जापानियों ने कर्मयोग के शास्त्र-सम्मत संदेश को ग्रहण करके अपने जीवन को चरितार्थ कर दिया है। समुद्र के किनारे विभिन्न टापुओं पर बसे हुए प्राय: 12 करोड़ जनसंख्या वाले जापान के लिए यह नहीं कहा जा सकता है कि जापान को प्रकृति का वरदहस्त प्राप्त है, पर जापान ने अपनी श्रमशक्ति के बल पर दिखा दिया है कि वह विश्व की आर्थिक महाशक्ति है तथा वह इस प्रतियोगात्मक संसार में सर्वश्रेष्ठता के शिखर के बिल्कुल पास है।
जापानियों का गंतव्य है और वह भी कुशल तथा तकनीकी सम्मत कार्य। जापानियों के परिश्रम तथा अल्प भोजन-रुचि के कारण जापान का अधिकांश उत्पादन का लाभांश उनके बैंकों में जमा होता रहता है। जापान के सामने समस्या है कि इस अतिरिक्त पूंजी को कहां निवेशित करे। जापानियों के पास कार्याधिक्य के कारण खर्च करने के लिए समय नहीं है। यही कारण है कि हाल में जापान की अर्थव्यवस्था में ठहराव आ गया था। इस समस्या का निवारण करने के लिए जापानी अन्य देशों में निवेश करने के लिए निकल पड़े हैं। उनकी युवा पीढ़ी विश्व के ज्येष्ठ एवं अनुभवी लोगों के संपर्क में आ रहे हैं। जापान की यही युवा पीढ़ी जब जापान की कर्णधार होगी तब उनके पास इतना अनुभव एवं परिपक्वता होगी कि जापानियों को कोई दूसरे नम्बर पर नहीं धकेल पायेगा। आज जापान विश्व का नम्बर एक का साहूकार है।
पर्यावरण एवं प्रदूषण निवारण के प्रति जापानी पश्चिमी देशों से भी अधिक संवेदनशील हो गये हैं। जब प्रदूषण ही नहीं होगा तो प्रदूषण-निवारण का सवाल ही नहीं उठेगा। जापान कई देशों में जल-प्रदूषण निवारण सम्बंधी योजनाओं को कार्यान्वित करने के लिए आगे आया है जैसे भारत में गंगा कार्य योजना। जापानी अपने देश में इस तरह की विकराल समस्या का सुरसा की भांति मुख ही नहीं खुलने देते। कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक स्थल पर धूम्रपान नहीं कर सकता है। धूम्रपान करने के लिए प्रत्येक सार्वजनिक स्थान पर छोटे-छोटे कांच के बंद कक्ष बनाये गये हैं, जहां खड़े होकर धूम्रपान प्रेमी एक साथ धूम्रपान यज्ञ में भागीदार हो सकते हैं। चाहे कार्यालय हो, या सड़़क हो, बस अड्डा हो अथवा होटल या सार्वजनिक स्थल हो, सभी स्थानों पर जापानी महिलाएं हाथों में प्लास्टिक के लम्बे दस्ताने पहनकर तथा उच्च तकनीकी वाली सुन्दर झाड़ू लेकर दिन भर सफाई करती रहती हैं। कूड़ा गिरने के पूर्व ही वह अदृश्य हो जाता है। सभी कार्यों के लिए निर्धारित स्थल हैं। यहां तक कि प्रेमी युगलों के लिए भी टहलने के लिए अद्र्धचन्द्राकार विद्युत से टिमटिमाता हुआ प्रेमपथ निर्धारित है। पौ फटने के पूर्व ही पूरा जापान साफ हो जाता है। यदि कोई कसर हुई तो प्रकृति द्वारा रिमझिम बारिश से सभी पथ एवं भवन परिष्कार हो जाते हैं। ऐसा ज्ञात होता है जैसे कि स्वच्छता की साम्राज्ञी ने जापान में अपना डेरा डाल लिया हो।
