
डॉ प्रीती
कुछ वर्ष पूर्व वसन्त व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने सामाजिक समता और हिन्दू संगठन विषय पर बोलते हुए कहा था –“यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है तो दुनिया में कुछ गलत नहीं है ।
सामाजिक समरसता निर्माण हुए बगैर सामाजिक समता नहीं स्थापित हो सकती, ऐसी धारणा पूज्य डॉ. हेडगेवार के समान ही पूज्य बाबासाहब की भी थी । उन्होंने 25 नवम्बर, 1947 को दिल्ली में कहा था – हम सब भारतीय परस्पर सगे भाई हैं – ऐसी भावना अपेक्षित है। इसे ही ‘बंधुभाव’ कहा जाता है और आज उसी का अभाव है । जातियाँ आपसी ईर्ष्या और द्वेष बढ़ाती हैं । अत: यदि ‘राष्ट्र’ के उच्चासन तक हम पहुँचना चाहते है तो इस अवरोध को दूर करना होगा, तभी बन्धुभाव पनपेगा । बन्धुभाव ही नहीं रहेगा तो समता, स्वाधीनता सब अस्तित्वहीन हो जायेंगे ।“
बन्धुभाव की गारंटी
एक अन्य अवसर पर बाबसाहब ने कहा – “मेरा तत्त्वज्ञान राजनीति से नहीं, धर्म से उपजा है । भगवान बुद्ध के उपदेशों से मैंने वह ग्रहण किया है । उसमें स्वाधीनता और समता को स्थान है । किन्तु अपरिमित स्वाधीनता से समता का नाश होता है और विशुद्ध समता में स्वाधीनता का स्थान नहीं रहता । मेरे तत्त्वज्ञान में स्वाधीनता और समता का उल्लंघन न हो केवल इसलिए सुरक्षा के नाते विधान (कानून) के लिए जगह है। किन्तु कानून ही स्वाधीनता और समता की गारंटी है ऐसा मैं नहीं मानता । इसीलिए मेरे विचार में बन्धुभाव के लिए बड़ा ऊँचा स्थान है । स्वाधीनता और समता के उचित परिपालन में केवल ‘बन्धुभाव’ ही सुरक्षा की गारंटी हो सकता है । इसी बन्धुता का दूसरा नाम मानवता है और मानवता ही धर्म है ।“
हिन्दू संगठन के लिए संघ के उपक्रम के मूल में यही भावना निहित है यह सभी जानते हैं । ‘सर्वेषां विरोधेन’ काम करने की संघ की पद्धति है । संघ का काम बढ़ता देखकर कुछ लोगों के पेट में दर्द होता है । ये ऐसे कुछ समाजवादी प्रगतिशील कहलाने वाले महाराष्ट्र के नेता हैं जो कभी चार लोगों को भी अपने साथ लेकर नहीं चल सके । उनकी उस बाँझ महिला जैसी स्थिति है जिसे दूसरों के बच्चे होना बर्दाश्त नहीं होता । इस मनःस्थिति के कारण ही संघ का विरोध करना वे अपना एक मात्र कार्य मानते हैं। ऐसे लोगों को समझाना व्यर्थ है, क्योंकि सोते हुए को उठाया जा सकता है, सोने का नाटक करने वाले को नहीं उठाया जा सकता। इन प्रगतिशील महानुभावों का उद्देश्य विरोध के लिए विरोध करना मात्र है । समाचार-पत्र ही इनके एक मात्र शक्तिस्रोत हैं । उनके माध्यम से वे रणनीति के रूप से सतत् प्रयास करते रहे कि दलित समाज और संघ परस्पर विरोधी हैं – ऐसा आभास निर्माण किया जाये । इसीलिए इन लोगों ने यह प्रचार जोरों से किया कि नागपुर में संघ का मुख्यालय होने के कारण संघ को मानो चिढ़ाने के लिए ही बाबासाहब ने धर्मान्तरण के लिए नागपुर चुना। इससे जो गलतफहमी दलित और सवर्ण समाज में फैली, उसकी ओर बाबासाहब का ध्यान गया । इसलिए उन्होंने आरम्भ में ही कहा कि नागपुर का चुनाव भारत के मध्य में होने के कारण शास्त्रशुद्ध रीति से किया गया । उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “जो लोग ऐसा आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केन्द्र होने के कारण उन्हें चिढ़ाने के लिए मैंने नागपुर का चुनाव किया, उनकी यह सोच असत्य और द्वेष-प्रेरित है ।“
संघ से सम्पर्क
बाबासाहब को संघ के विषय में पूरी जानकारी थी । 1935 में वह पुणे में महाराष्ट्र के पहले संघ शिविर में आये थे । उसी समय उनकी डा. हेडगेवार से भी भेंट हुई थी । वकालत के लिए वे दापोली (महाराष्ट्र) गये थे, तब भी वे वहाँ की संघ शाखा में गये थे और संघ स्वयंसेवकों से दिल खोलकर संघ कार्य के बारे में चर्चा की थी । 1937 की करहाड शाखा (महाराष्ट्र) के विजयादशमी उत्सव पर बाबासाहब का भाषण और उसमें संघ के विषय में प्रगट किये गये उनके विचार जिन्हें आज भी स्मरण हैं, ऐसे लोग आज भी वहाँ हैं । सितम्बर 1948 में श्री गुरुजी और बाबासाहब की दिल्ली में भेंट हुई थी। गांधीजी की हत्या के बाद सरकार ने द्वेष के कारण संघ पर प्रतिबंध लगाया था, उसे हटवाने के लिए पू. बाबासाहब, सरदार पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कोशिश की थी । 