गांव के गोचर में उगे वनौषधीय जंगल अब लुप्त हो रहे हैं। खेतों में कंकरीट के जंगल उग रहे हैं। जड़ी-बूटियों की जगह इंजेक्शन व रासायनिक टेबलेट में स्वास्थ्य खोजा जा रहा है। यह बिडंबना उस देश की है, जिसने विश्व को आयुर्वेद महान का नारा दिया। पतंजलि आयुर्वेद व पतंजलि का संपूर्ण आंदोलन इन्हीं बातों से चिंतित है और औषधि के नाम पर परमात्मा के इस शरीर रूपी मंदिर के साथ हो रहे अत्याचार को वैश्विक स्तर पर समाप्त करने के लिए पतंजलि आयुर्वेद सतत अनुसंधानरत है। इन शोध निष्कर्षों पर आधारित है बनौषधी में स्वास्थ्य की यह श्रृखंला। प्रस्तुत अंक में शरद ऋतु की अति उपयोगी बनौषधीय तिल के गुण-कर्म प्रयोग दिये जा रहे हैं:-
तिल और तिलों के तेल से सब परिचित हैं। जाड़े की ऋतु में तिल के मोदक बड़े चाव से खाये जाते हैं। रंग भेद से तिल के तीन प्रकार होते हैं, श्वेत, लाल एवं काला। औषधि कर्म में काले तिलों से प्राप्त तेल (बीज) एवं तेल भारतवर्ष के प्रसिद्ध व्यावसायिक एवं औषधीय द्रव्य हैं। भारत के समस्त प्रांतों में लगभग 1200 मी ऊंचाई तक इसकी खेती की जाती है। तिल के नित्य सेवन से जठराग्रि प्रदीप्त होती है, मेधा शक्ति बढ़ती है, बुद्धि की ग्रहण शीलता बढ़ती है तथा दांतों के लिए यह विशेषकर हितकर माना जाता है।
तिल का तेल त्वचा के लिए लाभकारी है। प्रतिदिन तिल के तेल की मालिश करने से मनुष्य रक्त विकार, कटिशूल, अंगमर्द, वातव्याधि जैसे रोगों से दूर रहता है। तिलों की पुल्टिस बनाकर घाव पर बांधने का भी विधान है। शरीर में किसी भी अंग में नागफनी या थूहर का कांटा घुस जाये और निकालने में दिक्कत हो तो उस जगह तिल का तेल बार-बार लगाने से कुछ समय में वह कांटा स्वत: निकल जाता है। ऐसे अनेक रोगों में कारगर साबित होने वाले तिल का संपूर्ण पंचाग अर्थात् मूल, पत्र, बीज एवं तैल सभी प्रयोज्य हैं, पर कुष्ठ, शोथ तथा प्रमेह के रोगियों को स्नेहन, भोजन आदि में तिल का प्रयोग बिल्कुल वर्जित बताया गया है। इसके अतिरिक्त अन्य प्रयोगों में चिकित्सक के परामर्शानुसार ही इसका उपयोग करना चाहिए।
बाह स्वरूप
यह सीधा, 30-60 सेमी ऊंचा, तीक्ष्ण-गंधयुक्त, शाखित अथवा अशाखित, वर्षायु, शाकीय पौधा है। इसका काण्ड सूक्ष्म अथवा रोमश, ऊपरी भाग की शाखाएं एवं काण्ड चतुष्कोणीय, कुंठाग्र एवं खांचयुक्त होती हैं। इस पौधे पर जगह-जगह स्नावी ग्रंथियां पाई जाती हैं। इसके पत्र बृहत् पतले, कोमल, रोमयुक्त, ऊध्र्व के पत्र कुछ लंबे तथा अधोभाग के पत्र पालिक, 6-15 सेमी लंबे एवं 3-10 सेमी चौड़े होते हैं। इसके पुष्प बैंगनी, गुलाबी अथवा श्वेताभ बैंगनी व पीत वर्ण के चिन्हों से युक्त होते हैं। इसकी फली 2-5 सेमी लंबी, 6 मिमी चौड़ी, रोमश, सीधी, चतुष्कोणीय तथा 4-खांचयुक्त होती है। बीज अनेक, 2-5 मिमी लंबे, 1-5 मिमी चौड़े, चिकने भूरे अथवा श्वेत वर्ण के होते हैं। इसका पुष्पकाल एवं फलकाल अगस्त से अक्टूबर तक होता है।
रासायनिक संघटन
