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विदेशी फंडिंग के खेल पर मोदी सरकार का कड़ा प्रहार

Modi government's stern crackdown on the foreign funding game.

 


उमेश
चतुर्वेदी


 

 

सा 2008 के गर्मियों की बात है। दिल्ली के अशोक होटल के कन्वेंशन हाल में ग्रामीण विकास के लिए काम कर रहे देशभर के स्वयंसेवी संगठनों का सम्मेलन हो रहा था। दोपहर के भोजन के लिए दो जगह इंतजाम था, जिसमें एक जगह उस आयोजन के कर्ता-धर्ताओं का खाना-पीन चल रहा था। वहीं पत्रकारों को भी बुलाया गया। भोजन से पहले जैसा कि होता है, सूप के प्याले परोसे गए। सूप का सिप लेते हुए जो बातचीत हो रही थी, वहां उपस्थित कई पत्रकारों को समझ में नहीं रही थी। दरअसल बातचीत पूरी तरह से कूट संकेतों में हो रही थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ग्रामीण विकास और लड़कियों की पढ़ाई कर रहे एक सज्जन सपरिवार उपस्थित थे, सूप के सिप के दौरान उनके मध्य प्रदेश के आदिवासी इलाके का विकास कर रहे एक संगठन के संचालक से आमना-सामना हुआ।

दोनों के बीच बातचीत शुरू हुई,

आपका कितना सीआर का मंजूर हुआ?

चार..

कितना आया..

इस बार तो तीन ही..

कितना खर्च कर देते हैं?

एक-डेढ़..बाकी से मैंने एक बड़ा घर खरीद लिया है..फलां शहर में..

पहली बार में इसे समझना आसान नहीं था..लेकिन बाद में किसी से पूछने पर पता चला कि गृहमंत्रालय के विदेशी चंदा को रेगुलेट करने वाले विभाग से उनके स्वयंसेवी संगठन यानी एनजीओ को चार करोड़ तक के फंडिंग की मंजूरी मिल गई है। विदेशी दानदाताओं से उन्हें इस साल तीन करोड़ मिला। जिसमें से उन्होंने डेढ़ करोड़ खर्च किया और बाकी से किसी शहर में बड़ा घर खरीद लिया है।

मोदी सरकार के आने के पहले तक विदेशी चंदा और फंडिंग एक खास वर्ग के लिए कमाई का बड़ा साधन था। बात सिर्फ कमाई तक ही सीमित रहती तो गनीमत थी। लेकिन इस चंदे का इस्तेमाल शहरी इलाकों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों की आड़ में नक्सल और माओवाद के खूनी संघर्ष को सही ठहराने का खेल होता था। इस पैसे से स्वयंसेवी संगठनों के दफ्तरों की शामें गुलजार होतीं। इनके स्वयंसेवियों और विदेशी फंडिंग से मौज और बहार लूटने वाले में लाल गढ़ के रूप में जानी-जाने वाले जवाहर लाल नेहरू और यादवपुर विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों की वामपंथी धारा के छात्रों की संख्या ज्यादा होती। इन स्वयंसेवी संगठनों में काम करने वालों को मोटी पगार मिलती। कई बार विदेशी चंदा भारत के आदिवासी, गरीबों और महिलाओं की स्थिति के नीतिगत अध्ययन के लिए मिलता। विदेशी चंदा हासिल करने के लिए एक और बड़ा फैशनेबल विषय उभरा था, पीस एंड कांफ्लिक्ट मैनेजमेंट यानी शांति और संघर्ष प्रबंधन। कहने का मतलब यह कि शांति स्थापित करने के नाम पर गठित संगठनों को भी विदेशी चंदा मिल रहा था। दिलचस्प यह है कि विदेशों से आने वाला यह पैसा किसी और काम में लग जाता। पिछली सदी के साठ के दशक में विदेशी चंदा आना शुरू हुआ। तब से लेकर साल 2014 तक आए चंदे का सचमुच उसी मद में इस्तेमाल हुआ होता, जिस मद में आया था तो निश्चित मानिए कि उन क्षेत्रों में बहुत बदलाव आया होता।

आजादी के पहले से ही विदेशी चंदा ईसाई मिशनरियों और इस्लामी संस्थानों को खूब मिलता रहा है। दिलचस्प यह है कि ईसाई मिशनरियां सबसे ज्यादा उन इलाकों में सक्रिय हैं, जहां शिक्षा और विकास धीमी गति से पहुंचा है। आदिवासी बहुल इलाकों में निश्चित तौर पर उन्होंने स्कूल खोले हैं, अस्पताल चला रहे हैं, लेकिन सेवा की आड़ में उन्होंने धर्मपरिवर्तन भी खूब कराया है। खाड़ी युद्ध के बाद से अरब देशों की संस्थाएं अब इस्लामी और मुस्लिम संगठनों की फंडिंग कर रही हैं। इसके चलते लव जेहाद, धर्म परिवर्तन आदि की घटनाएं इन दिनों बढ़ी हैं।