1939 में पूना संघ शिक्षा वर्ग में सायंकाल के कार्यक्रम हेतु बाबासाहब आये थे । डा. हेडगेवार भी वहीं थे । लगभग 525 पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवक संघस्थान पर थे । बाबासाहब ने पूछा, ‘इनमें अस्पृश्य कितने हैं ?’ डा. हेडगेवार ने कहा, ‘अब आप पूछिए न?’ बाबासाहब ने कहा, “देखो, मैं पहले ही कहता था ।“ इस पर डा. हेडगेवार ने कहा, “यहाँ हम अस्पृश्य हैं ऐसा किसी को कभी लगने ही नहीं दिया जाता । अब यदि चाहें तो जो उपजातियाँ हैं, उनका नाम लेकर पूछिए ।“ तब बाबासाहब ने कहा – “वर्ग में जो चमार, महार, मांग, मेहतर हों वे एक-एक कदम आगे आयें ।“ ऐसा कहते ही कोई सौ से ऊपर स्वयंसेवक आगे आये।
1953 में मा. मोरोपंत पिंगले, मा. बाबासाहब साठे और प्राध्यापक ठकार औरंगाबाद में बाबासाहब से मिले थे । तब उन्होंने उनसे संघ के बारे में ब्योरेवार जानकारी प्राप्त की । शाखाएँ कितनी हैं, संख्या कितनी रहती है आदि पूछा । वह जानकारी प्राप्त करने के बाद बाबासाहब मोरोपंत जी से कहने लगे, “मैंने तुम्हारी ओ.टी.सी. देखी थी । उसमें जो तुम्हारी शक्ति थी, उसमें इतने वर्षों में । जितनी होनी चाहिए थी उतनी प्रगति नहीं हुई । प्रगति की गति बड़ी धीमी दिखाई देती है । मेरा समाज इतने दिन प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं है ।“ ‘अनुसूचति जातियों और कम्युनिज्म के बीच अम्बेडकर अवरोध हैं तथा सवर्ण हिन्दुओं और कम्युनिज्म के बीच गोलवलकर अवरोध हैं।’ यह शब्दश: उनका कथन है।
राष्ट्रहित में परम साहसी अम्बेडकर
बाबासाहब पं. नेहरू की विदेश नीति के कटु आलोचक थे। उन्होंने कहा था, एक ओर मुस्लिम देश आसानी से पाकिस्तान के साथ मिलकर गुट बना सकते हैं और इस ओर चीन को ल्हासा पर कब्जा कर लेने देने से हमारे प्रधानमंत्री ने चीन को हमारी सीमा के पास तक आ भिड़ने में मदद की है । संविधान में धारा 370 जोड़ने के बारे में भी बाबासाहब को इसके लिए सहमत करने की जिम्मेदारी पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला पर सौंपी थी । प्रत्यक्ष चर्चा में भाग लेना इस संकेतात्मक बन्धन के कारण संभव न होने से बाबासाहब ने 370 धारा का विरोध करने का काम अपने मित्र मौलाना हसरत, मोहानी से करवाया।
भाषावार प्रान्त रचना देश के लिए घातक होगी, यह चेतावनी देने का कार्य केवल दो महापुरुषों ने ही किया था एक परम पूजनीय गुरुजी, दूसरे पूज्य डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर । राज्य के पुनर्गठन में उनकी अवधारणा की इकाइयाँ (यूनिट्स) पं. दीनदयाल जी की जनपद अवधारणा से मेल खाती थी।
14 अप्रैल, 1942 को बाबासाहब के 50 वें जन्म दिवस पर शुभकामनाएँ देते हुए स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने लिखा था, “अम्बेडकर अपने व्यक्तित्व, विद्वता, संगठन कुशलता और नेतृत्व कुशलता के कारण ही देश के एक आधारभूत महापुरुष गिने जा सकेंगे । किन्तु अस्पृश्यता के उन्मूलन और लाखों अस्पृश्य बस्तुओं में साहसपूर्ण आत्म-विश्वास और चेतना जगाने में जो यश उन्हें मिला है उससे उनके द्वारा भारत की अमूल्य सेवा हुई है। यह उनका कार्य चिरंतन स्वरूप का, देशभक्ति पूर्ण और मानवतावादी है। अम्बेडकर जैसे महान् व्यक्ति का जन्म, तथाकथित अस्पृश्य जाति में हुआ यह बात अस्पृश्य वर्ग की निराशा मिटा कर कथित स्पृश्यजनों के थोथे व्यक्तित्व एवं बड़प्पन को चुनौती देने की प्रेरणा उन्हें दिये बगैर नहीं रहेगी। अम्बेडकर के प्रति आदर रखते हुए मैं उनके स्वस्थ दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ जिससे वे अपने समाज में बड़े प्रभावी परिवर्तनकारी अभियान चला सके ।“
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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