भारत और अमेरिका के मध्य अंतरिम व्यापार समझौते पर संयुक्त बयान जारी होना केवल द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम नहीं है, बल्कि इसके साथ जुड़ा एक प्रतीकात्मक किंतु अत्यंत दूरगामी कूटनीतिक संकेत भी सामने आया है। संयुक्त बयान के उपरांत अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) द्वारा जारी भारत के मानचित्र में पूरे जम्मू–कश्मीर—जिसमें पाक-अधिकृत कश्मीर भी सम्मिलित है—को भारत का अविभाज्य अंग दर्शाया गया है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस मानचित्र में न तो नियंत्रण रेखा (LoC) को दर्शाया गया है और न ही चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन क्षेत्र को भारत से अलग दिखाया गया है। यह पहली बार है जब अमेरिका ने मानचित्र के प्रश्न पर स्पष्ट रूप से भारत के दृष्टिकोण का समर्थन किया है।
अब तक अमेरिकी एजेंसियाँ जम्मू–कश्मीर और अक्साई चिन के संदर्भ में भारत के आधिकारिक मानचित्र से भिन्न प्रस्तुति करती रही हैं। ऐसे में यूएसटीआर द्वारा जारी यह मानचित्र केवल तकनीकी या प्रशासनिक दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता के प्रति अमेरिकी रुख में परिवर्तन का सूचक है। स्वाभाविक है कि इस घटनाक्रम से भारत के परंपरागत विरोधी—चीन और पाकिस्तान—में असहजता और तनाव व्याप्त हुआ है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर दृष्टि डालें तो 1957 में तिब्बत पर कब्जे के बाद चीन अक्साई चिन क्षेत्र में सक्रिय हुआ और 1962 के भारत–चीन युद्ध का प्रमुख केंद्र यही क्षेत्र बना। उस युद्ध के पश्चात लगभग 38,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन के नियंत्रण में चला गया। इसी प्रकार 1947 के आक्रमण के बाद से पाकिस्तान जम्मू–कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर अवैध कब्जा बनाए हुए है। इन्हीं विवादित क्षेत्रों को लेकर अमेरिका पूर्व में भारत के मानचित्र के साथ छेड़छाड़ करता रहा था। अतः अमेरिका द्वारा भारत का सही और पूर्ण मानचित्र जारी किया जाना, महत्व के स्तर पर, इस अंतरिम व्यापार समझौते के समकक्ष ही माना जाना चाहिए।
राजनीतिक परिदृश्य में यह भी चर्चा का विषय है कि संसद में भारत–अमेरिका समझौते पर विपक्ष द्वारा लगातार स्पष्टीकरण की मांग और हंगामे के पीछे कहीं न कहीं इस मानचित्र संबंधी पहलू को सार्वजनिक विमर्श से ओझल रखने की प्रवृत्ति भी हो सकती है। यद्यपि यह आकलन राजनीतिक है, किंतु मानचित्र के प्रश्न पर मुख्यधारा की भारतीय मीडिया की अपेक्षाकृत चुप्पी और पाकिस्तानी मीडिया में इस विषय पर तीखी बहस अपने आप में बहुत कुछ संकेत करती है।
इस संपूर्ण घटनाक्रम को भारत की ‘राष्ट्र प्रथम’ नीति के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भारत ने किसी दबाव में आए बिना अपने किसानों और घरेलू हितों की रक्षा करते हुए वार्ता की, और परिणामस्वरूप अमेरिका न केवल व्यापार समझौते पर सहमत हुआ, बल्कि भारत के आधिकारिक मानचित्र को भी स्वीकार करता दिखा। अंतरिम द्विपक्षीय समझौते की रूपरेखा तय होने के साथ ही नई आर्थिक संभावनाओं के द्वार खुलने की बात कही जा रही है। विशेषज्ञों और विश्लेषकों के अनुसार, सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर इसे “फादर ऑफ ऑल डील्स” कहे जाने में अतिशयोक्ति नहीं है।
