देश को आजादी दिलाने वाली कांग्रेस पार्टी जिसे महात्मा गांधी ने अपने विचारों से सींचा हो आज ऐसेे चौराहेे पर खड़ी हो गयी जो नहीं जान पा रही कि उसे किस रास्ते पर जाना है। आखिर कांग्रेस की ये दुर्दशा कैसे हुई। उसे सड़क पर लाने वाला कौन है इस पर विचार करने वाला कोई नहीं। पूरी पार्टी में एक भी नेता एेसा नहीं जो राह दिखा सके। कांग्रेस पार्टी की दुर्दशा करने की बात चलेगी तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी का नाम आना स्वाभाविक है। प्रजातंत्र में पार्टी किसी की बपौती नहीं हो सकती। नेतृत्व के पास विचार और स्पष्ट दृष्टि होना चाहिए। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के पास न सोच है, न विजन है न ही उन्हें गांधीवाद का पता है, यदि पता होता भी तो 10 वर्ष मनमोहन सिंह सरकार गांधीवादी विचार धारा पर नहीं चल पायी। इसमें मनमोहन सिंह का दोष इतना बड़ा नहीं क्योंकि उन्हें देश दुनिया से कुछ लेना देना नहीं था उन्हें तो कुर्सी से चिपकना था सो जी हजूरी करके चिपके रहे और सरकार 10 जनपथ यानी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया के निवास से चलती रही। मनमोहन सिंह के पास विजन था थोड़ी बहुत सोच भी रखते थे पर कुर्सी के लालच में हिम्मत नहीं दिखा सके। वे हिन्दुस्तान के सबसे कमजोर और फिसड्डी प्रधानमंत्री साबित हुवे। राजनीति की समझ उन्हें दूर दूर तक नहीं थी। एक लोकसभा चुनाव दिल्ली से लड़े वो भी हार गये। फिर हर बार राज्यसभा में आसाम से आये। इसका पूरा लाभ गांधी परिवार या सही कहें तो नेहरू परिवार ने उठाया।
सोनिया गांधी और राहुल गांधी में केवल इतना फर्क है कि सोनिया गांधी जानती थी कि वे राजनीति में नौसिखिया हैं उन्हें कुछ नहीं आता इसलिये वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं जैसे प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, मोहसिन विदवई आदि से सलाह मश्विरा कर निर्णय लेती थी। राहुल गांधी को भी राजनीति की समझ नहीं है उन्हें भी कुछ पल्ले नहीं पड़ रहा पर वो समझते हैं उन्हें सब कुछ आता है बस यही समस्या है। राहुल गांधी अभी तक ठीक से भाषण देना भी नहीं सीख सके। कांग्रेस या महात्मा गांधी के नाम पर चुनाव जीतने का वक्त अब चला गया। वो पीढ़ियां बदल गयी जो आंख बन्द करके महात्मा गांधी के नाम पर मुहर लगा देती थी। नई पीढ़ी को सामने रिजल्ट दिखाई देना चाहिए। उन्हें प्रभावी नेतृत्व चाहिए। एेसा व्यक्ति चाहिये वे जिसके पीछे चल सके। राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को कोई एजेंडा नहीं दे सके, कोई प्रभावी कार्यक्रम नहीं दे सके, कोई आन्दोलन नहीं कर सके, कोई हड़ताल नहीं करवा सके, कोई प्रभावशाली धरना प्रदर्शन नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ नहीं करवा सके। एेसे में पार्टी का बर्बाद होना निश्चित था। धीरे-धीरे उनके ही कार्यकर्ता उनसे और पार्टी से निराश होते गये और घर बैठ गये। पिछले 10 सालों में नरेन्द्र मोदी की सरकार के खिलाफ एक भी मुद्दा जनता की अदालत में नहीं ले जा पाये। सोनिया गांधी अच्छी तरह जानती हैं कि राहुल गांधी में परिपक्वता नहीं आ रही, वो अभी भी इस मुगालते में है कि एक न एक दिन कांग्रेस के नाम पर सत्ता मिल जायेगी और उनका बेटा गद्दी पर बैठ जायेगा पर एेसा होने वाला नहीं है। इसका सीधा-सीधा उदाहरण है अमेठी लोकसभा का 2019 चुनाव। अपनी पुश्तैनी परम्परागत सीट से डर कर भाग कर केरल में लोकसभा का चुनाव वायनाड से लड़ा। राहुल गांधी में नेतृत्व की क्षमता होती या उन्होंने अपने ही क्षेत्र में कार्य किया होता तो अमेठी छोड़ कर भागना नहीं पड़ता। एक बार स्मृति ईरानी से चुनाव जीत गये थे तो क्षेत्र में काम करना था।

