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नेत्र की निगरानी में नया भारत 27 वर्षों की तपस्या से मिली आसमान की 'तीसरी आँख'

A New India Under Watchful Eyes: The 'Third Eye' in the Sky Achieved After 27 Years of Dedication

मित्रों, 11 जनवरी 1999 को  तमिलनाडु के अरक्कोनम के आसमान में भारतीय रक्षा विज्ञान ने अपने सबसे दर्दनाक दिनों में से एक देखा। भारत के पहले स्वदेशी एयरबोर्न सर्विलांस प्लेटफॉर्म (ASP) की परीक्षण उड़ान के दौरान एक संशोधित एवीआरओ विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस हादसे में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) के चार वैज्ञानिकों और भारतीय वायुसेना के चार अधिकारियों सहित आठ प्रतिभाशाली कर्मियों ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उस दिन केवल एक विमान नहीं गिरा था, बल्कि ऐसा लगा था कि भारत की अपनी "आकाशीय आँखें" विकसित करने का सपना भी मलबे में दफन हो गया है। लेकिन इतिहास गवाह है कि जिन राष्ट्रों के संकल्प बड़े होते हैं, वे असफलताओं से हार नहीं मानते।

लगभग 27 वर्षों बाद वही सपना 'नेत्र' (Netra) एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (AEW&C) प्रणाली के रूप में भारतीय वायुसेना की सबसे भरोसेमंद "तीसरी आँख" बनकर सामने खड़ा है। इसे फाइनल ऑपरेशनल क्लियरेंस (FOC) मिलना केवल एक रक्षा परियोजना की सफलता नहीं, बल्कि उन आठ वीर वैज्ञानिकों और वायुयोद्धाओं के अधूरे स्वप्न को साकार करने का ऐतिहासिक क्षण भी है। यही कारण है कि इस उपलब्धि को परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों और भारतीय वायुसेना के अधिकारियों ने 1999 के उन शहीद साथियों को समर्पित किया।

युद्ध का स्वरूप इक्कीसवीं सदी में पूरी तरह बदल चुका है। आज विजय केवल अधिक लड़ाकू विमान या अधिक मिसाइलें रखने से सुनिश्चित नहीं होती, बल्कि उस राष्ट्र को बढ़त मिलती है जो दुश्मन को पहले देख सके, उसकी गतिविधियों को पहले समझ सके और उससे पहले निर्णय ले सके। आधुनिक सैन्य रणनीतिकार इसे "इन्फॉर्मेशन डॉमिनेंस" कहते हैं। नेत्र भारत को यही बढ़त प्रदान करता है। वर्ष 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक से लेकर हालिया ऑपरेशन सिंदूर तक इस स्वदेशी प्रणाली ने भारतीय वायुसेना के लिए एक ऐसे "फोर्स मल्टीप्लायर" की भूमिका निभाई, जिसने पूरे युद्धक्षेत्र की तस्वीर बदल दी। यह केवल आसमान में उड़ने वाला विमान नहीं, बल्कि हवा में स्थापित एक चलता-फिरता कमांड एवं कंट्रोल सेंटर है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर तक दुश्मन की गतिविधियों पर निरंतर नज़र रख सकता है।

बेंगलुरु स्थित सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स (CABS), जो डीआरडीओ की एक अग्रणी प्रयोगशाला है, ने इस प्रणाली को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित किया है। इसे ब्राज़ील के एम्ब्रेयर EMB-145I विमान पर एकीकृत किया गया है, लेकिन इसकी वास्तविक शक्ति विमान नहीं, बल्कि उसके भीतर स्थापित स्वदेशी मिशन सिस्टम हैं। नेत्र का सबसे महत्वपूर्ण अंग उसका अत्याधुनिक एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड ऐरे (AESA) रडार है। पारंपरिक रडारों को लक्ष्य खोजने के लिए यांत्रिक रूप से घूमना पड़ता है, जबकि AESA रडार इलेक्ट्रॉनिक बीम के माध्यम से एक साथ अनेक दिशाओं में निगरानी कर सकता है। परिणामस्वरूप यह अधिक तेज़, अधिक सटीक, अधिक विश्वसनीय और इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग के विरुद्ध कहीं अधिक प्रभावी सिद्ध होता है।

