कहा जाता है कि प्रत्येक मनुष्य अनेक भावों के साथ जीता है। अलग-अलग भाव के साथ मनुष्य का जीवन जुड़ा रहता है। वह जो भी कार्य करता है उस कार्य का सीधा संबंध हमारे भावों के साथ होता है। चाहे हम खुश हों, दुखी हों या फिर क्रोधित हों ये सभी क्रिया के दौरान हमारे अलग-अलग भाव जागृत रहते हैं। इन्हीं में से एक है भय। भय एक स्वाभाविक और शक्तिशाली भावना है जो किसी खतरे, नुकसान या पीड़ा की आशंका से उत्पन्न होती है, जिससे शारीरिक और मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं, जो हमें 'लड़ो या भागो' प्रतिक्रिया के लिए तैयार करती हैं, और यह स्थिति के अनुसार तर्कसंगत या अतार्किक हो सकती है, जिसका प्रबंधन आत्म-नियंत्रण और जागरूकता से किया जा सकता है। इसी कारण हम जाने अनजाने में अपने अंदर रहने वाले भाव के जागृत होने से भय की अनुभूति करते हैं और कभी-कभी उसे अपने ऊपर हावी कर बैठते हैं। हम सोचते हैं कि भय होना जरूरी है क्या? किसी भी चीज के लिए पहले से आभास होना या उसके लिए सचेत रहना आवश्यक है । लेकिन उसे हम भय नहीं कह सकते हैं । भय वो चीज है जो हमें कमजोर बना देता है । हमारे सोच को संकुचित कर देता है। हम किसी भी अन्य चीज को भय होने पर नहीं सोच पाते हैं। भय हमारे मनोबल को पीछे धकेल देता है । कोई भी चीज करने से पहले ही हमारे अंदर नकारात्मक विचारों की उत्पत्ति होने लगती है। ना चाहते हुए भी हम लगातार उसी के बारे में सोचते हैं । इसी कारण जब भी हमें डर लगता है या फिर भय होता है तो ये हमेशा हमें पीछे धकेलने का कार्य करता है।
भय हमारे अंदर रहने वाला वो शत्रु है जो हमेशा हमारे मनोबल को कमजोर कर देता है । कोई भी कार्य घटने से पहले जो आभास होता है वो अपनी पूर्वअनुभूति के आधार पर होता है। वो हमारे लिए फैला मंद हो सकता है । चीजों को सही रुप से जानने के लिए, परखने के लिए हमें किसी ना किसी के सहयोग की आवश्यकता हो जाती है । उदाहरण के रूप से जब हम घने जंगल में सफ़र कर रहे होते हैं और हमारे सामने कोई हिंसक पशु के आने की संभावना होती है तो उसके लिए तैयार रहना भय नहीं हो सकता है या फिर आधी रात को अकेले सूनसान रास्ते पर कुछ कीमती चीजों के साथ जाना हमारे मन में पहले से दुर्घटना का आभास कराता है। उसे नकारने की इच्छा रखना भय नहीं हो सकता है। भय एक प्रकार से देखा जाए तो कोई भी कार्य होने से पहले वाली आभास है या पूर्वाभास है । हमें यह देखना है कि परिणाम क्या होगा। जब परिणाम भयंकर या जानलेवा होता है तो उससे बचना ग़लत नहीं होगा । लेकिन हर कार्य से पहले उसका पूर्वाभास करना कि परिणाम क्या होगा तो वो हमारे अंदर नकारने की इच्छा बना लेता है । कभी-कभी तो हम समाज या फिर अपने आस पास रहने वाले लोगों के लिए भी यह भाव आता है कि वो क्या सोचेंगे.. तो हम उनके सामने रहने वाले विचारों के प्रति सचेत रहते हैं । कभी- कभी तो यही भय एक कारण बन जाता है जो हमारे मन में आने वाले अनेक इच्छाओं को दबा देता है। हमारे कार्य से किसको क्या फर्क पड़ सकता है । ये भय सबसे अधिक खतरनाक होता है ।जिसके अंदर ये भय आ जाता है वो खुल कर जीवन जी नहीं पाता है । यही कारण है कि भय दिनों दिन मन को दुर्बल बना देता है। यह मनुष्य को खोखला कर देता है । हमारे सोचने और समझने की शक्ति को या कहें कि क्षमता को खत्म कर देता है। हमारे सामने रहने वाले सभी लोग..उनकी सोच धीरे-धीरे हमारे ऊपर हावी होने लग जाती है। देखा जाए तो केवल अपने अंदर के भय के कारण हम अपने मूल अस्तित्व से दूर हो जाते हैं।
अपने आप को भय शून्य करने का एक ही रास्ता है वो यह है कि हमें अपने आत्मविश्वास को सुदृढ़ करना होगा । बाहरी भाव को अंतर्निहित करने से रोकना होगा। हमारे अंदर रहने वाले परम शक्ति को अनुभव करना होगा। ख़ुद को आध्यात्मिक रास्ते पर ले जाना होगा। निरंतर खुद की खोज करनी होगी । इसे उम्र के तराजू में तौला नहीं जा सकता, बस इसे समझना होगा। आप जितना जल्दी अपने आपको समझ जाओगे आपको जीवन जीने में उतनी ही आसानी हो जाएगी । जब आप भय से मुक्त हो जाओगे तब आप जीवन का आनंद ले पाओगे ।लेकिन सही आध्यात्मिक रास्ता भी चुनना आवश्यक है । जिसमें धर्म के प्रति भय ना हो जिसमे आप पूरी तरह से चेतना से भरे हों और उसे खुलकर जीने का अभ्यास हो । जीवन ऐसा हो की अगर भय या डर जो भी हो तो आप को उसके परिणाम की चिंता ना हो...बल्कि आप यह सोचे कि इससे कैसे पार पाया जा सके । भय जरूर करो लेकिन अपने दुष्कर्मों और दुश्चिंता का करो । जिसका परिणाम आगे आप को ही देखना है । एक सच्ची और अच्छी सोच रख कर जीवन बिताओ जिसमें कोई भय ना हो केवल आनंद ही आनंद हो ,भय को हराना है तो यह जरुरी हो जाता है कि हमें आत्मचिंतन करना बेहद जरूरी हो जाता है क्योंकि अगर हम आत्मचिंतन करेंगे तो हम भय जैसे तमाम भावों से दूर रह पाएंगे ।

उपाली अपराजिता
Leave Your Comment