2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के जिस प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही थी उससे काफी कमजोर नतीजे आये। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ईमानदारी और समर्पित भाव से देश की सेवा और विकास के चर्चे जन-जन की जुबान पर थे। देश का आत्मनिर्भर और रक्षा के क्षेत्र में मजबूत बनानें में मोदी सरकार के कामों से जनता उन्हें दोबारा सत्ता देना चाहती थी और सत्ता की कमान दी भी लेकिन भाजपा को अकेले बहुमत नहीं मिल सका। इसके लिये बड़े-बड़े राजनैतिक गणितज्ञों और पत्रकारों ने अपने अपने हिसाब से कहा या लिखा। तरह-तरह की बातें सम्पादकीय में देखने को मिली। देखा जाये तो इन सबके कथन जातिगत गणित, धार्मिक आधार और संविधान में परिवर्तन कर आरक्षण व्यवस्था के बदलने पर केन्द्रित रहा। आरक्षण आदि को बन्द करनें के मिथ्या प्रचार में इंडी ग्रुप थोड़ा बहुत कामयाब हुआ। जाति धर्म की बात तो पहले भी रही है लेकिन नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में 2014 के चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला तब जाति गणित से ऊपर उठ कर लोगों ने भाजपा को वोट दिये। 2019 में तो नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की आशा से अधिक सीटें आयीं। अकेले ही भाजपा को भारी स्पष्ट बहुमत से सरकार बनानें का अवसर जनता ने दिया। सारे जातिगत, क्षेत्रीय, धार्मिक सोच से ऊपर उठ कर भाजपा को वोट मिले थे। लोगों ने मोदी सरकार के कामों पर फिर मुहर लगाई थी।
मोदी के 10 वर्ष के कार्यकाल में अनगिनत विकास के काम हुए। जनता मोदी सरकार के कामों से अत्यधिक संतुष्ट दिखाई दे रही थी लेकिन मामूली गलतियों से भाजपा और नरेन्द्र मोदी ने अपने समर्थकों को खो दिया।
नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व अटल बिहारी वाजपेयी के चेहरे के समकक्ष न भी रहा हो पर कहीं फीका दिखाई नहीं दिया। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा ने पूर्व निवर्तमान अध्यक्ष अमित शाह के बाद कार्यभार संभाला था। अमित शाह से पहले नितिन गडकरी राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उनसे पहले राजनाथ सिंह थे। ये राष्ट्रीय स्तर पर बहुत बड़े चेहरे रहे, अध्यक्षता के दौरान और भी बड़े बन गये थे। राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, और अमित शाह ने अपनी योग्यता का प्रमाण दिया। उन्होंने पार्टी को नई दिशा दी। कार्यकर्ताओं में जोश भरने और उनमें अधिक से अधिक समर्पित भाव से काम करनें की भावना जगाने का बड़ा काम किया।
नरेन्द्र मोदी का चेहरा जब प्रधानमंत्री पद के लिये 2014 में आगे किया गया उस समय भाजपा अपने पैर गहराई से जमा रही थी। नरेन्द्र मोदी द्वारा गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए जो विकास के काम हुए, भ्रष्टाचार बन्द हुआ और गुजरात में चहंुमुखी विकास हुआ। वे राष्ट्रीय स्तर पर एक भारी पृष्ठभूमि लेकर आये थे जो किसी भी विपक्षी दल के नेता से बड़़ी थी। नरेन्द्र मोदी के मजबूत नेतृत्व को पार्टी के मजबूत नेतृत्व का योगदान मिला। आम जनता में पिछले तीन अध्यक्षों के बड़े नेताओं में है।
भाजपा संगठन की कमजोरी: प्रदेश, जिलों आदि लगभग सभी स्तरों पर पदाधिकारियों में ताल मेल की कमी रही। कार्यकर्ताओं का एकजुट होकर काम करना दिखाई नहीं दिया। सभी को लगने लगा कि नरेन्द्र मोदी के नाम पर आसानी से चुनाव जीत जायेंगे। चुनाव तो चुनाव होता है जरा सी कमजोरी या लापरवाही भारी पड़ सकती है।
