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भारतीय युवा: वैश्विक श्रम बाजार : में नई पहचान और अवसर 

Indian youth: New identity and opportunities in the global labor market

आज का भारतीय युवा वैश्विक मंच पर एक नए आत्मविश्वास और सामर्थ्य के साथ उभर रहा है। वह अब केवल विदेशी धरती पर रोजगार की तलाश में जाने वाला श्रमिक नहीं है, बल्कि एक ऐसा पेशेवर है जिसकी दक्षता, अनुकूलन क्षमता और नवाचार को पूरी दुनिया सलाम करती है। हाल के वर्षों में भारतीय युवाओं ने न केवल अपनी शैक्षणिक योग्यता से, बल्कि कार्य कौशल और सांस्कृतिक समरसता से दुनिया भर में एक अमिट छाप छोड़ी है। "वसुधैव कुटुम्बकम" की भावना को चरितार्थ करते हुए, वे उच्च शिक्षा और रोजगार के लिए विदेशों का रुख कर रहे हैं और वहाँ की सामाजिक-आर्थिक संरचना में सहजता से घुल-मिल रहे हैं। आज तकनीकी, स्वास्थ्य, अनुसंधान, वित्त और निर्माण जैसे क्षेत्रों में भारतीय मूल के पेशेवरों का दबदबा है, जो उन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को गति देने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। यह परिवर्तन केवल रोजगार का मुद्दा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और बौद्धिक कूटनीति का नया अध्याय है, जिसमें भारत 'ब्रेन ड्रेन' की पुरानी अवधारणा को पीछे छोड़ 'ब्रेन गेन' और 'सॉफ्ट पावर' के युग में प्रवेश कर चुका है।


वैश्विक मांग का बढ़ता दायरा और जनसांख्यिकीय लाभ
विकसित देशों में तेजी से बढ़ती वृद्ध जनसंख्या और घटते युवा वर्ग के कारण कुशल श्रम की भारी कमी उभरी है। इसके विपरीत, भारत की युवा आबादी एक जीवंत 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' प्रस्तुत करती है। इस चुनौती को अवसर में बदलते हुए, रूस, जापान, इज़राइल, जर्मनी, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, फ्रांस जैसे देश भारतीय युवाओं के लिए अपने दरवाज़े खोल रहे हैं। द्विपक्षीय व्यापार एवं श्रम समझौते इसके प्रमुख साधन बन रहे हैं। यह एक ऐतिहासिक पल है जब विश्व की श्रम आवश्यकताएं और भारत की युवा शक्ति एक दूसरे के पूरक बन रहे हैं, जिससे एक ऐसा पारस्परिक लाभ का रिश्ता विकसित हो रहा है जो दशकों तक टिका रह सकता है।


रूस के साथ एक ऐतिहासिक साझेदारी
भारतीय श्रम बाजार के लिए रूस एक नया और महत्वपूर्ण गंतव्य के रूप में उभरा है। दिसंबर 2025 में आयोजित 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच संबंधों को नई दिशा मिली। रूस लगभग 20 से 50 लाख कुशल कामगारों की कमी से जूझ रहा है। इस कमी को पूरा करने के लिए भारत के साथ हुए समझौते के तहत, वर्ष 2030 तक सूचना प्रौद्योगिकी, निर्माण और नर्सिंग जैसे क्षेत्रों में रूस को लगभग 5 लाख भारतीय श्रमबल उपलब्ध कराया जाएगा। यह केवल संख्याओं का समझौता नहीं है, बल्कि एक रणनीतिक साझेदारी है। साथ ही, यूरेशियन आर्थिक संघ (EAEU) के साथ मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में हुई प्रगति से भारतीय फार्मा और वस्त्र उद्योग के लिए एक विशाल बाज़ार खुल गया है, जिससे रोजगार सृजन की श्रृंखला और लंबी होगी।



इज़राइल और जापान: सक्रिय सहयोग और विशिष्ट मांग
हमास के साथ संघर्ष के बाद निर्माण क्षेत्र में श्रम की कमी से जूझ रहे इज़राइल ने भारत से एक लाख श्रमिकों की मांग की है। पहले ही चरण में हज़ारों भारतीय कामगार वहां पहुंच चुके हैं। उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्य विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम चला रहे हैं ताकि श्रमिक स्थानीय भाषा, संस्कृति और तकनीकी मानकों से परिचित हो सकें। यह प्रवासन मॉडल अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बन सकता है।

