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वर्ण से वोट-बैंक तक : खंडित राजनीति से अंबेडकर की दृष्टि को मुक्त करने का समय

From Varna to Vote-Bank: Time to Liberate Ambedkar’s Vision from Fragmented Politics


नीलाभ कृष्ण


भारत आज ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ एक ओर वह विकसित भारत के संकल्प के साथ 21वीं सदी की आर्थिक, तकनीकी और सामरिक शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है, तो दूसरी ओर उसकी राजनीति को बार-बार अतीत की सामाजिक विभाजक रेखाओं की ओर लौटाने का प्रयास किया जा रहा है। राष्ट्रीय जाति जनगणना की मांग इसी राजनीतिक विमर्श का नया केंद्र बनती दिखाई दे रही है। सामाजिक वास्तविकताओं को समझने और वंचित समुदायों की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन करने के लिए आंकड़ों की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन प्रश्न तब उठता है जब जनगणना का उद्देश्य सामाजिक स्थिति को समझने से आगे बढ़कर राजनीतिक हिस्सेदारी का स्थायी गणित बन जाए।

आज “जिसकी जितनी आबादी, उसका उतना हक” जैसे नारे इसी नई राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। सुनने में यह प्रतिनिधित्व और न्याय की भाषा लगती है, लेकिन इसके भीतर एक गंभीर राजनीतिक खतरा छिपा है। यदि प्रत्येक नागरिक को पहले उसकी जाति के सदस्य के रूप में देखा जाएगा, फिर उस जाति को एक राजनीतिक समूह में बदला जाएगा और अंततः उसकी संख्या के आधार पर सत्ता, संसाधन और अवसरों का दावा किया जाएगा, तो भारतीय नागरिकता धीरे-धीरे साझा राष्ट्रीय पहचान से हटकर प्रतिस्पर्धी सामाजिक समूहों की पहचान में बदल सकती है। भारत की सामाजिक संरचना अत्यंत जटिल और बहुस्तरीय रही है। वर्ण, जाति, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय, पेशा और स्थानीय परंपराओं ने मिलकर भारतीय समाज को आकार दिया है। इसे केवल कुछ स्थिर जातीय खानों में बंद करके देखना भारतीय सभ्यता की वास्तविक विविधता को समझना नहीं, बल्कि उसे राजनीतिक गणित में सीमित करना है।

आज भारत को जिस ऊर्जा की आवश्यकता है, वह यह पूछने में नहीं कि किस जाति की आबादी कितनी है और उसका राजनीतिक हिस्सा कितना होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करने में है कि भारत की प्रत्येक प्रतिभा को आगे बढ़ने का अवसर कैसे मिले। जब देश कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, रक्षा तकनीक, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है, तब राजनीति का बार-बार जातीय गणित में लौटना राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए गंभीर विचलन है। भारत को अपनी सामाजिक वास्तविकताओं को समझना चाहिए, लेकिन अपनी राजनीतिक नियति को जातीय पहचान के हवाले नहीं करना चाहिए।

अंबेडकर को वामपंथी आख्यानों से मुक्त करने की आवश्यकता

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक और सामाजिक चिंतकों में से एक हैं। दुर्भाग्य यह है कि उनकी विरासत का राजनीतिक उपयोग जितना व्यापक हुआ है, उनकी मूल बौद्धिक दृष्टि का अध्ययन उतना ही सीमित होता गया है। अंबेडकर को अक्सर केवल जाति-आधारित राजनीति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके नाम का उपयोग सामाजिक पहचान को राजनीतिक लामबंदी में बदलने के लिए किया जाता है। लेकिन अंबेडकर का वास्तविक बौद्धिक संघर्ष कहीं अधिक गहरा था। उनका लक्ष्य जाति को राजनीतिक रूप से मजबूत करना नहीं, बल्कि जाति की सामाजिक सत्ता को समाप्त करना था।

