यमुना नदी का उद्गम बन्दरपूँछ में स्थित हिमानी यमुनोत्री से होता है। ये नदी पांच राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, दिल्ली से होकर उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के समीप गंगा नदी से मिल जाती है। नदियां किसी भी संस्कृति की प्राथमिक धरोहर रही हैं। वास्तव में विश्व की सभी सभ्यताएं किसी न किसी नदी के किनारे ही विकसित हुई हैं। ये न केवल जीवनदायिनी हैं अपितु बड़े पैमाने पर ये हमारी विभिन्न सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास की आधारशिला हैं। ये नदियां भौगोलिक स्वरुप के साथ -साथ आजीविका से लेकर आध्यात्मिकता तक मनुष्यों के सांस्कृतिक मूल्यों का भी निर्धारण करती हैं। इन्हीं के इर्द-गिर्द समाज उत्तरोतर विकसित हुआ हैं किन्तु विकास के इस क्रम में मानव ने अविवेकी अभ्यास के फलस्वरूप इन नदियों को बहुत ही दूषित किया है। भारत में प्रदूषित नदियों के इस क्रम में यमुना संभवतः प्रथम अंक पर है, खासतौर पर जब यह दिल्ली क्षेत्र से प्रवाहित होती है।
बढ़ती जनसंख्या, सिंचाई के पानी के बढ़ते उपयोग साथ ही बड़े पैमाने पर बैराजों के निर्माण के फलस्वरूप ( विभिन्न राज्यों में ) यमुना नदी का पानी मोड़ दिया जाता है जिसके कारण दिल्ली में यमुना का जलस्तर सामान्य से भी कम पाया जाता है। ज्ञात है की यमुना नदी दिल्ली में अपनी कुल लम्बाई का मात्र 54 किलोमीटर ही विस्तृत है फिर भी वजीराबाद से लेकर ओखला तक के मात्रा 22 किलोमीटर के कम क्षेत्र में नदी अपने प्रदूषण के चरम स्तर पर पायी जाती है। आंकड़ों की भाषा में नदी के इस 2 प्रतिशत से भी कम के क्षेत्र में प्रदूषण भार 76 प्रतिशत से अधिक है। अतः प्रदूषण का यह भयावह स्तर मानवीय कल्पना से परे है। जिसका एक बड़ा कारण वजीराबाद के बाद यमुना नदी के प्राकृतिक प्रवाह में अत्यंत कमी है। इसके बाद यमुना नदी वास्तव में एक नाले के रूप में परिवर्तित हो जाती है। साथ ही इस 22 किलोमीटर के छोटे क्षेत्र में नदी में विभिन्न संयत्रों जैसे फार्मास्यूटिकल, टेक्सटाइल, केमिकल, शुगर इत्यादि संयत्रों से निकलने वाला दूषित पानी 18 बड़े नालों के माध्यम से या तो उपचारित या अनुपचारित रूप में ही निर्बाध रूप से यमुना नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। इन नालों द्वारा लाये गए जहरीले रासायनिक तत्व नदी को प्रदूषित करने के साथ -साथ उसमें पाए जाने वाले तथा उस पर निर्भर रहने वाले जीवों को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है साथ ही अन्य रसायनों की उपलब्धता होने से नदी में यूट्रोफिकेशन अर्थात पौष्टिक तत्वों की मात्रा में अत्यंत वृद्धि हो जाती है जिससे नदी में शैवाल एवं अन्य जलीय पौधों के आश्चर्यजनक वृद्धि के परिणाम स्वरुप नदी में पायी जाने वाली घुलित ऑक्सीजन कम हो जाती है जिससे जलीय जंतु का जीवन खतरे में आ जाता है और केवल यही नहीं नदी के पानी के स्तर में भी गिरावट दर्ज की जाती है।
वास्तव में किसी भी नदी के जीवंत होने का प्रमाण उसमे मौजूद घुलित ऑक्सीजन की मात्रा से किया जाता है किन्तु दिल्ली प्रदूषण नियंत्रण कमेटी द्वारा यमुना नदी के 9 घाटों के सर्वेक्षण के दौरान यह पाया गया की 9 में से सात घाटों में ऑक्सीजन की उपलब्ध मात्रा शून्य पर चली गयी है, अर्थात नदी वास्तविकता में मृतप्राय हो गयी है। इसी तरह इसी कमेटी के एक अन्य रिपोर्ट में यह पाया गया की यमुना नदी में पल्ला (जहाँ से नदी दिल्ली में प्रवेश करती है ) के समीप जैव -ऑक्सीजन मांग 2 मिलीग्राम/लीटर थी जबकि असगरपुर में (जहाँ से नदी दिल्ली से बाहर जाती है ) जैव -ऑक्सीजन मांग 28 गुना बढ़कर 85 मिलीग्राम/लीटर तक पहुँच गयी थी। इसी तरह राज्य जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार 2023 में किये गए एक अध्ययन में यमुनोत्री के पास फीकल कॉलिफोर्म बैक्टीरिया 2 MPN (मोस्ट प्रोबबल नंबर) पायी गयी जबकि दिल्ली में असगरपुर के पास इन्हीं कॉलिफोर्म जीवाणुओं की संख्या करीब 3 लाख के करीब पायी गयी जो की सीवेज से निकलने वाले प्रदूषकों के कारण अधिक गंभीर स्तर पर पहुँच गयी है। इसका अभिप्राय यह है की नदी का पानी न तो पीने योग्य है न ही स्नान योग्य। अतः मूल रूप से नदी में प्रदूषण स्तर बढ़ने के दो ही कारण हैं पहला औद्योगिक (जहरीले रसायनो का नदी में सीधा विसर्जन ) दूसरा घरेलू (विभिन्न मानवीय गतिविधियों द्वारा विसर्जित प्रदूषक तत्त्व जैसे डिटर्जेंट , तेल , ग्रीस , इत्यादि ) साथ ही नदी में पूजन सामग्री, मूर्तियों आदि के विसर्जन के कारण भी प्रदूषण स्तर बढ़ता है क्योंकि इनमें से अधिकतर चीजें कृत्रिम एवं विभिन्न रासायनिक रंगों से बनी होती हैं जो की आसानी से नदी में नहीं घुलती हैं फलस्वरूप नदी दिन प्रतिदिन प्रदूषित होती जा रही है। चूँकि राजधानी क्षेत्र के 90 प्रतिशत लोगों के पानी की पूर्ति यमुना नदी से ही संभव है अतः यमुना नदी का पुनरोद्धार अतिआवश्यक है। परन्तु अब प्रश्न यह उठता है िक क्या यमुना नदी का पुनरोद्धार संभव भी है और ये कैसे तथा कितने वर्षों में हो सकता है ?
