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ओडिशा से जापान तक : भारत की हरित ऊर्जा क्रांति और बदलती वैश्विक शक्ति का नया अध्याय

From Odisha to Japan: A New Chapter in India's Green Energy Revolution and Shifting Global Power.

बिदिया कुमारी


दुनिया में कुछ परिवर्तन ऐसे होते हैं जो किसी युद्ध, चुनाव या आर्थिक संकट की तरह सुर्खियां नहीं बनते। वे चुपचाप होते हैं, लेकिन आने वाले दशकों की दिशा तय कर देते हैं। भारत और जापान के बीच हुआ 25 वर्षों का ग्रीन अमोनिया आपूर्ति समझौता भी ऐसा ही एक क्षण है। पहली नज़र में यह एक सामान्य व्यापारिक अनुबंध प्रतीत हो सकता है—एक भारतीय कंपनी ओडिशा में हरित अमोनिया का उत्पादन करेगी और उसे जापान भेजेगी। लेकिन यदि इस समझौते को वैश्विक ऊर्जा राजनीति, जलवायु परिवर्तन, औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और भू-रणनीति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो स्पष्ट हो जाता है कि यह केवल ईंधन की आपूर्ति का सौदा नहीं है। यह उस नई विश्व व्यवस्था का संकेत है, जिसमें भारत पहली बार ऊर्जा आयातक से ऊर्जा निर्यातक बनने की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है।

यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। पिछले सात दशकों में भारत की विकास यात्रा का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा आयात पर निर्भर रहा है। हर बार जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती थीं, उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, महंगाई और चालू खाते के घाटे पर पड़ता था। ऊर्जा सुरक्षा हमेशा भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौतियों में से एक रही। लेकिन आज तस्वीर बदल रही है। भारत अब केवल यह नहीं सोच रहा कि उसे ऊर्जा कहाँ से मिलेगी; वह यह भी सोच रहा है कि भविष्य की दुनिया को ऊर्जा कैसे उपलब्ध कराई जाएगी। यही सोच भारत को वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन के केंद्र में ला रही है।

ग्रीन हाइड्रोजन को अक्सर भविष्य का ईंधन कहा जाता है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा से प्राप्त बिजली द्वारा पानी का इलेक्ट्रोलिसिस करके बनाया जाता है। इस प्रक्रिया में कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है। लेकिन हाइड्रोजन की एक बड़ी व्यावहारिक समस्या है। इसे लंबे समय तक संग्रहित करना और हजारों किलोमीटर दूर सुरक्षित ढंग से ले जाना अत्यंत कठिन और महंगा है। वैज्ञानिकों और उद्योग जगत ने इसका समाधान ग्रीन अमोनिया के रूप में खोजा। हाइड्रोजन को नाइट्रोजन के साथ मिलाकर अमोनिया बनाया जाता है, जिसे आसानी से जहाजों द्वारा दुनिया के किसी भी हिस्से तक पहुँचाया जा सकता है। गंतव्य पर पहुँचकर इसे सीधे ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर दोबारा हाइड्रोजन में परिवर्तित किया जा सकता है। इसी कारण ग्रीन अमोनिया को वैश्विक ऊर्जा व्यापार का सबसे व्यावहारिक माध्यम माना जा रहा है।

यही वह बिंदु है जहाँ भारत की संभावनाएँ असाधारण रूप से उभरती हैं। दुनिया के अधिकांश विकसित देशों के पास तकनीक तो है, लेकिन उनके पास पर्याप्त भूमि, सस्ती नवीकरणीय ऊर्जा और विशाल उत्पादन क्षमता नहीं है। दूसरी ओर भारत के पास तेज़ी से बढ़ती सौर और पवन ऊर्जा क्षमता, विशाल समुद्री तट, अनुकूल जलवायु, कम उत्पादन लागत और युवा मानव संसाधन मौजूद हैं। यही कारण है कि वैश्विक निवेशकों की नज़र अब भारत पर टिक गई है। वे भारत को केवल 140 करोड़ लोगों का बाज़ार नहीं, बल्कि भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा का कारखाना मानने लगे हैं।

