By एस. एन. साहू
दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के आचरण ने ही उन्हें महान बनाया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ भारतीयों को ही एकजुट नहीं किया, बल्कि उस देश में रहने वाले चीनियों सहित दूसरे देशों के लोगों को भी न्याय, मानवाधिकार और मानव गरिमा के लिए संघर्ष करने के लिए एकजुट किया। एक प्रवासी भारतीय महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के आधुनिक इतिहास में सबसे पहले अहिंसक आंदोलन की शुरुआत की।
महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से 9 जनवरी 1915 को भारत आगमन हमारे इतिहास की अहम घटना है। बेशक, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 9 जनवरी को प्रवासी दिवस का ऐलान करके अपनी विराट सोच का परिचय दिया था। महात्मा गांधी कुल 25 वर्ष तक विदेश में रहे, जिनमें लगातार 13 साल उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में बिताए। इसलिए वे ऐसे विरले प्रवासी भारतीय हैं जिनकी अहिंसक योद्धा के रूप में अनोखा योगदान मानव इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज हो गया है।मुंबई में 9 जनवरी 1915 को गांधी का भव्य स्वागत हुआ और बड़े पैमाने पर लोगों का प्यार उन्हें हासिल हुआ। उस समय बांबे क्रोनिकल के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा, मैं सिर्फ यही उम्मीद कर सकता हूं कि भविष्य में अपने आचरण से हमें साबित करना होगा कि हम इस स्वागत के काबिल हैं। उन्होंने आचरण को सबसे अधिक महत्व दिया, जो न सिर्फ प्रवासी भारतीयों के लिए, बल्कि स्वदेश में रहने वाले लोगों के लिए भी उतना ही जरूरी है।
दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी के आचरण ने ही उन्हें महान बनाया। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में सिर्फ भारतीयों को ही एकजुट नहीं किया, बल्कि उस देश में रहने वाले चीनियों सहित दूसरे देशों के लोगों को भी न्याय, मानवाधिकार और मानव गरिमा के लिए संघर्ष करने को एकजुट किया। एक प्रवासी भारतीय महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ्रीका के आधुनिक इतिहास में सबसे पहले अहिंसक आंदोलन की शुरुआत की। यह भी महत्वपूर्ण है कि 9/11/1906 को पहले अहिंसक आंदोलन की शुरुआत हुई थी। आज, 9/11 का जिक्र आते ही हमें स्वत: अमेरिका में वल्र्ड ट्रेड सेंटर के जुड़वे टॉवरों पर आतंकी हमले की याद आ जाती है। इस तरह 9/11 का संबंध आतंकवाद, उग्रवाद और हिंसा से जुड़ गया है जिससे सारी दुनिया आशंका और भय से घिर गई थी। लेकिन हमारे अपने इतिहास में एक प्रवासी भारतीय महात्मा गांधी ने नैतिक और आत्मबल पर आधारित एक नया आंदोलन शुरू किया था, जो मानव इतिहास में हिंसक और खून-खराबे के संघर्ष के खिलाफ एक नए अध्याय की तरह दर्ज होगा। आज के दौर में जब सभ्यताओं के संघर्ष की बातें हो रही हैं, महात्मा गांधी ने सभ्यताओं के सह-अस्तित्व की बातें कीं और व्यवहार में उसे संभव बना कर दिखाया। हम प्रमुख विद्वान प्रोफेसर सैमुअल हंटिंगटन के सभ्यताओं के संघर्ष के सिद्धांत से परिचित हैं। यह सभ्यताओं के एक-दूसरे के विरुद्ध जंग का खतरनाक सिद्धांत है। महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में पहला सत्याग्रह कर रहे थे तो जनरल स्मट्स ने इसी सिद्धांत की वकालत की थी। भारतीयों