पहली नवम्बर 2000 को मध्यप्रदेश से अलग होकर भारत के मानचित्र पर एक नए राज्य के रूप में उभरा छत्तीसगढ़ आज अपनी रजत जयंती मना रहा है। यह 25 वर्षों की यात्रा केवल एक प्रशासनिक इकाई के गठन की नहीं, बल्कि एक आत्मनिर्भर, समृद्ध और समावेशी राज्य के निर्माण की कहानी है। अपनी स्थापना के समय यह प्रदेश प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर तो था, परंतु औद्योगिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य सुविधाओं के मामले में पिछड़ा हुआ था। सीमित आधारभूत ढांचा, नक्सलवाद की चुनौती और ग्रामीण-जनजातीय क्षेत्रों में विकास की कमी ने इस युवा राज्य की राह कठिन बना रखी थी। किंतु छत्तीसगढ़ ने इन चुनौतियों को अवसरों में बदला और आज ‘मूल से शिखर’ तक पहुंचने की अपनी कहानी स्वर्ण अक्षरों में लिख दी है।
राज्य के विकास की बुनियाद रखने का श्रेय बड़े पैमाने पर भाजपा की पहली सरकार को जाता है, जिसका नेतृत्व रमन सिंह ने किया। जब उन्होंने 2003 में सत्ता संभाली, तब राज्य का बजट मात्र ₹7,000 करोड़ था। अगले 15 वर्षों में यह बढ़कर ₹78,000 करोड़ से अधिक हो गया। रमन सिंह सरकार ने गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी। जन-कल्याण योजनाओं, विशेषकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) को सुदृढ़ किया गया, जिससे हर जरूरतमंद तक सस्ता और सुलभ अनाज पहुंचा। यह योजना पूरे देश में मॉडल के रूप में अपनाई गई। इसी के साथ राज्य ने बिजली उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की और ‘पावर-सप्लस स्टेट’ बनने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बढ़ाए।
रमन सिंह के शासनकाल में छत्तीसगढ़ में उद्योग और कृषि दोनों को समान रूप से प्रोत्साहन मिला। लघु वनोपज आधारित उद्योगों को बढ़ावा देने से जनजातीय समाज को आर्थिक सुरक्षा मिली। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई नए संस्थान स्थापित किए गए — स्कूलों, कॉलेजों, मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। सड़क, रेल और संचार नेटवर्क का विस्तार हुआ। राज्य सरकार ने ‘मेक इन छत्तीसगढ़’ नीति के माध्यम से औद्योगिकीकरण को बढ़ावा दिया और निवेश को आकर्षित किया। इन पहलों के परिणामस्वरूप राज्य ने धीरे-धीरे अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ किया और एक स्थिर विकास दर हासिल की।
वर्ष 2023 के बाद राज्य में भाजपा के नए नेतृत्व के रूप में विष्णु देव साय के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही विकास यात्रा के नए अध्याय की शुरुआत हुई। उन्होंने ‘छत्तीसगढ़ अंजोर विजन 2047’ के माध्यम से एक स्पष्ट और दूरदर्शी विकास खाका प्रस्तुत किया। इस विजन का लक्ष्य वर्ष 2047 तक छत्तीसगढ़ को एक विकसित और समृद्ध राज्य बनाना है — ऐसा राज्य जिसकी अर्थव्यवस्था ₹75 लाख करोड़ तक पहुंचे और प्रति व्यक्ति आय आज की तुलना में दस गुना हो जाए।
साय सरकार की प्राथमिकताओं में उद्योग, सेवा, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि, लॉजिस्टिक्स, ऊर्जा और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्र शामिल हैं। निवेश को प्रोत्साहन देने के लिए ‘इंडस्ट्रियल पॉलिसी 2024-30’ लागू की गई है, जिसके अंतर्गत ₹1.6 लाख करोड़ से अधिक के नए औद्योगिक प्रस्ताव राज्य को प्राप्त हुए हैं। खनिज संपदा के कुशल प्रबंधन और पारदर्शिता के लिए डिजिटल पोर्टल शुरू किए गए हैं। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ देश का पहला राज्य बन गया जिसने लिथियम ब्लॉक की नीलामी शुरू की — जो स्वच्छ ऊर्जा के भविष्य की दिशा में एक बड़ा कदम है।

सरकार का विशेष फोकस नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास को तेज करना है। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल और उद्यमिता कार्यक्रमों के माध्यम से नई ऊर्जा का संचार हुआ है। शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में नए आयाम स्थापित हुए हैं — मेडिकल कॉलेजों की संख्या में वृद्धि, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर बल दिया गया और डिजिटल शिक्षा के विस्तार ने राज्य की सामाजिक प्रगति को नई दिशा दी है।
वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र में भी छत्तीसगढ़ ने उल्लेखनीय सुधार किया है। बजट अब डिजिटल नवाचार और पारदर्शिता पर आधारित है। कृषि और ग्रामीण विकास पर खर्च में बढ़ोतरी हुई है, जिससे गांवों में समृद्धि का आधार मजबूत हुआ है। आज राज्य के किसान केवल उत्पादनकर्ता नहीं, बल्कि आर्थिक सशक्तिकरण के प्रतीक बन रहे हैं। वन उत्पादों के मूल्य संवर्धन और प्रसंस्करण उद्योगों के विकास से जनजातीय समाज की आय में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