जापान में अधिकारियों तथा कर्मचारियों के बीच पृथक-पृथक कक्ष नहीं हैं। सभी एक ही छत के नीचे समान रुप से काम करते हैं तथा एक-दूसरे पर परस्पर नियंत्रण रखते हैं। उनके वेतन मानों एवं जीवनस्तर में भी बहुत विभेद नहीं है। वे प्रत्येक कार्य में तनाव, विरोधाभास तथा अपशिष्ट को कम-से-कम करते हैं, ताकि उत्पाद में पूर्ण गुणवत्ता सुनिश्चित हो सके। वे बोलने की अपेक्षा दूसरों की बात सुनना अधिक पसंद करते हैं। वे दूसरों के काम में छिद्रान्वेषण नहीं करते हैं, बल्कि उसमें सहयोग करके उसमें श्रेष्ठता लाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि जापान के भंडारों में सबसे कम माल बंद रहता है। वे अपनी भांति कच्चे माल तथा उत्पादन को भी निरंतर गतिशील रखते हैं। गति ही जीवन है। परिवर्तन ही गति है एवं गति ही प्रगति है। जापान में हड़ताल तथा तालाबंदी नाममात्र की होती है। वे सभी पर अपना एवं अपने समुदाय का अधिकार समझते हैं। जापानी कम्पनियां भी कर्मचारियों को जीवन भर की नौकरियां देती हैं। इसलिए उनका जापानी कम्पनियों तथा कारखानों से भावनात्मक लगाव है। यदि उन्हें आपत्ति हुई या विरोध हुआ तो वे अपनी पोशाक पर काला फीता लगाकर इसका प्रदर्शन करते हैं। कभी-कभी वे विरोध में कारखानों में अधिक उत्पादन करते हैं, ताकि उद्योग के स्वामी या प्रबंधक को नुकसान हो पर समाज को अधिक लाभ हो। इस प्रकार जापान व्यक्ति के ऊपर समष्टि को रखते हैं। यह कहना आसान है पर इसका व्यावहारिक रुप जापान में देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि इस साम्यवादी सिद्धांत का भी समाज में इस प्रकार प्रणयन संभव है।
जापान ने समय के साथ कदम बढ़ाना सीखा है। जैसे ही कोई नया उत्पाद किसी देश में आया, जापानी सरकारें तथा निजी कम्पनियां अन्वेषण में लग जाती हैं। जापान में नई-नई खोजें तथा वैज्ञानिक एवं तकनीकी प्रयोगशालाओं पर जमकर खर्च किया जाता है। राष्ट्रीय एवं प्रांतीय सरकारों की ओर से सभी उत्पादों के लिए अन्वेषण-संस्थान तथा प्रयोगशालाएं हैं जहां सरकार की ओर से तैनात वैज्ञानिक, निजी कंपनियों के अभियन्ता तथा विश्वविद्यलाय है एवं अविकसित देशों में इन अनुसंधानों को फाइलों के पन्ने से निकलने में इतनी देर हो जाती है कि उनके बाहर आने के पहले बाजार में उससे अच्छा दूसरा उत्पाद आ जाता है। पर इन उत्पादों का जापान में मूल्य विदेशों में उनके मूल्य से अधिक होता है क्योंकि जापान में उपभोक्ता के पास विराट क्रयशक्ति है, अर्थतंत्र का ऊंचा स्तर है। यही कारण है कि जापानी कम्पनियां अपने कारखाने विदेशों में स्थापित कर रही हैं पर अंत में लाभांश तो जापान में ही आता है।
आधुनिक जापानी युवा पीढ़ी उपभोक्ता संस्कृति के प्रभाव के कारण नशे तथा स्वछन्द जीवन की ओर प्रवृत्त हो रही है। शायद जापान को फिर से भारत से या भारतीय गुरुओं जैसे- रविशंकर तथा रामदेव आदि से बौद्ध-पद्धति सीखनी होगी, जोकि बौद्ध-पद्धति का अधुनिकतम संस्करण है। यदि जापान में तुरन्त एक और वैचारिक क्रांन्ति न लायी गयी तो जापान उपभोक्ता-संस्कृति के बोझ से चरमरा उठेगा। वैसे भी जापान में वृद्धों और बीमारों की संख्या बढ़ रही है तथा सक्रिय कामकाजी लोगों की संख्या कम हो रही है। यह किसी भी समाज के लिए एक अपशकुन है।
डॉ. प्रमोद कुमार अग्रवाल
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