इस पूरे परिवर्तन में ओडिशा की भूमिका विशेष महत्व रखती है। लंबे समय तक यह राज्य लौह अयस्क, बॉक्साइट, कोयला और अन्य खनिजों की प्रचुरता के लिए जाना जाता रहा। भारत के औद्योगिक विकास में इसकी भूमिका मुख्यतः कच्चे संसाधन उपलब्ध कराने तक सीमित मानी जाती थी। लेकिन अब ओडिशा अपनी नई पहचान गढ़ रहा है। पारादीप जैसे आधुनिक बंदरगाह, विस्तृत समुद्री तट, औद्योगिक कॉरिडोर, उपलब्ध भूमि और नवीकरणीय ऊर्जा की अपार संभावनाएँ इसे ग्रीन हाइड्रोजन तथा ग्रीन अमोनिया उत्पादन का स्वाभाविक केंद्र बना रही हैं। यह परिवर्तन केवल उद्योग का विस्तार नहीं है; यह पूरे राज्य की आर्थिक संरचना को बदलने वाला कदम हो सकता है।

कल्पना कीजिए कि आने वाले वर्षों में ओडिशा के तटीय क्षेत्रों में विशाल सौर पार्क स्थापित होंगे। उन्हीं से प्राप्त बिजली से इलेक्ट्रोलाइज़र पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित करेंगे। फिर उसी हाइड्रोजन से ग्रीन अमोनिया का उत्पादन होगा। बंदरगाहों से विशेष जहाज इस ईंधन को जापान सहित दुनिया के अन्य देशों तक पहुँचाएँगे। इस पूरी प्रक्रिया में हजारों प्रत्यक्ष और लाखों अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होंगे। इंजीनियरों, तकनीशियनों, वैज्ञानिकों, बंदरगाह कर्मियों, परिवहन क्षेत्र और स्थानीय उद्योगों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। यह केवल एक संयंत्र नहीं होगा; यह एक नए औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा।

यहीं पर भारत-जापान समझौते का महत्व और बढ़ जाता है। ऊर्जा क्षेत्र में दीर्घकालिक अनुबंध केवल उत्पाद की खरीद-बिक्री नहीं होते, बल्कि वे भविष्य की रणनीतिक साझेदारियों की नींव रखते हैं। जापान दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन उसके पास ऊर्जा संसाधन अत्यंत सीमित हैं। वह दशकों से अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर निर्भर रहा है। वर्ष 2011 की फुकुशिमा परमाणु दुर्घटना के बाद जापान की ऊर्जा नीति में बड़ा बदलाव आया। परमाणु ऊर्जा के प्रति संदेह बढ़ा और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों की खोज तेज़ हो गई। आज जापान ने 2050 तक कार्बन न्यूट्रल बनने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसे विशाल मात्रा में ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया की आवश्यकता होगी।

प्रश्न यह है कि जापान ने भारत को क्यों चुना?

इसका उत्तर केवल लागत में नहीं, बल्कि भरोसे में छिपा है। भारत और जापान के संबंध पिछले एक दशक में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुए हैं। दोनों देश केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक सहयोगी भी हैं। बुलेट ट्रेन परियोजना, औद्योगिक कॉरिडोर, सेमीकंडक्टर सहयोग, रक्षा अभ्यास, समुद्री सुरक्षा और क्वाड जैसी पहलों ने दोनों देशों के बीच विश्वास की ऐसी नींव तैयार की है, जिस पर अब ऊर्जा सहयोग का यह नया स्तंभ खड़ा हो रहा है।

जापान जानता है कि भविष्य की ऊर्जा आपूर्ति केवल सस्ती नहीं, बल्कि सुरक्षित और विश्वसनीय भी होनी चाहिए। दुनिया ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान देखा कि जब ऊर्जा आपूर्ति राजनीतिक संकटों में फँस जाती है, तो पूरी अर्थव्यवस्था हिल जाती है। जापान ऐसे जोखिमों को कम करना चाहता है। भारत उसे एक लोकतांत्रिक, स्थिर, नियम-आधारित और दीर्घकालिक साझेदार के रूप में दिखाई देता है। यही कारण है कि उसने केवल कुछ वर्षों के लिए नहीं, बल्कि पूरे पच्चीस वर्षों के लिए भारत के साथ हाथ मिलाया है।

यहाँ से कहानी केवल भारत और जापान तक सीमित नहीं रहती। यह उस वैश्विक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन जाती है जिसमें ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, चिली और चीन जैसे देश भी ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया के क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में जो देश इस क्षेत्र में शुरुआती बढ़त हासिल करेगा, वही भविष्य के ऊर्जा व्यापार में निर्णायक भूमिका निभाएगा। भारत ने इस दौड़ में अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है, लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी है।