मनमोहन सिंह की सरकार के रहते वक्त तो इन संस्थाओं पर खास रोकटोक नहीं रही। दिलचस्प यह है कि अरविंद केजरीवाल का आंदोलन हो या फिर अन्ना की अगुआई वाला भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन या फिर कश्मीर को स्वायत्तता देने वाला वामपंथी आंदोलन, सबके साथ विदेशी चंदा पाने वाली संस्थाओं के लोग भी खड़े रहे और कई बार खर्च भी करते रहे। दक्षिण दिल्ली स्थित एक स्वयंसेवी संगठन पीस फाउंडेशन के दफ्तर में नेपाल की माओवादी क्रांति के तमाम अगुआ बैठते रहे। एक दौर में यहीं से बाबू राम भट्टराई और पुष्पकमल दहल उर्फ प्रचंड के आंदोलन की रणनीति बनती रही। कुछ विदेशी संगठन भारत की यातायात और मौसम का अध्ययन करने के लिए विदेशी पैसा लेते रहे। यह बात और है कि अंतत: उनके पैसे के बड़े हिस्से का इस्तेमाल शहरी माओवाद के लिए जनमत बनाने, धर्म परिवर्तन और विदेशी वैचारिकी को बढ़ावा देने के लिए होता रहा।

यही सब देखते हुए केंद्र सरकार ने फॉरेन कॉंन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट यानी एफसीआरए के नियमों को लेकर बेहद सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब देश के भीतर काम कर रहे एनजीओ और धार्मिक संस्थान विदेशी फंड का इस्तेमाल धर्मांतरण जैसे कामों के लिए नहीं कर पाएंगे।

क्या है नया नियम?

इन नियमों के जरिए सरकार ने साफ संदेश दिया है कि विदेशी पैसे का इस्तेमाल सिर्फ देश के विकास, समाज कल्याण और सही कामों में ही होना चाहिए। इन नियमों के जरिए सरकार ने ताकीद की है कि इस पैसे का इस्तेमाल किसी भी तरह किसी गुप्त एजेंडे या देश की जनसांख्यिकी बदलने यानी धर्म परिवर्तन के लिए नहीं होना चाहिए।

इसमें दो राय नहीं कि कई संस्थाएं सेवा की आड़ में विदेशी फंडिंग का गलत इस्तेमाल करती रही हैं। उन्होंने इसके जरिए भोले-भाले लोगों का धर्मांतरण भी कराया है। लेकिन नियमों में नए संशोधनों के बाद,  विदेशी फंडिंग हासिल करने वाली संस्थाओं को ना सिर्फ पाई-पाई का हिसाब देना होगा, बल्कि किसी अन्य मद में खर्च करने के लिए जवाब भी देना पड़ेगा। अगर किसी भी तरह की संदिग्ध गतिविधि पायी गई तो उनके खिलाफ सरकार की ओर से तत्काल सख्त कानूनी कार्रवाई होगी।

दिल्ली में नीतिगत विषयों का अध्ययन करने वाली एक संस्था ने कुछ साल पहले विदेश से मिले चंदे को झारखंड में सक्रिय कुछ नक्सली समूहों को ट्रांसफर कर दिया था। यानी पैसा मंगाया गया अध्ययन के खाते में और इसका इस्तेमाल देश की आंतरिक सुरक्षा को चोट पहुंचाने के लिए किया गया। ऐसी घटनाओं को देखते हुए एफसीआरए के नियमों में बदलाव का यह फैसला भारत की आंतरिक सुरक्षा, संस्कृति और संप्रभुता को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। पारदर्शिता लाने और विदेशी ताकतों के गलत मंसूबों को नाकाम करने के लिए यह कड़ा कदम उठाना बेहद जरूरी था।

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने 22 जून 2026 को विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम  के नियमों में बड़े और सख्त संशोधन अधिसूचित किए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य विदेशी फंडिंग में पारदर्शिता लाना और धार्मिक धर्मांतरण (धर्म परिवर्तन) जैसी गतिविधियों पर पूरी तरह रोक लगाना है।

