भारत और अमेरिका के बीच चल रही ट्रेड डील को लेकर कई अनसुलझे सवाल उठ रहे हैं। आधिकारिक रूप से यह समझौता “साझेदारी और आर्थिक सहयोग” बढ़ाने वाला बताया जा रहा है, लेकिन इसके गोपनीय पहलू (Non-Disclosure Agreement – NDA) और संभावित असर को लेकर चिंता है। नवीनतम रिपोर्ट और ऐतिहासिक केस स्टडीज़ के आधार पर यह स्पष्ट है कि भारत को इस डील के फायदे और जोखिम दोनों का आंकलन करना होगा।

ऐतिहासिक संदर्भ
भारत और अमेरिका के आर्थिक और व्यापारिक संबंध दशकों से विकसित हो रहे हैं। 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारत ने विदेशी निवेश और व्यापार को प्रोत्साहित करना शुरू किया। अमेरिका ने भारत को तकनीक, सेवाएँ और रक्षा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा। और अभी भारत को एक बड़े बाजार के तौर पर| “Every coin has two sides.” – हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। भारत अमेरिका से सालाना 42 अरब डॉलर का आयात करता है, और अभी जो डील सामने आयी है उसके मुताबिक भारत 100 अरब डॉलर का सालाना आयात करेगा । मतलब सालाना 100% से भी ज्यादा की खरीद भारत बढ़ायेगा। भारत का अमेरिका से जो निर्यात सरप्लस था वो या तो शून्य होगा या नकारात्मक । बहरहाल चूंकि व्हाइट हाउस ने अपनी वेबसाइट पर कुछ अहम जानकारी भारत अमेरिका डील को लेकर सांझा की है उसी से जानने की यहां एक कोशिश है। समझौते के ढांचे के तहत भारत सभी अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं तथा अनेक अमेरिकी खाद्य और कृषि उत्पादों पर शुल्क समाप्त या कम करेगा। इनमें ड्राइड डिस्टिलर्स ग्रेन्स (DDGs), पशु आहार हेतु रेड सोरघम, मेवे, ताजे व प्रसंस्कृत फल, सोयाबीन तेल, वाइन और स्पिरिट्स सहित कई अन्य उत्पाद शामिल हैं। जैसा कि मैने कहा हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। फायदा की बात करें तो देश में मेवे सस्ते होंगे और भारत फैट फूड से न्यूट्रीशियन फूड की तरफ बढ़ेगा, देश में सालाना 20 ग्राम प्रति वैयक्ति मेवा उपभोग है, जिसको बढ़ाने की जरूरत है। भारत सरकार ने 2026 बजट में मेवा इंडस्ट्री और उत्पादक पर ध्यान दिया है, जो यह बताता है कि देश में मेवा बाजार जो आज करीब 2 अरब डॉलर का है, 2030 तक 20 अरब डॉलर का हो जाएगा। इस से देश का किसान मेवा की खेती की तरफ रुख कर सकता है। हाँ सोयाबीन किसानों को निराशा हाथ लगी है, अमेरिका भारत को सोया तेल देगा और साथ ही DDGs भी अब इसके भी फायदे और नुकसान है। कहते हैं ना- “What you don’t know can hurt you.” – जिसे आप नहीं जानते, वह आपको नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन यहां हमें यह जानना होगा की कौन सोयाबीन की खेती सूरजमुखी की तरह कम हो रही है और किसान बीते 4 साल से सोयाबीन की खेती से पैसा नहीं ले पा रहे थे और वो दूसरी फसलों की और रुख कर गए।
DDGs के आयात का फायदा पशुअहार आयातकों, पशु पालकों को, मुर्गी पालकों को होगा, क्योंकि सस्ते में ये सब अमेरिका से आयात होगा। हाँ यहां भारतीय पशुआहार इंडस्ट्री को नुकसान हो सकता है। लेकिन भारतीय पशुपालकों को फायदा, क्योंकि उन्हें पशुआहार सस्ते में मिलेगा और लागत कम आएगी। डेयरी उद्योग को फायदा होगा। जहाँ-तक मुझे लगता है सरकार इस में भी ये फायदा देख रही होगी कि किसान पशु पालन से ज्यादा फायदा कमाए। 2016 में अमेरिकी कंपनियों को भारत में अधिक निवेश के लिए आसान नियम बनाए गए तो उसका फायदा शेयर बाजार, निवेश जागरुकता के तौर पर साफ़ दिखाई दिया।
इस डील का फायदा हल्दी, मखाना, चावल के किसानों को मिलेगा और अमेरिका का बाजार अब इनके आगे बढ़ने में रोड़ा नहीं होगा।
NDA और गोपनीय शर्तें: लाभ और खतरे
NDA यानी Non-Disclosure Agreement अगर इस डील का हिस्सा हैं तो इसमें बहुत सतर्कता की जरूरत होगी। अगर Non-Disclosure Agreement उद्देश्य व्यापारिक रणनीति और संवेदनशील डेटा को सुरक्षित रखना है। हालांकि, इसके साथ जोखिम भी जुड़ा होता है। अमेरिकी कंपनियों की एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट रणनीति सार्वजनिक न हो के लिए हो सकता है इसको डील का हिस्सा रखा गया हो। राजनीतिक दबाव से बचाव के लिए डील को राजनीतिक विवाद का हिस्सा बनने से रोकने के लिए भी हो सकता है, इसको जरूरी समझा गया हो।
हमें बांग्लादेश माडल से बचना होगा
हाल ही में बांग्लादेश ने अमेरिका के साथ “गोपनीय ट्रेड डील” की है। यह डील भारत-अमेरिका डील के बाद जल्दी से फाइनल की गई। अमेरिका ने भारत के लिए टैरिफ 18% किया, बांग्लादेश ने डील फाइनल की बांग्लादेश ने डील 9 फरवरी को साइन करनी थी, लेकिन डील जल्दी फाइनल की गई। न संसद, न मीडिया, न इंडस्ट्री स्टेकहोल्डर्स को पूरी जानकारी दी गई, और जानकारी पर रोक है। भारत को बांग्लादेश और अमेरिका के बीच हुई इस तरह की डील से बचना होगा।
अमेरिकी मानक और सर्टिफिकेशन स्वीकार करना अमेरिकी प्रोडक्ट्स और वाहन स्वतंत्र रूप से प्रवेश आयात निरीक्षण कम या शून्य भारत के केस में इस बात का ध्यान रखना होगा “Forewarned is forearmed.” – जिसे पहले से पता है, वह तैयार रहता है। भारतीय उद्योगों और किसानों पर संभावित असर टेक्सटाइल और गारमेंट सेक्टर भारत का टेक्सटाइल निर्यात अमेरिका में बढ़ सकता है अमेरिकी कंपनियों की स्वतंत्र मार्केट एक्सेस से स्थानीय प्रतिस्पर्धा कठिन हो सकती है कृषि क्षेत्र अमेरिकी कृषि उत्पाद बिना रोक-टोक भारत में उतर सकते हैं| किसानों की फसल और बाजार भाव प्रभावित हो सकते है| समर्थन मूल्य और घरेलू उत्पादन जोखिम में आ सकते हैं छोटे उद्योगों को अमेरिका की सस्ती प्रोडक्ट्स से मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है| इस डील में ऐसा लगता है सरकार इन लाइन पर काम कर रही होगी “Keep your friends close, and your enemies closer.” – मित्र को पास रखो, दुश्मन को और पास।
सुरेश मनचन्दा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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