उनकी प्रसिद्ध कृति Annihilation of Caste अर्थात जाति का विनाश इसका सबसे स्पष्ट प्रमाण है। अंबेडकर का प्रश्न यह नहीं था कि जातियों के बीच सत्ता और संसाधनों का विभाजन किस अनुपात में किया जाए। उनका मूल प्रश्न था कि ऐसा समाज बनाया ही क्यों जाए जिसमें मनुष्य की सामाजिक प्रतिष्ठा, अवसर और संबंध जन्म से निर्धारित हों? उन्होंने जाति को केवल सामाजिक पहचान नहीं माना, बल्कि ऐसी व्यवस्था के रूप में देखा जो मनुष्य को जन्म के आधार पर श्रेणियों में विभाजित करती है और सामाजिक एकता को बाधित करती है। अंबेडकर की दृष्टि में राजनीतिक लोकतंत्र तभी टिक सकता है जब उसके पीछे सामाजिक लोकतंत्र की नींव हो। स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व उनके लिए अलग-अलग आदर्श नहीं थे। वे एक-दूसरे के पूरक थे। स्वतंत्रता बिना समानता के विशेषाधिकार बन सकती है, समानता बिना स्वतंत्रता के दमन में बदल सकती है और दोनों बिना बंधुत्व के स्थायी नहीं रह सकते।

यहीं आधुनिक जातीय राजनीति का अंतर्विरोध सामने आता है। यदि लक्ष्य जाति का विनाश है, तो क्या ऐसी राजनीति उचित है जो नागरिकों को लगातार अपनी जाति की संख्या, राजनीतिक शक्ति और हिस्सेदारी के प्रति जागरूक बनाए रखे? यदि हर चुनाव में व्यक्ति से पहले उसकी जाति पूछी जाएगी और हर सरकारी नीति को जातीय हिस्सेदारी के चश्मे से देखा जाएगा, तो जाति समाप्त कैसे होगी?

ऐतिहासिक वंचना को पहचानना आवश्यक है। भेदभाव का समाधान भी आवश्यक है। सकारात्मक कार्रवाई की आवश्यकता भी उन परिस्थितियों में समझी जा सकती है जहाँ सामाजिक और आर्थिक बाधाओं ने अवसरों को असमान बनाया है। लेकिन सामाजिक न्याय का अंतिम लक्ष्य व्यक्ति को उसकी जन्म-परिचय की कैद से मुक्त करना होना चाहिए, न कि उस पहचान को स्थायी राजनीतिक पासपोर्ट बना देना। अंबेडकर का सपना ऐसा भारत था जिसमें जाति मनुष्य की नियति तय न करे। इसके विपरीत, “जिसकी जितनी आबादी, उसका उतना हक” का राजनीतिक सिद्धांत नागरिकता को संख्या में बदलने का खतरा पैदा करता है। वह व्यक्ति को पहले जाति का प्रतिनिधि और बाद में भारत का नागरिक बना सकता है। यह अंबेडकर की दृष्टि से मूलभूत विचलन है।

सामाजिक विभाजन को राजनीतिक हथियार बनाने का खतरा

जाति आधारित राजनीति की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसकी कोई स्वाभाविक अंतिम सीमा नहीं होती। एक बार जाति राजनीतिक अधिकारों और संसाधनों का प्राथमिक आधार बन जाए तो प्रत्येक समूह अपने भीतर भी प्रतिनिधित्व का नया गणित खोजने लगता है। एक जाति कहेगी कि दूसरी जाति को अधिक लाभ मिला। उसके भीतर की उप-जाति कहेगी कि बड़ी जाति ने उसका हिस्सा रोक लिया। फिर उप-वर्गीकरण की मांग उठेगी। उसके बाद अलग कोटा, अलग प्रतिनिधित्व और अलग राजनीतिक पहचान की मांग सामने आएगी। इस प्रकार सामाजिक न्याय का विमर्श धीरे-धीरे स्थायी प्रतिस्पर्धा में बदल सकता है। भारत को ऐसी राजनीति की आवश्यकता नहीं है जिसमें प्रत्येक सामाजिक समूह को यह विश्वास दिलाया जाए कि उसका अधिकार किसी दूसरे समूह के हिस्से से ही निकलेगा। यह स्थिति केवल सामाजिक तनाव नहीं बढ़ाती, बल्कि राज्य की संस्थागत क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है। भारत जैसे विशाल देश को मजबूत संस्थानों की आवश्यकता है—ऐसे संस्थान जो प्रतिभा, दक्षता, ईमानदारी और क्षमता को प्रोत्साहित करें। यह स्वीकार करना होगा कि merit किसी सामाजिक शून्य में पैदा नहीं होती। जिन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, डिजिटल साधन और आर्थिक सुरक्षा नहीं मिलती, उनसे समान प्रारंभिक स्थिति में प्रतिस्पर्धा की अपेक्षा करना वास्तविक समानता नहीं है। लेकिन इसका समाधान प्रतिभा और दक्षता को ही संदेह की दृष्टि से देखना नहीं हो सकता। सही रास्ता है—merit pool को व्यापक बनाना।