इस प्रणाली की क्षमताएँ केवल रडार तक सीमित नहीं हैं। इसमें आइडेंटिफिकेशन फ्रेंड ऑर फो (IFF) प्रणाली लगी है, जो मित्र और शत्रु विमानों की तत्काल पहचान करती है। इसका उच्च क्षमता वाला मिशन कंप्यूटर लाखों सूचनाओं का वास्तविक समय में विश्लेषण करता है। सुरक्षित संचार नेटवर्क लड़ाकू विमानों, ग्राउंड कंट्रोल स्टेशनों और वायु रक्षा प्रणालियों को एक साझा सूचना तंत्र से जोड़ते हैं। वहीं इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट मेजर्स (ESM) दुश्मन के रडार उत्सर्जन को पकड़ते हैं और कम्युनिकेशन सपोर्ट मेजर्स (CSM) उसके संचार संकेतों का विश्लेषण करते हैं। अर्थात नेत्र केवल दुश्मन को देखता ही नहीं, बल्कि उसकी "भाषा" भी सुनता है, उसकी गतिविधियों को समझता है और कुछ ही क्षणों में भारतीय वायुसेना को आवश्यक निर्णय लेने योग्य जानकारी उपलब्ध कराता है। आधुनिक नेटवर्क-सेंट्रिक युद्ध में यही क्षमता सबसे निर्णायक हथियार मानी जाती है।

बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान भारतीय वायुसेना को पाकिस्तान की हवाई गतिविधियों पर निरंतर निगरानी बनाए रखने में ऐसी प्रणालियों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। हालिया ऑपरेशन सिंदूर में भी नेत्र ने भारतीय लड़ाकू विमानों, वायु रक्षा नेटवर्क और कमांड मुख्यालयों के बीच वास्तविक समय में सूचनाओं का आदान-प्रदान सुनिश्चित किया। यह प्रणाली दुश्मन के विमानों, ड्रोन, हेलीकॉप्टरों, क्रूज़ मिसाइलों और कम ऊँचाई पर उड़ने वाले लक्ष्यों का समय रहते पता लगाकर भारतीय सेनाओं को पहले प्रतिक्रिया देने का अवसर देती है। युद्ध में कई बार कुछ मिनटों की चेतावनी ही जीत और हार का अंतर तय कर देती है, और नेत्र वही बहुमूल्य समय भारत को उपलब्ध कराता है।

नेत्र की सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह भारत की तकनीकी आत्मनिर्भरता का जीवंत उदाहरण बन चुका है। विश्व में ऐसी एयरबोर्न अर्ली वार्निंग प्रणाली विकसित करने की क्षमता केवल कुछ देशों—अमेरिका, रूस, इज़राइल, स्वीडन और चीन—के पास रही है। लंबे समय तक भारत को भी विदेशी तकनीक पर निर्भर रहना पड़ा। इज़राइल के फैल्कन (Phalcon) सिस्टम ने भारतीय वायुसेना की क्षमताएँ अवश्य बढ़ाईं, लेकिन नेत्र ने भारत को एक नई पहचान दी—अब वह केवल रक्षा तकनीक का आयातक नहीं, बल्कि उसका निर्माता भी है। यही अनुभव अब AEW&C Mk-II जैसी अगली पीढ़ी की स्वदेशी परियोजनाओं की आधारशिला बनेगा, जिनसे भारत की निगरानी क्षमता और भी व्यापक होगी।

यह उपलब्धि ऐसे समय आई है जब भारत के सामने चीन और पाकिस्तान जैसे दो परमाणु-संपन्न पड़ोसियों की चुनौती है। दोनों देशों ने अपनी वायु और मिसाइल क्षमताओं का निरंतर विस्तार किया है। ऐसे सुरक्षा परिवेश में केवल शक्तिशाली हथियार पर्याप्त नहीं होते; उनसे भी अधिक महत्वपूर्ण होती है दुश्मन की हर गतिविधि पर समय रहते नज़र रखने की क्षमता। नेत्र भारतीय वायुसेना को यही रणनीतिक बढ़त देता है। यह पूरे युद्धक्षेत्र को एक साझा डिजिटल तस्वीर में बदल देता है, जहाँ लड़ाकू विमान, मिसाइल रक्षा प्रणाली, ग्राउंड कमांडर और राष्ट्रीय कमान एक ही सूचना पर कार्य करते हैं। यही आधुनिक युद्ध की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

नेत्र की अंतिम परिचालन स्वीकृति इसलिए केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है; यह भारत के वैज्ञानिक आत्मविश्वास का उद्घोष है। 1999 में जिस दुर्घटना ने इस यात्रा को रक्तरंजित कर दिया था, उसी यात्रा ने 2026 में आत्मनिर्भर भारत की सबसे बड़ी रक्षा सफलताओं में से एक को जन्म दिया है। यह उन वैज्ञानिकों की तपस्या का प्रतिफल है, जिन्होंने असफलता को अंत नहीं बनने दिया, बल्कि उसे नई शुरुआत का आधार बनाया। आज जब नेत्र भारत के आकाश की निगरानी कर रहा है, तब वह केवल सीमाओं की रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि दुनिया को यह संदेश भी दे रहा है कि नया भारत अब रक्षा तकनीक का उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसका सृजनकर्ता है। और शायद यही इस उपलब्धि का सबसे बड़ा अर्थ है—भारत ने अब केवल अपने आसमान को सुरक्षित नहीं किया है, बल्कि अपनी सामरिक नियति भी स्वयं लिखनी शुरू कर दी है।

 

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