समझौते के प्रारूप में भारतीय किसानों के हितों से जुड़े कृषि और डेयरी उत्पादों—जैसे मक्का, गेहूं, काबुली चना, चावल, दूध, चीज, इथनॉल, तंबाकू तथा कुछ सब्जियों और फलों—को संरक्षित रखा गया है। संरक्षित सब्जियों और फ्रोजन सब्जियों में प्याज, आलू, मटर, मशरूम, तोरी, भिंडी, कद्दू, लहसुन, खीरा, शिमला मिर्च और शकरकंद शामिल हैं। इसके अतिरिक्त केला, आम, स्ट्रॉबेरी, चेरी, सूखा आलूबुखारा, सूखा सेब, इमली, सिंघाड़ा और गरी जैसे उत्पादों का भी संरक्षण किया गया है। इससे स्पष्ट है कि भारत ने कृषि क्षेत्र में किसी प्रकार का समझौता नहीं किया है।
वहीं दूसरी ओर, इस समझौते से टेक्सटाइल्स एवं एपैरल, चमड़ा एवं फुटवेयर, प्लास्टिक एवं रबर, कुछ मशीनरी, सजावटी वस्तुएँ, हस्तशिल्प, सामान्य फार्मास्युटिकल्स, एयरक्राफ्ट पार्ट्स तथा जेम्स एंड ज्वैलरी जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय लाभ और निर्यात वृद्धि की संभावनाएँ हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह फ्रेमवर्क वैश्विक निवेशकों के भरोसे को सुदृढ़ करता है, प्रतिस्पर्धा और प्रौद्योगिकी तक पहुँच बढ़ाता है तथा आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करता है। दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच आर्थिक तालमेल को आगे बढ़ाने वाला यह कदम रणनीतिक साझेदारी को नई ऊँचाई देता है—जिसका उद्देश्य टैरिफ में कमी, नियामक बाधाओं का उन्मूलन और विभिन्न क्षेत्रों में नए अवसर सृजित करना है। इसके लागू होने से ‘मेक इन इंडिया’ को भी ठोस बढ़ावा मिलेगा।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने इस समझौते को स्पष्ट रूप से भारत के हित में बताया है। उनका आकलन है कि इसके बाद चीन के मुकाबले ‘मेड इन इंडिया’ को प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त मिलेगी और इसका प्रभाव शीघ्र ही दिखाई देगा। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, फार्मा, इंजीनियरिंग वस्तुएँ, रत्न–आभूषण और चर्म उत्पाद क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ने से निर्यात में भी वृद्धि होगी।
क्षेत्रीय दृष्टि से देखें तो उत्तर प्रदेश इस समझौते का बड़ा लाभार्थी बनकर उभर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह राज्य के निर्यात और एमएसएमई क्षेत्र के लिए ‘गेमचेंजर’ सिद्ध होगा। टेक्सटाइल, कार्पेट, लेदर, गृहसज्जा और कृषि आधारित उद्योगों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा, जिससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन संभव है। भदोही–मिर्जापुर का कालीन उद्योग और वाराणसी के रेशम व हैंडलूम उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बेहतर पहुँच मिलने की संभावना है। इसी तरह मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर के गृहसज्जा एवं हस्तशिल्प उद्योगों के लिए भी यह समझौता अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अंततः प्रश्न यह उठता है कि क्या इस संपूर्ण घटनाक्रम का सबसे बड़ा ‘गेमचेंजर’ अमेरिका द्वारा जारी भारत का मानचित्र है? उत्तर संभवतः हाँ में है। यह मानचित्र अमेरिका के रुख में आए एक बड़े और स्पष्ट परिवर्तन को रेखांकित करता है। चीन और पाकिस्तान की चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि यह केवल कागज पर खींची गई रेखाएँ नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक कूटनीति का संकेत है। भारत–अमेरिका संबंधों में यह नया अध्याय आर्थिक साझेदारी के साथ-साथ भारत की क्षेत्रीय अखंडता के अंतरराष्ट्रीय समर्थन की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हो सकता है।
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