरी जानकारी होनी चाहिए। इसी पारदर्शिता को सुनिश्चित करने के लिए FCRA व्यवस्था को लगातार मजबूत किया जा रहा है।
लेकिन इस पूरी बहस में कांग्रेस और विपक्ष की भूमिका लगातार चर्चा का विषय बनी हुई है। अब जैसा दिख रहा है, विपक्ष पारदर्शिता का विरोध नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के समाप्त होने से असहज है जिसमें विदेशी फंडिंग प्राप्त करने वाले संगठनों पर अपेक्षाकृत कम निगरानी थी। यदि किसी संस्था की गतिविधियां पूरी तरह वैध हैं और उसका वित्तीय रिकॉर्ड साफ है, तो उसे अंतिम दानदाता की जानकारी देने, फील्ड वेरिफिकेशन कराने या सोशल मीडिया की जांच से डरने की कोई आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
हालांकि एक तथ्य ऐसा है जिस पर लगभग सभी सहमत दिखाई देते हैं—विदेशी धन के उपयोग में पारदर्शिता आवश्यक है। मतभेद इस बात पर है कि पारदर्शिता सुनिश्चित करने का तरीका क्या हो और उसकी सीमा क्या हो। मोदी सरकार का मानना है कि अधिक कठोर निगरानी ही इसका सबसे प्रभावी उपाय है, जबकि विपक्ष का कहना है कि निगरानी और स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो FCRA में हुए ताजा संशोधन उस व्यापक परिवर्तन का हिस्सा हैं, जो पिछले दस वर्षों में भारत की नीति-निर्माण प्रक्रिया में दिखाई देता है। चाहे रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हो, डिजिटल डेटा पर नियंत्रण, सेमीकंडक्टर निर्माण, विदेशी निवेश के लिए नई शर्तें या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कानून—हर क्षेत्र में सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारत अब अपनी नीतियां बाहरी दबावों के आधार पर नहीं, बल्कि अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार तय करेगा। FCRA संशोधन भी उसी नीति-दृष्टि का विस्तार प्रतीत होते हैं।
भविष्य में इन संशोधनों का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि उनका क्रियान्वयन किस प्रकार किया जाता है। फिर भी एक बात निर्विवाद रूप से कही जा सकती है कि FCRA अब केवल विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाला कानून नहीं रह गया है। यह भारत की बदलती राजनीतिक सोच, राष्ट्रीय सुरक्षा की नई परिभाषा और संप्रभुता की व्यापक अवधारणा का प्रतीक बन चुका है। यह बहस आने वाले वर्षों में भी जारी रहेगी, क्योंकि जैसे-जैसे भारत वैश्विक मंच पर अधिक प्रभावशाली होता जाएगा, वैसे-वैसे विदेशी प्रभाव, वित्तीय पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन का प्रश्न भी और अधिक महत्वपूर्ण होता जाएगा।
अंततः यही इस पूरे विवाद का सार है। प्रश्न केवल यह नहीं है कि विदेशी धन भारत में आए या न आए। वास्तविक प्रश्न यह है कि यदि विदेशी धन आता है, तो क्या उसके स्रोत, उद्देश्य और उपयोग के बारे में भारतीय राज्य और भारतीय समाज को पूरी जानकारी होनी चाहिए? विदेशी धन से चलने वाले नेटवर्कों को अब यह संदेश मिल चुका है कि भारत में काम करना है तो भारतीय कानूनों और भारतीय हितों के अनुरूप ही करना होगा। कांग्रेस चाहे इसे जितना भी राजनीतिक रंग देने की कोशिश करे, आम नागरिक के लिए सवाल बहुत सरल है—क्या विदेशी धन का स्रोत और उपयोग पारदर्शी होना चाहिए या नहीं? यदि उत्तर ‘हाँ’ है, तो FCRA पर सख्ती का स्वागत होना चाहिए, विरोध नहीं।
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
Leave Your Comment