बैंकों की मनमानी से सताये लोग : सरकार का बैंकों के ऊपर ठीक से नियंत्रण नहीं होने के कारण बैंक मनमानी करते है। बैंकों की दादागिरी से जनता बहुत दुखी है। गरीब, किसान, अनपढ़ लोग तो परेशान हैं ही लेिकन पढ़े लिखे शिक्षित मिडिल क्लास के लोग भी बैंकों की मनमानी से तंग आ चुके हैं। अधिकांश बैंक तरह-तरह की आपत्तियां लगाकर लोगों को तंग करते हैं। विशेष तौर से प्राइवेट बैंक मनमाने ढंग से लोगों की पेमेंट रोक लेते है। दस्तावेज सही नहीं होने के बहाने से कभी KYC फाॅर्म जमा नहीं करते और अगर कर लेते हैं तो कोई अन्य आपत्ति लगा देते हैं ताकि लोगों का अधिक से अधिक पैसा बैंकों में जमा रहे। पासबुक में एन्ट्री करने से मना करते हैं चेक पर कैश निकालने के पेमेंट को मना कर देते है। चेक पर हस्ताक्षर नहीं मिलने का बहाना लेकर पेमेंट रोक लेते हैं और 500 रूपये बैंक पेनाल्टी लगाकर खाते से निकाल लेते हैं। मनमानी से लाॅकर का किराया काट लेते है। किसानों को कई-कई बार बैंक के चक्कर लगाने पड़ते है। इससे लोगों में काफी नाराजगी और रोष है। यदि इसे नहीं रोका गया या KYC को साधारण नहीं किया गया तो आने वाले चुनावों पर फिर लोगों की नाराजगी भा.ज.पा. को झेलना पड़ सकती है।
सीनियर सिटीजनस का गुस्सा: सीनियर सिटीजन्स वोटिंग में एक बड़ा रोल अदा करते हैं एक तो हर गांव, शहर या महानगरों में उनका अलग ग्रुप या संगठन, संस्थायें हैं। वे फुरसत में रहते हैं आपस में मिलते हैं और परिवार को भी दिशा देने का काम करते हैं। उनमें अधिकांश मोदी के समर्थक थे और पिछले चुनावों में भाजपा के साथ थे। आम चुनाव से पहले यकायक उनका रेलवे कंसेशन बन्द करनें की बात जिस किसी ने सुझायी हो उसी सेे ही सीनियर सिटीजन्स के वोट भाजपा के विपक्ष में जाने का काम हुआ। कन्शेसन एक छोटी बात थी पर उसने काम बहुत बड़ा कर दिया। 90 प्रतिशत वरिष्ठ नागरिकों ने भाजपा को वोट नहीं दिया। रेलवे ने इससे इतना नहीं कमाया जितना खामियाजा खुद भुगता, गाड़ियां खाली चलने लगीं। वरिष्ठ नागरिक कम किराये के चक्कर में घूमनें जाने लगे थे। फुल किराया वसूल किये जाने पर उन्होंने ज्यादा आना जाना बन्द कर दिया जिससे रेलवे को नुकसान हुआ। सीनियर सिटीजनस के कंसेशन बन्द करनें का उनके परिवार जनों को भी बुरा लगा। रेलवे को चाहिये था कि कम से कम चुनाव से पहले उसे बहाल कर देता। इस तरह भाजपा ने अपना एक बहुत बड़ा वोट बैंक खोया। रेलवे खुद भी डूबी और मोदी सरकार को डुबोने का काम भी कर गयी।
आर एस एस कैडर: जिस उत्साह और उल्लास के साथ स्वयं सेवक हर चुनाव में काम करते थे उतना जोश और खुशी उनमें दिखाई नहीं दी। स्वयं सेवकों ने काम तो काफी किया, पर उन्हें लगता था कि चुनाव तो जीत ही रहे हैं सब जगह मोदी का नाम चल रहा है, यह एक कारण उनकी शिथिलता का रहा। पहले जिस तरह कई-कई दिन पहले से ये लोग अपना खाना सामान बांध कर गांवों में पहुंच जाते थे। चुनाव में ऐसा नहीं हुआ। अधिकांश लोग एक दो दिन पहले ही गये। ये लोग अति उत्साही नहीं दिखाई दिये। भाजपा की जीत में इस संगठन का बड़ा हाथ था, इसका कमजोर होना चुनाव में भाजपा को बहुत भारी पड़ा। बाद में कुछ शीर्षस्थ नेताओं ने उनकी आवश्यकता को नजरअंदाज भी किया और टिकट पाने वाले नये नेता आर एस एस से सम्पर्क साधनें में फेल रहे। सबको लगा कि वे जीत रहे हैं।
भाजपा के अन्य संगठन का कमजोर प्रदर्शन: भाजपा के अनगिनत समान्तर संगठन हैं जो जगह जगह काम कर रहे हैं जिनके नाम कई पत्रकारों को भी पता नहीं होगा। उदाहरण के तौर पर अल्पसंख्यक संगठन बना तो उसमें संगठन के मुखिया ने बहुत मेहनत भी की, जिला स्तर पर भी संगठन खड़ा कर दिया पर प्रदेश स्तर के नेताओं तक को कहीं सत्ता में भागेदारी नहीं मिली। यहां तक छोटी -छोटी सलाहकार समितियां रेलवे उपभोक्ता या अन्य सार्वजनिक संस्थानों में जगह नहीं मिली। लगभग यह सभी संगठनों के साथ हुआ इसलिए उसके पदाधिकारी निराशा से काम कर रहे थे। इसी तरह कांग्रेस ने अपने समान्तर संगठन सेवा दल, इन्टक युवक कांग्रेस को यहां तक कि महिला कांग्रेस को बर्बाद किया था। यही स्थिति भाजपा में भी बन गयी। कांग्रेस के चौपट होने की गलितयों से भाजपा ने सबक नहीं लिया या यों कहें कि अब नहीं सीख रही।