ने ट्रांसवाल में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध के खिलाफ संघर्ष शुरू किया तो जनरल स्मट्स ने कहा, दक्षिण अफ्रीका पश्चिमी सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि भारत पूर्वी सभ्यता का केंद्र है। मौजूदा पीढ़ी के विचारकों का मानना है कि ये दोनों सभ्यताएं साथ-साथ नहीं चल सकतीं। अगर इन प्रतिद्वंद्वी संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले देश छोटे समूहों में भी आमने-सामने आते हैं तो नतीजा भारी विस्फोटक ही होगा। महात्मा गांधी ने ऐसी दलीलों को छद्म दार्शनिकता बताया और कहा कि पूर्वी सभ्यता डरती नहीं है, बल्कि सकारात्मक रूप से पश्चिमी सभ्यता का खुलकर स्वागत करना चाहती है। हंटिंगटन आज जो कह रहे हैं, वह 1906 में जनरल स्मट्स के कहे का ही विस्तार है। जब संस्कृति और सभ्यता के प्रति महात्मा गांधी के नजरिए पर जोर बढ़ेगा तो सभ्यताएं एक-दूसरे के संपर्क आ सकेंगी और कट्टरता तथा आतंकवाद से ग्रस्त दुनिया में सह-अस्तित्व की व्यावहारिक जरूरत स्थापित हो सकेगी। पहले सत्याग्रह का यही आध्यात्मिक संदेश हमारी सोच और कार्रवाइयों की प्रेरणा बनेगा। महात्मा गांधी के जीवन और काम का यही संदेश धर्म के नाम पर फैली हिंसा और घृणा से मनुष्य को छुटकारा दिलाएगा। दक्षिण अफ्रीका में प्रवास के दौरान महात्मा गांधी ने भारत और भारतीय सभ्यता के प्रतिनिधि के तौर पर भारतीय जीवन-शैली और मूल्यों को आगे बढ़ाया। जब ब्रिटिश साम्राज्य अपने शिखर पर था और व्यक्तिवाद पश्चिमी सभ्यता का प्रतीक बन गया था, तब महात्मा गांधी नैतिकता, अनुशासन और संयम के सभ्यतागत मूल्यों पर जोर दे रहे थे। जब अंग्रेजों को अपने विशाल साम्राज्य पर भारी घमंड था कि उनके राज में सूरज नहीं डूबता, तब गांधी ने उसकी गलतियों और गड़बडिय़ों की ओर ध्यान दिलाया और भविष्यवाणी की कि उसका पतन अनिवार्य है। उस प्रवासी भारतीय ने आधुनिक सभ्यता की गड़बडिय़ों को भी गिनाया था जो आज आधुनिक विकास की प्रक्रिया से पर्यावरण विनाश और जलवायु परिवर्तन का कारण बन रहा है।
पहले सत्याग्रह में भारतीय भाषाओं पर जोर
महात्मा अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास के दौरान बाकी दुनिया के लिए भारत और भारतीय मूल्यों के दूत बने। इसके साथ ही उन्होंने अपनी मातृभाषा और भारतीय भाषाओं के प्रति प्रेम का भी इजहार किया। इससे वहां रह रहे बाकी भारतीय भी अपनी मातृभाषा को तरजीह देने लगे। दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह पर अपनी किताब में गांधी ने स्पष्ट लिखा है कि सत्याग्रह का एक उद्देश्य उस देश में भारतीय भाषाओं को आगे बढ़ाना था। उन्होंने खुद तमिल सीखी और तमिल प्रवासियों के बच्चों को तमिल भाषा पढ़ाने लगे। आज भूमंडलीकृत दुनिया में जब अंग्रेजी के आगे हमारी भाषाएं दोयम स्थिति में पहुंच गई हैं और अंग्रेजी के प्रति बढ़ते रुझान की वजह से हमारी भाषायी विविधता खतरे में है, ऐसे में हमें गांधीजी के जीवन से सीख लेकर अपनी भाषाओं को आगे बढ़ाने का काम करना चाहिए। 20वीं सदी के पहले दशक में जब एक प्रवासी भारतीय, भारतीय भाषाओं के प्रति ऐसा अनुराग दिखा सकता है तो 21वीं सदी जब हमारी भाषाओं के प्रति खतरा बढ़ गया है तो हमें उनकी रक्षा में आगे बढऩा चाहिए।
