ञ्चया मालदा हिंसा को टाला जा सकता था? क्या मालदा हिंसा सुनियोजित साजिश थी? क्यों और कैसे मालदा हिंसा को रोकने में पश्चिम बंगाल सरकार नाकाम रही? क्या अपनी नाकामी छुपाने के लिये पश्चिम बंगाल सरकार ने इस मामले को मामूली झगड़ा बताते हुए इसका ठीकरा बीएसएफ के सिर फोडऩा चाहा था? या फिर इसके पीछे मुस्लिम तुष्टीकरण है, क्योंकि पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं? आखिर क्यों हिंसा के बाद बीजेपी नेताओं को मालदा जाने से यह कहकर रोका गया, कि उनके वहां पहुंचने से स्थिति और बेकाबू हो सकती है? क्यों और कैसे पश्चिम बंगाल पुलिस और उसके इंटेलिजेंस को समय रहते इतने बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा की भनक तक नहीं मिल सकी? मालदा पुलिस ने पहले ही वहां धारा 144 लगाकर, एहतियातन असामाजिक तत्वों पर कड़ी नजर रख कर स्थिति को बिगडऩे से रोकने की हरसंभव कोशिश क्यों नहीं की? क्योंकि, ये तो हो ही नहीं सकता कि अकस्मात कहीं ढाई लाख लोगों की भीड़ अपने-अपने घरों से निकल कर दुकानों में लूटपाट, सड़कों पर तांडव करे और थाने में आग लगा दे? हिंसक भीड़ ने पुलिस के सामने ही पुलिस की कई गाडिय़ों, दो दर्जन गाडिय़ों, बीएसएफ की एक बस में आग लगाने के बाद थाने में तोड़-फोड़ और आगजनी की और पुलिस इसे रोकने की बजाय देखती रही। ये सारे सवाल मालदा के कालियाचक इलाके में करीब ढाई लाख लोगों की भीड़ द्वारा बड़े पैमाने पर की गई हिंसा, आगजनी और लूटपाट के बाद उस पर हो रहे राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों में छुपे हैं। बीजेपी ने हिंसा के लिये सीधा ममता सरकार को जिम्मेदार बताया है। पार्टी नेताओं के मुताबिक एनआईए मालदा में जाली नोट के रैकेट का भंडाफोड़ करने वाली थी क्योंकि देश में करीब 80 फीसदी नकली करेंसी मालदा से होकर आती है। इसके लिए बंगाल पुलिस की मदद चाहिये। ये सारी डिटेल्स कालियाचक पुलिस स्टेशन में थी और इसी रिकॉर्ड को जलाने और दोषियों को बचाने के लिये पुलिस स्टेशन पर हमला हुआ। मालदा में अफीम की खेती होती है और इसे बांग्लादेश में भेजा जाता है। इसे अब तक क्यों नहीं रोका गया?
03 जनवरी को मालदा में बड़े पैमाने पर भड़की हिंसा के बाद बिहार में हुए उपद्रव और हिंसा से उपजे तनाव के बाद राजनीति चरम पर है। बीजेपी का कहना है कि मालदा हिंसा सुनियोजित साजिश थी और मालदा में सांप्रदायिक पर्चे बांटे गए थे और ममता सरकार की नरमी की वजह से ये तोडफ़ोड़ और हिंसा हुई। जबकि पश्चिम बंगाल की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस और वहां की सीएम ममता बनर्जी ने मालदा हिंसा पर अपना बचाव करते हुए इसे सांप्रदायिक या सुनियोजित हिंसा मानने से इनकार कर दिया और बीजेपी पर मालदा हिंसा के जरिये राजनीति करने का आरोप लगाया। ममता बनर्जी ने कहा कि असल में यह स्थानीय लोगों और बीएसएफ के बीच का मामला था और अब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण में है। लेकिन सवाल यही कि पश्चिम बंगाल सरकार और पुलिस लाखों लोगों के हिंसक होने और उनके हाथों करोड़ों रुपये के माल के खाक होने का इंतजार क्यों करती रही? तीन जनवरी को हुई हिंसा के बाद से मालदा में स्थिति तनावपूर्ण है। इस मामले में 11 लोगों की गैरजमानती धाराओं में गिरफ्तारी हुई, जबकि चार अहम संदिग्ध लोगों पर पुलिस की गहरी नजर है।