संगठन और प्रत्याशियों में तालमेल की कमी: पार्टी संगठन के लोग बहुत से नये प्रत्याशियों के साथ नहीं जुड़ पाये। कुछ प्रत्याशी तो कार्पोरेट समझ कर उनसे काम करवाना चाहते थे। इस तरह वर्कर्स को मान सम्मान नहीं मिलने से उन्होंने काम भी नहीं किया और घर बैठ गये। ऊपर से जाति गणित पर उतनी मेहनत नहीं की गयी जितनी पिछले लोकसभा, विधानसभा चुनावों में की गयी थी। बुन्देलखण्ड का होने के कारण मैंने अपनी आंखों से देखा कि हमीरपुर और जालौन के प्रत्याशियों को बिना उनका कार्य देखे तीसरी बार टिकट दिया गया, वे चुनाव हार गये। जालौन के प्रत्याशी तो केन्द्रीय मंत्री रहते हुये चुनाव नहीं जीत पाये।
दलित राजनीति का गलत अंकगणित: जहां जहां आदिवासियों का क्षेत्र था भाजपा को विजय मिली। उड़ीसा में बड़ी जीत के दो कारण रहे एक तो वर्तमान मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का नेतृत्व काफी कमजोर हो गया था वे स्वयं भी कमजोर स्वास्थ्य के कारण क्षीण हो चुके हैं। दूसरा उड़ीसा से आदिवासी महिला को राष्ट्रपति बनानें का असर उड़ीसा ही नहीं सभी जगह पर पड़ा। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में आदिवासी वोट मिले। पर दलित वोटों में सबसे अधिक संख्या अहिरवारों की है जो उत्तर प्रदेश में जीत हार का फैसला करवा सकते हैं। मायावती की कमजोर स्थिति का फायदा उठा कर भाजपा इन वोटों को ले सकती थी पर भाजपा ने कम संख्या वाले खटीक, कोरी को तो रिझाया लेकिन अहिरवारों की ओर ध्यान नहीं दिया। जबकि सरकारी नौकरी में उनकी बड़ी भारी संख्या भी है। बुन्देलखण्ड से प्रदेश में एक कोरी मंत्री के रहते हुये सब ठीक था। लेकिन इस चुनाव से पहले क्षेत्र के गणित पर ध्यान नहीं दिया गया। एक मंत्री केन्द्र में भी बनाया गया वो भी कोरी समाज से। फिर झांसी का महापौर भी कोरी समाज से बनाया। इससे बुन्देलखण्ड में ही नहीं पूरे प्रदेश में अहिरवार के वोट भाजपा को काफी कम मिले। बाकी काम संविधान को बदल कर आरक्षण समाप्त करने वाले मिथ्या प्रचार ने कर दिया जिसकी समय रहते भाजपा काट नहीं कर सकी। यहां तक कि भाजपा सारे वोट कुर्मी, लोधी, कुशवाहा में भी आरक्षण समाप्त होने का डर समा गया उनमें से भी बहुत से परम्परागत वोट चले गये। उत्तर प्रदेश के अहिरवार विरोध में रहे, कुछ पिछड़े वर्ग के लोग भी। ऊपर से मुख्यमंत्री, प्रदेश अध्यक्ष और संगठन मंत्री में से कोई ब्राह्मण नहीं था। इसका असर ग्रामीण ब्राह्मणों पर पड़ा। महेन्द्र नाथ पांडेय के अध्यक्ष रहते पिछली बार भाजपा ने 2019 में शानदार जीत हासिल की थी।
कुल मिला कर संविधान बदलने के अतिरिक्त रेलवे किरायों में छूट, अहिरवारों पर कम ध्यान देना, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को सम्मान में कमी, संगठन की कमजोरी, प्रचार में मुख्य बिन्दुओं की अनदेखी करना भाजपा के खराब प्रदर्शन का कारण रहा। विकास की बजाय चुनाव का केन्द्र बिन्दु आरक्षण विरोधी हो जाना भाजपा पर वज्र की तरह गिरा जिसे राजनीति में स्वच्छ छवि वाले नरेन्द्र मोदी भी नहीं रोक पाये। हार का विश्लेषण भी गलत दिशा में गया इसलिये उपचुनावों में भी हार हुई।

डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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