महात्मा का मिशन स्वच्छ भारत भी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महात्मा गांधी के जन्मदिन को स्वच्छ भारत दिवस मनाने का ऐलान किया। यह जिक्र करना लाजिमी है कि दक्षिण अफ्रीका में गांधी ने साफ-सफाई पर काफी कुछ लिखा और वहां भारतीयों की छवि सुधारने में स्वच्छता का महत्व बताया। जोहान्सबर्ग में 1903 में प्लेग फैला तो गांधी ने उसके प्रसार के लिए साफ-सफाई की कमी और अस्वस्थकर परिवेश को जिम्मेदार ठहराया। इंडियन ओपिनियन के पहले ही अंक में उन्होंने इस बारे में लिखा और लोगों से अपील की कि प्लेग को फैलने से रोकने के लिए अपने परिवेश को साफ-सुथरा रखें। उन्होंन यहां तक लिखा कि भारतीयों को सफाई की नसीहत गोरों से लेनी चाहिए, जो अपने और उसके आसपास को एकदम साफ-सुथरा रखते हैं। आज, जब देश भर में लेागों को यह सिखाने का अभियान चलाया जा रहा है कि सड़कों पर न थूकें और ऐसा करने पर दंड भी भुगतना पड़ सकता है तो हमें गांधीजी की दक्षिण अफ्रीका में दी गई सीख को भी याद करना चाहिए कि जंगलों में थूकने पर जुर्माना भरना पड़ेगा। गांधी के जीवन के ये संदेश आज के दौर में बेहद प्रासंगिक हैं, जब सरकार उनके नाम पर स्वच्छ और सेहतमंद भारत का अभियान चला रही है।
गांधी और भारतीयों को कारोबार करने का अधिकार गांधीजी को दक्षिण अफ्रीका जाते समय वहां भारतीयों के भेदभाव झेलने की असली वजह का अंदाजा नहीं था। उन्हें सिर्फ इतना ही मालूम था कि वहां भारतीयों को चमड़ी के रंग के कारण गोरों से रंगभेद झेलना पड़ता है। लेकिन दक्षिण अफ्रीका पहुंचकर उन्होंने पाया कि कारोबार को लेकर ईष्र्या भाव के कारण प्रवासी भारतीयों को गोरों से भेदभाव झेलना पड़ता है। उन्होंने देखा कि मजदूर के रूप में वहां ले जाए गए ज्यादातर भारतीयों ने अतिरिक्त आमदनी के लिए छोटी-मोटी दुकानें खोल ली हैं और बेहतर मुनाफा कमा हैं। यह देखकर गोरों ने भारतीयों के कारोबार में अड़चन डालने और उन्हें ठप्प करने की नीति अपनाई। ऐसी एक नीति यह थी कि भारतीयों को कारोबार करने का अधिकार नहीं है, क्योंकि कभी उनके पास यह अधिकार नहीं था। यहां तक कि वे एक जगह से दूसरी जगह अपना कारोबार ले जाते तो उन्हें यह कहकर मुश्किल में डाल दिया जाता था कि नई जगह के कारेबार को नया माना जाएगा। गांधीजी ने लिखा है कि गोरे यह जानकर भारतीयों के व्यवसाय को फलने-फूलने नहीं देते थे कि भारतीय उद्यमियों को मौका मिला तो वे अपने हुनर से यूरोपीय लोगों को परास्त कर देंगे। इस तरह उन्होंने व्यापार और कारेबार में भारतीयों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रेखांकित किया। दक्षिण अफ्रीका के अंग्रेज शासकों को एक ज्ञापन में उन्होंने लिखा कि भारतीय लोग जन्म से ही कारोबारी होते हैं और फिर ऐसे मामलों में भेदभाव रुका। 21वीं सदी में जब भारत दुनिया में व्यापार और कारोबार का केंद्र बन रहा है, गांधी की यह अंतर्दृष्टि गौर करने के काबिल है कि भारतीय जन्म से ही व्यापारी होते हैं। उनके पहले सत्याग्रह का एक उद्देश्य यह था कि दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के कारोबार करने के अधिकार बहाल हों। उन्होंने यह अधिकार सफलतापूर्वक हासिल कर लिया। आज, दुनिया भर के प्रवासी भारतीय हर क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्हें हुनर, संपत्ति और मानव संसाधन का भंडार माना जाता है। भारत के विकास और प्रगति में उनका योगदान देश की क्षमताओं के विकास में अहम होगा। राष्ट्र निर्माण में उनके हुनर का अहम योगदान होगा। 