हमारा देश तेजी से आगे बढ़ रहा है, हमारे आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रम तरक्की भी कर रहे हैं लेकिन अब भी हम बैसाखियों के भरोसे ही हैं। क्योंकि विकास के लिए सबसे जरुरी है रिसर्च और डिवेलपमेंट, जिसमें हमारे देश अभी काफी पीछे है।
पिछले दिनों मेरा ध्यान एक खबर की तरफ गया कि हमारे देश को लड़ाकू विमानों के 42 स्क्वैड्रन की जरुरत है लेकिन उसके पास मात्र 31 स्क्वैड्रन ही बचे हैं क्योंकि भारतीय कंपनियां तेजी से लड़ाकू विमान तैयार नहीं कर पा रही हैं। वायुसेनाध्यक्ष अमरप्रीत सिंह ने तो साफ तौर पर कहा है कि भारतीय कंपनियों को प्रतिवर्ष 30 से 40 लड़ाकू विमान तैयार करने होंगे लेकिन हालत यह है कि फिलहाल 4 से 5 लड़ाकू विमान भी नहीं बन पा रहे हैं क्योंकि हम लड़ाकू विमानों के लिए 90 किलो न्यूटन से ज्यादा थ्रस्ट पैदा करने वाला इंजन तैयार नहीं कर पाए हैं और इसके लिए हम कभी अमेरिकी की जनरल इलेक्ट्रिक तो कभी फ्रांस की सफ्रान कंपनी का मुंह ताक रहे हैं और ऐसा इसलिए है क्योंकि लड़ाकू विमानों का इंजन तैयार करने के लिए जिस उच्च दबाव वाले मेटल यानी धातु की जरुरत होती है। वह हमारे रक्षा अनुसंधानकर्ता तैयार नहीं कर पाए हैं और यह हालत तब है जब डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट संस्थान यानी डीआरडीओ के मुखिया समीर कामत खुद ही विश्वस्तर के मेटोलॉजी यानी धातु विज्ञान के वैज्ञानिक हैं। फिर भी हम स्वदेशी इंजन तैयार कर पाने में अक्षम साबित हुए हैं। इसका कारण है कि भारत में रिसर्च की परंपरा स्थापित करने पर पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा ध्यान ही नहीं दिया गया और अब भी रिसर्च के लिए अक्सर बजट की कमी बनी ही रहती है।
यह हालत सिर्फ रक्षा क्षेत्र की ही नहीं है बल्कि नागरिक उत्पाद के क्षेत्र में भी रिसर्च की कमी देखी जा रही है अमेरिका, यूरोप, जापान, रूस जैसे देशों की तो बात ही रहने दें। इन विकसित देशों में तो 50-50 सालों से गहन रिसर्च का काम चल रहा है जिसकी वजह से यह देश माइक्रो चिप से लेकर लड़ाकू विमान तक अपने दम पर बनाने में सक्षम हैं। दक्षिण कोरिया जैसा छोटा सा देश भी रिसर्च और डिवेलपमेन्ट में हमसे आगे है दक्षिण कोरिया भारी अनुसंधान और विकास में निवेश करके अपनी अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ाया, जबकि भारत अनुसंधान और विकास पर कम खर्च कर रहा है।
भारत की कंपनियां और संस्थान अभी भी अनुसंधान और विकास में कम निवेश कर रहे हैं और यह देश के युवाओं के बीच बेरोजगारी के कई कारणों में से एक है।
वैसे तो मोदी सरकार आने के बाद से देश की अर्थव्यवस्था को तेज गति देने के लिए कई तरीके अपनाए गए हैं।

व्यवसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा दिया गया
MSME को सहारा दिया है
निर्यात को बढ़ाने की नीतियां बनाई हैं
PLI योजनाएं भी लाई हैं लेकिन एक जरूरी चीज हम भूल गए हैं वह है R&D यानी अनुसंधान और विकास कोरिया जैसे छोटे देशों की तेज तरक्की का राज R&D में उनका भारी निवेश है। 1970 के दशक के बाद कोरिया की अर्थव्यवस्था में तेजी से वृद्धि हुई। इसका कारण R&D में किया गया निवेश ही था। लेकिन हम कोरिया से सीखने के बजाय बड़े व्यवसायों पर दांव लगा रहे हैं।
कोरिया अपने बड़े उद्योग समूहों जैसे ह्युंडाई और सैमसंग को सपोर्ट तो करता है लेकिन एक शर्त पर कि वे रिसर्च एंड डिवेलपमेन्ट में निवेश करें। कोरिया अपनी जीडीपी का 5 प्रतिशत R&D पर खर्च करता है, जबकि भारत केवल 0.7 प्रतिशत खर्च करता है। इसमें भी निजी क्षेत्र का योगदान बहुत कम है। भारत में रिसर्च पर निजी क्षेत्र का योगदान केवल 41प्रतिशत है, जबकि कोरिया में यह 79 प्रतिशत है। सैमसंग जैसी कंपनी R&D पर 8-11 प्रतिशत खर्च करती है जबकि उससे कई गुना बड़ी रिलायंस जैसी कंपनी रिसर्च पर केवल 0.6 प्रतिशत खर्च करती है यहां तक कि टाटा स्टील, ITC और मारुति जैसे बड़े उद्योग समूहों ने भी पिछले पांच वर्षों में R&D पर खर्च कम कर दिया है।
