2024 लोकसभा के चुनाव में भाजपा को हल्का सा झटका लगा था। कांग्रेस की सीटों में थोड़ी सी बढ़ोतरी जरूर हुई थी फिर भी लोकसभा की 546 सीटों में वो 100 का आंकड़ा भी नहीं छू सकी थी। उसे खुशी से नाचनें गानें का कोई कारण नहीं था क्योंकि भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बन गयी। भाजपा को अपने गिरते ग्राफ की चिंता होना स्वभाविक था क्योंकि इसके पहले चुनाव दर चुनाव उसका ग्राफ बड़ता जा रहा था। हरियाणा और जम्मू कश्मीर विधान सभा के अभी हुए चुनाव में भाजपा की स्थिति सुधरी है तो वहीं कांग्रेस की स्थिति दोनों प्रदेश में खराब हुयी। कांग्रेस ने हरयाणा में 2019 में हुये विधान सभा चुनाव में 31 सीटें जीती थी और 2024 में 37 सीटें जीत कर 6 सीटें बढ़ायी वहीं भाजपा ने 2019 में 40 सीटें जीती थी जो 2024 में बढ़ कर 48 हो गयी। कांग्रेस की 6 सीटें बढ़ी तो भाजपा की 8 सीटें बढ़ी और भाजपा ने इस बार अपने दम पर हरियाणा में सरकार बनाने की संख्या से अधिक सीटें जीती।
जम्मू कश्मीर में तो उसकी हालत बहुत ही बुरी हुयी। पिछली बार 2014 में हुए विधानसभा चुनाव में जीती सीटों से 2024 में उसकी सीटें आधी रह गयीं। प्रदेश की सबसे महत्वपूर्ण पार्टी के साथ समझौता करने के साथ भी पिछली बार की 12 सीटों की जगह अब कांग्रेस मात्र 6 सीटें ही जीत सकी। यानी कांग्रेस पार्टी ने हरियाणा और जम्मू कश्मीर दोनों जगह मात खाई जम्मू कश्मीर में भाजपा ने अपनी स्थिति पिछले चुनाव से अधिक मजबूत करते हुए इस बार 29 सीटें जीत कर 4 सीटों का इजाफा किया जबकि भाजपा ने कश्मीर क्षेत्र की सीटों पर प्रत्यासी खड़े नहीं किये। जम्मू कश्मीर में नेशनल कांग्रेस और कम्युनिस्ट कांग्रेस मिलकर लड़ी तो भी कांग्रेस की सीटें आधी रह गयीं। इससे एक बात तो साफ है कि कांग्रेस को जम्मू कश्मीर में बुरी तरह नकारा गया वहीं दूसरी ओर भाजपा का समर्थन और सीटें बड़ी हैं।
हरियाणा में राहुल गांधी ने जोरदार प्रचार किया पर नतीजा उलट ही रहा। जो उम्मींद कांग्रेस की सरकार बनानें की लग रही थी उस पर पानी फिर गया। क्या राहुल के जाने से स्थिति बिगड़ी इस पर पार्टी को विचार गंभीरता से करना चाहिये। कांग्रेस पार्टी के राहुल के सहयोगी कर्णधार नेता फिर से पार्टी को गुमराह करके राहुल को प्रसन्न करने की चाकरी में लग गयेे हैं और चुनाव में गड़बड़ी की बात करने लगे। कह रहे कि चुनाव आयोग के पास शिकायत लेकर जायेंगे। चुनाव आयोग ने जिस तरह चुनाव कराया है वह तारिफ के काबिल है। कांग्रेस को आयोग को बधाई देते हुए जनता को धन्यवाद देकर अपनी स्थिति पर संतोष करना चाहिये। उसे नई रणनीति बनाना चाहिये थी न कि हर बार हारने पर चुनाव की असहमति, चुनाव आयोग, चुनाव अधिकारी और मशीन आदि पर दोष मड़ने का प्रयास करना चाहिये। पहले भी चुनाव आयोग को अपील और फिर सुप्रीम कोर्ट तक गये वहां से हार कर चले आये। किसी तरह की कोई गड़बड़ी नही बता पाये। बीच चुनाव में हरयाणा में ही दो बड़े नेेताओं में आंतरिक संघर्ष चल रहा हो और राहुल गांधी का भाषण सुन कर लोग हंस रहे हों कि जलेबी की फेक्टरी लगवा कर पचास हजार आदमी को काम मिल जायेगा ऐसे में जनता ने कांग्रेस के हांथो में सत्ता सौंपना ठीक नहीं समझा।
हरियाणा में कांग्रेस ने पत्ते ठीक से नहीं खेले