मालदा हिंसा के बाद बिहार के पूर्णिया में हिंसा की गई और मालदा पार्ट-2 को दोहराया गया। पूर्णिया में ऑल इंडिया इस्लामिक काउंसिल की अगुवाई में मुस्लिम समुदाय के करीब 30 हजार लोगों ने हिंसक विरोध प्रदर्शन किया। हिंदू महासभा के कार्यकारी अध्यक्ष कमलेश तिवारी ने पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ जो आपत्तिजनक बयान दिया उस पर कानून फैसला करेगा, लेकिन तिवारी ने यह बयान किस प्रतिक्रिया में दिया? इसे भी जानना जरुरी है। दिनांक 29 नवंबर, साल 2015 एक ऐसी तारीख, जब उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के कद्दावर मंत्री आजम खां ने गे राइट्स के संदर्भ में बताते हुए कहा कि आरएसएस के कई नेता ऐसे ही हैं, इसलिए ही तो शादी नहीं करते। इसकी प्रतिक्रिया में कमलेश तिवारी ने पैगंबर मोहम्मद साहब पर विवादित बयान दिया। कमलेश तिवारी का पैगंबर मुहम्मद साहब पर दिया गया विवादास्पद बयान सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित हुआ, जबकि आजम खां का बयान तमाम विवादित बयानों की फेहरिस्त में खो गया। मुस्लिम धर्मगुरूओं का ध्यान भी कमलेश तिवारी के बयान के ऊपर गया, दूसरी ओर उर्दू मीडिया में भी तिवारी का बयान प्रमुखता से छपा।
2 दिसंबर, 2015 को सहारनपुर के देवबंद में कमलेश तिवारी के बयान के विरोध में एक बड़ा प्रदर्शन किया गया। दरअसल यह पहली प्रतिक्रिया थी। लोगों की भावनाओं को आहत करने एवं लोगों के गुस्से के बाद कमलेश तिवारी को गिरफ्तार कर लिया गया। सूबे के मुखिया अखिलेश यादव ने कमलेश तिवारी पर कड़ी कार्रवाई करने का मुस्लिम धर्मगुरूओं को आश्वासन भी दिया। लेकिन, सरकार और मुस्लिम संगठन आजम खां को क्यों भूल गए? निश्चित तौर पर कमलेश तिवारी को पैगंबर मुहम्मद साहब के अपमान के लिए सजा मिलनी चाहिए। सजा के रूप में तिवारी को अरेस्ट भी कर लिया गया। लेकिन, सवाल ये भी उठता है कि जहां से इस मामले को पहली चिंगारी मिली कार्रवाई तो उस सिरे से लेकर आखिरी कोने तक होनी चाहिए या फिर क्या केवल इसलिए, क्योंकि आजम खां सपा सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं, उन्हें छोड़ दिया जाये? यह गलत है या सही, इसका फैसला हम नहीं कर सकते, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि कार्रवाई नहीं करने के पीछे मुस्लिम वोट हैं। सपा को डर है कि आजम पर कार्रवाई करने से कहीं अल्पसंख्यकों के वोटों का ध्रुवीकरण न हो जाए। वहीं बिजनौर में कलेक्ट्रेट के बाहर हुई सभा में जमीयत शबाबुल इस्लाम के वेस्ट यूपी महासचिव और जामा मस्जिद के इमाम मौलाना अनवारुल हक ने कहा कि बिजनौर जिले के उलेमाओं का फैसला है कि अगर कमलेश तिवारी को सजा नहीं मिलती है तो वे उसे खुद सजा देंगे। उन्होंने कहा कि कमलेश तिवारी का सिर कलम करके लाने वाले व्यक्ति को बिजनौर के मुसलमान 51 लाख रुपये का इनाम देंगे। इसके बाद सीएम के नाम संबोधित मजिस्ट्रेट को सौंपे एक ज्ञापन में कमलेश तिवारी को फांसी दिलाये जाने की मांग की। खुलेआम कमलेश तिवारी का सिर कलम करने की बात करने वाले मौलाना साहब के खिलाफ 506 आईपीसी के तहत कार्रवाई की जा सकती है। किसी पर निजी टिप्पणी करने पर 504 आईपीसी के तहत कार्रवाई की जा सकती है। जाति, धर्म पर टिप्पणी करना 295 आईपीसी के अंतर्गत आता है, लेकिन प्रशासन चुपचाप ही रहा। यहां भी सपा सरकार के हाथ मुस्लिम वोटों की जंजीरों से बंधे हुए हैं।
इस मामले में यही हाल पश्चिम बंगाल की ममता सरकार का भी है। बंगाल सरकार ने शुरूआत में पूरे मामले पर चुप्पी साधे रखी। मालदा के थानों ने मुंह पर डर की उंगली रखकर सरकारों की हकीकत बता दी। बड़े पैमाने पर की गई हिंसा की घटना 3 दिन बाद उजागर हुई। स्थानीय पुलिस ने घटना के 3 दिन बाद इस मामले में 11 लोगों को गिरफ्तार किया। जबकि मुख्य आरोपी अताउल्ला शेख, अब्दुर रउफ, अशदुर बिश्वास और राजू मुराल को बताया गया है। एक जानकारी के मुताबिक, अताउल्ला शेख इदारा ए शरिया का चेयरमैन है। अब पुलिस सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही है, जिसके जरिये कुछ और संदिग्धों की पहचान संभव होगी।