2019 में जब आभास हो गया था कि वे चुनाव हार जायेंगे तो दो क्षेत्रों से चुनाव लड़ा। उसमें भी मुस्लिम बाहुल्य सीट पर लड़ने गये इससे उनकी छवि में एक बात और जुड़ गयी कि वे हिन्दुओं से अधिक मुसलमानों पर भरोसा करते हैं। ये पूरे देश ने देखा हिन्दुओं को नजर अन्दाज करने की उनकी छवि में एक और तमगा लग गया। राहुल को चाहिए ये था कि बिना मुसलमानों की भावनाओं को क्षति पहुंचाए हिन्दुओं का दर्द दूर करने की बात करते कांग्रेस के पूर्व नेताओं जैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हेमबती नन्दन बहुगुणा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह में ये गुण थे। एेसा करने के बजाय राहुल मंदिरों में जाकर, टीका लगाकर, जनेऊ पहनकर, भगवा वस्त्र डाल कर हिन्दुओं को प्रभावित करने में लग गये। राहुल भूल गये कि तिलक लगानें, मंदिर जानें या भगवा पहनने, कीर्तन गानें में वे कभी भी भाजपा को पछाड़ नहीं पायेंगे क्योंकि ये सब तो भाजपा के जींस में है। भाजपा कहती हैं कि कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति में हिन्दुओं के साथ अन्याय हुआ है और वे इसे दूर करेंगे। आज की कांग्रेस या नेहरू परिवार के वारिसों के पास कोई ठोस एजेंडा नहीं है, प्रोग्राम नहीं है, सामनें न कोई मंजिल है न कोई रास्ता। कांग्रेस बीच चौराहे पर खड़ी है। कभी हिन्दुओं को रिझानें में लग जाती, कभी मुसलमानों को मनानें में, कभी अन्य विपक्षी पार्टियों के साथ गठबन्धन कर लेती कभी तोड़ लेती है। कभी क्षेत्रीय पार्टियों से समझौता करती है, कभी उन्हें ही बुरा भला कहने लगती, कभी चीन से दोस्ती करके, मोदी सरकार के खिलाफ बोलने लगती है, कभी देश भक्ति की बातें करने लगती है। विरोधाभास की एक सीमा होती है जो हर दिन बेपेेंदी के लोटे की तरह नहीं चल सकती है। चाहे कोई भी पार्टी हो। हर चुनाव कांग्रेस केवल कुर्सी को नजर में रखकर लड़ती है वो भी तरह-तरह के घाल मेल करके जिसे जनता लगातार नकार रही है। कोई दूरगामी योजना नहीं बना सकी। कम से कम 10-15 साल का एक स्पष्ट एजेंडा होता वे क्या चाहते है, क्या करेंगे, कैसे करेंगे इस पर विचार करके एक ठोस कार्यक्रम सामनें रखना होगा। हर समय अन्य विपक्षी पार्टियों को बैसाखी की तलाश कांग्रेस को निकम्मा बनाती जा रही है। कांग्रेस के पास गांधीवाद का एजेंडा है अभी भी देश के हर कोनें में समर्पित दो चार कांग्रेसी मिल जायेंगे। पार्टी को अपनी दम पर खड़ा होना होगा। लोग कांग्रेस को विपक्ष में देखना चाहते हैं पर पार्टी क्षेत्रीय पार्टियों के आगे पीछे घूम-घूम कर अपने को बौना साबित करती जा रही है।
कांग्रेस की ये कमजोरी उसे कहीं का नहीं रहने देगी यदि कुछ समय और कांग्रेस इसी तरह क्षेत्रीय पार्टियों खासतौर पर एेसी जिनकी राष्ट्रीय स्तर पर छवि बेहद खराब है जैसे अखिलेश यादव की पंचर साईकिल समाजवादी पार्टी और लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल को लोग अपराधिक पार्टी के नाम से पहचानते है। इसी तरह बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल को हिन्दुओं को सताने, मारने, भगाने वाली पार्टी समझते हैं। कम्यूनिष्ट का तो बोरिया बिस्तर लगभग उठ चुका है। उनसे समझौता करके कांग्रेस खुद के बजूद खोती जा रही है। उन प्रदेशों में क्षेत्रीय पार्टियों का कब्जा होता जा रहा है। आखिर आम आदमी पार्टी की सरकार दिल्ली में बना कर कांग्रेस न सांप को दूध पिलाया जिसने उसे ही डस लिया। यही हाल कुछ समय और रहा और राहुल के हाथ कांग्रेस की कमान रही और उसे दिग्विजय सिंह, सुरजेवाला एंड कंपनी चलाती रही तो पार्टी घर की रहेगी न घाट की।