फिर भी, राज्य के सामने कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं — जैसे कि ग्रामीण आधारभूत ढांचे को और मजबूत बनाना, नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त करना, और पर्यावरण संरक्षण के साथ सतत विकास सुनिश्चित करना। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का कहना है कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि “जनजीवन में स्थायी बदलाव” लाना है। यही कारण है कि उनकी सरकार की नीतियाँ समावेशी विकास पर केंद्रित हैं — जहाँ शहरों के साथ-साथ गांवों, महिलाओं, युवाओं और जनजातीय समाज को भी समान अवसर मिलें।
भविष्य के लिए राज्य ने कार्बन-फ्री उद्योग नीति, हरित ऊर्जा मिशन और युवाओं के लिए कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए हैं। लक्ष्य यह है कि आने वाले दो दशकों में छत्तीसगढ़ न केवल आत्मनिर्भर बने, बल्कि भारत के सबसे उन्नत और पर्यावरण-संतुलित राज्यों में शामिल हो। इसके लिए 12 से 13 प्रतिशत की निरंतर विकास दर बनाए रखना एक बड़ी चुनौती होगी, परंतु जिस दृढ़ संकल्प और योजनाबद्ध तरीके से वर्तमान सरकार काम कर रही है, वह लक्ष्य असंभव नहीं लगता।
छत्तीसगढ़ की 25 वर्ष की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि यदि नीयत साफ हो, नीति स्पष्ट हो और नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो कोई भी प्रदेश अपनी नियति बदल सकता है। रमन सिंह के स्थिर नेतृत्व ने जहां विकास की बुनियाद रखी, वहीं विष्णु देव साय ने उस पर भविष्य का सुनहरा गुम्बद खड़ा करने का संकल्प लिया है।
आज जब छत्तीसगढ़ अपनी रजत जयंती मना रहा है, तब यह राज्य अपनी उपलब्धियों के साथ अपने नागरिकों के विश्वास का भी उत्सव मना रहा है। जंगलों से लेकर स्मार्ट शहरों तक, मिट्टी से लेकर खनिज तक, और परंपरा से लेकर तकनीक तक — छत्तीसगढ़ की यह यात्रा वास्तव में भारत के आत्मनिर्भरता अभियान का सशक्त प्रतीक है। आने वाले वर्षों में यह प्रदेश निश्चित ही ‘विकसित भारत 2047’ की दिशा में एक अग्रणी भूमिका निभाएगा।
लूट, उपेक्षा और विद्रोह का वृत्त
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस शासन, नक्सलवाद और अमित शाह की मुहिम
छत्तीसगढ़ की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए उसके सामाजिक और सुरक्षा परिदृश्य का अध्ययन आवश्यक है। वर्ष 2000 में मध्यप्रदेश से अलग होकर गठित हुए इस राज्य ने जितनी तेजी से प्रगति के अवसर पाए, उतनी ही गहराई से नक्सलवाद जैसी समस्याओं का भी सामना किया। दुर्भाग्यवश, कांग्रेस शासित सरकारों के कार्यकाल में यह समस्या केवल बढ़ती ही गई। इन सरकारों ने न केवल शासन और प्रशासन को भ्रष्टाचार से ग्रस्त किया, बल्कि विकास योजनाओं की उपेक्षा कर राज्य के सुदूर आदिवासी और ग्रामीण इलाकों को नक्सलवाद की आग में झोंक दिया।
कांग्रेस शासन के वर्षों में राज्य के प्राकृतिक संसाधनों का शोषण एक आम बात बन गई। खनिज, वन और जल जैसे संसाधनों से भरपूर इस भूमि से जनता को उतना लाभ नहीं मिला, जितना राजनीतिक और ठेकेदार वर्ग ने उठाया। परियोजनाएँ शुरू तो हुईं, परंतु वे अधूरी रहीं या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गईं। पारदर्शिता की कमी और नौकरशाही की उदासीनता ने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को जड़ बना दिया। परिणामस्वरूप, सुदूर बस्तर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और कांकेर जैसे जिलों में लोगों के भीतर यह भावना गहरी होती गई कि सरकारें केवल शहरों और उद्योगों तक सीमित हैं, ग्रामीणों और आदिवासियों के लिए नहीं। यही उपेक्षा नक्सलवाद के लिए उपजाऊ भूमि साबित हुई।
