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भारत के सपनों की उड़ान

flight of dreams of india

थुंबा से शुरू हुआ भारत का अंतरिक्ष सफर आज चांद पर पहुंच गया है। भारत ने चंद्रमा संबंधी अनुसंधान शुरू करने, उपग्रह बनाने, अन्य के लिए भी विदेशी उपग्रहों को ले जाने में सफलता अर्जित कर दुनियाभर में अपनी पहचान बना ली है। चंद्रयान-3 का पृथ्वी से 3.84 लाख किमी की दूरी तय कर चांद पर उतरना और इतिहास रचना, अंतरिक्ष के अनगिनत रहस्यों की खोज की दिशा में एक अति महत्वपूर्ण कदम है। इस महान उपलब्धि के लिए चंद्रयान प्रोजेक्ट के वैज्ञानिकों, इसरो और अनुसांगिक संगठन तो बधाई के पात्र हैं ही लेकिन अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतिहास रचे जाने के उल्लास में हमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान के जनक डाॅ. ए.विक्रम साराभाई को नहीं भूलना चाहिए। भले ही चंद्रयान प्रोजेक्ट 2019 में शुरू हुआ हो मगर अंतरिक्ष के रहस्यों को जानने और वहां उड़ने की परिकल्पना भारत ने 1962 में भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति की स्थापना के साथ ही कर ली थी, जो आज चांद पर उतर कर साकार हुई है।

भारत की आजादी के बाद 76 सालों में बैलगाड़ी युग से अंतरिक्ष में धमाकेदार उपस्थिति दर्ज करना वास्तव में एक महान उपलब्धि है। दरअसल भारत ने आजादी मिलने के बाद पहले दशक में ही अन्तरिक्ष और चांद-सितारों के बारे में कल्पना की उड़ानें भरनी तब शुरू कर दीं थी जब भारत के मित्र सोवियत संघ ने 4 अक्टूबर 1957 को पृथ्वी का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक-1 प्रक्षेपित किया। हमारे विज्ञानियों की असाधारण प्रतिभा और भारत के दृढ़ संकल्प का ही नतीजा है कि जो भारत आज अंतरिक्ष के क्षेत्र में कई अन्य देशों की मदद कर रहा है और बाकायदा उसका अंतरिक्ष उद्योग भी शुरू हो चुका है, उसके पास 1963 में अपने पहले प्रक्षेपण के वक्त केवल हौंसले और कुछ जुझारू वैज्ञानिक ही थे। उस समय चूंकि तिरुअनंतपुरम के बाहरी हिस्से में स्थित थुंबा भूमध्यरेखीय रॉकेट प्रक्षेपण स्टेशन पर कोई इमारत नहीं थी, इसलिए बिशप के घर को निदेशक का कार्यालय बनाया गया। आज अमेरिका के नासा और रूस के रॉस्कोसमॉस की बराबरी करने जा रहे इसरो की मातृ संस्था राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति ही है। इस ऐतिहासिक मौके पर हमें सतीश धवन और डा. ए.पी.जे अब्दुल कलाम और विक्रम साराभाई से लेकर डा. एस. सोमनाथ के पूर्ववर्ती इसरो निदेशकों और उनकी टीमों के सदस्यों को भी नहीं भूलना चाहिए।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा हाल ही में चंद्रयान-3 का सफल प्रक्षेपण चाँद की खोज में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। रोवर प्रज्ञान से सुसज्जित अंतरिक्ष यान ने नई खोजों और अंतर्दृष्टि के वादे के साथ दुनिया को मंत्रमुग्ध करते हुए चंद्रमा की की सतह पर कामियाबी के साथ उतर गया, यह शुरुआती रूसी मिशनों से लेकर अपोलो कार्यक्रम और इसरो की उल्लेखनीय उपलब्धियों तक, चंद्रमा अभियानों के समृद्ध इतिहास की श्रंखला में एक नया अध्याय है।

