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बायो-फार्मा शक्ति : भारतीय चिकित्सा विज्ञान की नई दिशा

Bio-Pharma Shakti: The New Direction of Indian Medical Science

इक्कीसवीं सदी के तीसरे दशक में चिकित्सा विज्ञान जिस संक्रमण बिंदु पर खड़ा है, वह केवल नई औषधियों के आगमन का नहीं, बल्कि रोगों को देखने, समझने और उपचार करने की पूरी अवधारणा में परिवर्तन का संकेत देता है। बीसवीं शताब्दी की चिकित्सा उपलब्धियाँ मुख्यतः रासायनिक संश्लेषण पर आधारित औषधियों से संभव हुईं। एंटीबायोटिक्स, दर्दनिवारक, हार्मोन तथा हृदय-रोगों की दवाओं ने मानव जीवन-प्रत्याशा को अभूतपूर्व रूप से बढ़ाया और अनेक संक्रामक रोगों को नियंत्रित करना संभव हुआ। किंतु जैसे-जैसे जीवविज्ञान, आनुवंशिकी और प्रतिरक्षा-विज्ञान की समझ गहरी होती गई, यह स्पष्ट होने लगा कि अनेक जटिल रोग केवल रासायनिक असंतुलन का परिणाम नहीं हैं, बल्कि उनकी जड़ें कोशिकीय सिग्नलिंग, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया और जीन-अभिव्यक्ति में निहित हैं।
इसी वैज्ञानिक बोध से जैव-आधारित औषधियों, अर्थात् बायोफार्मास्यूटिकल्स, का विकास हुआ। मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, रिकॉम्बिनेंट प्रोटीन्स, वैक्सीन, सेल-थेरेपी और जीन-थेरेपी जैसी तकनीकें चिकित्सा विज्ञान को लक्षण-आधारित उपचार से आगे ले जाकर रोग के मूल जैविक कारणों को लक्षित करने की दिशा में ले गई हैं। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के पूरे चिंतन में एक गुणात्मक बदलाव का प्रतीक है, जहाँ उपचार अधिक लक्षित, अधिक व्यक्तिगत और दीर्घकालिक होता जा रहा है।
इस वैश्विक वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय बजट 2026–27 में घोषित “बायो-फार्मा शक्ति” पहल को समझना आवश्यक है। इसे केवल औद्योगिक या वित्तीय प्रोत्साहन योजना के रूप में देखना इसके निहित वैज्ञानिक अर्थ को सीमित कर देगा। वास्तव में यह पहल भारतीय विज्ञान, स्वास्थ्य और औद्योगिक नीति के अंतर्संबंधों को एक नए ढंग से संरचित करने का संकेत देती है। यह इस स्वीकारोक्ति का द्योतक है कि भविष्य की स्वास्थ्य-सुरक्षा और आर्थिक प्रतिस्पर्धा दोनों ही उच्च-मूल्य ज्ञान-आधारित जैव-औषधि क्षमता पर निर्भर होंगी।
भारत की फार्मास्यूटिकल यात्रा इस संदर्भ में विरोधाभासों से भरी रही है। एक ओर भारत कम लागत वाली जेनेरिक दवाओं के उत्पादन में वैश्विक स्तर पर अग्रणी रहा है और “विश्व की फार्मेसी” के रूप में स्थापित हुआ है। एचआईवी, तपेदिक और मलेरिया जैसे रोगों के उपचार में भारतीय दवाओं ने करोड़ों जीवन बचाने में योगदान दिया। कोविड महामारी के दौरान भी भारत की वैक्सीन और दवा उत्पादन क्षमता ने वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दूसरी ओर, जैव-औषधि नवाचार और मूल अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की भागीदारी अपेक्षाकृत सीमित रही है।
इस अंतर का कारण वैज्ञानिक क्षमता का अभाव नहीं, बल्कि जैव-औषधि विकास की अंतर्निहित जटिलता है। पारंपरिक रासायनिक औषधियों के विपरीत जैव-औषधियाँ जीवित कोशिकाओं के माध्यम से उत्पादित होती हैं। उत्पादन प्रक्रिया, गुणवत्ता नियंत्रण, जैव-समरूपता और स्थिरता परीक्षण—सभी चरण अत्यंत संवेदनशील होते हैं। उत्पादन प्रक्रिया में सूक्ष्म परिवर्तन भी औषधि की प्रभावशीलता और सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसके अतिरिक्त, जैव-औषधि अनुसंधान में समय-सीमा लंबी होती है; प्रयोगशाला से क्लिनिकल उपयोग तक पहुँचने में अक्सर एक दशक या उससे अधिक समय लग जाता है, और असफलता की संभावना भी अधिक बनी रहती है।