20वीं सदी के पहले दशक में गांधी भारतीय के कारोबार करने के अधिकार के लिए लड़ रहे थे। आज 21वीं सदी में दुनिया भर में भारत के उद्यमी, वैज्ञानिक, अकादमिक, आर्किटेक्ट और अन्य पेशवर अपना डंका बजा रहे हैं। गांधीजी को यह बखूबी एहसास था कि एक दिन दुनिया भर में भारतीयों का हुनर बढ़-चढ़कर बोलेगा। हर साल 9 जनवरी को प्रवासी दिवस के आयोजन में आप्रवासी भारतीयों की बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी और उनके हुनर के प्रदर्शन ने साबित किया है कि भारत के आर्थिक, सांस्कृतिक और हर क्षेत्र में विकास में उनका योगदान बना रहेगा।
गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और चीनियों में एकजुटता कायम की यह कम ही लोग जानते हैं कि गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में भारत और चीन के रिश्तों में एक नया अध्याय शुरू किया था। अपने पहले सत्याग्रह में गांधी वहां रह रहे चीनी लोगों के संपर्क में आए और उनमें कई ने सत्याग्रह में हिस्सा भी लिया और जेल भी गए। दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और चीनियों के बीच एकजुटता का अब एक मायने में प्रासंगिकता बढ़ गई है, क्योंकि दोनों ही देश दुनिया में बड़ी आर्थिक शक्ति के रूप में विकसित हो रहे हैं। दरअसल दोनों ही देशों के प्रवासी लोगों ने अपने-अपने देश के विकास में बड़ी भूमिका निभाई है। दोनों ही देशों को आज गांधी के उस योगदान को याद करना चाहिए, जब उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों और चीनियों में एकजुटता कायम की थी। पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत के.आर. नारायणन ने पेकिंग यूनिवर्सिटी में 30 मई 2000 को अपने संबोधन में इसका जिक्र किया था।
गांधी ने गिरमिटिया मजदूरों को सच्चा नायक बताया दक्षिण अफ्रीका में पहले सत्याग्रह की एक बड़ी उपलब्धि यह थी कि उसमें साधारण और गरीब भारतीयों ने हिस्सा लिया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि दक्षिण अफ्रीका में पहले सत्याग्रह से इतिहास में आम आदमी का दौर शुरू हुआ। इतिहास में इसके पहले की क्रांतियों में अमीर और अभिजात्य लोगों ने ही हिस्सा लिया था, जबकि पहले सत्याग्रह के केंद्र में साधारण लोग थे। भारत लौटकर गांधी ने गिरमिटिया मजदूरों को ही भारत का सच्चा नायक बताया था। बेशक, आज 21वीं सदी में आप्रवासी भारतीय भारत की ताकत और संसाधनों के नायक हैं। 9 जनवरी 1915 को भारत लौटने के बाद गांधी ने साधारण लोगों की दशा देखने और अंग्रेजी राज के शोषण को समझने के लिए ही पूरे देश का भ्रमण किया। उन्होंने अपना रहन-सहन सामान्य आदमी की तरह किया। पूरे देश को ताकतवर अंग्रेज सरकार के खिलाफ अहिंसक संघर्ष के तले एकजुट करके खड़ा कर दिया। साधारण जीवन का महत्व आज सबसे अधिक प्रासंगिक है। आज भौतिक समृद्धि और तड़क-भड़क वाली संस्कृति साधारण लोगों को दोयम दर्जे के जीवन जीने को मजबूर कर रही है।