2008 में लॉन्च किया गया चंद्रयान-1, इसरो की पहली चाँद यात्रा थी और इसने चंद्र सतह पर पानी के अणुओं की खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस सफलता के आधार पर, 2019 में चंद्रयान -2 का लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र का पता लगाना था और इसमें एक ऑर्बिटर, एक लैंडर (विक्रम), और एक रोवर (प्रज्ञान) शामिल था। हालाँकि विक्रम की लैंडिंग योजना के अनुसार नहीं हुई, लेकिन ऑर्बिटर लगातार बहुमूल्य डाटा भेज रहा है।

 चंद्रयान-3 का हालिया प्रक्षेपण चंद्र अन्वेषण के प्रति भारत की दृढ़ता और प्रतिबद्धता का प्रतीक है. जैसे ही प्रज्ञान ने चंद्रमा की सतह पर कदम रखा, उत्साह स्पष्ट हो गया। अपने वैज्ञानिक उपकरणों के साथ, रोवर चंद्रमा की मिट्टी, चट्टानों और वायुमंडल का विस्तृत विश्लेषण करेगा इसके भूवैज्ञानिक इतिहास और विकास पर प्रकाश डालेगा। प्रज्ञान द्वारा भेजी गई पहली तस्वीर उस दुनिया की आकर्षक झलक पेश करती हैं जिसने सदियों से इंसानो को आकर्षित किया है।

 अंतरिक्ष अन्वेषण में इसरो की प्रमुखता में वृद्धि का श्रेय उसके समर्पण, रणनीतिक योजना और उल्लेखनीय उपलब्धियों को दिया जा सकता है। एक ही मिशन में रिकॉर्ड संख्या में उपग्रहों को लॉन्च करने से लेकर अंतरग्रहीय प्रयासों को शुरू करने तक, इसरो की उपलब्धियां विस्मयकारी हैं, हैरान करने वाली है,2013 में मार्स ऑर्बिटर मिशन (मंगलयान), जिसने भारत को मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंचने वाला पहला एशियाई राष्ट्र बना दिया, इसरो की क्षमताओं का उसके क़ाबलियत का उदाहरण है।

 चंद्रयान श्रृंखला भी इसरो की विशेषज्ञता को प्रदर्शित करती है। संगठन के लागत प्रभावी दृष्टिकोण और तकनीकी नवाचार ने इसे जटिल मिशन शुरू करने में सक्षम बनाया है जो ब्रह्मांड की हमारी समझ में योगदान देता है. इसरो की उपलब्धियाँ चंद्र अन्वेषण से परे, उपग्रह प्रौद्योगिकी, संचार और पृथ्वी अवलोकन में प्रगति तक फैली हुई हैं।

चंद्रयान -3 और रोवर प्रज्ञान का प्रक्षेपण चंद्र अन्वेषण में एक नए अध्याय का प्रतीक है। जैसे ही प्रज्ञान अपनी चंद्र यात्रा पर निकलता है, यह चंद्रमा के रहस्यों को जानने के लिए उत्सुक राष्ट्र की आकांक्षाओं को लेकर पिछले मिशनों के नक्शेकदम पर चलता है। सोवियत लूना मिशन से लेकर अमेरिका के अपोलो कार्यक्रम और विभिन्न अन्य देशों के योगदान तक चंद्र अभियानों का इतिहास, ब्रह्मांड का पता लगाने के लिए मानवता की अतृप्त जिज्ञासा और दृढ़ संकल्प का मिसाल है। अंतरिक्ष अन्वेषण में एक चैंपियन के रूप में इसरो का उदय वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका का उदाहरण है, जो सीमाओं को पार कर रहा है और पीढ़ियों को सितारों तक पहुंचने के लिए प्रेरित कर रहा है।

थुंबा से शुरू हुआ भारत का अंतरिक्ष सफर आज चांद पर पहुंच गया है। भारत ने चंद्रमा संबंधी अनुसंधान शुरू करने, उपग्रह बनाने, अन्य के लिए भी विदेशी उपग्रहों को ले जाने में सफलता अर्जित कर दुनियाभर में अपनी पहचान बना ली है।


 


डॉ प्रीती 
अस्सिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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