हरियाणा में संभव है कुछ जाट किसानों की नाराजगी भाजपा से रही हो या अभी भी हो क्योंकि किसान आंदोलन में वे सहयोगी थे भले ही पंजाब के किसानों के बहकावे में आकर ऐसा हुआ हो। पर भाजपा ने यूपी में जाट को अध्यक्ष बनाकर और देश का उपराष्ट्रपति भी जाट को बनाकर उनकी नाराजगी दूर करने का भरपूर प्रयास किया। जाटों के सबसे बड़े नेता चौधरी चरण सिंह जो प्रधानमंत्री के पद तक भी पहुंचे उसके नाम पर बनी पार्टी उनके पुत्र अजीत सिंह अब पौत्र द्वारा चलायी जा रही राष्ट्रीय लोक दल को भाजपा ने (एनडीए) अपने ग्रुप में मिलाकर इंडी को मात दी। वर्तमान में जाटों का सबसे बड़ा राजनैतिक नेता तो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संविधान सभा के सदस्य पंजाब में मंत्री रहे रणवीर सिंह के पुत्र भूपेंद्र सिंह हुड्डा हैं दो बार हरयाणा के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उनके मुकाबले में रंजीत सिंह सुरजेवाला और कुमारी शैलजा को महत्व देकर कांग्रेस हाई कमान ने उनके कद को छोटा होने दिया। उसका भी खामियाजा पार्टी ने उठाया। इसी तरह अनुसूचित जाति का समर्थन प्राप्त करने में असमर्थ रहे जब मायावती की पार्टी बसपा मैदान में थी उस स्थिति को गंभीरता से लेना था। तीसरी बात लोक सभा 2024 चुनाव में 10 में से 5 सीटें जीतने के बाद पार्टी मुगालते में थी और जीत के लिए आश्वस्त थी। भाजपा एक एक कदम फूंक-फूंक कर रख रही थी, अपनी कमजोरी और कांग्रेस की जीत के फैक्टर पर बराबर काम कर रही थी। इसलिये उसने पिछड़ों का कार्ड खेला और पिछड़ी जाति के व्यक्ति को चुनावों से पहले मुख्यमंत्री बना दिया। उधर बैकवर्ड पिछड़ों की ओर से कांग्रेस लगभग निष्क्रिय रही। 10 वर्ष के लगातार शासन करने के बाद कोई पार्टी हरियाणा में कभी सत्ता में तिबारा नहीं आयी। इस चुनाव में इसका लाभ कांग्रेस को मिलना था। पर नरेंद्र मोदी की चतुराई के आगे सब फेल हो गये। भाजपा के सभी नेता यहां तक कि नरेन्द्र मोदी ने 5 और अमित शाह ने 10 सभायें की। केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी को भी हरयाणा में लगाया गया। गुड़गांव में गडकरी चुनाव प्रचार में गये वहां भाजपा प्रत्यासी 68 हजार मतों से जीता।
कहने का मतलब है कि भाजपा एक एक कदम फूंक कर रख रही थी यहां तक प्रयास किया गया पार्टी में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, नितिन गडकरी आदि सभी नेता एकजुट हैं तो दूसरी ओर कांग्रेस चुनाव के बीच में भी अपने नेताओं को एकजुट करने में फेल हुयी। ऊपर से राहुल गांधी का जलेबी वाला सुझाव एक मजाक बन गया। इन सब बातों के कारण कांग्रेस हार गयी। अब चुनाव व्यवस्था या चुनाव आयोग पर उंगली उठा कर खुद अपने आप पर कीचड़ उछाल रही है।
जम्मू कश्मीर के विकास के लिये, सुरक्षा के लिये, वहां पर शान्ति बहाल करके पर्यटन को पुनः जिन्दा करने के लिए जो कार्य उसके केन्द्र शासित प्रदेश बनने के बाद हुए हैं वो एक सुनहरा अध्याय है। भाजपा को इसका राजनीतिक लाभ पूरी तरह नहीं मिला क्योंकि जम्मू कश्मीर का कश्मीर वाला क्षेत्र जिसमें जम्मू क्षेत्र से अधिक विधान सभा सदस्य चुने जाते हैं ने नेशनल कांग्रेस को चुना। नेशनल कांग्रेस ने जम्मू कश्मीर में भी सीटें जीती। हालांकि भाजपा 90 में से सभी की सभी 29 सीटें जम्मू क्षेत्र से ही जीती हैं। इस चुनाव की सबसे बड़ी विषेषता यह रही कि पूरा चुनाव शांति से सम्पन्न हुआ और एतिहासिक वोटिंग