गांधी के जीवन से जिम्मेदारी का संदेश गांधी ने प्रवासी भारतीय के रूप में शुचिता और ईमानदारी की अनोखी मिसाल पेश की। पैसे के लेन-देन के मामले में जिम्मेदारी और जवाबदेही के महत्व को उन्होंने अपने अनगिनत लेखों में जाहिर किया है। अब यह एहसास ज्यादा तेजी से हो रहा है कि सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही हमें अधिक लोकतांत्रिक और साफ-सुथरा बनाने के लिए बेहद जरूरी है। असल में पहला सत्याग्रह जवाबदेही के भाव को जगाने का सत्याग्रह भी था। गांधीजी चंदा जुटाने और उसे खर्च करने का पाई-पाई का हिसाब रखते थे और उसे निरीक्षण के लिए आगे करते थे। उन्होंने सत्याग्रह पुस्तक में लिखा, सार्वजनिक जीवन का वरण करने वाले युवाओं के फायदे के लिए यह बताना जरूरी है कि हम हिसाब-किताब के मामले में इस कदर पक्के थे कि छोटी-छोटी रसीदें भी संभालकर रखते थे, जैसे स्टीमर पर खरीदा जाने वाला सोडा वाटर। इसी तरह हम टेलिग्राम की रसीदें भी संभालकर रखते थे। मुझे याद नहीं आता कि विस्तृत हिसाब-किताब लिखने के वक्त एक भी चीज सामान्य खाते में डाली जाती थी। हमें हर पैसे का हिसाब रखना चाहिए। अगर निजी जीवन में ऐसी जिम्मेदारी का भाव जरूरी है तो सार्वजनिक जीवन में इसकी और अधिक जरूरत है। हिसाब-किताब रखना एक अलग काम है, इसमें पर्याप्त सफाई होनी चाहिए। अगर संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता हमसे लिहाज या भय से हिसाब नहीं मांगते तो वे भी बराबर के हिस्सेदार हैं। अगर को सवैतनिक कार्यकर्ता अपने काम और पैसे का हिसाब रखने को बाध्य हैं तो स्वयंसेवक को भी काम का हिसाब रखने और देने की उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी है। यह काफी महत्व का है और कई संस्थाओं में इसका पालन किया जाता है...
जवाबदेही के भाव में क्षरण ही आज प्रशासन की गड़बडिय़ों की मूल वजह है। सौ साल पहले महात्मा गांधी ने जवाबदेही की मिसाल रखी थी। हमें उससे सीख लेकर उसका पालन करना चाहिए।
धर्मों की एकता महात्मा 9 जनवरी 1915 को जब भारत लौटे, उसके पहले ही वे विभिन्न धर्मों के बीच शांति, सहनशीलता और सह-अस्तित्व की मिसाल कायम कर चुके थे। पहले सत्याग्रह में हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाई अपने साझा मकसद के लिये हाथ मिलाकर लड़े और एक-दूसरे धर्मों का सम्मान किया। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान गांधी ने पहले सत्याग्रह का कई बार जिक्र किया और कहा कि सत्य और अहिंसा के प्रति दृढ़ विश्वास से सत्याग्रहियों ने हर धर्म में सुंदर चीजों की खोज की। गौरतलब है कि पहले सत्याग्रह में मुसलमान सबसे आगे थे। कभी उन्होंने अपनी मजहबी पहचान को दूसरी पहचान और मकसद के आड़े नहीं आने दिया। वे हमेशा दिल से भारतीय पहचान को ही तवज्जो देते रहे।आज कट्टरतावादी समाज में धर्म के नाम पर खाई पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं और हमारे मुसलमान भाई-बहनों से अपना देशप्रेम साबित करने को कहते हैं। ऐसे वक्त में हमें पहले सत्याग्रह के संदेश को समझना चाहिए और भारत के बारे में अपने नजरिए पर दोबारा विचार करना चाहिए।
भारतीय मूल्यों में रचा-बसा कोई प्रवासी भारतीय ही धर्मों की एकता के महत्व को बेहतर समझ सकता है। जब कोई धर्म के नाम पर लोगों में फूट डालने की कोशिश करे तो उसे महात्मा गांधी के जीवन और काम के संदेश को एक बार जरूर याद कर लेना चाहिए। इस तरह महात्मा गांधी के प्रवासी भारतीय के रूप में महत्व अनोखा है।(लेखक राज्यसभा सचिवालय में संयुक्त सचिव हैं। इस लेख में उद्धृत विचार लेखक के निजी हैं।)
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