बेहतर सरकारी विद्यालय, गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा, छात्रवृत्ति, कौशल विकास, डिजिटल कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य सेवाएं, उद्यमिता और सुलभ पूंजी—ये वे साधन हैं जिनके माध्यम से समाज के वंचित वर्गों को सक्षम बनाया जा सकता है। सामाजिक न्याय का लक्ष्य यह होना चाहिए कि अधिक से अधिक लोग प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में आएं; न कि प्रतिस्पर्धा की जगह स्थायी सामाजिक खानों का निर्माण हो। यह प्रश्न राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ा है।

भारत की शक्ति केवल उसकी सेना, अर्थव्यवस्था या जनसंख्या में नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक एकता में भी निहित है। बाहरी शक्तियां हमेशा किसी देश की आंतरिक कमजोरियों का लाभ उठाने का प्रयास करती हैं। यदि समाज की प्रत्येक विभाजन रेखा को राजनीतिक रूप से सक्रिय कर दिया जाए, तो बाहरी हस्तक्षेप और दुष्प्रचार के लिए अवसर बढ़ते हैं।

21वीं सदी में वैश्विक शक्ति बनने के लिए भारत को सामाजिक रूप से आत्मविश्वासी, आर्थिक रूप से उत्पादक और राजनीतिक रूप से स्थिर होना होगा। जो राष्ट्र अपनी आंतरिक ऊर्जा का बड़ा हिस्सा एक-दूसरे से हिस्सेदारी मांगने में खर्च करता है, वह विश्व व्यवस्था को प्रभावित करने के लिए आवश्यक ऊर्जा कैसे जुटाएगा? भारत को यह तय करना होगा कि वह अपनी विविधता को शक्ति बनाएगा या उसे स्थायी राजनीतिक संघर्ष का आधार बनने देगा।

राष्ट्रवादी विकल्प: समरसता का मार्ग

भारत के सामने विकल्प केवल दो नहीं हैं—या तो जातिगत अन्याय को स्वीकार करो या जाति-आधारित राजनीति को अनंतकाल तक जारी रखो। भारतीय सभ्यता के पास तीसरा और अधिक रचनात्मक रास्ता है—समरसता।

समरसता का अर्थ यह नहीं कि भारत के सामाजिक इतिहास में असमानताएं थीं ही नहीं। इसका अर्थ यह भी नहीं कि ऐतिहासिक अन्याय को भुला दिया जाए। समरसता का अर्थ है कि सामाजिक न्याय की यात्रा का अंतिम लक्ष्य सामाजिक विभाजनों को स्थायी बनाना नहीं, बल्कि उन्हें अप्रासंगिक बनाना हो। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता

भारतीय समाज के भीतर सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध संघर्ष कोई आधुनिक राजनीतिक आविष्कार नहीं है। भक्ति आंदोलन ने सदियों पहले धार्मिक और सामाजिक श्रेष्ठताबोध को चुनौती दी थी।

रामानुजाचार्य ने भक्ति को व्यापक सामाजिक आधार दिया। कबीर ने धार्मिक पाखंड और सामाजिक अहंकार पर तीखा प्रहार किया। संत रविदास ने ऐसी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की जिसमें मनुष्य की गरिमा जन्म से निर्धारित न हो। इन संत परंपराओं का महत्व केवल उनके धार्मिक योगदान तक सीमित नहीं है। वे भारतीय समाज के भीतर से उठी उस आत्म-सुधार की परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने मनुष्य की आध्यात्मिक गरिमा को जन्म से ऊपर रखा।

