अपने फायदे के लिए राजनीति बेशक जज्बात का इस्तेमाल करती है। इसके ठीक उलट वह असलियत में बेहद निर्मम होती है। इसे बिडंबना ही कहेंगे कि राजनीति जिस बुनियाद और जिसके नाम पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ती है, वह लोक स्वभाव से कहीं ज्यादा भावुक होता है। हर चुनावों के बाद जज्बात का यह रेला उमड़ता है और कई बार इतिहास के कूड़ेदान में कहीं खो जाता है। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव और तीन राज्यों में मिली प्रचंड जीत के बाद भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह के कदम उठाए हैं, उसके बाद जज्बातों का यह रेला एक बार फिर दिख रहा है। भारतीय जनता पार्टी के प्रशंसक और वोटर वर्ग में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान के लिए भावनाओं का यह ज्वार कहीं ज्यादा उमड़ा दिख रहा है। दिलचस्प यह है कि जज्बातों का यह रेला मोदी विरोधी मीडिया और राजनीति की ओर से भी हिलोरें लेता नजर आ रहा है। जो शिवराज के लिए बेचारा भाव दिखाते हुए एक तरह से मोदी-शाह की जोड़ी की रणनीति पर सवाल खड़े कर रहा है। हालांकि प्रशंसकों और मोदी विरोधी राजनीतिक मोर्चे की भावुकता में भी राजनीति है। मोदी विरोधी खेमे की भावुकता में राजनीति की चाशनी ज्यादा है, जबकि प्रशंसकों की भावुकता कहीं ज्यादा कोरी है।
राजस्थान में बिल्कुल नवेले भजनलाल शर्मा को कमान सौंपना हो या फिर मध्य प्रदेश में मोहन यादव को या फिर छत्तीसगढ़ में विष्णु साय को सत्ता सौंपी गई हो, बीजेपी ने अपनी ओर से इन नए नेताओं को कमान सौंपने के लिए कोई दलील या वक्तव्य नहीं दिया है। लेकिन माना जा रहा है कि साल 2024 के आम चुनावों के मद्देनजर पार्टी ने बड़ी तैयारी के तहत बेहद सोच-समझकर इन नेताओं को जिम्मेदारी दी है। इसके जरिए जातीय समीकरण को साधने की कोशिश की गई है। उत्तर भारत खासकर बिहार और उत्तर प्रदेश में यादव वोटरों की संख्या अच्छी-खासी है। लेकिन पारंपरिक रूप से उनका रूझान उत्तर प्रदेश में जहां मुलायम परिवार की ओर है तो वहीं बिहार में लालू यादव के साथ। ऐसा माना जा रहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के इन वोटरों को लुभाने के लिए भाजपा ने मोहन यादव को कमान सौंपी है। भाजपा कभी ब्राह्मण-बनिया की पार्टी मानी जाती थी। हाल के कुछ वर्षों में जिस तरह पिछड़ावाद की राजनीति परवान चढ़ी है, उसमें भाजपा का पारंपरिक ब्राह्मण वोटर खुद को कहीं कोने में उपेक्षित महसूस करने लगा था। लगता है कि पार्टी को इसका अहसास है, इसीलिए उसने राजस्थान में ब्राह्मण को कमान सौंपी है। छत्तीसगढ़ और झारखंड आदिवासी वोटर बहुल राज्य है। देश के सर्वोच्च पद पर आदिवासी समुदाय की महिला को पहुंचाकर भाजपा पहले ही बड़ा संदेश दे चुकी है। उसने विष्णु साय को कमान सौंप कर एक तरह से आदिवासी समुदाय को आश्वस्त करने की कोशिश है।

फिर भी एक सवाल माहौल में उछल रहा है कि क्या नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ही भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की पहली शख्सियत है, जो जज्बात और पारंपरिक राजनीतिक मुहावरों को किनारे रख रही है? इस तरह वह जमे-जमाए नेतृत्व की बजाय बिल्कुल नए नेतृत्व को कमान सौंप रही है? राजनीतिक यादों की खोह से जब हम गुजरेंगे तो हमें पता चलेगा कि यह पहला मौका नहीं है, जब किसी विजेता मुख्यमंत्री को अगली सरकार के नेतृत्व से वंचित कर दिया गया। याद कीजिए, 1985 के विधानसभा चुनावों को। दिलचस्प यह है कि जिस मध्य प्रदेश के शिवराज को लेकर जज्बातों का ज्वार उमड़ रहा है, उसी मध्य प्रदेशऔर बिहार में 1985 में विधानसभा चुनाव हुए थे। