
दीपक कुमार रथ
किसी भी संप्रभु राष्ट्र का पहला दायित्व अपनी सीमाओं की ही नहीं, बल्कि अपने लोकतांत्रिक ढांचे, सामाजिक ताने-बाने और नीतिगत स्वतंत्रता की भी रक्षा करना होता है। भारत में विदेशी फंडिंग को लेकर वर्षों से बहस चलती रही है, लेकिन एक बुनियादी प्रश्न हमेशा अनुत्तरित रह गया—क्या किसी देश को यह जानने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि उसकी सीमाओं के भीतर काम कर रहे संगठनों को पैसा कौन दे रहा है, वह धन किस उद्देश्य से आ रहा है और अंततः उसका उपयोग किन गतिविधियों में हो रहा है? नरेंद्र मोदी सरकार ने एफसीआरए (Foreign Contribution Regulation Act) के तहत किए गए नवीनतम संशोधनों के माध्यम से इसी प्रश्न का स्पष्ट उत्तर दिया है। सरकार का संदेश साफ है—विदेशी धन का स्वागत है, लेकिन वह पूर्ण पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों के दायरे में ही स्वीकार्य होगा।
नए नियमों ने उन कई खामियों को बंद करने का प्रयास किया है, जिनकी ओर लंबे समय से ध्यान दिलाया जाता रहा था। अब विदेशी फंड प्राप्त करने वाले संगठन धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों को "धार्मिक शिक्षा", "धार्मिक परंपराओं के संरक्षण" या "स्थानीय धार्मिक मान्यताओं" जैसी व्यापक श्रेणियों के अंतर्गत दर्ज नहीं कर सकेंगे। कई धार्मिक श्रेणियों में स्पष्ट रूप से "धर्म परिवर्तन को छोड़कर" शब्द जोड़े गए हैं। इसके साथ ही विदेशी नागरिकों के प्रमुख पदाधिकारियों पर कड़ी पाबंदियां, अंतिम वास्तविक दानदाता की पहचान सार्वजनिक करने की अनिवार्यता, सोशल मीडिया गतिविधियों की जांच, फील्ड वेरिफिकेशन और निष्क्रिय संगठनों के लाइसेंस रद्द करने जैसे प्रावधान पूरे नियामक ढांचे को कहीं अधिक मजबूत बनाते हैं। यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि जवाबदेही की संस्कृति स्थापित करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है।
मोदी सरकार का तर्क भी उतना ही स्पष्ट है। भारत ने कभी भी वास्तविक सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य या मानवीय सहायता के कार्यों का विरोध नहीं किया। देश में हजारों संगठन विदेशी सहायता के साथ पूरी वैधता के साथ कार्य कर रहे हैं। लेकिन वर्षों से यह चिंता भी व्यक्त की जाती रही है कि कुछ संस्थाएं सामाजिक सेवा की आड़ में वैचारिक प्रभाव, राजनीतिक सक्रियता अथवा धर्मांतरण जैसी गतिविधियों में भी संलग्न रही हैं। ऐसे मामलों में अंतिम सत्य न्यायिक प्रक्रिया ही तय करेगी, लेकिन सरकार का मानना है कि यदि धन विदेश से आ रहा है, तो उसके स्रोत और उपयोग पर सरकार की कठोर निगरानी कोई असामान्य मांग नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।
यहीं पर विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस, का रुख कई प्रश्न खड़े करता है। सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत सुधार की बात करने वाले राजनीतिक दल विदेशी फंडिंग की पारदर्शिता के प्रश्न पर अचानक असहज क्यों दिखाई देते हैं? यदि किसी संगठन का कार्य पूरी तरह वैध है, यदि धन का उपयोग घोषित उद्देश्यों के अनुरूप हो रहा है और यदि उसके पीछे कोई छिपा हुआ एजेंडा नहीं है, तो वास्तविक दानदाताओं की पहचान उजागर करने या सरकारी सत्यापन से घबराहट क्यों होनी चाहिए? वस्तुतः अधिक पारदर्शिता से तो विश्वसनीयता बढ़नी चाहिए, कम नहीं।
इस पूरे विवाद का एक अंतरराष्ट्रीय पक्ष भी सामने आया है। कुछ विदेशी सांसदों और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों ने इन संशोधनों को नागरिक समाज पर अंकुश लगाने वाला कदम बताया है। किंतु यह आलोचना स्वयं वैश्विक व्यवहार से मेल नहीं खाती। अमेरिका, यूरोप और अनेक विकसित लोकतंत्र विदेशी लॉबिंग, बाहरी राजनीतिक प्रभाव और विदेशी वित्तीय प्रवाह पर भारत से कहीं अधिक कठोर कानून लागू करते हैं। वे अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए व्यापक निगरानी और कठोर प्रकटीकरण व्यवस्था को आवश्यक मानते हैं। ऐसे में यदि भारत भी अपने लोकतांत्रिक संस्थानों और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए समान सिद्धांत अपनाता है, तो उसे अलग कसौटी पर परखना उचित नहीं कहा जा सकता।
वास्तव में एफसीआरए में किए गए ये संशोधन मोदी सरकार की उस व्यापक सोच का हिस्सा हैं, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और राजनीतिक संप्रभुता को परस्पर जुड़ा हुआ माना जाता है। सरकार यह स्पष्ट कर चुकी है कि भारत वैश्विक सहयोग, विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय परोपकार का विरोधी नहीं है, लेकिन भारत के भीतर होने वाली प्रत्येक गतिविधि भारतीय कानूनों और भारतीय हितों के अनुरूप ही संचालित होगी। विदेशी फंडिंग अब किसी भी प्रकार की अपारदर्शिता या नियामकीय ढिलाई का माध्यम नहीं बन सकती।
अंततः यह बहस किसी सरकार और नागरिक समाज के बीच संघर्ष की नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की है। क्या विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों को अपने वास्तविक दानदाताओं का खुलासा करना चाहिए? क्या सरकार को यह सत्यापित करने का अधिकार होना चाहिए कि विदेशी धन उसी उद्देश्य के लिए खर्च हो रहा है जिसके लिए अनुमति दी गई थी? क्या राष्ट्रीय हितों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए? मोदी सरकार ने इन सभी प्रश्नों का उत्तर दृढ़ता से 'हाँ' में दिया है। एक ऐसे भारत के लिए जो अपनी संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं और नीतिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि मानता है, यह केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।
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