आधुनिक काल में अनेक सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलनों ने अस्पृश्यता और जातिगत अहंकार के विरुद्ध संघर्ष किया। यह समझना आवश्यक है कि किसी समाज का सुधार केवल कानून से नहीं होता। सामाजिक मानसिकता का परिवर्तन भी उतना ही आवश्यक है। इसलिए समरसता का अर्थ है—अपने समाज के भीतर से उस मानसिकता को समाप्त करना जो जन्म के आधार पर श्रेष्ठता या हीनता पैदा करती है। जाति का राजनीतिक विस्तार नहीं, जातिगत अहंकार का सामाजिक अंत—यही अधिक स्थायी समाधान है।

आर्थिक पहचान को जन्म से अलग करना

जाति को कमजोर करने का सबसे प्रभावी माध्यम केवल राजनीतिक भाषण नहीं, बल्कि आर्थिक अवसर है। जब किसी व्यक्ति की आय, रोजगार, उद्यम और सफलता उसके जन्म से कम और उसकी योग्यता, कौशल तथा परिश्रम से अधिक निर्धारित होने लगती है, तब जाति की आर्थिक शक्ति स्वाभाविक रूप से कम होती है। यहीं भारत की डिजिटल और आर्थिक परिवर्तन यात्रा महत्वपूर्ण हो जाती है।

डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना ने लाखों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ने के नए अवसर पैदा किए हैं। डिजिटल भुगतान, बैंकिंग, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और वित्तीय समावेशन ने उन लोगों के लिए आर्थिक भागीदारी के रास्ते खोले हैं जिनके पास परंपरागत आर्थिक नेटवर्क नहीं थे। पूंजी का लोकतंत्रीकरण भी इसी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

MUDRA जैसे कार्यक्रमों ने छोटे उद्यमियों और सूक्ष्म व्यवसायों को संस्थागत ऋण तक पहुंच देने की कोशिश की है। इसका महत्व केवल ऋण की संख्या में नहीं है। इसका बड़ा अर्थ यह है कि उद्यमिता को पारंपरिक पूंजी, पारिवारिक नेटवर्क और स्थापित कारोबारी समुदायों के एकाधिकार से बाहर निकाला जा सकता है।

एक युवा दर्जी, दुकानदार, कारीगर, सेवा प्रदाता, महिला उद्यमी या पहली पीढ़ी का व्यवसायी यदि औपचारिक वित्तीय प्रणाली तक पहुंच बना सकता है, तो आर्थिक सफलता का आधार धीरे-धीरे जन्म से हटकर क्षमता की ओर जाता है। यही वास्तविक सामाजिक परिवर्तन है। जाति किसी व्यक्ति की सांस्कृतिक पहचान हो सकती है; लेकिन वह उसकी आर्थिक नियति नहीं होनी चाहिए।

संतृप्ति आधारित कल्याण: गरीबी पर प्रहार, पहचान पर नहीं

सामाजिक विभाजन को कमजोर करने का तीसरा रास्ता है—ऐसी कल्याणकारी व्यवस्था जो लाभार्थी को उसकी जाति के कारण नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक आवश्यकता के आधार पर पहचाने।

आवास, स्वच्छता, स्वास्थ्य, पेयजल, बिजली, वित्तीय समावेशन, सामाजिक सुरक्षा और अन्य मूलभूत सुविधाएं जब गरीब परिवार तक पहुंचती हैं, तो राज्य और नागरिक के बीच संबंध बदलता है। एक गरीब परिवार को घर इसलिए मिले कि उसे घर की आवश्यकता है; उसे स्वच्छता इसलिए मिले कि वह गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार रखता है; उसे स्वास्थ्य सेवा इसलिए मिले कि बीमारी गरीबी को और गहरा न करे—यह कल्याण की अधिक मानवीय अवधारणा है।

संतृप्ति आधारित कल्याण की शक्ति इसी में है कि राज्य पात्र नागरिक तक पहुंचने का प्रयास करता है, न कि केवल राजनीतिक रूप से प्रभावशाली समूहों तक। इससे सामाजिक पहचान का राजनीतिक मूल्य धीरे-धीरे कम किया जा सकता है। सच्चा सामाजिक न्याय वह होगा जिसमें गरीबी पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत न बने। अवसर भी जन्म से निर्धारित न हो। गरीबी वंशानुगत नहीं, अवसर सार्वभौमिक—यही कल्याणकारी राज्य का लक्ष्य होना चाहिए।