हुयी है, लोग खुल कर घरों से निडर होकर वोट डालनें आये। एक बार फिर से स्पष्ट हो गया कि सब कुछ मिलने के बाद, कश्मीर में धंधा, व्यवसाय की वापसी के बाद भी मुसलमानों ने भाजपा के विरूद्ध ही वोट दिया है। जिन पिछड़े, आदिवासी पहाड़ी लोगों को आरक्षण की सुविधायें केन्द्र द्वारा दी गयी, उन बकरवाल, गुर्जर, पहाड़ियों ने भी भाजपा के खिलाफ वोट दिया। उन्होंने कश्मीर की भलाई, विकास, तरक्की, शान्ति को छोड़ धार्मिक सोच पर वोटिंग की है। नहीं कहा जा सकता कि इससे मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिये कश्मीर के चौमुखी विकास के लिये भाजपा के नेतृत्व का मनोबल गिरा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता क्या जिस उत्साह से भाजपा की केन्द्रीय सरकार काम कर रही थी क्या अब वही उत्साह बना रहेगा।
370 की समाप्ति फेक्टर नहीं था
कुछ विश्लेषक कह रहे हैं कि केन्द्र सरकार द्वारा 370 की समाप्ति प्रदेश का विशेष दर्जा हटने के कारण भी लोगों ने भाजपा के खिलाफ वोट दिया ऐसा हमें बिल्कुल नहीं लगता। 370 हटने के बाद जो केन्द्र सरकार ने कश्मीर के लिये किया वो तो 60 साल में किसी सरकार ने नहीं किया। नेशनल कांन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला जो मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं की तीसरी पीढ़ी राज करेगी पर उन्होंने कभी भी कश्मीर के गरीब लोगों के लिये भलाई के कामों में रूचि नहीं दिखाई। आतंकवाद रोकने के लिये गंभीरता से कोई प्रयास नहीं किये। हिन्दु ब्राह्मणों की रक्षा नहीं की, उनके मजबूरी में पलायन पर चुप बैठे रहे। अति पिछड़े, गरीब, बकरवाल, गुर्जर आदि कमजोर वर्ग के लिये कुछ नहीं किया। भाजपा ने उनके लिये भारी प्रयास किये विशेष वजट दिया पर्यटन विकास में कश्मीर क्षेत्र की विशेष मदद की। पर्यटन विकास होने से उनकी रोजी रोटी वापिस लौटी फिर भी मुसलमानों ने जमकर एक तरफा वोट किया। नेशनल कान्फ्रेंस की इसलिये पौ बारह हो गयी कि वहां के मुसलमान और कश्मीर के तो लगभग सभी उस विकल्प को चुनना चाहते थे जो भाजपा के खिलाफ जीत कर सरकार बना सके। इसलिये वहां बड़े-बड़े कद्दावर नेता निर्दलीय चुनाव या क्षेत्रीय पार्टियों से लड़े, चुनाव हार गये। यहां तक कि विधान सभा भंग होने से पहले जिस पीडीपी पार्टी की 2014 में सरकार बनी थी वो सीधी 28 सीटों से 5 पर आ गयी। उसको भी वोट नहीं मिले शायद इस डर से कि कहीं वोट बंटने से पीडीपी और नेशनल कॉन्फ्रेंस कोई भी सरकार न बना पाए और भाजपा का मुख्यमंत्री बन जाये।
कुल मिला कर जम्मू कश्मीर और हरियाणा में इस चुनाव में भाजपा को लाभ काफी हुआ और कांग्रेस को भारी झटका लगा। कांग्रेस कश्मीर में भी तीसरे चौथे नम्बर की पार्टी हो गयी। जहां भाजपा को कांग्रेस से पांच गुनी सीटें मिली।
हरियाणा में तो केवल इस बार कांग्रेस की स्थिति बेहतर दिख रही थी और उसकी अब नहीं तो कभी नहीं कि स्थिति थी। अब आगे हुडा जी पांच साल बाद इतने शक्तिशाली नहीं रहेंगे और सुरजेवाला जैसे नेताओं के भरोसे हरियाणा जीतना असंभव ही रहेगा। हरयाणा और कश्मीर के चुनावों परिणाम ने भाजपा को टिकट में महाराष्ट्र, झारखंड में होने वाले चुनावों में जीतने की राह आसान कर दी।

डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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