ऐसी स्थिति में जैव-औषधि क्षेत्र का विकास केवल निजी पूँजी पर छोड़ देना व्यावहारिक नहीं होता। दीर्घकालिक सार्वजनिक निवेश, स्थिर नीति-परिवेश और वैज्ञानिक जोखिम-साझेदारी आवश्यक हो जाती है। बायो-फार्मा शक्ति पहल इसी संरचनात्मक आवश्यकता को संबोधित करने का प्रयास करती है। प्रस्तावित ₹10,000 करोड़ का सार्वजनिक निवेश किसी एक चरण तक सीमित न होकर अनुसंधान एवं विकास, ट्रांसलेशनल रिसर्च, क्लिनिकल ट्रायल, औद्योगिक स्केल-अप और नियामकीय सुदृढ़ीकरण—पूरी मूल्य-श्रृंखला को वैज्ञानिक दृष्टि से सशक्त करने का लक्ष्य रखता है।
भारत की स्वास्थ्य-आवश्यकताओं में हो रहा परिवर्तन इस पहल की वैज्ञानिक प्रासंगिकता को और गहरा करता है। असंक्रामक रोगों का बोझ तेजी से बढ़ रहा है। बढ़ती औसत आयु के साथ कैंसर, न्यूरोडीजेनेरेटिव रोग, ऑटो-इम्यून विकार और दुर्लभ आनुवंशिक बीमारियाँ अधिक व्यापक हो रही हैं। इन रोगों के लिए दीर्घकालिक, लक्षित और व्यक्तिगत उपचारों की आवश्यकता होती है, जिन्हें पारंपरिक रासायनिक औषधियाँ सीमित रूप में ही प्रदान कर पाती हैं। जैव-औषधियाँ इन चुनौतियों का वैज्ञानिक समाधान प्रस्तुत करती हैं, किंतु वर्तमान में इनका आयात-आधारित ढाँचा उपचार को अत्यधिक महँगा बना देता है।
इस संदर्भ में स्वदेशी जैव-औषधि क्षमता का विकास केवल औद्योगिक आत्मनिर्भरता का प्रश्न नहीं, बल्कि स्वास्थ्य-समता और सामाजिक न्याय का भी विषय बन जाता है। यदि उन्नत जैव-औषधियाँ केवल सीमित वर्ग की पहुँच तक सिमटी रहें, तो चिकित्सा विज्ञान की प्रगति सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकती है। बायो-फार्मा शक्ति इस अंतर को कम करने की वैज्ञानिक संभावना प्रस्तुत करती है।
इस पूरी प्रक्रिया का केंद्रीय आधार मानव संसाधन है। जैव-औषधि विज्ञान विशुद्ध प्रयोगशाला विज्ञान नहीं है, बल्कि यह आणविक जीवविज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी, रसायन विज्ञान, चिकित्सीय विज्ञान, बायो-इन्फॉर्मेटिक्स, डेटा-विज्ञान और विनियामक विज्ञान के बीच निरंतर संवाद की माँग करता है। ऐसे बहुविषयक मानव संसाधन का निर्माण अल्पकालिक प्रशिक्षण से संभव नहीं है। इसके लिए दीर्घकालिक शैक्षणिक निवेश, अनुसंधान-आधारित शिक्षा और उद्योग-अकादमिक सहयोग आवश्यक है।
राष्ट्रीय औषधि शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थानों का सुदृढ़ीकरण, शोध-अनुकूल विश्वविद्यालय परिवेश और पोस्ट-डॉक्टोरल अवसर इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। विज्ञान प्रगति जैसे मंच के लिए यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि बायो-फार्मा शक्ति शुद्ध विज्ञान और अनुप्रयुक्त विज्ञान के बीच की दूरी को कम करने का प्रयास करती है, जो किसी भी वैज्ञानिक राष्ट्र के लिए दीर्घकालिक लाभ का आधार होता है।
क्लिनिकल ट्रायल जैव-औषधि विकास का सबसे संवेदनशील और निर्णायक चरण होता है। भारत के पास विशाल रोग-भार और आनुवंशिक विविधता उपलब्ध है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान है। इसके बावजूद भारत की वैश्विक क्लिनिकल रिसर्च में भूमिका सीमित रही है। इसके पीछे अवसंरचनात्मक कमियाँ, नैतिक निगरानी की जटिलताएँ और नियामकीय अनिश्चितता जैसे कारण रहे हैं।