कभी-कभी किसी-किसी राज्य में कांग्रेस पार्टी जीत जाती है तो जश्न मनाने में लग जाते हैं बजाय इसके कि आगे चुनाव योजना बनाये इसी का राग अलापते रहते हैं। मीडिया में डिबेट में नेतागण राहुल के कसीदे पढ़ते रहेंगे। जबकि राहुल का प्रदेश के चुनाव में पार्टी की जीत से कोई लेना-देना नहीं होता। कभी समस्यायें या कभी भाजपा में फूट या अन्य कोई कारण से कांग्रेस की दाल गल जाती है तो तुरन्त लोकसभा मंे 10 प्रतिशत से भी कम सीट पाने वाली कांग्रेस पार्टी सरकार बनानें के सपने देखने लगती है और नेता राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बननें का ख्वाब दिखाने लगते हैं।
राहुल की छवि अकेले भारते में ही नहीं धुंधली है विदेशों में भी उन्हें लोग एक कमजोर गुमराह नेता की नजर से देखते हैं। हाल ही में राहुल द्वारा अमेरिका में भारत की बुराई करने पर वहां की एक महिला सांसद ने टिप्पणी की थी एेसा व्यक्ति जो अपने देश की बुराई विदेश में आकर करे वो कभी प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। क्या कोई नेता किसी देश के साथ ठीक युद्ध के बीच सार्वजनिक रूप से कह सकता है कि हमारे सैनिक पीटे गये हम हार रहे हैं। राहुल गांधी की राष्ट्र के प्रति, सेना के प्रति अविश्वसनीयता दिखाना अब एतिहासिक पन्नों से कभी नहीं मिट सकते। पार्टी द्वारा कभी चीन को शक्तिशाली बताना, कभी भारत की सेना की पिटाई बोलना, कभी चुनाव में पाकिस्तान से मदद की आशा व्यक्त करना, कभी विदेशों में भारत की बुराई करना, कभी विदेशी समाचार पत्रों की खबरों पर लोकसभा में सरकार को घेरना, बदनाम करना, कभी चीनी राजदूत से आधी रात को मिलने जाना आखिर किस रास्ते पर चल रही ये कांग्रेस पार्टी जो कभी राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रधर्म से ओत प्रोत थी। सोनिया, राहुल एंड कम्पनी किस दिशा की ओर इसे ले जाना चाहते हैं शायद ही कोई समझ पायेगा। आखिर मनमोहन सरकार ने 10 वर्षों में बुलेट प्रूफ जाकेट और राफेल क्यों नहीं खरीदे थे। क्या कोई और एजेंडा था पार्टी का इनके जबाब कभी न कभी तो देना होगा।
राहुल गांधी चाैबीस घंटे अडानी-अडानी करते रहते हैं। अडानी का मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा चुका है। कोई प्रमाण नहीं मिला अडानी या नरेन्द्र मोदी के गठजोड़ का। मोदी की छवि तेज तर्रार नेता की हो सकती है किसी सीमा तक उन्हें कांग्रेस तानाशाह कह सकती है जिस तरह विरोधी पार्टियां नेहरू और इन्दिरा गांधी को कहती रही है। पर मोदी को बेईमान कहना एक भी भारतवासी के गले नहीं उतरेगा। राहुल एेसी जगह चोट कर रहे जहां उनका खुद का हाथ टूट रहा है। पहले भी तोते की तरह राफेल, नोटबन्दी की रट लगाये रहे पर जनता सब जानती थी इसलिये मोदी सरकार को फिर चुना। कोरोना पर भी न जाने क्या क्या बोलते रहे जो जनता के गले नहीं उतरा।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपनी पुस्तक। Promised Land में लिखा है कि राहुल गांधी नर्वस (घबराये हुये), कौशल विहीन, बिना जनून के हतोत्साहित, अनाकार, बेढंग से रचित व्यक्ति हैं।
कांग्रेस पार्टी चलाना राहुल के वश की बात नहीं लगती और राहुल पर सोनिया की पकड़ नहीं लगती शायद सोनिया गांधी की बात नहीं मानते होंगे, जहां भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी के बाद राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी, अमित शाह और योगी जैसे प्रधानमंत्री के लिये योग्य नेता हैं। वहीं कांग्रेस के पास एक भी नेता उनके समकक्ष दूर-दूर तक नजर नहीं आता। जल्दी ही कांग्रेस ने रास्ता नहीं खोजा तो चौराहे पर खड़े-खड़े दुर्घटना ग्रस्त होकर विलुप्त हो सकती हैै।

डॉ. विजय खैरा
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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