तिल के पुष्प में ग्लायकोलिपिड्स तथा फास्फोलिपिड्स पाए जाते हैं। इसके बीज में वसा, प्रोटीन, म्युसिलेज, कार्बोहाइड्रेट, खनिज कैल्शियम, फॉस्फोरस, विटामिन-ए, बी, सी, ई थाएमिन, आर्जिनिन सिसटीन, ल्यूसीन, टायरोसिन, वैलीन, निआसिन, अवाष्पशील तैल, सिसामिन, सिसेमैलिन तथा सिसामेल पाया जाता है।
इसके पत्र में गोंद सदृश पदार्थ फ्लेवोनायड ग्लुकोसाईड एवं पेडालिन भी होता है।
औषधीय प्रयोग एवं विधि
शिरो रोग
केशविकार : तिल की जड़ और पत्र का क्वाथ बनाकर बाल धोने, काले तिलों के तेल को शुद्ध अवस्था में बालों में लगाने से बाल असमय सफेद नहीं होते। सदैव मुलायम, काले और घने रहते हैं।
- सिर के बालों में रूसी पडऩे पर तिल के फूल तथा गोक्षुर को बराबर मात्रा में लेकर इसे घी तथा मधु के साथ पीसकर सिर पर लेप करने से गंजापन तथा रूसी दूर होती है।
- सूर्यावर्त : दूध के साथ तिल को पीसकर, वेदनायुक्त स्थान का स्वेदन करने या मस्तक पर लगाने से सूर्यावर्त नामक शिरोरोग में लाभ होता है।
- खालित्य-पालित्य : समभाग आंवला, काला तिल, कमल केसर तथा मुलेठी के चूर्ण में मधु मिलाकर सिर पर लेप करने से बाल लंबे तथा काले होते हैं।
- तिल के पत्तों को सिरके या पानी में पीसकर मस्तक पर लेप करने से शिर:शूल का शमन होता है।
नेत्र रोग
- तिल के पुष्पों पर शरद्-ऋतु में पड़ी ओस की बूंदों को मलमल के कपड़े या किसी अन्य तरीके से उठाकर शीशी में भरकर रख लें। इन ओस कणों को आंख में टपकाते रहने से नेत्रों के सब प्रकार के रोगों से लाभ मिलता है।
- काले तिलों का क्वाथ बनाकर नेत्र धोने से नेत्र विकारों में लाभ होता है।
- 80 तिल के पुष्प, 60 पिप्पली, 50 जाती पुष्प तथा 16 काली मिर्च को जल के साथ पीसकर वत्र्ति बनाकर, घिसकर अंजन करने से तिमिर, अर्जुन, नेत्रशक्र, मांसवृद्धि आदि नेत्र रोगों का शमन होता है।
- तिल तैल, बहेड़ा तैल, भृंगराज रस तथा विजयसार क्वाथ को मिलाकर लोहे की कड़ाही में तैल पाक करके रख लें। प्रतिदिन 1-2 बूंद नस्य लेने से दृढ़शक्ति बढ़ती है।
वक्ष रोग
- खांसी : तिल और मिश्री को उबालकर पिलाने से सूखी खांसी मिटती है।
उदर रोग
- रक्तातिसार : तिल के 5 ग्राम चूर्ण में बराबर मिश्री मिलायें तथा इसे बकरी के चार गुने दूध के साथ सेवन करने से रक्तातिसार में लाभ होता है।
- आमातिसार : तिल के पत्रों को पानी में भिगोने से पानी में लुआब आ जाता है, यह लेप या लुआब बच्चों को विसूचिका, आमातिसार, प्रतिश्याय और मूत्र नली जैसे रोगों में पिलाने से लाभ होता है।
गुदा रोग
- अर्श : तिल को जल के साथ पीसें, इसे मक्खन के साथ दिन में तीन बार भोजन से 1 घंटा पहले खायें, अर्श में लाभ होगा तथा रुधिर का निकलना बंद होगा।
- तिल को पीसकर गर्म करके अर्श पर पुल्टिस की तरह बांधें।
- बवासीर : तिल के तेल की बस्ति (एनिमा) देने से गुदा के अंदर काफी दूर तक आंतें स्निग्ध होती हैं व मल के गुच्छे निकल जाते हैं, जिससे बवासीर में राहत महसूस होती है।
पथरी रोग
- तिल की छाया-शुष्क कोमल कोपलों (125-250 मिग्रा) को प्रतिदिन खाने से पथरी गलकर निकल जाती है।
- तिल पुष्पों के 1-2 ग्राम क्षार में 2 चम्मच मधु और 250 मिली दूध मिला कर पिलाने से पथरी गल जाती है।