यदि बायो-फार्मा शक्ति के अंतर्गत पारदर्शी, वैज्ञानिक और नैतिक रूप से सुदृढ़ क्लिनिकल ट्रायल नेटवर्क विकसित किया जाता है, तो यह भारत को वैश्विक जैव-औषधि अनुसंधान मानचित्र पर एक सशक्त स्थान दिला सकता है। साथ ही यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक होगा कि वैज्ञानिक प्रगति मानवीय गरिमा और नैतिक मूल्यों के अनुरूप हो।
जैव-औषधियों के संदर्भ में नियामकीय ढाँचा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनुप्रयुक्त विज्ञान का विषय है। उत्पादन प्रक्रिया में सूक्ष्म परिवर्तन के प्रभावों को समझना, गुणवत्ता और सुरक्षा का आकलन करना तथा वैश्विक मानकों के अनुरूप निर्णय लेना उच्च वैज्ञानिक क्षमता की माँग करता है। यदि नियामकीय प्रणाली पूर्वानुमेय, पारदर्शी और विज्ञान-आधारित होती है, तो यह नवाचार को प्रोत्साहित करने के साथ-साथ सार्वजनिक विश्वास भी कायम रख सकती है।
सार्वजनिक–निजी सहभागिता इस पूरी प्रक्रिया का एक और महत्वपूर्ण आयाम है। जैव-औषधि अनुसंधान अत्यधिक जोखिमपूर्ण और पूँजी-सघन होता है। इस जोखिम को केवल सरकारी या केवल निजी क्षेत्र द्वारा वहन करना व्यावहारिक नहीं है। साझा अनुसंधान मंच, सह-वित्तपोषित क्लिनिकल ट्रायल और साझा बायो-मैन्युफैक्चरिंग सुविधाएँ जोखिम को संतुलित रूप से वितरित कर सकती हैं, बशर्ते इनके साथ पारदर्शी बौद्धिक संपदा नीति और स्पष्ट उत्तरदायित्व तंत्र जुड़ा हो।
भारत का उभरता बायोटेक स्टार्टअप इकोसिस्टम भी इस पहल से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा है। प्रयोगशाला में जन्म लेने वाले कई नवाचार वित्तीय और नियामकीय बाधाओं के कारण क्लिनिकल स्तर तक नहीं पहुँच पाते। इस अवस्था को अक्सर ‘वैली ऑफ डेथ’ कहा जाता है। यदि बायो-फार्मा शक्ति के माध्यम से प्रारंभिक चरण के नवाचारों को संस्थागत समर्थन मिलता है, तो भारत जैव-औषधि क्षेत्र में केवल अनुकरणकर्ता नहीं, बल्कि ज्ञान-सृजक राष्ट्र के रूप में उभर सकता है।
कोविड महामारी ने यह स्पष्ट कर दिया कि जैव-औषधि क्षमता किसी भी राष्ट्र की रणनीतिक स्वायत्तता का अभिन्न अंग है। वैक्सीन, थेरैप्यूटिक्स और डायग्नोस्टिक्स में आत्मनिर्भरता केवल स्वास्थ्य-सुरक्षा ही नहीं, बल्कि विज्ञान-कूटनीति और वैश्विक सहयोग की क्षमता को भी सुदृढ़ करती है। इस दृष्टि से बायो-फार्मा शक्ति भारत को दीर्घकालिक रणनीतिक लाभ प्रदान कर सकती है।
अंततः बायो-फार्मा शक्ति को भारतीय विज्ञान-नीति के एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए। यह पहल भारत को जैव-औषधियों का मात्र उपभोक्ता या निम्न-मूल्य उत्पादक बने रहने से आगे ले जाकर उच्च-मूल्य ज्ञान-आधारित नवाचार की दिशा में स्थापित करने की क्षमता रखती है। यदि इसका क्रियान्वयन वैज्ञानिक, पारदर्शी और दीर्घकालिक दृष्टि के साथ होता है, तो आने वाले दशकों में भारत वैश्विक जैव-औषधि मानचित्र पर एक निर्णायक और उत्तरदायी भूमिका निभा सकता है। यही इस पहल का वास्तविक वैज्ञानिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्व है।

 


डॉ दीपक कोहली
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)

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