नक्सलवाद मूल रूप से विकास की कमी और असमानता की प्रतिक्रिया थी, लेकिन कांग्रेस सरकारों ने इसे एक कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर केवल सतही समाधान खोजने की कोशिश की। नक्सल प्रभावित इलाकों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं का न होना, युवाओं में बेरोजगारी और आदिवासियों की आवाज़ का दमन—इन सबने इस आंदोलन को और मजबूत किया। कांग्रेस शासन ने नक्सल समस्या के सामाजिक पक्ष को समझने के बजाय केवल दिखावटी नीतियाँ अपनाईं, जिससे नक्सली संगठनों को अपनी विचारधारा फैलाने का अवसर मिला।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कांग्रेस शासन ने नक्सलवाद को अप्रत्यक्ष रूप से पोषित किया। कई बार खनिज ठेकेदारों और नेताओं के बीच की सांठगांठ ने स्थानीय जनता के अधिकारों को कुचला। वन अधिकार कानून और भूमि अधिग्रहण में पारदर्शिता की कमी ने आदिवासियों को उनके ही जंगलों से बेदखल कर दिया। ऐसे में नक्सलियों ने खुद को ‘जनता के रक्षक’ के रूप में प्रस्तुत किया और ग्रामीण इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत की। इस दौरान न तो शिक्षा के प्रसार के लिए गंभीर प्रयास हुए, न ही युवाओं को रोजगार के अवसर मिले। कांग्रेस की यही असफलताएँ आज के नक्सलवाद की जड़ों में दर्ज हैं।
लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने “नक्सल-मुक्त छत्तीसगढ़” का स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है। शाह का दृष्टिकोण केवल सुरक्षा-नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें विकास, पुनर्वास और समावेशी प्रगति का संतुलन है। उन्होंने घोषणा की है कि वर्ष 2026 तक नक्सलवाद को पूरी तरह समाप्त कर दिया जाएगा। हाल के वर्षों में अभूझमाड़ और उत्तर बस्तर जैसे क्षेत्रों को नक्सल-मुक्त घोषित करना इस दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। यह केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृढ़ता और राजनीतिक इच्छाशक्ति का प्रमाण है।
अमित शाह की रणनीति “डबल इंजन” मॉडल पर आधारित है—जहाँ एक ओर केंद्र की नीतियाँ सुरक्षा बलों को तकनीकी और संसाधन सहायता प्रदान करती हैं, वहीं राज्य सरकार (मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में) विकास योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू कर रही है। नक्सल प्रभावित गाँवों में आत्मसमर्पण करने वाले लोगों को पुनर्वास और सम्मानजनक जीवन का अवसर दिया जा रहा है। गृह मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि जो भी गाँव नक्सल मुक्त घोषित होगा, उसे ₹1 करोड़ का विशेष विकास कोष दिया जाएगा ताकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर वहाँ स्थापित हो सकें। यह नीतिगत बदलाव दर्शाता है कि अब सरकार बंदूक से नहीं, विकास से जवाब दे रही है।
शाह की दृष्टि का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू “विश्वास निर्माण” है। जिन क्षेत्रों में कभी सरकार का नाम तक नहीं लिया जाता था, वहाँ अब सड़कें, पुलिस कैंप और स्कूल खुल रहे हैं। केंद्रीय बलों और स्थानीय पुलिस के संयुक्त अभियानों ने नक्सली नेटवर्क को कमजोर किया है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सलियों की भर्ती दर में भारी गिरावट आई है, जबकि आत्मसमर्पण करने वालों की संख्या बढ़ी है। यह परिवर्तन दर्शाता है कि अब लोग हथियार नहीं, अवसर चाहते हैं।
अमित शाह की “नक्सल-मुक्त छत्तीसगढ़” नीति इस मायने में ऐतिहासिक है कि यह केवल सुरक्षा नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान की लड़ाई है—उन लोगों के लिए जो दशकों से विकास से वंचित रहे हैं। उनका मॉडल यह मानता है कि यदि शासन की उपस्थिति विकास और न्याय के रूप में महसूस की जाए, तो कोई भी व्यक्ति बंदूक नहीं उठाएगा। शाह का लक्ष्य छत्तीसगढ़ को 2026 तक नक्सलवाद से मुक्त कर “विकसित भारत 2047” के मिशन का अभिन्न हिस्सा बनाना है।
यह भी सच है कि इस अभियान को सफल बनाने के लिए अभी लंबा रास्ता तय करना होगा। कांग्रेस सरकारों द्वारा छोड़ी गई शिथिल प्रशासनिक विरासत और गहरे सामाजिक घावों को भरने में समय लगेगा। किंतु वर्तमान दिशा और राजनीतिक प्रतिबद्धता यह संकेत देती है कि अब छत्तीसगढ़ अपने सबसे बड़े आंतरिक खतरे से निपटने की निर्णायक स्थिति में है।
निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि कांग्रेस शासन ने छत्तीसगढ़ को विकास से दूर रखकर उसे नक्सलवाद की चपेट में पहुंचाया, जबकि आज भाजपा के नेतृत्व में राज्य उस अंधकार से बाहर निकल रहा है। अमित शाह की रणनीति यह साबित करती है कि केवल सुरक्षा बल नहीं, बल्कि विश्वास, विकास और न्याय ही नक्सलवाद का स्थायी समाधान हैं। यदि यह दृष्टि साकार होती है, तो 2026 का छत्तीसगढ़ वह होगा जहाँ जंगलों में बंदूकें नहीं, बल्कि बच्चों के हाथों में किताबें होंगी — और यही सच्चे अर्थों में “नया छत्तीसगढ़” होगा।

नीलाभ कृष्ण
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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