- 125-250 ग्राम तिल पमचाघौ भस्म को सिरके के साथ प्रात: सायं भोजन से पहले खाने से पथरी गलकर निकल जाती है।
प्रजननसंस्थान संबंधी रोग
- गर्भाशय के विकार : गर्भाशय में रुधिर के जमाव को बिखेरने के लिए 625 मिग्रा तिल के चूर्ण को दिन में 3-4 बार सेवन करें, साथ ही कमर तक उष्ण जल में बैठना चाहिए।
- मासिक धर्म यदि कष्ठ से आता हो तो तिलों का 30-40 मिली क्वाथ बनाकर पिलाना चाहिए।
- तिल के 100 मिली क्वाथ में 2 ग्राम सोंठ, 2 ग्राम काली मिर्च और 2 ग्राम पीपल का चूर्ण बुरककर दिन में तीन बार पिलाने से मासिक धर्म की रुकावट मिटती है।
- रुई के फाहे को तेल में भिगोकर योनि के अग्रभाग पर रखने से श्वेत प्रदर में लाभ होता है।
- 10 ग्राम तिल और 10 ग्राम गोखरू को रातभर पानी में भिगोयें, प्रात:काल उनका चेप निकालकर उसमें थोड़ा बूरा डालकर पिलाने से बंद हुआ मासिक धर्म फिर से प्रारंभ हो जाता है।
- 1-2 ग्राम तिल चूर्ण को दिन में 3-4 बार जल के साथ लेने अथवा तिल का काढ़ा बनाकर लगभग 30-40 मिली काढ़े को सुबह शाम पीने से मासिक-धर्म नियमित हो जाता है।
- 5 ग्राम तिल तथा 1 ग्राम गोखरू चूर्ण को 200 मिली बकरी के दूध में पका कर ठंडा करें, उसमें शहद मिलाकर पिलाने से वीर्य की पुष्टि होती है।
- सूजाक : इसके ताजे पत्तों को 12 घंटे तक पानी में भिगोकर उस पानी को पिलाने अथवा तिल के 1-2 ग्राम क्षार को दूध या शहद के साथ देने से पेशाब की जलन कम होती है और पेशाब साफ आता है।
अस्थिसंधि रोग
- संधिवात : तिल तथा सोंठ चूर्ण को समभाग लेकर प्रतिदिन इसे 5-5 ग्राम की मात्रा में तीन से चार बार सेवन करने से संधिवात में लाभ होता है।
- पुरूषार्थ : तिल और अलसी का क्वाथ बनाकर 30-40 मिली नित्य प्रात:-सायं भोजन से पहले पिलाने से पुरुषार्थ वृद्धि होती है।
रसायन वाजीकरण
- रसायन : काले तिल और जल भांगरे के पत्तों को लगातार एक मास तक सेवन करने से कई प्रकार के रोग मिटते हैं। यह रसायन जैसा प्रभाव दर्शाता है। पथ्य में सिर्फ दूध ही आहार रूप में लें।
बाल रोग
- बच्चों का मूत्र रोग : रात्रि में बच्चे बिस्तर गीला कर देते हैं, उनके लिए तिल का लंबे समय तक सेवन बहुत लाभकारी है।
विष चिकित्सा
विष : तिल और हल्दी को पानी में पीसकर लेप करने से मकड़ी का विष दूर होता है।
तिल को पानी में पीसकर लेप करने से बिल्ली का विष तथा सिरके में पीसकर मलने से भिरड़ (बर्रें) का विष दूर होता हैं।
विषम ज्वर : तिल की लुगदी बना लें, उसे घी के साथ लेने से विषमज्वर में लाभ होता है।
- वृश्चिक दंश : तिल की खली (पिण्याक) का दंशस्थान पर लेप करने से वृश्चिक दंश जन्य वेदना आदि का शमन होता है।
कीटविष : वात प्रधान कीट के काटने पर तिल की खली (पिण्याक) का लेप करें, व उस पर तिल तैल की मालिश करने से लाभ मिलता है।
इस प्रकार सर्दियों में तिल व तिल के तेल का उपयोग करें और शरीर के अंग-प्रत्यंग को स्वस्थ पोषण से भरपूर बनायें।
(साभार: योग संदेश)
आचार्य बालकृष्ण
проверить место сайта по запросуmfxbroker com
Leave Your Comment