ममता कर रही हैं देश की सुरक्षा से खिलवाड़-- सिद्धार्थनाथ सिंह
उदय इंडिया के वरिष्ठ संवाददाता कुमार मयंक ने मालदा में हुई हिंसा के मुद्दे पर बात की, बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और पश्चिम बंगाल भाजपा के सह-प्रभारी सिद्धार्थनाथ सिंह से। जिसमें उन्होंने ममता बनर्जी पर सीधा आरोप लगाया कि वह देशद्रोही तत्वों के साथ मिलकर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का नंगा नाच कर रहीं हैं। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के मुख्य अंश:
क्या मालदा हिंसा सांप्रदायिक थी या सुनियोजित? पूरे मामले में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?
मालदा की घटना मुस्लिम तुष्टीकरण का नतीजा है, वेस्ट बंगाल में तुष्टीकरण की राजनीति जारी है। ममता सरकार ने प्रशासन के हाथ बांध दिये हैं कि एक विशेष अल्पसंख्यक समुदाय -- मुस्लिमों के द्वारा कुछ भी करने पर उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई न करें, उनको खुली छूट है। दूसरी तरफ बांग्लादेश से आने वाले मुस्लिमों के पक्ष में वोट बैंक के लिये उनका तुष्टीकरण किया जा रहा है, इसका एकमात्र मकसद कम्युनल अप्रोच बनाकर उनका वोट लेना है। इसकी वजह से ही मालदा के अंदर बड़े पैमाने पर नकली नोटों की स्मगलिंग होती है, अफीम की खेती और तस्करी होती है। ये सभी गैर-कानूनी धंधे मुस्लिम समाज के लोग करते हैं और पुलिस-प्रशासन इसलिये रोक नहीं पाता क्योंकि ममता बनर्जी सरकार ने इसकी इजाजत दे रखी है। इसी वजह से ऐसी घटनाएं होती हैं। मालदा में हिसंक माहौल टीएमसी के पक्ष में मुसलमानों के वोटों को गोलबंद करने वाले मुस्लिम कट्टरपंथी संगठन इदारा-ए-शरिया ने बनाया। इदारा-ए-शरिया के दो सदस्य इदरेसलिया और इमरान अहमद तृणमूल कांग्रेस के सांसद भी हैं। इसके बाद इन्होंने एक महीने पहले यूपी में हुई पुरानी बात का जाल बुनकर, एक महीने से ज्यादा समय के बाद मालदा में सांप्रदायिकता का माहौल बनाकर, प्रदर्शन की बात को अपनी ढाल बनाकर सुनियोजित तरीके से इसे अंजाम दिया। इसमें शामिल असामाजिक तत्वों ने अपने मकसद को पूरा करने के लिये कालियाचक पुलिस स्टेशन में रखी गई स्मगलिंग और फेक करेंसी की जांच रिपोर्ट को नष्ट कर दिया।
सीएम ममता बनर्जी ने बीजेपी पर राजनीतिक फायदे के लिये इसे गलत तरीके से उछालने का आरोप लगाया है, इस पर आप क्या प्रतिक्रिया देंगे?
ममता बनर्जी के शासन में राजनीतिक फायदे के लिये तुष्टीकरण की सियासत उच्चतम स्तर पर है। वे वहां देश के कानून को लागू नहीं कर रही हैं जिससे कि एक धर्म विशेष के लोगों को इसका गलत फायदा मिलता रहे। धर्म के नाम पर वोट तो ममता बनर्जी लेती हैं और इसका नंगा नाच तो ममता बनर्जी के शासन में हो रहा है तो सांप्रदायिकता की राजनीति वह खुद कर रही हैं। और, ऐसा करके तो वह देश के सेक्युलर ढांचे पर ही प्रहार कर रही हैं। ऐसे में जब बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे के मुद्दे को उठाती है तो ममता बनर्जी को नागवार गुजरना स्वाभाविक ही है। जबकि ममता बनर्जी को खुद अपने गिरेबान में झांकना चाहिये।
क्या ममता सरकार ने अल्पसंख्यक वोटों के तुष्टीकरण की राजनीति में बीएसएफ के जवानों पर आरोप लगाया है? जबकि रैली में शामिल हिंसक भीड़ ने कालियाचक पुलिस स्टेशन पर हमला करने के बाद करीब दो दर्जन गाडिय़ों, दुकानों में आग लगा दी और लूटपाट की। बीजेपी इसे किस रुप में देखती है?