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह की अगुआई में कांग्रेस चुनाव मैदान में उतरी थी। बेशक इंदिरा गांधी की हत्या की याद ताजा थी। लेकिन यह भी नहीं भूलना चाहिए कि भोपाल गैस त्रासदी से उपजे जख्म भी ताजे थे। लेकिन कांग्रेस को ना सिर्फ जीत मिली, बल्कि पिछले 1980 के चुनावों की तुलना में कांग्रेस को दो सीटें ज्यादा यानी 250 सीटों पर जीत मिली थी। कुछ-कुछ आज ही की तरह के तब भी हालात थे। विपक्षी भारतीय जनता पार्टी की सीटें 60 से घटकर 58 रह गई थीं। यहां जान लेना जरूरी है कि तब मध्य प्रदेश से छत्तीसगढ़ अलग नहीं हुआ था। उस दौरान मध्य प्रदेश की विधानसभा में 320 सीटें होती थीं। अव्वल तो इस जीत का श्रेय अर्जुन सिंह को जाता था। इस लिहाज से एक बार फिर उन्हें ही राज्य की कमान मिलनी चाहिए थी। अर्जुन सिंह की आस बेमानी भी नहीं थी। लेकिन राजीव गांधी ने उनकी जगह पूर्व पत्रकार और कभी राजनादगांव जिले के खबरनवीस रहे मोतीलाल बोरा को कमान सौंप दी थी। मोतीलाल बोरा ने राजनीति की शुरूआत सोशलिस्ट पार्टी से की थी। तब भी मध्य प्रदेश कांग्रेस में कई लोग ऐसे रहे होंगे, जिन्होंने कांग्रेसी राजनीतिक माहौल में ना सिर्फ सांस लेना शुरू किया होगा, बल्कि उनका सियासी कद आसमान छू रहा होगा। लेकिन राजीव गांधी ने मोतीलाल वोरा पर भरोसा किया।
साल 1985 के ही शुरूआती महीनों में बिहार में भी विधानसभा के चुनाव हुए। बिहार में राजनीतिक हालात और माहौल कुछ वैसे ही रहे, जैसे मध्य प्रदेश में थे। तब कांग्रेसी सरकार की अगुआई चंद्रशेखर सिंह कर रहे थे। उनकी अगुआई में बिहार विधानसभा की 324 सीटों में से कांग्रेस ने 196 सीटों पर भारी जीत मिली थी। जबकि इसके ठीक पहले 1980 में हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 169 सीटों पर जीत मिली थी। 1980 के चुनावों के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो 1985 की जीत के लिए कुछ हद तक चंद्रशेखर सिंह को भी श्रेय दिया जाना चाहिए। इस लिहाज से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उनका हक बनता था। पिछले चुनाव की तुलना में 27 सीटें ज्यादा जीतने की वजह से उनका दावा और भी मजबूत था। लेकिन राजीव गांधी ने मध्य प्रदेश की तरह चंद्रशेखर सिंह की बजाय बिंदेश्वरी दुबे पर भरोसा किया और उन्हें कांग्रेसी ताज सौंप दिया गया। यह पता नहीं है कि 1985 में जब कांग्रेस आलाकमान ने निर्वतमान मुख्यमंत्रियों अर्जुन सिंह और चंद्रशेखर सिंह को लेकर आज के शिवराज के पक्ष में उठे जज्बात की तरह कोई लहर चली या नहीं। बहरहाल ऐसे में यह मानना कि शिवराज को मौका ना मिलना भारतीय राजनीति के लिए कोई पहली घटना नहीं है। ऐसा अतीत में भी हो चुका है।
राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में जिस तरह जमे-जमाए नेताओं को मौका न देकर भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह नए और बिल्कुल अनजान जैसे नेताओं को कमान सौंपी है, उसकी भाजपा से ज्यादा विरोधी खेमे की ओर से आलोचनाएं हो रही हैं। कहा जा रहा है कि मोदी-शाह का कदम प्रचलित राजनीतिक सिद्धांतों की बलि है। हालांकि भाजपा में पहली बार ऐसा नहीं हो रहा है। याद कीजिए, 2003 के मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनावों को। तब मध्य प्रदेश में सुंदरलाल पटवा, गौरीशंकर शेजवार, विक्रम वर्मा, कैलाशचंद्र जोशी जैसे कद्दावर नेता मौजूद थे। लेकिन भाजपा ने उनकी तुलना में अपेक्षाकृत नई और युवा नेता उमा भारती को चुना। उमा भारती ने भी बीजेपी को निराश नहीं किया और 2003 में भाजपा को राज्य में भारी जीत मिली। इसी तरह जब उसी साल वसुंधरा पर भाजपा ने राजस्थान के लिए भरोसा जताया, तब बेशक राजस्थान भाजपा के दिग्गज भैरो सिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन चुके थे। उनके बाद ललित किशोर चतुर्वेदी, गुलाब चंद कटारिया, हरिशंकर भाभड़ा जैसे दिग्गज नेता तब राजस्थानी राजनीति में सक्रिय थे। जसवंत सिंह को भी इसी श्रेणी में रख सकते हैं। लेकिन पार्टी ने उनकी तुलना में नई वसुंधरा पर भरोसा जताया और उन्हें कमान सौंप दी। कुछ इसी तरह 2001 में गुजरात में नरेंद्र मोदी को भी कमान सौंपी गई। जबकि वहां केशुभाई पटेल, शंकर सिंह बाघेला, सुरेश राणा जैसे दिग्गज नेता पहले से ही थे, लेकिन पार्टी ने मोदी पर भरोसा जताया। इन नेताओं ने अपनी परिस्थितियों में बेहतर प्रदर्शन किया। अपने संगठन को भी ऊंचाई तक पहुंचाया और अपनी सरकारों को भी। 