वास्तव में यमुना नदी के प्रदूषण को कम करने का प्रयास 32 वर्ष पूर्व ही शुरू कर दिया गया था जब केंद्र सरकार द्वारा 1993 में यमुना कार्य योजना की नींव रखी गयी थी। बाद में इसे नमामि गंगे कार्यक्रम के अंतर्गत सम्मिलित कर लिया गया जिसके तहत गंगा नदी बेसिन के सभी नदियों का संरक्षण एवं सफाई करना है। हालाँकि इस पूरे बेसिन क्षेत्र में कई सीवेज उपचार संयंत्र स्थापित हैं परन्तु ये अपनी उपलब्ब्ध क्षमता से कम पानी का ही शोधन कर रहे हैं अतः इनकी उपलब्ध क्षमता का पूर्ण उपयोग करना आवश्यक है साथ ही कई अन्य नए उपचार संयंत्रों को स्थापित करने की आवश्यकता है।

नदी के पर्यावरणीय (मूल ) प्रवाह एवं वेग को बनाये रखने के लिए सामान्य जलस्तर को बरक़रार रखने की आवश्यवकता है। चूँकि नदी का जल स्तर जब अधिक होता है तो भूमिगत जल का स्तर भी बना रहता है किन्तु जब नदी का जलस्तर कम होता है (बैराज आदि के निर्माण के साथ -साथ बढ़ी हुई जनसंख्या और सिंचाई के लिए जल की अधिक मांग ) तब भूमिगत जलस्तर नीचे होने के कारण नदी का रिसाव बढ़ जाता है जिसकी वजह से कई अवांछनीय तत्त्व भी भूमिगत जल में प्रवेश कर जाते हैं जो कि कई असाध्य शारीरिक एवं चर्म रोग को जन्म देते हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने दिल्ली विकास प्राधिकरण को नदी बेसिन के क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने और गैरकानूनी ढाँचागत विकास के प्रतिबन्ध को सुनिश्चित किये जाने का आग्रह किया है। नदी से भारी पैमाने पर हो रही अवैध बालू खनन को प्रतिबंधित किया जाना आवश्यक है, क्योंकि यह प्रक्रिया नदी मार्ग को प्रभावित करने के साथ -साथ प्रवासी पक्षियों के सुचारु आवागमन को भी अवरोधित करती है।
अंत में यमुना नदी जल सरंक्षण एवं पुनरोद्धार की प्रक्रिया का सकारातमक परिणाम सभी राज्यों के आपसी सहयोग एवं अथक प्रयास के कारण ही संभव हो सकता है। हाल ही में दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के साथ ही डबल इंजन की सरकार निर्मित हुई है। अब केंद्र तथा राज्य सरकार मिलकर यमुना नदी के सरंक्षण के प्रयासों को द्रुत गति से शुरू कर सकती हैं तथा गुजरात मॉडल (साबरमती रिवर फ्रंट) का प्रयोग कर यमुना नदी के भी पुनरोद्धार कार्य को सुनिश्चित किया जा सकता है।
अतः सरकार यमुना पुनरोद्धार कार्यक्रम के सफल संचालन के लिए चरणबद्ध तरीके से निम्नलिखित कदम उठा सकती है जैसे- ठोस एवं अपशिष्ट प्रबंधन , सीवेज उपचार संयंत्र की स्थापना, नदी में सामन्य जलस्तर प्रवाह को बरक़रार रखना, अतिक्रमण एवं बाढ़ आशंकित क्षेत्रों में अवैध निर्माण को प्रतिबंधित करना, पारिस्थितिकीय महत्व को बनाये रखने के लिए पेड़ लगाकर हरित पट्टी का निर्माण कर वन्य जीवों को आवासीय सुरक्षा एवं स्थिरता प्रदान करना। साथ ही इन प्रयासों को सफल अमलीजामा पहनाने के लिए आम जनता का जागरूक एवं सचेत होना अतिआवश्यक है तभी सामुदायिक भागीदारी एवं जवाबदेहिता को संज्ञान में रखते हुए यमुना संरक्षण के प्रति गहन संकल्पित हुआ जा सकता है। हालाँकि नदी की वर्तमान दशा को देखते हुए यह राह सरल नहीं होगी परन्तु ये असंभव भी नहीं है!

स्मृति उपाध्याय
(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के हैं। उनसे संपादक व प्रकाशक का सहमत होना अनिवार्य नहीं है। किसी भी विवाद की स्थिति में हमारा न्याय क्षेत्र दिल्ली होगा।)
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