ममता बनर्जी का आरोप पूरी तरह गलत है। अगर लोगों की बीएसएफ से नाराजगी थी तो गुस्साये लोगों ने बीएसएफ के बैरकों में आग क्यों नहीं लगाई और सीधे कालियाचक पुलिस स्टेशन में जाकर ही आग क्यों लगाई? इसका सीधा अर्थ है कि यह हिंसा और आगजनी बेहद सुनियोजित तरीके से रची और अंजाम दी गई होगी। दरअसल ममता बनर्जी हों या कांग्रेस या सीपीएम सभी अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति करती रही हैं। चाहे ये दल विपक्ष में रहें या सत्ता में मुसलमानों के वोट के लिये कभी एक-दूसरे की आलोचना नहीं करते हैं। जबकि, बीजेपी राष्ट्रीय सुरक्षा के बदले न तो कभी वोट बैंक, न ही जाति और न ही धर्म की राजनीति करती है।
मालदा हिंसा की जांच में टीएमसी नेताओं के नाम भी सामने आए हैं, ऐसे में इससे संबंधित जांच पर आपका क्या कहना है?
जांच के नाम पर हो रही कार्रवाई महज दिखावा और खानापूर्ति है। मीडिया ने भीड़ का पूरा वीडियो दिखाया है। वीडियो में साफ-साफ दिख रहा है कि खुलेआम लोग बंदूकें, पेट्रोल बमों और तलवारों को लेकर घूम-घूम कर आग लगाते और तोडफ़ोड़ करते दिखे हैं, लेकिन उन्हें प्रशासन ने गिरफ्तार नहीं किया, क्योंकि वे टीएमसी के कार्यकर्ता या उसके समर्थक हैं।
ऐसी बातें भी निकल कर सामने आ रही हैं कि कालियाचक थाने में जाली नोटों और अफीम की खेती व तस्करी वाले गिरोहों से संबंधित सबूत जलाने के लिए ही वहां आगजनी की गई थी। इस पर आपका क्या कहना है?
पूरी घटना और उस पर मीडिया रिपोर्ट देखने के बाद सब कुछ साफ हो गया है कि वहां पुलिस नपुंसक बनीं रही और हिंसक भीड़ को रोकने में नाकाम रही। खुद पुलिस का कहना था कि उन्हें ऊपर से ही भीड़ में शामिल लोगों के खिलाफ कोई भी एक्शन न लेने का आदेश मिला था। ये आदेश इसलिए दिये गये थे, क्योंकि एनआईए पहले से ही उन मामलों की जांच कर रही है और इस मामले में अब तक 15 लोग पकड़े गये हैं और पकड़े गये लोगों में अधिकांश मालदा के ही हैं। साथ ही आईएसआई के पकड़े गये लोगों ने इस बात का खुलासा किया है कि मालदा किस तरह से देश की सुरक्षा के खिलाफ ऐसी गैरकानूनी गतिविधियों का अड्डा बन चुका है। यही बातें हमने राष्ट्रपति जी से बातचीत में भी उनके सामने उठाईं हैं।
हिंसा के बाद भाजपा के जांच दल में शामिल नेताओं को वहां जाने से रोका गया। इस मामले को उठाकर आप जनता के बीच अपनी स्थिति कैसे मजबूत करेंगे?
भाजपा के तीन सांसदों को ममता बनर्जी ने मालदा जाने से इसलिए रोका, क्योंकि उन्हें डर था कि इससे बहुत बड़ा सच देश और वेस्ट बंगाल की जनता के सामने आ जाएगा और वह इसे छुपाना चाहती थीं। लेकिन, देश की जनता ऐसे नेताओं और दलों के चरित्र को बखूबी समझती है।
भाजपा का आरोप है कि मालदा नकली नोटों, मादक पदार्थों की तस्करी और देशविरोधी गतिविधियों का केंद्र बन चुका है, क्योंकि राज्य की मुख्यमंत्री और स्थानीय अधिकारी इसकी अनदेखी कर रहे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार इस मामले से कैसे निबटेगी?