2001 का गुजरात का नया नेतृत्व की ताकत तो अब देश देख रहा है। नरेंद्र मोदी देश ही नहीं वैश्विक क्षितिज पर छा गए हैं। इन संदर्भों में कह सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी ने तीनों राज्यों में जिन नए नेतृत्वों पर भरोसा जताया है, उसकी भी वजह यही रही है कि ये भाजपा संगठन और परिदृश्य को भविष्य में नई उंचाइयां देंगे।
इन अर्थों में कांग्रेस में बदले गए नेतृत्व को भी परखना होगा। यह देखना होगा कि उन्होंने किस तरह अपनी पार्टी को फायदा पहुंचाया। अर्जुन सिंह के बाद बने मोतीलाल बोरा को देखिए। वे अगली बार अपनी सरकार को वापस नहीं जिता पाए। 1990 में हुए चुनावों में मध्य प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को बहुमत मिला। भाजपा के सुंदरलाल पटवा मुख्यमंत्री बने। यही स्थिति बिहार में भी हुआ। जिन बिंदेश्वरी दुबे पर चंद्रशेखर की तुलना में राजीव गांधी ने भरोसा जताया, वे कांग्रेसी माहौल को बेहतर नहीं बना पाए। वैसे तीन साल बाद ही वे हटा दिए गए। जिन कांग्रेसी जगन्नाथ मिश्र की अगुआई में बिहार में कांग्रेस 1990 के चुनाव में उतरी, वे पार्टी को कहां तक जिता पाते, तब से कांग्रेस लगातार बिहार में नीचे से नीचे ही उतरती चली गई है। उसके बाद कांग्रेस बिहार में लौट ही नहीं पाई।
दरअसल कांग्रेसी और भाजपायी नेतृत्व परिवर्तन में सोच और दृष्टि को लेकर काफी अंतर है। बीजेपी के बारे में कहा जा सकता है कि नेतृत्व परिवर्तन की वजह नए नेतृत्व को उभारना और उसके जरिए संगठन को भविष्य के अनुरूप तैयार करना है। जबकि कांग्रेसी नेतृत्व परिवर्तन में या तो आलाकमान की अपनी पसंद-नापसंद दिखती रही है या फिर क्षत्रपों की मठाधीशी। वे अपनी दबंगई पर ही फोकस करते रहे हैं। कांग्रेसी राजनीतिक हल्के मे यह प्रवृत्ति बीते विधानसभा चुनावों में भी दिखी। अगर कल्पनाथ और दिग्विजय सिंह ने नए नेतृत्व के लिए राह खाली की होती या उन्हें मौका दिया होता, कुछ ऐसी सोच अशोक गहलोत की रहती तो शायद कांग्रेस के लिए चुनावी नतीजे ऐसे नहीं होते। लेकिन दोनों राज्यों में स्थापित नेतृत्व की दबंगई कायम रही। कांग्रेस का आलाकमान भी इनके सामने दयनीय रहा। जबकि तेलंगाना में उसने नए नेतृत्व पर भरोसा जताया और हालात बदल कर रख दिया।
कांग्रेसी हल्के में नेतृत्व परिवर्तन के पीछे दूरंदेशी अंदाज कम नजर आता है, जबकि बीजेपी की सोच इसके उलट नजर आती है। हो सकता है कि नेतृत्व परिवर्तन के पीछे बीजेपी आलाकमान की अपनी पसंद और नापसंद भी रही हो, लेकिन मोटे तौर पर यह दृष्टिगोचर नहीं हो रहा। इसीलिए शायद बीजेपी लगातार आगे बढ़ती दिख रही है, जबकि देश की सबसे पुरानी पार्टी वैसा बदलाव नहीं दिखा पा रही है। दोनों पार्टियों के नेतृत्व परिवर्तन को इतिहास और भविष्य केंद्रित नजरिए की कसौटी पर कसना होगा, जज्बात के निष्कर्ष पर नहीं। तभी जाकर समझा जा सकता है कि बीजेपी के क्षत्रपों मे बदलाव की वाजिब वजह क्या है और उसकी आलोचनाओं में कितना दम है? वैसे इस नेतृत्व परिवर्तन से साफ है कि पार्टी ऐसा नया नेतृत्व उभारने की कोशिश कर रही है, जिसके जरिए वह भविष्य की राजनीतिक चुनौतियों से ना सिर्फ निबट सके, बल्कि भविष्य में अपने कार्यकर्ताओं को नव उत्साह के साथ नवीन नेतृत्व दे सके...तीनों राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन को इस नजरिए से भी देखा और समझा जाना चाहिए।

उमेश चतुर्वेदी
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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