नए नियमों के लागू होने के बाद अब गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और धार्मिक संस्थाओं के लिए विदेशी चंदा प्राप्त करना और उसका इस्तेमाल करना पहले से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण और कड़े नियमों के दायरे में होगा।

नए बदलावों के मुख्य बिंदु
धर्मांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध

नए नियमों के तहत विदेशी फंड का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष  रूप से धर्मांतरण के लिए उपयोग करने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।

फंड के मूल स्रोत का खुलासा

 अब संस्थाओं के लिए केवल यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि उन्हें किस विदेशी फाउंडेशन से पैसा मिला है। उन्हें उस फाउंडेशन को पैसा देने वाले मूल बैकर्स यानी असल दानदाता और पूरी रकम शृंखला की जानकारी देनी होगी।

गतिविधियों और क्षेत्रों का विशिष्ट चयन

पहले संगठन सामाजिक कार्यों के नाम पर पैसा लेकर कहीं भी खर्च कर देते थे। अब उन्हें 5 निर्धारित श्रेणियों (सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, सांस्कृतिक और धार्मिक) में से किसी एक को चुनना होगा और सरकार द्वारा तय सूची के अनुसार ही काम करना होगा।

भौगोलिक सीमा और जियो-टैगिंग

संस्थाओं को अब स्पष्ट रूप से बताना होगा कि वे भारत के किस राज्य, केंद्र शासित प्रदेश और किस जिले में पैसा खर्च करेंगी, जिससे सरकार पैसे की सटीक निगरानी कर सके।

सोशल मीडिया और डिजिटल उपस्थिति की जानकारी

संगठनों को अपने सभी सोशल मीडिया हैंडल, वेबसाइट और प्रकाशनों की विस्तृत जानकारी गृह मंत्रालय को देनी होगी। इसके जरिए निगरानी की जाएगी कि विदेशी चंदे के दम पर देश विरोधी दुष्प्रचार तो नहीं किया जा रहा है।

अलग-अलग फीस का प्रावधान

पहले एफसीआरए रजिस्ट्रेशन के लिए फीस की एक ही दर तय थी। अब प्रत्येक चुनी गई श्रेणी, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश के लिए अलग-अलग दर पर शुल्क देना होगा।

विदेशी नागरिकों की भूमिका पर रोक

नए नियमों के तहत भारतीय संगठनों में विदेशी नागरिकों की भूमिका को सीमित करने की कोशिश की गई है। अक्सर देखा गया है कि विदेशी नागरिक भारत के आंतरिक मामलों में इन संस्थाओं के जरिए दखल देते रहे हैं और विदेशी नागरिक होने के चलते भारतीय कानूनों से बच निकलते रहे हैं। अब नए नियमों के तहत यदि किसी भारतीय संगठन के मुख्य पदाधिकारियों में विदेशी नागरिक शामिल हैं, तो उन्हें विदेशी फंड लेने के लिए रजिस्ट्रेशन या पूर्व-मंजूरी  देने पर विचार नहीं किया जाएगा।

फेरा कानून में इस संशोधन को लागू करने को लेकर व्हाइट कॉलर कमाई करने वाले लोगों की चिंताएं बढ़ा दीं है। लेकिन सरकार ने इसके लिए कई कारण भी बताए हैं। सरकार का कहना है कि इन नए संशोधनों के जरिए सुनिश्चित किया जा रहा है कि विदेशी रकम की एक-एक पाई का हिसाब हो और बैलेंस शीट के साथ-साथ फंड के अंतिम उपयोग की स्पष्ट कड़ियों को ट्रैक किया जा सके। सरकार का कहना है कि देश की जनसांख्यिकी को बदलने की कोशिशों और सेवा की आड़ में छिपे एजेंडों को रोकना भी इन नए संशोधनों का उद्देश्य है। अगर कोई संगठन या संस्था इन नियमों का उल्लंघन करते हुए पायी जाती है तो उसके खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। इसके तहत संगठनों पर कम से कम एक लाख रुपये का न्यूनतम जुर्माना और लाइसेंस रद्द होने जैसी सख्त कार्रवाई का प्रावधान किया है।

इन नए संशोधनों के बाद सरकार ने 72 नए संगठनों और संस्थाओं को विदेशी चंदा लेने के लिए मंजूरी दी है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ा संगठन सेवा भारती भी है। नई मंजूरी में प्रोजेक्ट मुंबई और हरे कृष्ण मूवमेंट इंडिया समेत 72 स्वयंसेवी समूहों को इस साल विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए के तहत विदेशी चंदा पाने के लिए पंजीकृत किया गया है।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

 

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