यदि इस पूरे घटनाक्रम को केवल एक औद्योगिक परियोजना मान लिया जाए, तो शायद इसकी वास्तविक महत्ता समझ में नहीं आएगी। दरअसल, यह उस व्यापक रणनीति का परिणाम है जिसे भारत ने पिछले एक दशक में चरणबद्ध ढंग से विकसित किया है। जिस प्रकार बीसवीं शताब्दी में तेल केवल एक ऊर्जा स्रोत नहीं, बल्कि भू-राजनीति का सबसे प्रभावशाली हथियार बन गया था, उसी प्रकार इक्कीसवीं शताब्दी में ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया ऊर्जा, उद्योग और अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन की नई धुरी बनने जा रहे हैं। भारत ने इस परिवर्तन को समय रहते पहचान लिया है और यही कारण है कि आज उसकी ऊर्जा नीति केवल घरेलू आवश्यकताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक बाज़ारों को ध्यान में रखकर तैयार की जा रही है।

भारत की इस महत्वाकांक्षी यात्रा का औपचारिक आधार राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन (National Green Hydrogen Mission) है, जिसकी घोषणा वर्ष 2023 में की गई। इस मिशन का उद्देश्य केवल हरित हाइड्रोजन का उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरे मूल्य-श्रृंखला (Value Chain) का निर्माण करना है। इसमें नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण, हाइड्रोजन भंडारण, ग्रीन अमोनिया उत्पादन, निर्यात अवसंरचना और अनुसंधान एवं विकास को एक साथ जोड़ा गया है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत केवल ईंधन नहीं बनाना चाहता, बल्कि उस संपूर्ण औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना चाहता है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक ऊर्जा व्यापार को संचालित करेगा।

सरकार ने इस क्षेत्र में निजी निवेश को आकर्षित करने के लिए अनेक प्रोत्साहन योजनाएँ भी शुरू की हैं। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI), बंदरगाहों के आधुनिकीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता विस्तार और इलेक्ट्रोलाइज़र निर्माण को बढ़ावा देने जैसी नीतियाँ इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। परिणामस्वरूप देश के कई बड़े औद्योगिक समूह ग्रीन हाइड्रोजन और ग्रीन अमोनिया परियोजनाओं में भारी निवेश कर रहे हैं। यह प्रतिस्पर्धा केवल घरेलू बाजार के लिए नहीं है, बल्कि भविष्य के वैश्विक निर्यात बाजार पर कब्ज़ा करने की तैयारी है।

इस पूरी रणनीति को समझने के लिए यह जानना भी आवश्यक है कि दुनिया आज भारत की ओर क्यों देख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण है—कम लागत पर स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन की क्षमता। भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जहाँ सौर ऊर्जा की लागत सबसे कम है। राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में विशाल सौर एवं पवन ऊर्जा परियोजनाएँ तेजी से विकसित हो रही हैं। जब बिजली सस्ती होगी, तभी ग्रीन हाइड्रोजन भी प्रतिस्पर्धी कीमत पर तैयार किया जा सकेगा। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।

इसके अतिरिक्त भारत के पास लंबी समुद्री तटरेखा और आधुनिक बंदरगाहों का नेटवर्क है। ग्रीन अमोनिया जैसे उत्पादों के निर्यात के लिए यह एक महत्वपूर्ण लाभ है। पारादीप, कांडला, मुंद्रा, विशाखापट्टनम और तूतीकोरिन जैसे बंदरगाह भविष्य में केवल पारंपरिक माल ढुलाई के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि हरित ऊर्जा निर्यात के वैश्विक द्वार बन सकते हैं। ओडिशा का चयन भी इसी रणनीतिक सोच का हिस्सा है। वहाँ उपलब्ध औद्योगिक अवसंरचना और समुद्री संपर्क इसे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ने में सक्षम बनाते हैं।