भारत सरकार टाटा, अंबानी और अडानी जैसे उद्योगपतियों का समर्थन करती है और करना भी चाहिए। लेकिन इन कंपनियों को रिसर्च एंड डिवेलपमेंट में आलस्य करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। अब से कोई 60 से 70 वर्ष पहले भारत और दक्षिण कोरिया बराबर की स्थिति में थे। भारत उपनिवेशवाद के कहर से निकला ही था। वहीं कोरिया चीन के खिलाफ युद्ध से उबर रहा था। दोनों देश कृषि प्रधान थे। उनके उद्योग कम कुशल और श्रम प्रधान थे।
लेकिन 1980 में कोरिया ने ज्ञान आधारित उद्योगों को चुना और हमसे आगे निकल गया। भारत की वामपंथी रुझान वाली कांग्रेसी सरकारें रूस पर निर्भर हो गईं और उनके रिसर्च और डिवेलपमेंट के भरोसे बैठ गईं। जिससे देश में रिसर्च का माहौल विकसित ही नहीं हो पाया हालांकि भारत के युवा बेहद प्रतिभाशाली हैं और निजी तौर पर वह रिसर्च के काम में जुटे होते हैं लेकिन उन्हें व्यवस्था की तरफ से वह प्रोत्साहन नहीं मिल पाता है जिसकी उन्हें सख्त जरुरत है। यही कारण है कि भारत में 15-24 वर्ष की आयु के 25 प्रतिशत युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण में नहीं हैं वहीं कोरिया में यह संख्या केवल 5 प्रतिशत है भारत के बहुत से युवा व्यावसायिक कौशल हासिल करने के बावजूद निराश और बेरोजगार हैं। नेचर वर्ल्ड साइंस रैंकिंग में भारत 11वें स्थान पर है।
विश्वविद्यालयों में रिसर्च का काम हो रहा है साइंटिफिक पेपर छापे जा रहे हैं किंतु इसकी दिशा तय नहीं है। जिसकी वजह से कई बार छात्रों द्वारा बरसों की मेहनत से की गई रिसर्च बेकार हो जाती है। वैसे तो भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम का लोहा पूरी दुनिया मानती है हाल ही में हमने चांद पर रॉकेट भी भेजा है। हमारे युवाओं के पास बौद्धिक शक्ति भी है लेकिन रिसर्च और डिवेलपमेंट जैसे ईंधन के अभाव में यह शक्ति पूरी तरह से काम नहीं करती। हालांकि इस कमी को दूर करने के लिए भारत सरकार अपने बाजार की ताकत का उपयोग कर रही है। जिसके तहत विदेशी कंपनियों को भारत में ही प्रोडक्शन करने और तकनीक के हस्तांतरण के लिए मनाया जा रहा है। जिसमें कई बार भारत को सफलता भी हासिल हुई है। लेकिन कोई भी कंपनी अपनी दशकों की मेहनत से की गई रिसर्च को ऐसे ही किसी दूसरे देश के हवाले नहीं करना नहीं चाहती हालांकि भारत के विशाल बाजार में अपनी उपस्थिति बनाए रखने के लिए विदेशी कंपनियों को कई बार अपनी रिसर्च शेयर करने के लिए मजबूर होना पड़ा है लेकिन यह कंपनियां बहुत बेमन से इस काम को करती हैं जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण अमेरिका की जनरल इलेक्ट्रिक कंपनी है जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साल 2023 की अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान भारत में हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड के साथ मिलकर जीई-404 और जीई 414 इंजन तैयार करने के लिए मना लिया था लेकिन इस समझौते के लगभग दो साल बीत चुके हैं और अब तक यह कार्य शुरु नहीं हो पाया है जीई कंपनी लगातार इंजन देने में हीला हवाली कर रही है जिसकी वजह से भारत के के तेजस विमान तैयार नहीं हो पा रहे हैं और हमारे पास पास लड़ाकू विमानों की कमी होती जा रही है यह एक उदाहरण है कि कैसे भारत को आगे बढ़ना है तो अपने देश में अपने शोध छात्रों और वैज्ञानिकों द्वारी की गई रिसर्च पर भरोसा करना होगा।
विदेशी रिसर्च के भरोसे हम अपने देश को आत्मनिर्भर नहीं बना सकते है। भारत में हमारे पास सोचने वाले दिमाग हैं, लेकिन संस्थागत ताकत की कमी है। इस कमी को हमें दूर करना ही होगा जिसका समाधान सिर्फ और सिर्फ रिसर्च और डिवेलपमेंट है। जिसकी जरुरत सैन्य और नागरिक दोनों क्षेत्रों को है ।

अंशुमान आनंद
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