वहीं, जापान ने भारत में अपने निवेश को बढ़ाने के साथ-साथ एक "पीपल टू पीपल" आदान-प्रदान कार्यक्रम शुरू किया है। इसका लक्ष्य अगले पांच वर्षों में जापान में 5 लाख भारतीय छात्रों और श्रमिकों को लाना है, ताकि वहाँ की प्रौढ़ होती आबादी और श्रम की कमी को दूर किया जा सके। विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में भारतीय नर्सों और केयरगिवर्स के लिए अवसर सृजित किए जा रहे हैं। जापानी समाज में भारतीयों का एकीकरण इस साझेदारी की सफलता की कुंजी होगा।


यूरोप और अन्य क्षेत्रों में बढ़ती संभावनाएं
जर्मनी, फिनलैंड, ताईवान, पुर्तगाल और नीदरलैंड जैसे देश भी सक्रिय रूप से भारतीय कुशल श्रमिकों की तलाश में हैं। जर्मनी प्रतिवर्ष लगभग 90,000 भारतीय पेशेवरों को वीजा जारी करने की योजना बना रहा है, जबकि फिनलैंड और पुर्तगाल स्थायी निवास और नागरिकता का प्रलोभन दे रहे हैं। पिछले पाँच वर्षों में 16 लाख से अधिक भारतीय श्रमिकों को विदेशों में रोजगार के लिए मंजूरी दी गई है, जो इस प्रवृत्ति के पैमाने को दर्शाता है। यूरोपीय देशों में मुख्य रूप से आईटी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य सेवा और अनुसंधान में विशेषज्ञता वाले पेशेवरों की मांग है।


भारत की सक्रिय भूमिका और श्रमिक सुरक्षा
इस बदलाव में भारत सरकार की भूमिका केवल एक 'सप्लायर' की नहीं, बल्कि एक 'संरक्षक और सुविधाकर्ता' की है। आस्ट्रिया, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, जापान, पुर्तगाल, खाड़ी देशों सहित कुल 17 देशों के साथ प्रवासन, श्रम आवाजाही और श्रमिक सुरक्षा से संबंधित समझौते किए गए हैं। इन समझौतों में संयुक्त कार्यदल बनाकर श्रमिकों के कल्याण, उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी सहायता पर नियमित निगरानी का प्रावधान है। यह दृष्टिकोण पारंपरिक श्रम निर्यात मॉडल से एक स्वस्थ परिवर्तन है।

नेशनल स्किल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (NSDC) और विभिन्न आईटीआई जैसे संस्थान भारतीय युवाओं को वैश्विक मानकों के अनुरूप प्रशिक्षित करके उन्हें इन अवसरों के लिए तैयार कर रहे हैं। केंद्र सरकार की कौशल विकास योजना का लक्ष्य न केवल घरेलू बाजार की मांग पूरी करना है, बल्कि भारत को एक 'ग्लोबल स्किल कैपिटल' और 'ग्लोबल मैनपावर सप्लायर' के रूप में स्थापित करना भी है। भाषाई प्रशिक्षण, सांस्कृतिक दक्षता और डिजिटल कौशल पर विशेष जोर दिया जा रहा है।


निष्कर्ष: एक नए युग की शुरुआत
वैश्विक जनसांख्यिकीय परिवर्तन ने भारत के 'डेमोग्राफिक डिविडेंड' को एक अद्वितीय वैश्विक अवसर में बदल दिया है। भारतीय युवा, अपने कौशल, मेहनत, अनुकूलन क्षमता और सांस्कृतिक लचीलेपन के बल पर, न केवल अपना भविष्य संवार रहे हैं, बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं को सुदृढ़ बना रहे हैं और 'वसुधैव कुटुम्बकम' के सिद्धांत को जीवंत कर रहे हैं। सरकार की सक्रिय कूटनीति और सुरक्षा उपाय इस प्रवास को और अधिक सुरक्षित, सम्मानजनक एवं लाभप्रद बना रहे हैं।



उदय इंडिया बयूरो

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