लेकिन भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जिसने इस अवसर को पहचाना हो। वैश्विक स्तर पर एक नई प्रतिस्पर्धा शुरू हो चुकी है। ऑस्ट्रेलिया अपने विशाल रेगिस्तानी क्षेत्रों में सौर और पवन ऊर्जा आधारित ग्रीन हाइड्रोजन परियोजनाएँ विकसित कर रहा है। सऊदी अरब, जिसने दशकों तक तेल निर्यात से दुनिया को ऊर्जा दी, अब अरबों डॉलर निवेश कर भविष्य का सबसे बड़ा ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादक बनने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। संयुक्त अरब अमीरात भी ऊर्जा परिवर्तन की दौड़ में तेजी से आगे बढ़ रहा है। चिली अपनी अनुकूल भौगोलिक परिस्थितियों का लाभ उठा रहा है, जबकि चीन इस क्षेत्र में उत्पादन क्षमता और तकनीकी निर्माण—विशेषकर इलेक्ट्रोलाइज़र—में भारी निवेश कर रहा है।

यही वह प्रतिस्पर्धा है जो भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती भी है और सबसे बड़ा अवसर भी। यदि भारत शुरुआती वर्षों में उत्पादन क्षमता, लागत और विश्वसनीय आपूर्ति के मामले में बढ़त बना लेता है, तो वह आने वाले दशकों में स्वच्छ ऊर्जा व्यापार का प्रमुख केंद्र बन सकता है। लेकिन यदि वह निवेश, तकनीक और अवसंरचना निर्माण में पीछे रह गया, तो यह अवसर दूसरे देशों के हाथों में भी जा सकता है।

भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल उसकी प्राकृतिक परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि उसका विशाल घरेलू बाजार भी है। यही कारण है कि विदेशी कंपनियाँ भारत में निवेश करने को उत्सुक हैं। जब किसी देश के भीतर ही इस्पात, उर्वरक, रिफाइनरी, सीमेंट और रसायन उद्योग जैसी बड़ी ऊर्जा-आधारित अर्थव्यवस्था मौजूद हो, तो ग्रीन हाइड्रोजन उद्योग को शुरुआती मांग के लिए अलग से संघर्ष नहीं करना पड़ता। घरेलू उद्योग पहले ग्राहक बनते हैं और उसके बाद निर्यात बाजार विकसित होता है। यह वही मॉडल है जिसने भारत को सौर ऊर्जा और मोबाइल विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में तेज़ी से आगे बढ़ाया।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि ग्रीन अमोनिया केवल बिजली उत्पादन या औद्योगिक ईंधन तक सीमित नहीं रहेगा। समुद्री परिवहन क्षेत्र में इसे भविष्य के प्रमुख ईंधनों में गिना जा रहा है। आज विश्व व्यापार का लगभग 90 प्रतिशत समुद्री मार्गों से होता है और अंतरराष्ट्रीय शिपिंग उद्योग भारी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करता है। यदि बड़े मालवाहक जहाज भविष्य में ग्रीन अमोनिया आधारित ईंधन अपनाते हैं, तो इसकी वैश्विक मांग कई गुना बढ़ सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह एक विशाल निर्यात अवसर होगा।

इसी संदर्भ में भारत-जापान समझौते का एक और आयाम सामने आता है। यह केवल आज की मांग पूरी करने का अनुबंध नहीं है, बल्कि भविष्य के बाजार पर संयुक्त रूप से दांव लगाने का निर्णय है। जापान अपने उद्योगों और ऊर्जा संयंत्रों में ग्रीन अमोनिया का उपयोग बढ़ा रहा है। यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में उसकी आयात आवश्यकता वर्तमान अनुमान से कहीं अधिक हो सकती है। ऐसे में भारत का शुरुआती आपूर्तिकर्ता बन जाना उसे दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ देगा।

यदि समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो तस्वीर अत्यंत सकारात्मक दिखाई देती है। भारत पहली बार ऐसी तकनीकी और औद्योगिक क्रांति का हिस्सा बन रहा है, जिसमें वह केवल तकनीक आयात करने वाला या विदेशी उत्पाद खरीदने वाला देश नहीं है। वह स्वयं भविष्य के वैश्विक समाधान का निर्माता बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यही वह परिवर्तन है जो भारत की आर्थिक कहानी को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकता है।