केंद्र सरकार की जांच एजेंसी एनआईए इस मामले की जांच पहले से ही बहुत बड़े पैमाने पर कर रही है। केंद्र सरकार के दबाव के चलते ही इसकी रिपोर्ट कालियाचक पुलिस स्टेशन पहुंची थी। बीते दिसंबर में ही एनआईए के डायरेक्टर जनरल ने पश्चिम बंगाल के गृह सचिव के साथ मिलकर मालदा फेंक करेंसी मॉड्यूल को बस्ट करने का प्लान बनाया था और मालदा हिंसा 3 जनवरी को हुई। इससे साफ है कि ममता बनर्जी और उनके प्रशासन ने राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति केंद्र सरकार के जीरो टॉलरेंस की नीति से घबराकर ही मालदा हिंसा की रणनीति बनाई।
दरअसल, मालदा का पूरा इलाका जाली नोटों की तस्करी और अफीम की खेती के लिए कुख्यात है। वहां पूरी आबादी अल्पसंख्यकों की है। अत: यह दो गुटों की आपसी रंजिश भी हो सकती है। बीजेपी के मुताबिक ममता सरकार का मिशन तस्करी में लिप्त मुसलमानों को बचाने के हर संभव उपाय करना है और वह यही कर रहीं हैं, ताकि मुसलमानों का वोट उन्हें मिलता रहे। बंगाल के चुनावों में अल्पसंख्यक वोट कांग्रेस के बाद सीपीएम और अब टीएमसी के खाते में है। अल्पसंख्यक वोटों के तुष्टीकरण का यह खेल उनके संख्या बल के आधार पर टिका है। बंगाल के चुनावों में अल्पसंख्यकों की 27 फीसदी आबादी खासकर मालदा जैसे सीमावर्ती जिलों में कई सीटों पर निर्णायक भूमिका में है। इसलिए तमाम दल उनको लुभाने और उनका हमदर्द बनने की कवायद में हैं। राज्य सरकार व तृणमूल कांग्रेस की चुप्पी का राज भी यही है और विपक्षी दलों की सक्रियता का भी।
मालदा हिंसा के बाद भाजपा जांच दल को ये कहकर वहां नहीं जाने दिया गया कि उनके जाने से स्थिति और खराब हो सकती है। क्या ममता सरकार को डर था कि विपक्षी दल इस मामले का राजनीतिक लाभ उठाने का प्रयास कर सकते हैं और इसे सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल कर सकते हैं?
वहीं मुख्यमंत्री ने घटना के 4 दिनों बाद मालदा हिंसा को बीएसएफ और स्थानीय लोगों के बीच मामूली झगड़ा करार दिया। लेकिन वह इस सवाल का जवाब नहीं दे सकीं कि अगर झगड़ा बीएसएफ से था तो लोगों ने बीएसएफ चौकी पर हमले क्यों नहीं किये और लाखों लोगों की हिंसक भीड़ ने कालियाचक पुलिस थाने को ही क्यों फूंका? क्योंकि यह वाजिब सवाल बीजेपी और देश की जनता का है और क्या ममता बनर्जी कभी इसका जवाब देंगी? बीजेपी का सीधा कहना है कि, कालियाचक थाने में जाली नोटों के सौदागरों व तस्करों, अफीम और गांजे की खेती और तस्करी करने वाले गिरोहों की जांच से संबंधित सबूत जलाने के लिये ही वहां लोगों की हिंसक भीड़ ने आगजनी की थी। लेकिन, ममता राज की पुलिस टुकुर-टुकुर ये सब इसलिए देखती रही, क्योंकि पुलिस को कार्रवाई न करने का आदेश ऊपर बैठे लोगों ने दिया था।
बीजेपी-आरएसएस मालदा हिंसा और उसके बाद के पूरे हालात पर नजर बनाये हुए हैं। अब पार्टी की अगली रणनीति अपने नेताओं अमित शाह, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी और स्मृति ईरानी की चार बड़ी रैलियों के जरिये पश्चिम बंगाल की ममता सरकार का असल चेहरा पश्चिम बंगाल की जनता को दिखाना है। बीजेपी का सीधा आरोप है कि अल्पसंख्यक वोटों के तुष्टीकरण में सीएम ममता बनर्जी देश और राष्ट्रीय हितों की बलि चढ़ा रही हैं।
कुमार मयंक
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