भारत को जाति की गणना से आगे बढ़ना होगा

भारत को अपनी सामाजिक वास्तविकताओं से आंखें नहीं मूंदनी चाहिए। जातिगत भेदभाव, ऐतिहासिक वंचना और सामाजिक असमानताओं को समझना आवश्यक है। आंकड़े भी आवश्यक हैं। लेकिन आंकड़ों का उद्देश्य समाज को हमेशा के लिए राजनीतिक खानों में बांटना नहीं होना चाहिए। किसी भी सामाजिक नीति का अंतिम लक्ष्य ऐसी स्थिति बनाना होना चाहिए जहाँ जन्म की पहचान अवसर का निर्णायक कारक न रहे। भारत को एक ऐसी राजनीति चाहिए जो यह पूछे कि कितने लोग शिक्षा से वंचित हैं, कितने परिवार गरीबी से बाहर आ सकते हैं, कितने युवाओं को कौशल चाहिए, कितने उद्यमियों को पूंजी चाहिए और कितने नागरिकों तक स्वास्थ्य एवं आवास की सुविधा पहुंचानी है।

हमें यह भी पूछना चाहिए कि अगली पीढ़ी में जाति की सामाजिक शक्ति कैसे कम की जाए। क्योंकि यदि हर पीढ़ी को फिर उसी जातीय पहचान के आधार पर राजनीतिक रूप से संगठित करना पड़े, तो यह सामाजिक न्याय की सफलता नहीं, उसकी स्थायी विफलता होगी। डॉ. अंबेडकर का वास्तविक महत्व इसी चुनौती में निहित है। उन्होंने भारत को केवल राजनीतिक लोकतंत्र देने की बात नहीं की; उन्होंने सामाजिक लोकतंत्र की चेतना जगाई। उनकी दृष्टि में मनुष्य की अंतिम पहचान उसकी जन्मगत श्रेणी नहीं, बल्कि उसकी समान मानवीय गरिमा थी। आज भारत को इसी विचार को पुनः केंद्र में लाने की आवश्यकता है।

विकसित भारत का निर्माण जातीय प्रतिस्पर्धा की अंतहीन सीढ़ी पर चढ़कर नहीं होगा। यह शिक्षा, नवाचार, उद्यमिता, तकनीक, मजबूत संस्थानों, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के आधार पर होगा। भारत को अपनी विविधता को मिटाना नहीं है। उसे एक उच्चतर राष्ट्रीय एकता में रूपांतरित करना है। समरसता का अर्थ एकरूपता नहीं है। समरसता का अर्थ है—विविधता के भीतर समान गरिमा। और अंततः भारत के नागरिक की सबसे बड़ी पहचान क्या होगी?

न उसकी जाति।
न उसकी उपजाति।
न उसका क्षेत्र।
न उसका राजनीतिक वोट-बैंक। बल्कि—भारतीय।

यही पहचान बाकी सभी पहचानों को नष्ट नहीं करती; उन्हें एक बड़े राष्ट्रीय वृत्त में समाहित करती है। जब एक युवा अपने सपने से पहले अपनी जाति नहीं पूछेगा, जब एक उद्यमी अपने अवसर से पहले अपना उपनाम नहीं देखेगा, जब एक छात्र अपनी क्षमता को जन्म की सीमा से नहीं तौलेगा और जब समाज व्यक्ति को उसके कर्म से पहचानना शुरू करेगा—तभी भारत वास्तव में जातिगत विभाजनों से आगे बढ़ेगा।  भारत को जाति की गणना से नागरिकता की चेतना तक जाना होगा.. वर्ण से नागरिकता तक..जाति से समरसता तक.. वोट-बैंक से राष्ट्र-बोध तक और विभाजन से विकसित भारत तक।

अंततः अंबेडकर को राजनीतिक नारों से नहीं, उनकी मूल बौद्धिक आकांक्षा से पुनः प्राप्त करना होगा—एक ऐसा भारत जहाँ स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व केवल संविधान के शब्द न रहें, बल्कि करोड़ों भारतीयों के दैनिक जीवन की वास्तविकता बनें। यही अंबेडकर की दृष्टि का सार है। और यही भारत की सभ्यतागत यात्रा का अगला चरण भी होना चाहिए।


(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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