यदि बीसवीं शताब्दी को तेल की शताब्दी कहा जाए, तो इक्कीसवीं शताब्दी को हरित ऊर्जा की शताब्दी कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। पिछली सदी में जिन देशों के पास तेल था, उन्होंने केवल अपनी अर्थव्यवस्थाएँ ही नहीं बदलीं, बल्कि विश्व राजनीति की दिशा भी प्रभावित की। । आज इतिहास स्वयं को दोहरा तो नहीं रहा, लेकिन एक नए रूप में अवश्य सामने आ रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार शक्ति का स्रोत भूमिगत तेल नहीं, बल्कि धरती पर बिखरी धूप, हवा और पानी हैं।

भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने इस परिवर्तन को समय रहते समझ लिया। यह संयोग नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी निर्माण, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और स्वच्छ विनिर्माण को एक-दूसरे से जोड़ते हुए एक व्यापक ऊर्जा रणनीति विकसित की है। यह केवल जलवायु परिवर्तन की चिंता का परिणाम नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दूरदृष्टि का भी परिचायक है। सरकार यह समझ चुकी है कि आने वाले दशकों में ऊर्जा का प्रश्न केवल बिजली उत्पादन का नहीं होगा, बल्कि औद्योगिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखलाओं और वैश्विक निवेश का भी होगा।

यही कारण है कि भारत आज स्वयं को केवल एक निर्यातक के रूप में प्रस्तुत नहीं कर रहा, बल्कि एक विश्वसनीय ऊर्जा साझेदार के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। दोनों भूमिकाओं में महत्वपूर्ण अंतर है। निर्यातक वह होता है जो उत्पाद बेचता है, जबकि साझेदार वह होता है जिस पर दशकों तक भरोसा किया जा सके। जापान के साथ हुए 25 वर्षों के समझौते की नींव इसी विश्वास पर आधारित है। यह केवल एक खरीद-बिक्री अनुबंध नहीं, बल्कि भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा का साझा खाका है।

भारत-जापान का यह समझौता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह एक नए आत्मविश्वास का प्रतीक है। एक समय था जब भारत वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में केवल खरीदार की भूमिका निभाता था। तेल उत्पादक देशों की नीतियाँ भारत की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती थीं। आज पहली बार भारत भविष्य की ऊर्जा का आपूर्तिकर्ता बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। यह परिवर्तन केवल व्यापारिक आँकड़ों में नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास में भी दिखाई देता है।

दरअसल, किसी राष्ट्र की शक्ति केवल उसके सैन्य बल या आर्थिक आकार से नहीं मापी जाती। वह इस बात से भी तय होती है कि भविष्य की दुनिया उसकी ओर किस रूप में देखती है। क्या वह समस्याओं का हिस्सा है या समाधान का? क्या वह केवल उपभोक्ता है या नवाचार का केंद्र? क्या वह केवल बाज़ार है या वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का नेतृत्व करने वाला देश? हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत धीरे-धीरे इन सभी प्रश्नों का सकारात्मक उत्तर देने लगा है।

शायद आने वाले वर्षों में ओडिशा के किसी बंदरगाह से जापान के लिए रवाना होने वाला ग्रीन अमोनिया से भरा जहाज़ किसी समाचार चैनल की बड़ी सुर्खी न बने। उसमें न युद्ध का रोमांच होगा, न चुनावी शोर और न ही किसी राजनीतिक विवाद की सनसनी। लेकिन इतिहास अक्सर ऐसे ही शांत क्षणों में लिखा जाता है। जब उस जहाज़ में भरा ईंधन जापान के किसी बिजली संयंत्र, इस्पात कारखाने या औद्योगिक परिसर तक पहुँचेगा, तब वह केवल अमोनिया की खेप नहीं होगी। वह इस बात का प्रतीक होगी कि भारत ने ऊर्जा की नई दुनिया में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है।

यह यात्रा अभी प्रारंभिक चरण में है। सफलता की गारंटी नहीं है, लेकिन दिशा स्पष्ट है। यदि भारत नीति की निरंतरता, तकनीकी नवाचार, निजी निवेश, पर्यावरणीय संतुलन और वैश्विक साझेदारियों को समान गति से आगे बढ़ाता रहा, तो आने वाले दशकों में दुनिया भारत को केवल सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा महाशक्ति के रूप में भी पहचान सकती है। और तब इतिहास शायद यह दर्ज करेगा कि इस परिवर्तन की शुरुआत किसी बड़े राजनीतिक घोषणापत्र से नहीं, बल्कि ओडिशा की धूप, पानी और एक शांत लेकिन दूरदर्शी 25 वर्षीय समझौते से हुई थी।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

 

 

 

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